शनिवार, 31 जुलाई 2010

मैं ऐसा क्यों करती हूँ?

ये प्रश्न मैंने अपने आप से तब पूछा, जब किसी ने सीधे-सीधे मुझसे पूछ लिया कि मैं ये औरतों वाले मुद्दों के पीछे क्यों पड़ी रहती हूँ??? यह भी कहा कि आप नारीवादियों का बस एक ही काम है औरतों को उनके घर के पुरुषों के खिलाफ भड़काना और पुरुषों के विरुद्ध तरह-तरह के इल्जाम लगाना. आप ये सोच सकते हैं कि कोई मुझसे इतना सब कह गया और मैं सुनती गयी...हाँ, क्योंकि मैं जिस विषय पर शोध कर रही हूँ, जो मेरा मिशन है, उसका पूर्वपक्ष और प्रतिपक्ष सुनना ज़रूरी है. ये देखना ज़रुरी है कि ये मानसिकता हमारे समाज में कितनी गहरी पैठी है कि कोई नारी-सशक्तीकरण की बात सुनना ही नहीं चाहता, या फिर उसे सिर्फ गरीब औरतों से जोड़कर देखता है, पर इससे पहले ये जानना ज़रुरी है कि मैं ऐसा क्यों करती हूँ ? मतलब नारी मुद्दों पर लेख लिखना, कवितायें लिखना, बहस करना, विरोध करना और जिस जगह नारी-सम्बन्धी कोई अनुचित बात दिखे वहाँ कूद पड़ना.

मेरे मन में नारी-मुद्दों को लेकर जो अत्यधिक संवेदनशीलता है, वो सिर्फ इसलिए नहीं है कि मैं अपने जीवन में पुरुषों द्वारा सताई गयी हूँ, हालांकि मैंने भी बहुत कुछ झेला है, जो किसी भी भावुक औरत को विद्रोही बनाने के लिए पर्याप्त है. पर बात इतनी सी ही नहीं है... इससे कहीं आगे की है. मैं गहन अध्ययन और विचार-विमर्श में विश्वास करती हूँ और यह अध्ययन सिर्फ किताबी नहीं है, वास्तविक समाज का अध्ययन है, लोगों का अध्ययन है. इसी कारण मैं समाज को एक नए नजरिये से देखना चाहती हूँ, जो कि कोई भी तार्किक और संवेदनशील व्यक्ति कर सकता है, भले ही उसने उतनी पढ़ाई ना की हो.

हमारा समाज बहुत ही रुढिवादी है, जो कि ना सिर्फ परिवर्तन से डरता है बल्कि चीज़ों को नए दृष्टिकोण से देखना तक नहीं चाहता, पर मैं इतना कहूँगी कि अगर आप किसी बात को बस एक आयाम से देखते हैं, तो कभी भी प्रगति नहीं कर सकते. अगर आपने सिर्फ इतिहास पढ़ा और सबाल्टर्न इतिहास नहीं पढ़ा, तो आपका ज्ञान अधूरा है; सिर्फ संस्कृत पढ़ी, प्राकृत नहीं, तो आप अधूरी जानकारी रखते हैं, इसी तरह मनोविज्ञान के साथ समाजशास्त्र और मानवशास्त्र जुड़ा हुआ है. ये सच है कि कोई भी व्यक्ति एक साथ सभी अंतर्संबंधित विषयों पर मास्टरी नहीं हासिल कर सकता, पर फिर भी एक विषय के साथ अन्य विषयों का सामान्य ज्ञान होना चाहिए और विषय को अलग-अलग दृष्टिकोणों से पढ़ना चाहिये.

अब बात नारीवादी दृष्टिकोण की आती है. मेरा समाज को देखने का यह एक नजरिया है... ध्यान देने योग्य बात है कि 'एक मात्र' नजरिया नहीं. जैसे-जैसे मैं संस्कृत के नए ग्रंथों और अन्य लोकोक्तियों की बारे में पढ़ती जा रही हूँ,  इतिहास और समकालीन समाज को देखने का नारीवादी दृष्टिकोण और भी स्पष्ट होता जा रहा है. इतिहास को देखने के नारीवादी नजरिये के बारे में अपने पिछले लेख में मैं एक संक्षिप्त परिचय दे चुकी हूँ. जैसा कि हम सभी विश्वास करते हैं कि हमारी संस्कृति में नारी का सर्वोच्च स्थान था और उसमें कालान्तर में ह्रास आ गया, मुख्यतः मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारण. इसका मतलब यह कि यदि मुस्लिम आक्रमणकारी नहीं आते तो हमारे देश में नारी की स्थिति घर-बाहर दोनों जगह सर्वोच्च होती. नारीवादी विचारक इस बात को सही नहीं मानते और विभिन्न तर्कों से अपने पक्ष को पुष्ट करते हैं. पिछले लेख में मैं इसे बता चुकी हूँ.

मैंने जब इन नारीवादी विचारकों के विचार पढ़े थे, तो उस पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं किया था, क्योंकि मैं बहुत तार्किक हूँ और किसी की भी बात को बिना अपने तर्क की कसौटी पर उतारे नहीं मानती, लेकिन जैसे-जैसे मैं संस्कृत का अध्ययन और अधिक करती गयी मेरा यह नजरिया पुष्ट होता गया. मैं अभी शोध कर रही हूँ, इसलिए पूरी बात तो यहाँ नहीं रख सकती क्योंकि जो संस्था मुझे फेलोशिप दे रही है, उसकी नियमावली में है कि मैं थीसिस पूरी होने से पहले सम्बंधित विषय पर कुछ प्रकाशित नहीं कर सकती. पर कुछ निष्कर्ष जो मेरे अपने हैं उन्हें कुछ बिंदुओं में रखने का प्रयास कर रही हूँ---

(1.)-- सबसे पहले तो ये बात पूरी तरह सत्य नहीं है कि प्राचीनकाल में भारत में नारी की स्थिति सर्वोच्च थी. यह आंशिक सत्य है. समाज में विवाहिता स्त्री और माता का स्थान अन्य स्त्रियों की अपेक्षा उच्च था. विवाहिता तो अपने पति के अधीन थी, परन्तु माँ सबसे ऊपर थी. यहाँ तक कि उसे ईश्वर से भी उच्च माना गया. परन्तु इसके ठीक विपरीत जो स्त्री माँ नहीं बन पाती, उसे समाज की उपेक्षा झेलनी पड़ती, जो अब भी कायम है. इसी तरह अविवाहित अथवा विधवा को समाज में बिल्कुल सम्मान नहीं मिलता था. स्त्रियों की स्थिति पुरुषों से उनके संबंध के सापेक्ष थी. ये परम्परा अब भी कायम है. समाज में जो सम्मान विवाहित स्त्रियों को प्राप्त है, वह अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा को नहीं और उस पर विडम्बना यह कि विवाहित स्त्री के घरेलू कार्य को उपेक्षा से देखकर समय-समय पर उसकी औकात को बताया जाता रहता है.

(2.)--प्राचीन संस्कृत-साहित्य में स्थापित नारी की 'सती' वाली आदर्श छवि से इतर भी एक छवि रही है और वह थी एक स्वतन्त्र नारी की छवि, जिसे 'कन्या' कहा गया. यह नारी अपने कार्यों और निर्णयों के लिए और यहाँ तक कि यौन-संबंधों के लिए भी किसी एक पुरुष के अधीन नहीं थी. वह अपने निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतन्त्र थी. शास्त्रों में नहीं, अपितु लोक में उसे मान्यता प्राप्त थी. कुंती, द्रौपदी, देवयानी, उर्वशी और सूर्पनखा इसी श्रेणी में आती हैं. यह सभी लोग जानते हैं कि सूर्पनखा ने राम और लक्ष्मण से प्रणय-निवेदन किया था और इसी प्रकार देवयानी ने कच से और उर्वशी ने अर्जुन से प्रणय-निवेदन किया था. ये अलग बात है कि इन सभी को इस कार्य के लिए दंड भोगना पड़ा. क्योंकि तब भी पुरुषप्रधान समाज का एक वर्ग था जो कि स्त्रियों की इस विषय में स्वतंत्रता नहीं पसंद करता था. और भी उदाहरण हैं, विस्तार के भय से और नहीं लिख रही हूँ.

(3.)-- यह भी गलत तथ्य है कि औरतों की स्थिति में ह्रास अर्थात पर्दाप्रथा, सतीप्रथा, बालविवाह आदि मुस्लिमों के आक्रमण के बाद समाज में आये. घूँघट डालना संभ्रांत घरों की स्त्रियों में प्राचीनकाल से प्रचलित है और (उदाहरण- अभिज्ञान शाकुंतल का पाँचवाँ अंक, जब शकुंतला घूँघट डालकर दुष्यंत की सभा में जाती है और बाणभट्ट की कादम्बरी में चांडाल कन्या)  इसी प्रकार बालविवाह ( मनुस्मृति) और सती प्रथा (महाभारत) भी. मात्र जौहरप्रथा मुस्लिमकाल के बहुत बाद मुख्यतः राजपूतों में प्रचलित हुयी.

(4.)-- तत्कालीन विभेदकारी सामाजिक व्यवस्था को लेकर नारियों के एक वर्ग में असंतोष था, जो कि समय-समय पर बाहर आ जाता था, जैसा कि मैंने अपने इस लेख में लिखा है कि किस प्रकार प्राचीन भारत में भी नारी द्वारा सामाजिक विरोध के उदाहरण मिलते हैं.

इस प्रकार मेरे लिए नारीवाद ना सिर्फ एक आंदोलन है, एक विचारधारा है, बल्कि समाज को समझने का एक दृष्टिकोण और उपागम भी है. हमें इतिहास को अवश्य एक नए नज़रिए से देखना होगा और इसके लिए संस्कृत साहित्य को भी नए प्रकार से पढ़ना होगा, ताकि उन लोगों को जवाब दिया जा सके जो भारतीय संस्कृति में औरतों की सर्वोच्च स्थिति के विषय में एक-आध ग्रंथों से कुछ श्लोक उद्धृत करके यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि हमारे देश में इस प्रकार के आंदोलनों की कोई ज़रूरत नहीं है. सच तो यह है कि औरतों के लिए सरकारी स्तर पर, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा, एन.जी.ओज द्वारा और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किये जा रहे इतने प्रयासों के बावजूद उनका सशक्तीकरण इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि हमारे यहाँ के पुरुष अभी भी यह मानने को ही तैयार नहीं होते कि औरतों के साथ भेदभाव होता है और सदियों से होता आया है. हम आज भी अतीत की स्वर्णिम कल्पनाओं में डूबे हुए हैं और जाने कब उबर पायेंगे???