मंगलवार, 7 मई 2013

पैतृक सम्पत्ति पर बेटी का अधिकार क्यों न हो?

कुछ  दिन पहले मैंने अपने पिता की सम्पत्ति पर अपने अधिकार के सम्बन्ध में श्री दिनेशराय द्विवेदी जी से उनके ब्लॉग 'तीसरा खम्बा' पर एक प्रश्न पूछा था. उनके उत्तर से मैं संतुष्ट भी हो गयी थी और सोचा था कि कुछ दिनों बाद मैं पिता की सम्पत्ति पर अपना दावा प्रस्तुत कर दूँगी. लेकिन मैंने देखा कि जिसे भी इस सम्बन्ध में बात करो, वही ऐसा न करने की सलाह देने लगता है. मैं ऐसे लोगों से कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ. और साथ ही द्विवेदी जी से भी कुछ प्रश्न हैं इसी सन्दर्भ में.
मेरे पिताजी ने हम तीनों भाई-बहनों का एक समान ढंग से पालन-पोषण किया. उन्होंने कभी हममें लड़का-लड़की का भेदभाव नहीं किया. अपने अंतिम समय में वे भाई से थोड़ा नाराज़ थे. तो उन्होंने गुस्से में ये तक कह दिया था कि "मैं अपनी सम्पत्ति अपनी दोनों बेटियों में बाँट दूँगा. इस नालायक को एक कौड़ी तक नहीं दूँगा." मैंने हमेशा बाऊ जी की सेवा उसी तरह से की, जैसे कोई बेटा करता (हालांकि बेटे ने नहीं ही की थी, पिताजी के अनुसार)
फिर मैं उनकी सम्पत्ति की उत्तराधिकारिणी क्यों नहीं हो सकती? किस मामले में मैं अपने भाई से कम हूँ? और 2005 के हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन के बाद से ये कानूनी हक भी है. लेकिन मेरे भाई ने पिताजी के देहांत के बाद से घर पर कब्ज़ा कर लिया. अभी कुछ दिन पहले ज़मीन के कागज़ की नक़ल निकलवाई तो पता चला कि वो अपने आप भाई के नाम ट्रांसफर हो गयी है. जब 2005 के कानून के अनुसार बेटी भी अब ठीक उसी तरह अपनी पैतृक सम्पत्ति में उत्तराधिकार और विभाजन की अधिकारी होगी, जैसा अधिकार एक बेटे का है, तो ज़मीन अपने आप भाई के नाम क्यों हो गयी? क्या मेरी जगह कोई भाई होता, तो भी ऐसा ही होता. अगर नहीं तो इस कानून का मतलब क्या? जब मुझे लड़कर ही अपना हक लेना पड़े, तो वो हक ही क्या?
अगर कोई कृषि भूमि के कानूनों का हवाला देता है, तो क्या ये ठीक है कि पैतृक सम्पत्ति में बेटी को हक ना दिया जाय, सिर्फ इसलिए कि ज़मीन के अधिक टुकड़े हो जायेंगे? फिर वही बात कि फिर उस कानून का मतलब क्या? क्योंकि हमारे गाँवों में तो उतराधिकार योग्य सम्पत्ति में अधिकतर कृषि भूमि ही होती है. ऐसे तो लड़कियों को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार के कानून का कोई मतलब ही नहीं रह जाता.
मेरे लिए उस सम्पत्ति का महत्त्व इसलिए नहीं है कि उससे मुझे कोई लाभ होगा. मेरे लिए सम्पत्ति में उतराधिकार की लड़ाई अपने पिता के प्रेम पर मेरे हक की लड़ाई है. और अगर कोई यह तर्क देता है कि लड़कियों के संपत्ति में हक माँगने से भाई-बहन के सम्बन्ध टूट जाते हैं, तो मेरे भाई से मेरे सम्बन्ध वैसे ही कौन से अच्छे हैं और अगर अच्छे होते भी, तो भी मैं अपना हिस्सा माँगती. रही बात दीदी की, तो उनदोनो ने तो पहले ही कह रखा है कि तीन भाग हो जाने दो, फिर अपना हिस्सा हम तुम्हें दे देंगे. क्योंकि हम दोनों बहनों के सम्बन्धों के बीच पैसा-रुपया-धन सम्पत्ति कभी नहीं आ सकती. जिनमें सच्चा प्यार होता है, वहाँ ये सभी मिट्टी के धेले के समान होता है.
मुझे लगता है कि इस प्रकार के ऊटपटांग तर्क देकर लड़कियों के उतराधिकार के हक को रोकने वाले लोग, न सिर्फ सामाजिक बल्कि कानूनी अपराध भी कर रहे हैं. याद रखिये कि जब आप ये कहते हैं कि लड़कियों को पिता की सम्पत्ति में हिस्सा लेने का क्या हक है, वे तो अपने पति के यहाँ चली जाती हैं, तो आप एक ओर तो उनके जैविक अभिभावक का हक उनसे छीन रहे होते हैं, दूसरी ओर 2005 के हिन्दू उतराधिकार कानून का उल्लंघन कर रहे होते हैं. लड़कियों का विवाह हुआ है या नहीं, उन्हें पति के घर जाना है या नहीं, इससे उनके माता-पिता के प्रेम पर हक क्यों कम होना चाहिए? और अगर माँ-बाप के प्रेम पर पूरा हक है, तो सम्पत्ति पर क्यों नहीं होना चाहिए?
अपनी अगली पोस्टों में मैं पैतृक सम्पत्ति में बेटियों के उत्तराधिकार और विभाजन के विषय में विस्तार से बताऊँगी. फिलहाल मैं जानती हूँ कि बहुत सी लड़कियाँ इस विषय में कोई जानकारी नहीं रखती हैं. इस पोस्ट के माध्यम से मैं सभी लड़कियों को ये बताना चाहती हूँ कि अब अपने बाप-दादा की ज़मीन पर तो उनका हक है ही, अपने पिता के आवास में रहने का हक भी है. कोई उनसे पैतृक सम्पत्ति पर उनके हक और पिता के घर में रहने का अधिकार नहीं छीन सकता है.

गुरुवार, 14 मार्च 2013

कविता-संग्रह "यथास्थिति से टकराते हुए: दलित-स्त्री-जीवन से जुड़ी कविताएँ"


एक सवर्ण स्त्री और एक दलित स्त्री की समस्याओं में क्या अंतर हैं-? ये पूछते समय लोग यह भूल जाते हैं कि सवर्ण स्त्री भी दलित स्त्री का छुआ नहीं खाती। उसे उन्हीं हिकारत भरी नज़रों से देखती है। कई स्त्रियों के साथ होने पर वह खुद को स्त्री होने से ज़्यादा जाति से आइडेंटिफाई करती दिखती है। लेकिन वह भूल जाती है कि जिस तरह पूंजीवाद ने जाति के नाम पर मजदूरों को बाँटकर उनका आंदोलन क्षीण कर दिया, उसी तरह से ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने औरतों को जाति के नाम पर बाँटकर नारीवादी आंदोलन में तेज धार नहीं आने दी।

नारीवाद से जुड़ी सभी औरतों को ये सोचना होगा कि भारत में दलित स्त्री की बात किये बगैर नारीवाद का प्रश्न अधूरा है और यही पश्चिमी नारीवाद से भारतीय नारीवाद की भिन्नता का आधार है।

ज़रूरत इस बात की है कि यथास्थिति से जूझने वाला हर व्यक्ति आगे आये और इस बात पर विचार करे कि दलित स्त्री समाज की पदसोपानीय व्यवस्था में सबसे नीचे रही है। वह तिहरा शोषण झेलती रही है-
1.एक दलित होने के नाते,
2.एक स्त्री होने के नाते और
3.एक मजदूर होने के नाते

कविता-संग्रह "यथास्थिति से टकराते हुए: दलित-स्त्री-जीवन से जुड़ी कविताएँ" इसी बात को पैंसठ कवियों की कविताओं के माध्यम से सामने लाने की कोशिश में एक और कदम है। संग्रह में सम्मिलित कवियों में स्त्रियाँ हैं, तो पुरुष भी हैं, सवर्ण हैं, तो दलित भी हैं, लेकिन सबका उद्देश्य दलित स्त्री के पक्ष में खड़े होना है।

दलित स्त्री की स्थिति को विपिन शर्मा ने अपनी कविता में बहुत सटीक ढंग से उठाया है-(एक दलित स्त्री घर-बाहर शोषण झेलती है। बाहर उसे उसे चीरकर खा जाने वाले भेडिये हैं, जिनकी लोलुप दृष्टि और अश्लील कटाक्ष झेलती वह मैला कमाने का काम करके घर आती है और घर पर उसे पति की मारपीट सहनी पड़ती है। वह ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ रहे अपने पति से पूछती है-)

मेरे मालिक
तुम तो मेरी तरह ही थे
सदियों से दलित-पीड़ित
एक स्त्री पाते ही
परमेश्वर बनने का ख़्वाब कैसे जाग उठा
तुम तो मालिकों के खिलाफ
मिसाल थे बगावत की
मुझे कुचल कर
किस मुँह से न्याय की बात करोगे

मेरे पतिदेव
तुम तो बड़े ज्ञानी-ध्यानी हो
आखिर पुरुष जो ठहरे
या तो मेरा-अपना भेद बता दो
या बता दो
ब्राह्मण पुरुष से
अपना भेद
तुम्हारा हक
हो सकता है अगर
एक ब्राह्मण के समतुल्य
तो हे मेरे देव
मेरा तुम्हारे बराबर क्यों नहीं??

यह कविता-संग्रह दलित-स्त्री के विभिन्न पक्षों से जुड़ी कहानी, कविता और आलोचनाओं को सामने लाने के प्रयास की एक और कड़ी है। इसके पहले इस श्रंखला की पहली कड़ी के रूप में कहानी-संग्रह 'यथास्थिति से टकराते हुए दलित स्त्री जीवन से जुड़ी कहानियाँ' भी प्रकाशित हो चुका है, जिसमें बाईस युवा कहानीकार शामिल हुए थे।

अनिता भारती और बजरंग बिहारी तिवारी द्वारा संपादित यह कविता-संग्रह इस मायने में प्रशंसनीय प्रयास है कि यह दलित स्त्री के प्रश्न पर 'मिलकर' सोचने की बात करता है। जाति-व्यवस्था पर अपने ढंग से प्रहार करते हुए एक समतावादी समाज की स्थापना करने वाले ऐसे प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

एक बेहतर समाज की कोशिश


जब भी औरतों के लिए समानता या स्वतंत्रता की बात होती है, भारतीय पुरुषों का तर्क होता है- "हमारे यहाँ तो पहले से ही औरतों का बड़ा सम्मान है. हमारे यहाँ तो औरतों को देवी माना जाता है. हमें पश्चिम की तरह बनने की ज़रूरत नहीं. देखो अमेरिका की संस्कृति. वहाँ औरतों को आज़ादी मिली तो कैसे घर टूटने लगे. तलाक के केसेज़ बढ़ने लगे." ... उसके बाद वो तर्क देंगे अमेरिका में भारत से कहीं ज्यादा रेप केसेज़ होते हैं. वहाँ औरतों के खिलाफ यौन-हिंसा के मामले भारत से बहुत अधिक हैं.
तो भाई अमेरिका में यौन-हिंसा के मामले इसलिए ज्यादा होते हैं क्योंकि वहाँ यौन-हिंसा की परिभाषा बहुत व्यापक है. वहाँ की औरतें चुप नहीं रहतीं, विरोध करती हैं, वहाँ की पुलिस एफ.आई.आर. दर्ज करवाने में आनाकानी नहीं करती और वहाँ के न्यायालय निर्णय देने में इतनी देर नहीं लगाते. और इस सबसे बढ़कर वहाँ का समाज यौन-हिंसा के लिए औरतों को ज़िम्मेदार नहीं मानता. इसलिए औरतें भी अपने विरुद्ध अपराध को छिपाती नहीं हैं.
और फिर औरतों ने कब कहा कि उन्हें पश्चिम की तरह आज़ादी चाहिए. अरे आज़ादी तो हमारे संविधान ने हमें दी हुयी है. किसी को उसे हमें देने की ज़रूरत नहीं है. बस एक सुरक्षित माहौल चाहिए, जिसमें हम उस आज़ादी का उपयोग कर सकें. और वो माहौल न अकेले पुलिस बना सकती है, न न्यायालय न सरकार और न समाज...सबको मिलकर बेहतर समाज बनाना होगा.
आप फिर तर्क देंगे कि एक आदर्श समाज कैसे बन सकता है. अपराध तो तब भी होंगे. ये तो हम भी जानते हैं कि अपराधमुक्त समाज की कल्पना 'यूटोपिया' से बढ़कर कुछ नहीं है. अपराधी हर युग में रहे हैं और आगे भी रहेंगे. पर कुछ ऐसी बातें हैं, जिन पर ध्यान दिया जाय तो न सिर्फ अपराध कम होंगे, बल्कि अपराध होने पर औरतें उसकी शिकायत दर्ज कराने से डरेंगी नहीं.
पहली बात तो ये है कि अपराधियों के अन्दर कानून-व्यवस्था का डर होना चाहिए और ये तभी होगा, जब पुलिस अपना काम ठीक से करेगी. यहाँ तो ये हाल हैं कि छेड़छाड़ की रिपोर्ट करवाने जाने पर पुलिस ही समझाने लगती है कि जाने दो कौन सी इतनी बड़ी बात है. कहीं-कहीं तो इससे भी बढ़कर पुलिस खुद औरतों पर ही दोषारोपण करने लगती है कि आप इतनी रात में बाहर क्यों निकली? एकाध बार बड़े अधिकारियों को भी ये कहते सुना गया है कि पुलिस सारी औरतों की रक्षा तो नहीं कर सकती. बताइये, जब पुलिस के आला अफसर ऐसे बयान देंगे तो अपराधियों को पुलिस का डर रह जाएगा? इन्हीं सब कारणों से यौन-हिंसा की शिकार औरतें रपट लिखाने ही नहीं जातीं. मुझे लगता है कि हमारी पुलिस फ़ोर्स को और अधिक जेंडर सेंसटिव बनाना चाहिए. ये ट्रेनिंग के स्तर पर तो हो ही, समय-समय पर वर्कशॉप और सेमीनार के माध्यम से भी किया जा सकता है.
दूसरी बात, अपराधियों को समाज का भी भय होना चाहिए. हमारे समाज में यौन-हिंसा की शिकार औरतों को ही ज़िम्मेदार मानने की जो घटिया प्रवृत्ति है, इसके कारण भी जहाँ एक ओर अपराधियों का हौसला बढ़ता है, वहीं दूसरी ओर औरतें डर जाती हैं. सबको ये बात दिमाग से निकाल देनी चाहिए कि अपने विरुद्ध अपराध के लिए महिला दोषी है. अपराध कहीं भी किसी के साथ भी हो सकता है. बुर्के वाली औरतों से लेकर जींस पहनने वाली लड़कियों तक और बच्चियों से लेकर बूढ़ी औरत तक, सुबह-शाम, घर में, बाहर- कहीं भी कोई भी महिला अपराध का शिकार हो सकती है. औरतों को अपराध का ज़िम्मेदार मानना अपराध का समर्थन करने के समान है. इसलिए इस सोच को बदलना ही होगा.
तीसरी बात औरतों के विरुद्ध होने वाले छोटे-मोटे अपराधों को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. जब हम छींटाकशी, ताने मारना, भीड़ का फायदा उठाकर धक्के मारना- जैसे अपराधों पर ध्यान नहीं देते हैं, तो ऐसा करने वालों का हौसला बढ़ता है. कई केसेज़ में देखा गया है कि बलात्कारी कई दिनों से लड़की का पीछा करता रहा है, लेकिन या तो लड़की ने ध्यान नहीं दिया या घरवालों से कहने पर उन्होंने उससे ध्यान न देने को कहा या फिर अपराधी को धमकाकर या पिटवाकर छोड़ दिया गया. दरअसल हम इसे अपराध समझते ही नहीं. इसलिए पुलिस में शिकायत नहीं करते, जबकि इस तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए. हमें अपनी लड़कियों को भी ये सिखाना चाहिए कि वो ऐसे असामाजिक तत्वों को अनदेखा न करें, उन पर ध्यान दें और खुद परिवार को भी बच्चों को विश्वास में लेकर पूछते रहना चाहिए.
चौथी बात, कानूनी सुधार, पुलिस व्यवस्था में सुधार, ये सब बहुत लंबी प्रक्रिया है. इस पर तो बहस होती ही रहनी चाहिए. कानून को तेजी से बदलती सामाजिक व्यवस्था के साथ तारतम्य बैठाने की ज़रूरत होती है. तेजी से बढ़ रही टेक्नालजी, नगरीकरण, सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव आदि के चलते नए-नए तरह के अपराध सामने आते रहते हैं. औरतें घर से बाहर निकली हैं, तो उनके विरुद्ध अपराध बढ़े हैं. बदलते समय के हिसाब से कानून को भी बदलना होगा. औरतों के पक्ष में नए कानून बनाने होंगे.
मेरे विचार से इन बातों को ध्यान में रखा जाय, तो स्थिति में कुछ सुधार तो होगा ही. कोई भी समाज 'आदर्श समाज' नहीं बन सकता. उस आदर्श को पाया नहीं जा सकता, लेकिन उस ओर बढ़ा तो जा ही सकता है. एक बेहतर समाज बनाने की कोशिश किसी भी तरह बंद नहीं होनी चाहिए. हम अमेरिका नहीं बनना चाहते, हमें एक बेहतर हिन्दुस्तान चाहिए.