"भारत में नारीवाद को पश्चिमी परिप्रेक्ष्य में देखा गया है, जबकि ज़रूरत उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझने की है. यद्यपि पितृसत्ता हर युग और काल में मौजूद रही है, पर भारत में यह अत्यधिक जटिल ताने-बाने के साथ उपस्थित है, जिसमें जाति, वर्ण, वर्ग और धर्म सभी सम्मिलित हैं. इसे 'ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' का नाम दिया गया है. इसका यह अर्थ नहीं कि इसका निशाना कोई एक जाति है. यह भारतीय समाज में व्याप्त स्त्री की पराधीनता के अलग-अलग रूपों को दर्शाता है.
मेरी कोशिश नारीवाद को इसी भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में समझने की और मौजूदा समस्याओं को इस आधार पर विश्लेषित करने की है."

बुधवार, 1 फरवरी 2012

महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों का साधारणीकरण: लापरवाही या षड्यंत्र?

(यह लेख कल के जनसत्ता में 'दुनिया मेरे आगे' स्तंभ में 'शब्दों से खेल' शीर्षक से छप चुका है.)
  
बात वहाँ से शुरू होती है, जब एक छोटी-सी लड़की को दुनिया की ऐसी कड़वी सच्चाइयों का सामना करना पड़ता है जिनके चलते वह सामान्य घटनाओं को भी एक खास नजरिए से देखने लग जाती है। मासूम दिल कम उम्र में ही परिपक्व हो जाता है। पिताजी रेलवे में स्टेशन मास्टर थे। जब मैं दस साल की थी, उनका तबादला उत्तर रेलवे के उन्नाव स्टेशन के पड़ोस में एक छोटे-से रेलवे स्टेशन मगरवारा में हो गया। मुझे चार साल तक मगरवारा से उन्नाव स्थित अपने स्कूल ट्रेन से आना-जाना पड़ता। भीड़ होने पर लोग छोटी बच्ची जान कर अपने पास जगह बनाकर बिठा लेते। एक-दो साल बाद लोगों के स्पर्श में मुझे अजीब-सा बदलाव महसूस होने लगा। अनचाहा स्पर्श मन में वितृष्णा भर देता। बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ती एक लड़की पर ऐसी घटनाओं का क्या प्रभाव पड़ता है, यह एक लड़की ही समझ सकती है। अनजाने में मैं खुद को ही इसका दोषी समझने लगी। ऐसा लगता जैसे मेरे शरीर में ही ऐसी कोई कमी है कि लोग मेरे साथ ऐसी हरकत करते हैं।
कुछ साल बाद इलाहाबाद में छात्रावास में रहते और ‘स्त्री अधिकार संगठन’ के साथ काम करते हुए पता चला कि अधिकतर लड़कियाँ इसी तरह के कड़वे अनुभवों से गुजरी हैं। पर मुझे तब बहुत आश्चर्य होता, जब हमारे पुरुष मित्र और रिश्तेदार कहते कि ‘क्या लड़कियाँ छेड़छाड़ नहीं करतीं?’ जो घटनाएँ लड़कियों के मन-मस्तिष्क को झिंझोड़कर खुद को ही दोषी मानने पर मजबूर कर देती हैं, उसे कोई इतने हल्के ढंग से कैसे ले सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं था कि वैसी हरकतों के लिए ‘छेड़छाड़’ के बजाय हम कोई सही शब्द नहीं खोज पा रहे थे? तब मुझे नहीं लगा कि मैं इसे ‘यौन हिंसा’ कहूँ, क्योंकि उस उम्र में तो बस इतना समझ में आता था कि यह व्यक्ति जो कर रहा है, वह ठीक नहीं है। उस समय मन जिस तरह घृणा से भर जाता था, उसके लिए ‘छेड़छाड़’ सच में हल्का शब्द है।
अकादमिक क्षेत्रों में नारीवादी सोच के लोग ऐसी माँगें उठाते रहे हैं और ‘जेंडर’ के नजरिए से संवेदनशील शब्दों को लेकर एक स्तर तक समझ भी बनी है। लेकिन हमारा समाज और उसका प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाला मीडिया इस मामले में अब तक जरूरी संवेदनशीलता नहीं बरत रहा है। यहां तक कि ‘बलात्कार’ जैसे जघन्य अपराधों में भी मीडिया की कोशिश होती है कि इसके लिए अपेक्षया हल्के शब्दों का इस्तेमाल किया जाए। आमतौर पर बलात्कार की घटनाओं से संबंधित खबरें संवेदनहीन तरीके से ऐसे पेश की जाती हैं कि तथाकथित सभ्य समाज के कुत्सित मानसिकता वाले लोग उसे चटखारे लेकर पढ़ते हैं। कभी इसके लिए ‘इज्जत लुट गई’ तो कभी ‘मुँह काला किया’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये सभी शब्द महिलाओं के प्रति अपमानजनक और एक तरह से पीड़ित को ही दोषी सिद्ध करने वाले रहे हैं। 
समय के साथ किसी औरत के शरीर पर हमला करके जबरन उसका यौन-उत्पीड़न करने जैसे जघन्य कृत्य को ‘बलात्कार’ शब्द के जरिए व्यक्त किया जाने लगा। इस शब्द में जाहिर बलाघात इस अपराध की भयावहता को दर्शाता है। लेकिन पिछले कुछ समय से अखबारों या टीवी चैनलों में बलात्कार की जगह ‘दुष्कर्म’ और यहाँ तक कि ‘ज्यादती’ जैसे शब्दों तक का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाने लगा है। ‘दुष्कर्म’ शब्द अपने आप में चोरी, डकैती, जेब काटने तक को व्यक्त करता है। सवाल है कि क्या बलात्कार जैसे गंभीरतम अपराध को चोरी या जेब काटने जैसे अपराधों के समकक्ष करके देखा जा सकता है? सच्चाई यह है कि ‘दुष्कर्म’ जैसे शब्दों का प्रयोग बलात्कार को बेहद मामूली अपराधों के समकक्ष ला खड़ा करता है तो ‘ज्यादती’ इस लिहाज से और भी आपत्तिजनक प्रयोग है।
महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के परिप्रेक्ष्य में पिछले दिनों ऊँचे पदों पर बैठे पुलिस और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के जिस तरह के बयान आए हैं, ऐसे शब्दों का आम होते जाना उसी की एक कड़ी लगता है। कभी कोई कहता है कि ‘औरतों को देर रात अकेले घर से बाहर निकालना नहीं चाहिए’ तो कभी कहा जाता है कि ‘बड़े-बड़े महानगरों में छोटे-मोटे अपराध होते ही रहते हैं’ और कभी लड़कियों की वेशभूषा पर ही सवाल उठा दिया जाता है।
हाल ही में ‘रेप’ की जगह ‘सेक्सुअल असॉल्ट’ शब्द प्रयोग करने का सुझाव सामने आया है। यानी एक ओर अंग्रेजी में इस अपराध का दायरा बढ़ाने के लिए जिस ‘यौन हमला’ शब्द का विकल्प रखा गया है, वह इस अपराध की गंभीरता और भयावहता को न केवल कम नहीं करता, बल्कि अर्थ के भाव और असर की गहराई को भी बनाए रखता है। लेकिन हिंदी में बलात्कार की जगह दुष्कर्म शब्द का प्रयोग अगर आम होता जा रहा है तो इसे व्यवस्था द्वारा महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साधारणीकरण के एक षड्यंत्र के तौर पर देखा जाना चाहिए। इसमें मीडिया एक बड़े मददगार की भूमिका निभा रहा है।

शनिवार, 15 जनवरी 2011

पुस्तक-सूची



स्त्री विमर्श : कुछ पठनीय पुस्तकें 

देह की राजनीति से देश की राजनीति तक - मृणाल पांडे
परिधि पर स्त्री - मृणाल पांडे
बंद गलियों के विरुद्ध - मृणाल पांडे
जहाँ औरतें गढ़ी जाती हैं - मृणाल पांडे
दुर्ग द्वार पर दस्तक - कात्यायनी
स्त्री का समय - क्षमा शर्मा
स्त्रीत्व का मानचित्र - अनामिका
हौवा की बेटी - दिव्या जैन
उपनिवेश में स्त्री - प्रभा खेतान
हम सभ्य औरतें - मनीषा
औरत के लिए औरत - नासिरा शर्मा
खुली खिड़कियाँ - मैत्रेयी पुष्पा
औरत के हक में - तसलीमा नसरीन
स्त्री संघर्ष का इतिहास - राधा कुमार
साम्प्रदायिक दंगे और नारी - नूतन सिन्हा
संघर्ष के बीच संघर्ष के बीज - इलीना सेन
स्त्रीवादी साहित्य विमर्श - जगदीश्वर चतुर्वेदी
अधीन ज़मीन - उपेन्द्र नाथ अश्क
रेणु की नारी दृष्टि - डॉ. अल्पना तिवारी
चुकते नहीं सवाल - मृदुला गर्ग
नारी प्रश्न - सरला माहेश्वरी
स्वागत है बेटी - विभा देवसरे
जीवन की तनी डोर ये स्त्रियाँ - नीलम कुलश्रेष्ठ
स्त्री पुरुष कुछ पुनर्विचार - राजकिशोर
स्त्री के लिए जगह - सं. राजकिशोर
स्त्रीत्ववादी विमर्श समाज और साहित्य - क्षमा शर्मा
स्त्री : मुक्ति का सपना - सं. प्रो. कमला प्रसाद, राजेन्द्र शर्मा, अतिथि सं. अरविन्द जैन व लीलाधर मंडलोई
धर्म के नाम पर - गीतेश शर्मा
स्त्री उपेक्षिता - सीमोन द बुआ
विद्रोही स्त्री - जर्मन ग्रेयर
स्त्री अधिकारों का औचित्य साधन - मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट
औरत की कहानी - सं. सुधा अरोड़ा
एक गुमशुदा औरत की डायरी - सीमोन द बुआ
बधिया स्त्री - जर्मन ग्रीयर
अपना कमरा - वर्जीनिया वुल्फ
एक स्त्री की ज़िंदगी के चौबीस घंटे - स्टीफन ज्विग
स्त्री की पराधीनता - जान स्टुअर्ट मिल

कुछ अन्य पुस्तकें 

औरत होने की सजा - अरविन्द जैन
उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार - अरविन्द जैन
यौन हिंसा और न्याय की भाषा - अरविन्द जैन
न्याय क्षेत्रे अन्याय क्षेत्रे - अरविन्द जैन
बचपन से बलात्कार - अरविन्द जैन
औरत अस्तित्व और अस्मिता - अरविन्द जैन
आदमी की निगाह में औरत - राजेन्द्र यादव
अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य - अर्चना वर्मा
औरत उत्तरकथा - राजेन्द्र यादव
भारत में विवाह संस्था का इतिहास - विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े
सामान नागरिक संहिता - सरला माहेश्वरी
नए आयामों को तलाशती नारी - दिनेश नंदिनी डालमिया
प्राचीन भारत में नारी - डॉ. उर्मिला प्रकाश मिश्र
जो मारे जायेंगे - जया मित्रा
प्राचीन भारत में न्याय व्यवस्था - नताशा अरोड़ा
इक्कीसवीं सदी की ओर - सुमन कृष्णकांत
नारी देह के विमर्श - सुधीश पचौरी

स्त्री विमर्श : कुछ पठनीय उपन्यास 

पचपन खम्बे लाल दीवारें - उषा प्रियंवदा
रुकोगी नहीं राधिका - उषा प्रियंवदा
शेष यात्रा - उषा प्रियंवदा
अंतर्वंशी - उषा प्रियंवदा
अनारो - मंजुल भगत
आँखों की दहलीज - मेहरुन्निसा परवेज
उसका घर - मेहरुन्निसा परवेज
कोरजा - मेहरुन्निसा परवेज
तत्सम - राजी सेठ
रेत की मछली - कांता भारती
मेरे संधि पत्र - सूर्यबाला
उसकी पंचवटी - कुसुम अंसल
फ्रीलांसर - शुभा वर्मा
सात फेरे अधूरे - मीनाक्षी पुरी
एक ज़मीन अपनी - चित्रा मुद्गल
आवां - चित्रा मुद्गल

स्त्री विमर्श : कुछ पठनीय आत्मकथाएँ 

कागजी हैं पैरहन - इस्मत चुगताई
रसीदी टिकट - अमृता प्रीतम
मेरे आका - तहमीना दुर्रानी
मेरी कहानी - कमला दास
जो कहा नहीं गया - कुसुम अंसल
लगता नहीं है दिल मेरा - कृष्णा अग्निहोत्री
बूँद बावड़ी - पद्मा सचदेव
दोहरा अभिशाप - कौशल्या बैसंत्री
खानाबदोश - अजीत कौर
नंगे पैरों का सफ़र - दिलीप कौर टिंवाडा
कुछ कही कुछ अनकही - शीला झुनझुनवाला
कस्तूरी कुंडल बसे - मैत्रेयी पुष्पा
गुड़िया भीतर गुड़िया - मैत्रेयी पुष्पा
बुरी औरत की कथा - किश्वर नाहीद
नाच री घूमा - माधवी देसाई
मेरे बचपन के दिन - तस्लीमा नसरीन
उत्ताल हवा - तस्लीमा नसरीन
द्विखंडिता - तसलीमा नसरीन
वे अँधेरे दिन - तस्लीमा नसरीन
अन्या से अनन्या - प्रभा खेतान
एक कहानी यह भी - मन्नू भण्डारी
धरती की बेटी - एलन स्मेडली


 (स्रोत : 'स्त्री : मुक्ति का सपना' पुस्तक एवं मित्रगण)

सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

पश्चिमी नारीवाद बनाम भारतीय नारीवाद

आमतौर पर नारीवाद की बात चलने पर यह प्रश्न सभी के मन में उठता है कि नारीवाद की पाश्चात्य अवधारणा का भारत में क्या उपयोग है? और ये प्रश्न कुछ हद तक वाजिब भी है. खासकर के तब जब नारीवाद पर खुद पश्चिम में ही कई सवाल उठने लगे हों.

दरअसल, पश्चिम में नारीवाद एक विचारधारा के रूप में उभरकर तब सामने आया, जब वहाँ की औरतों को मूलभूत अधिकार प्राप्त हो चुके थे. हालांकि इसके लिए उन लोगों ने अलग-अलग छिटपुट रूप से ही सही, लंबी लड़ाइयाँ लड़ी थीं, तब जाकर उन्हें मताधिकार जैसे नागरिक अधिकार, राजनीतिक और कुछ आर्थिक अधिकार प्राप्त हुए. चूँकि उन्हें मूलाधिकार मिल चुके थे, इसलिए उनके मुद्दे उससे बढ़कर यौनिकता, यौन स्वतंत्रता, स्त्रीत्व की अवधारणाओं, पुरुष के वर्चस्व आदि से जुड़ गए. इस विषय में उल्लेखनीय यह है कि वहाँ तब नारीवादी आन्दोलन उच्चवर्गीय श्वेत महिलाओं के कब्ज़े में ही था, निम्नवर्गीय अथवा अश्वेत नारियाँ इससे अलग थीं.

तत्कालीन पाश्चात्य नारीवाद के समक्ष जो मुद्दे थे, भारत जैसे देशों के लिए महत्त्वपूर्ण तो थे, पर ज्यादा नहीं. भारतीय समाज आज भी एक सामंतवादी ढाँचे वाला समाज है और यहाँ की नारियों के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या प्राचीनता थी, जिसके कारण उन्हें नागरिक अधिकारों के अलावा अन्य अधिकार लगभग नहीं के बराबर प्राप्त थे. हालांकि यहाँ भी नारियों का एक वर्ग था, जिन्हें जीवन की मूलभूत सुविधाएँ प्राप्त थीं और वे पश्चिमी नारीवाद के प्रभाव में थीं. इस प्रकार भारत में भी कुछ नारीवादी विचारक उन्हीं मुद्दों को उठाने लगे, जो कि पाश्चात्य नारीवाद के मुद्दे थे और जिनका यहाँ की ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था में कोई ख़ास उपयोग नहीं था.

नारीवादी अवधारणा में व्यापक बदलाव नारीवाद की तीसरी लहर के बाद आया. नारीवाद की तीसरी लहर मुख्यतः लैटिन अमेरिकी, एशियाई और अश्वेत नारियों से सम्बन्धित थी. इस लहर पर उत्तर आधुनिक विचारधारा का प्रभाव था, जो विभिन्नताओं का सम्मान करती थी. विभिन्नता की अवधारणा के फलस्वरूप ही इस बात पर विचार किया जाने लगा कि एक जैसे सिद्धांत से सभी वर्गों की नारियों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है. भिन्न-भिन्न वर्गों की समस्याएँ अलग-अलग हैं और इसीलिये उनका समाधान भी अलग ढंग से खोजा जाना चाहिए. इस लहर ने भारतीय नारीवादी आंदोलन पर गहरा प्रभाव डाला. यहाँ भी दलित नारियों ने नारीवादी आंदोलन पर आरोप लगाना शुरू किया कि वह उच्चवर्गीय सवर्ण नारियों का प्रतिनिधित्व करता है और दलित, ग्रामीण और निर्धन महिलाओं को बाहर छोड़ देता है.

इसके फलस्वरूप नारीवादी विचारकों का ध्यान भारतीय समाज की विभिन्नता पर गया और इस बात पर विचार-विमर्श शुरू हो गया कि 'नारीवाद' को भारतीय समाज के अनुसार किस प्रकार ढाला जा सकता है? यह अस्सी-नब्बे का दशक था  और इसी समय भारतीय समाज के लिए 'ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' शब्द का प्रयोग किया जाने लगा. यह शब्द हमारे समाज की जटिल सरंचना और उसके फलस्वरूप दलित नारियों के होने वाले तिहरे शोषण को व्यक्त करता है.  दलित नारी जाति, वर्ग और पितृसत्ता तीनों के द्वारा शोषण का शिकार होती है. उसे औरत होने के कारण उसके समाज का पुरुष शोषित करता है, गरीब मजदूर होने के कारण भू-स्वामी शोषित करता है और दलित होने के कारण उसे सवर्णों द्वारा अपमान सहना पड़ता है.

भारत में वर्तमान नारीवादी अवधारणा इस बात पर विचार करती है कि गरीब, ग्रामीण, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं की समस्याएँ अलग हैं और धनी तथा सवर्ण औरतों की अलग, अतः इन पर भिन्न-भिन्न ढंग से विचार करना चाहिए. वर्तमान नारीवाद नारी के साथ ही उन सभी दलित और शोषित तबकों की बात करता है, जो सदियों से समाज के हाशिए पर धकेल दिए गए हैं. यह मानता है कि स्वयं नारीवादी आंदोलन के अंतर्गत कई धाराएँ एक साथ काम कर सकती हैं, भले ही उनके रास्ते अलग-अलग हों पर उनका गंतव्य एक ही है. इसलिए सबको एक साथ आगे आना चाहिए.

बुधवार, 22 सितम्बर 2010

नारी देह के बाजारीकरण पर सवालों के माध्यम से विचार-विमर्श

आमतौर पर हम समाज में घटने वाली घटनाओं को तो देखते हैं, पर उनके पीछे के कारणों को जानने का कभी प्रयास नहीं करते हैं. आज की नारी को बदलती सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के चलते पहले की अपेक्षा बहुत सी सहूलियतें मिली हैं. इतनी कि उन्हें मुक्त मान लिया गया है. जब हम माडलों, हिरोइनों और अन्य पेशों में आगे बढ़ती औरत को देखते हैं, तो ये मान बैठते हैं कि औरत आज़ाद हो गयी है और फिर ये सोच लेते हैं कि वो अपनी आज़ादी का गलत फायदा भी उठाने लगी है. सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाली औरत हो या कॉपरेट जगत की नारी, ये मान लिया जाता है कि वो अपनी देह को हथियार बनाकर आगे बढ़ने लगी है. टी.वी. में विज्ञापनों में औरतों के देह-प्रदर्शन पर भी उसे ही दोषी मान लिया जाता है. पर, उसके पीछे के कारणों को जानने की कोशिश नहीं की जाती.
प्रश्न ये हैं कि क्या वाकई आज की औरत आज़ाद हो गयी है... इतनी आज़ाद कि अपनी देह को हथियार की तरह  इस्तेमाल करके आगे बढ़ रही है? क्या उसकी सभी समस्याओं का अंत हो गया है? क्या उसे वे सभी अधिकार मिल गए हैं, जिनके लिए वो दशकों से लड़ाई लड़ रही थी? कुछ इन्हीं प्रश्नों के उत्तर ढूंढती एक पुस्तक आजकल पढ़ रही हूँ "स्त्री: मुक्ति का सपना" इसके मुख्य संपादक प्रो. कमला प्रसाद और राजेन्द्र शर्मा हैं, जबकि अरविंद जैन और लीलाधर मंडलोई अतिथि संपादक हैं.  यहाँ मैं अरविंद जैन के सम्पादकीय के कुछ उद्धरण दे रही हूँ, -
"स्त्री को 'देह के हथियार' से कितना 'सत्ता में हिस्सा'' मिला या मिला पाया- हम सब अच्छी तरह जांते हैं. पुरुषों के इस भयावह 'खेल' में स्त्री सहमति का निर्णय स्वयं ले रही है या 'सिक्का' (रुपया, डालर, पौंड ) ? देह के अर्थशास्त्र में स्वेच्छा और स्वतंत्रता का निर्णायक आधारबिंदु  क्या है? देह के व्यवसाय के मुनाफे और 'देह की कीमत' के बीच क्या अंतर्संबंध है? खेल के नियम, शर्तें और चुनाव प्रक्रिया कौन निर्धारित कर रहा है?"
इन सवालों से स्थिति स्पष्ट होती जाती है. हम ये तो देख रहे हैं कि पुरुष डियोडरेंट के विज्ञापन में औरतें बिकनी पहनकर दिख रही हैं, पर उनसे कौन ऐसा करा रहा है? कौन इस बात पर उन्हें मजबूर कर रहा है कि यदि वे ऐसा नहीं करेंगी तो प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जायेंगी?
यदि ये कहा जाए कि औरतें अपना शोषण होने ही क्यों देती हैं, तो उसका उत्तर यह है कि औरतों का शोषण कहाँ नहीं होता? यदि कार्यस्थल पर हो रहे शोषण से बचने के लिए वे घर में बंद रहने का निर्णय लें, तो क्या उनका शोषण नहीं होता? क्या घर में भी औरतें पूरी तरह सुरक्षित हैं? नहीं.
शो बिजनेस में नारी देह के इस्तेमाल को अरविन्द जैन बहुत अच्छी तरह सामने रखते हैं-
"बहुराष्ट्रीय पूँजी के सामने सुन्दर स्त्री के विरोध, प्रतिरोध और मोलभाव का क्या कोई मतलब है? पुरुष उद्योगपतियों द्वारा पहले से तय कीमत (इनाम, पुरस्कार, पारिश्रमिक...) पर, जब हज़ारों विश्व सुंदरियों को लाइन लगाकर देह प्रदर्शन के लिए लाकर खड़ा कर दिया जाता हो, तब राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय दलाओं के हाथों में नाचती कठपुतलियाँ या सुन्दर गुडियाँ सिर्फ वस्तु, माल या साधन भर होती हैं. खरीददार की शर्तों पर खेल-खेलने में, सुन्दरी की हार पहले से ही निश्चित है..."
स्त्री को घर में रखने और वहाँ से बाहर निकालने का सारा काम इसी विश्वव्यापक पूँजी के खेल का एक हिस्सा है. खेल के नियम भी यही तय करती है, खिलाड़ियों को भी और हार-जीत को भी. एक ओर तो औरतों को घर में बैठाकर, उसके घरेलू काम को अनुत्पादक सिद्ध करके उसके अंदर आत्मविश्वास की कमी पैदा करती है, तो दूसरी ओर माडलिंग, एक्टिंग आदि जैसे शो बिज़ को ग्लैमराइज करके सुन्दर लड़कियों को उस ओर आकर्षित करती है. ध्यान दीजिए रैम्प पर सैकड़ों लोगों के सामने वाक् करने के लिए माडल के पास बहुत अधिक आत्मविश्वास होना चाहिए और उसके अंदर ये आत्मविश्वास भी वही पूँजी भरती है, जो हाउस वाइफ को नकारा सिद्ध करती रहती है.
ये कहा जा सकता है कि पूंजीवाद अपना व्यापार चलाने के लिए औरतों का मनचाहा इस्तेमाल करता है. चाहे उसे घर में रखना हो या रैम्प पर चलना हो. वह सिर्फ 'कार्य करने' के लिए होती है, जैसा उसे कहा जाता है या उसे दिखाया जाता है. सोचना और निर्णय लेना औरतों का नहीं, पुरुषों का कार्य है. क्योंकि विश्व की लगभग समस्त पूँजी उन्हीं के पास है. एक-दो को छोड़ दें तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सी.ई.ओज., फिल्म, राजनीति हर जगह पुरुषों का वर्चस्व है.  इन बातों से औरतें बिल्कुल अनभिज्ञ, उनके इशारों पर नाचती रहती हैं और जो विरोध करती है या प्रश्न उठाती है, उसे प्रतिस्पर्धा से बाहर होना पड़ता है या फिर नारीवादी (जो कि आजकल एक गाली की तरह प्रयुक्त हो रहा है) कहकर उन्हें हे दृष्टि से देखा जाने लगता है.

(उपर्युक्त पुस्तक गूगल बुक्स पर इस पते पर देखी जा सकती है-
http://www.google.com/books?id=B9_b5iySOMAC&source=gbs_slider_thumb

और इस जगह ऑर्डर देकर मंगाई जा सकती है अपने पते पर, मैंने इसी तरह मंगाई है-
http://www.vaniprakashan.in/book_detail.php?id=224

शनिवार, 31 जुलाई 2010

मैं ऐसा क्यों करती हूँ?

ये प्रश्न मैंने अपने आप से तब पूछा, जब किसी ने सीधे-सीधे मुझसे पूछ लिया कि मैं ये औरतों वाले मुद्दों के पीछे क्यों पड़ी रहती हूँ??? यह भी कहा कि आप नारीवादियों का बस एक ही काम है औरतों को उनके घर के पुरुषों के खिलाफ भड़काना और पुरुषों के विरुद्ध तरह-तरह के इल्जाम लगाना. आप ये सोच सकते हैं कि कोई मुझसे इतना सब कह गया और मैं सुनती गयी...हाँ, क्योंकि मैं जिस विषय पर शोध कर रही हूँ, जो मेरा मिशन है, उसका पूर्वपक्ष और प्रतिपक्ष सुनना ज़रूरी है. ये देखना ज़रुरी है कि ये मानसिकता हमारे समाज में कितनी गहरी पैठी है कि कोई नारी-सशक्तीकरण की बात सुनना ही नहीं चाहता, या फिर उसे सिर्फ गरीब औरतों से जोड़कर देखता है, पर इससे पहले ये जानना ज़रुरी है कि मैं ऐसा क्यों करती हूँ ? मतलब नारी मुद्दों पर लेख लिखना, कवितायें लिखना, बहस करना, विरोध करना और जिस जगह नारी-सम्बन्धी कोई अनुचित बात दिखे वहाँ कूद पड़ना.

मेरे मन में नारी-मुद्दों को लेकर जो अत्यधिक संवेदनशीलता है, वो सिर्फ इसलिए नहीं है कि मैं अपने जीवन में पुरुषों द्वारा सताई गयी हूँ, हालांकि मैंने भी बहुत कुछ झेला है, जो किसी भी भावुक औरत को विद्रोही बनाने के लिए पर्याप्त है. पर बात इतनी सी ही नहीं है... इससे कहीं आगे की है. मैं गहन अध्ययन और विचार-विमर्श में विश्वास करती हूँ और यह अध्ययन सिर्फ किताबी नहीं है, वास्तविक समाज का अध्ययन है, लोगों का अध्ययन है. इसी कारण मैं समाज को एक नए नजरिये से देखना चाहती हूँ, जो कि कोई भी तार्किक और संवेदनशील व्यक्ति कर सकता है, भले ही उसने उतनी पढ़ाई ना की हो.

हमारा समाज बहुत ही रुढिवादी है, जो कि ना सिर्फ परिवर्तन से डरता है बल्कि चीज़ों को नए दृष्टिकोण से देखना तक नहीं चाहता, पर मैं इतना कहूँगी कि अगर आप किसी बात को बस एक आयाम से देखते हैं, तो कभी भी प्रगति नहीं कर सकते. अगर आपने सिर्फ इतिहास पढ़ा और सबाल्टर्न इतिहास नहीं पढ़ा, तो आपका ज्ञान अधूरा है; सिर्फ संस्कृत पढ़ी, प्राकृत नहीं, तो आप अधूरी जानकारी रखते हैं, इसी तरह मनोविज्ञान के साथ समाजशास्त्र और मानवशास्त्र जुड़ा हुआ है. ये सच है कि कोई भी व्यक्ति एक साथ सभी अंतर्संबंधित विषयों पर मास्टरी नहीं हासिल कर सकता, पर फिर भी एक विषय के साथ अन्य विषयों का सामान्य ज्ञान होना चाहिए और विषय को अलग-अलग दृष्टिकोणों से पढ़ना चाहिये.

अब बात नारीवादी दृष्टिकोण की आती है. मेरा समाज को देखने का यह एक नजरिया है... ध्यान देने योग्य बात है कि 'एक मात्र' नजरिया नहीं. जैसे-जैसे मैं संस्कृत के नए ग्रंथों और अन्य लोकोक्तियों की बारे में पढ़ती जा रही हूँ,  इतिहास और समकालीन समाज को देखने का नारीवादी दृष्टिकोण और भी स्पष्ट होता जा रहा है. इतिहास को देखने के नारीवादी नजरिये के बारे में अपने पिछले लेख में मैं एक संक्षिप्त परिचय दे चुकी हूँ. जैसा कि हम सभी विश्वास करते हैं कि हमारी संस्कृति में नारी का सर्वोच्च स्थान था और उसमें कालान्तर में ह्रास आ गया, मुख्यतः मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारण. इसका मतलब यह कि यदि मुस्लिम आक्रमणकारी नहीं आते तो हमारे देश में नारी की स्थिति घर-बाहर दोनों जगह सर्वोच्च होती. नारीवादी विचारक इस बात को सही नहीं मानते और विभिन्न तर्कों से अपने पक्ष को पुष्ट करते हैं. पिछले लेख में मैं इसे बता चुकी हूँ.

मैंने जब इन नारीवादी विचारकों के विचार पढ़े थे, तो उस पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं किया था, क्योंकि मैं बहुत तार्किक हूँ और किसी की भी बात को बिना अपने तर्क की कसौटी पर उतारे नहीं मानती, लेकिन जैसे-जैसे मैं संस्कृत का अध्ययन और अधिक करती गयी मेरा यह नजरिया पुष्ट होता गया. मैं अभी शोध कर रही हूँ, इसलिए पूरी बात तो यहाँ नहीं रख सकती क्योंकि जो संस्था मुझे फेलोशिप दे रही है, उसकी नियमावली में है कि मैं थीसिस पूरी होने से पहले सम्बंधित विषय पर कुछ प्रकाशित नहीं कर सकती. पर कुछ निष्कर्ष जो मेरे अपने हैं उन्हें कुछ बिंदुओं में रखने का प्रयास कर रही हूँ---

(1.)-- सबसे पहले तो ये बात पूरी तरह सत्य नहीं है कि प्राचीनकाल में भारत में नारी की स्थिति सर्वोच्च थी. यह आंशिक सत्य है. समाज में विवाहिता स्त्री और माता का स्थान अन्य स्त्रियों की अपेक्षा उच्च था. विवाहिता तो अपने पति के अधीन थी, परन्तु माँ सबसे ऊपर थी. यहाँ तक कि उसे ईश्वर से भी उच्च माना गया. परन्तु इसके ठीक विपरीत जो स्त्री माँ नहीं बन पाती, उसे समाज की उपेक्षा झेलनी पड़ती, जो अब भी कायम है. इसी तरह अविवाहित अथवा विधवा को समाज में बिल्कुल सम्मान नहीं मिलता था. स्त्रियों की स्थिति पुरुषों से उनके संबंध के सापेक्ष थी. ये परम्परा अब भी कायम है. समाज में जो सम्मान विवाहित स्त्रियों को प्राप्त है, वह अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा को नहीं और उस पर विडम्बना यह कि विवाहित स्त्री के घरेलू कार्य को उपेक्षा से देखकर समय-समय पर उसकी औकात को बताया जाता रहता है.

(2.)--प्राचीन संस्कृत-साहित्य में स्थापित नारी की 'सती' वाली आदर्श छवि से इतर भी एक छवि रही है और वह थी एक स्वतन्त्र नारी की छवि, जिसे 'कन्या' कहा गया. यह नारी अपने कार्यों और निर्णयों के लिए और यहाँ तक कि यौन-संबंधों के लिए भी किसी एक पुरुष के अधीन नहीं थी. वह अपने निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतन्त्र थी. शास्त्रों में नहीं, अपितु लोक में उसे मान्यता प्राप्त थी. कुंती, द्रौपदी, देवयानी, उर्वशी और सूर्पनखा इसी श्रेणी में आती हैं. यह सभी लोग जानते हैं कि सूर्पनखा ने राम और लक्ष्मण से प्रणय-निवेदन किया था और इसी प्रकार देवयानी ने कच से और उर्वशी ने अर्जुन से प्रणय-निवेदन किया था. ये अलग बात है कि इन सभी को इस कार्य के लिए दंड भोगना पड़ा. क्योंकि तब भी पुरुषप्रधान समाज का एक वर्ग था जो कि स्त्रियों की इस विषय में स्वतंत्रता नहीं पसंद करता था. और भी उदाहरण हैं, विस्तार के भय से और नहीं लिख रही हूँ.

(3.)-- यह भी गलत तथ्य है कि औरतों की स्थिति में ह्रास अर्थात पर्दाप्रथा, सतीप्रथा, बालविवाह आदि मुस्लिमों के आक्रमण के बाद समाज में आये. घूँघट डालना संभ्रांत घरों की स्त्रियों में प्राचीनकाल से प्रचलित है और (उदाहरण- अभिज्ञान शाकुंतल का पाँचवाँ अंक, जब शकुंतला घूँघट डालकर दुष्यंत की सभा में जाती है और बाणभट्ट की कादम्बरी में चांडाल कन्या)  इसी प्रकार बालविवाह ( मनुस्मृति) और सती प्रथा (महाभारत) भी. मात्र जौहरप्रथा मुस्लिमकाल के बहुत बाद मुख्यतः राजपूतों में प्रचलित हुयी.

(4.)-- तत्कालीन विभेदकारी सामाजिक व्यवस्था को लेकर नारियों के एक वर्ग में असंतोष था, जो कि समय-समय पर बाहर आ जाता था, जैसा कि मैंने अपने इस लेख में लिखा है कि किस प्रकार प्राचीन भारत में भी नारी द्वारा सामाजिक विरोध के उदाहरण मिलते हैं.

इस प्रकार मेरे लिए नारीवाद ना सिर्फ एक आंदोलन है, एक विचारधारा है, बल्कि समाज को समझने का एक दृष्टिकोण और उपागम भी है. हमें इतिहास को अवश्य एक नए नज़रिए से देखना होगा और इसके लिए संस्कृत साहित्य को भी नए प्रकार से पढ़ना होगा, ताकि उन लोगों को जवाब दिया जा सके जो भारतीय संस्कृति में औरतों की सर्वोच्च स्थिति के विषय में एक-आध ग्रंथों से कुछ श्लोक उद्धृत करके यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि हमारे देश में इस प्रकार के आंदोलनों की कोई ज़रूरत नहीं है. सच तो यह है कि औरतों के लिए सरकारी स्तर पर, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा, एन.जी.ओज द्वारा और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किये जा रहे इतने प्रयासों के बावजूद उनका सशक्तीकरण इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि हमारे यहाँ के पुरुष अभी भी यह मानने को ही तैयार नहीं होते कि औरतों के साथ भेदभाव होता है और सदियों से होता आया है. हम आज भी अतीत की स्वर्णिम कल्पनाओं में डूबे हुए हैं और जाने कब उबर पायेंगे???
   

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प्रिंट मीडिया में इस ब्लॉग की चर्चा

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7 सितम्बर 2011

राष्ट्रीय सहारा में २० अप्रैल २०११

राष्ट्रीय सहारा

राजस्थान पत्रिका में बालेंदु शर्मा दाधीच जी का लेख