मंगलवार, 31 मार्च 2015

परम्परागत विवाह या...

मेरे एक मित्र ने कहा था कि "हिन्दुस्तान में नब्बे प्रतिशत संयुक्त परिवार इसलिए चल रहे हैं कि स्त्रियाँ 'सह' रही हैं, जिस दिन वे सहना छोड़ देंगी, परिवार भरभराकर ढह जायेंगे." उन्होंने उस मंदिर का जिक्र किया, जहाँ विधवा-विधुर और तलाकशुदा स्त्रियों और पुरुषों का विवाह करवाने के लिए उनके माता-पिता और सम्बन्धी नाम दर्ज कराते हैं. मुझे आश्चर्य हुआ कि ऐसी भी जगहें होती हैं. उन्होंने कहा कि वहाँ ज़्यादा संख्या तलाकशुदा लोगों की ही थी. और तलाक क्यों बढ़ रहे हैं उसका कारण भी उन्होंने यही दिया क्योंकि अब बहुत सी लड़कियाँ 'सह' नहीं रही हैं. पहले लड़कियाँ 'किसी भी तरह' निभाती रहती थीं, वैसे ही जैसे पिछली पीढ़ी संयुक्त परिवार की ज़िम्मेदारियाँ निभा रही है.

मैं मानती हूँ कि यह सच है कि स्त्रियाँ अब 'जैसे-तैसे' अपना गृहस्थ जीवन खींचना नहीं चाहतीं, जीना चाहती हैं. इसलिए उन्होंने 'लड़की की मायके से डोली उठती है और ससुराल से अर्थी' वाली कहावत को मानने से इंकार कर दिया है. लेकिन कितने प्रतिशत लड़कियों ने? यह सोचने की बात है.

तलाक सिर्फ इसलिए नहीं हो रहे कि लड़कियों ने सहना छोड़ दिया है, बल्कि इसलिए भी कि परम्परागत विवाह (अरेंज्ड मैरिज) की प्रक्रिया ही सिरे से बकवास है. मेरी एक मित्र जो कि राज्य प्रशासनिक सेवा की ऑफिसर है, कई लड़कों को 'देख' चुकी है '(मिलना' शब्द यहाँ किसी भी तरह उपयुक्त लग ही नहीं रहा है) लेकिन वह समझ ही नहीं पाती कि एक-दो या ज़्यादा से ज़्यादा तीन घंटे की देखन-दिखाई, वह भी परिवार वालों के बीच किसी व्यक्ति को जीवनसाथी के रूप में परखने में किस प्रकार सहायक हो सकती है? यहाँ लड़का-लड़की दोनों का अहं भी आ जाता है. यदि वे बात करें और सामने वाले ने उसके बाद मना कर दिया तो उनकी तो बेइज्जती हो जायेगी. यह भी बात है कि कहीं एकतरफा लगाव हो गया और सामने से अस्वीकार, तो?

एक नहीं, हज़ार बातें हैं. उस पर भी इतने झूठ बोले जाते हैं परम्परागत विवाह के लिए कि पूछिए मत. मेरे उन्हीं मित्र ने एक बात और कही कि न जाने कितने तलाक तो एक-दूसरे के झूठ खुलने की वजह से होते हैं. दोनों ओर से एक-दूसरे के बारे में खूब बढ़ा-चढ़ाकर बातें की जाती हैं, जिनमें से आधी झूठ होती हैं. देख-परखकर विवाह करना अच्छी बात है, लेकिन उसका अवकाश तो मिले. कम से कम थोड़ी देर के लिए तो अकेले में बात कर सकें. वैसे मेरे विचार से तो उन्हें कई दिन तक बात करनी चाहिए जिससे एक-दूसरे के बारे में गहराई से जान सकें...लेकिन यहाँ पर एक तो लड़का-लड़की का अहं और ठुकराए जाने का डर होता है दूसरे "झूठ बोलकर रिश्ता लगवाने वाले" उनको ऐसा नहीं करने देना चाहते. आश्चर्य है कि अपने देश में ऐसे कूढ़मगज आज भी हैं. माफ कीजियेगा ऐसा कहने के लिए, लेकिन जीवन भर के साथ के लिए इस तरह से शुरुआत मुझे बहुत हास्यास्पद लगती है.

वास्तवकिता यह है कि हममें से कुछ लोग किसी न किसी तरह से जल्द से जल्द अपने बच्चों की शादी कर देना चाहते हैं बस. ये बात लड़के-लड़की दोनों के लिए एक जैसी है. अरेंज्ड शादियों में इतना अवकाश नहीं होता कि एक-दूसरे को ठीक से जान-समझ सकें. प्रेम विवाह में भी कभी-कभी पता नहीं चल पाता कि हम वास्तव में एक-दूसरे से प्रेम करते हैं या नहीं. लेकिन मेरे मित्र ने जिन लोगों का जिक्र किया था वे सभी अरेंज्ड यानि पारंपरिक विवाह के सताए हुए ही थे. माता-पिता ने बिना गहराई से जाँच-पड़ताल किये और बिना लड़का-लड़की को एक-दूसरे को समझने का मौका दिए विवाह कर दिया. जब वे दोनों वैवाहिक जीवन में मिले तो पाया कि वैसा कुछ भी नहीं था, जैसा उन्होंने सोचा था. फिर भी कोशिश की टूटे दिल और रिश्ते को बचाने की और जब निभाते-निभाते ऊब गए तो आखिर अलग होने का फैसला ले लिया. मित्र के मुताबिक़ कुछ शादियाँ छः महीनों में टूट गयीं.

मैं यह नहीं मानती कि विवाह जन्म-जन्मांतर का बंधन होते हैं, लेकिन किसी रिश्ते के टूटने पर दर्द तो होता ही है, गुस्सा और पछतावा भी होता है, खासकर के जब वह उस "तरीके" के अनुसार हुआ हो, जिसे हम भारतीय सबसे आदर्श विवाह मानते हैं- "शादी दो लोगों के बीच नहीं, दो परिवारों के बीच होती है" क्या कर पाते हैं परिवारवाले जब रिश्ता टूटता है तो? कुछ नहीं न? तो इसे इतना अनुल्लंघनीय क्यों बना दिया है उन्होंने? इसी को आदर्श विवाह क्यों मानते हैं? ये मान क्यों नहीं लेते कि इसमें खामियाँ हैं और यदि सुधार न हुआ तो इसी तरह से आपके बच्चे मानसिक संत्रास से गुजरते रहेंगे.

मेरे विचार से विवाह का निर्णय उन दोनों लोगों के लिए ही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है, जिन्हें एक-दूसरे के साथ जीवन बिताना है. इसलिए निर्णय भी उन्हीं को केन्द्र में रखकर लिया जाना चाहिए और सबसे बेहतर है कि निर्णय ही उन्हीं को लेने दिया जाय. ये बात माँ-बाप को बुरी लग सकती है, लेकिन बेहतर तो यही है. लड़का-लड़की को भी समझना चाहिए कि रात-दिन एक साथ रहकर ज़िंदगी उन्हें बाँटनी है, माँ-बाप को नहीं, इसलिए खुद निर्णय लें, भले ही इसके लिए माँ-बाप के विरुद्ध जाना पड़े. और बेशक, जब लगे कि नहीं निभनी है तो अलग हो जाएँ. कोई भी रिश्ता इतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता कि उसे निभाने के लिए आप अपनी ज़िंदगी नरक बना लीजिए.



रविवार, 22 मार्च 2015

बेदाद ए इश्क रूदाद ए शादी: एक पाठक की नज़र से

'बेदाद ए इश्क रुदाद ए शादी' पहले-पहल किताब का नाम बड़ा अजीब सा लगा था, लेकिन जब अशोक भाई ने फेसबुक पर शेयर किया कि किताब में बागी प्रेम विवाहों के आख्यान हैं, तो इसे पढ़ने के लिए मन उत्सुक हो उठा. पुस्तक मेले से लाने के बाद तीसरे दिन जब इसे पढ़ना शुरू किया तो एक बैठक में पढ़ गयी. जी हाँ, रात के दो बजे से सुबह के दस बजे तक पूरी किताब जैसे एक सांस में पढ़ डाली

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसमें प्रेम कहानियाँ थीं, लेकिन उससे भी अधिक इसलिए कि वास्तविक कहानियाँ थीं और उन्हीं की ज़ुबानी जिन्होंने निराशा के इस दौर में प्रेम किया और उसे शादी तक पहुँचाने का साहस भी. यहाँ यह सवाल उठ सकता है कि प्रेम तो प्रेम है, क्या ज़रूरी है कि उसका अंजाम शादी ही हो? क्या जिनकी शादी नहीं होती, उनका प्रेम सच्चा नहीं होता? हाँ, होता है. प्रेम किसी भी रूप में हो, सच्चा ही होता है. प्रेम का सम्मान करने वाले हर प्रेम को समान दृष्टि से देखते हैं. उनके लिए प्रेमी बस प्रेमी हैं, भले ही वे अंततः विवाह बंधन में बांध पाए हों या नहीं. लेकिन प्रेम सबका दुश्मन तभी बन जाता है, जब वह शादी के अंजाम तक पहुँचने की कोशिश करता है.

हमारे समाज में एक बेचारी 'शादी' पर ही तो पूरे समाज की जिम्मेदारियों का बोझ है. उसे पितृसत्ता को बनाए रखना है, ताकि संपत्ति और स्त्रियों की यौनिकता पर पुरुषों का नियंत्रण बरकरार रहे. उसे 'सामंतवाद' को बचाकर रखना है, ताकि धन-दौलत-बाहुबल-सत्ता आदि का दिखावा करने का अवसर उपलब्ध होता रहे. उसे 'जातिवाद' को भी जिंदा रखना है, ब्राह्मणवाद बचा रहे. उसे धर्म की भी रक्षा करनी है, ताकि साम्प्रदायिक ताकतें लोगों की अंधश्रद्धा को ईंधन बनाकर नफ़रत की आग जलाए रख सकें और उससे अपने हाथ सेंकते रहें. और अंततः उसे वर्ग-भेद बनाए रखने में भी सहयोग करना है क्योंकि शादी से सम्बन्धित सबसे प्रसिद्ध जुमला "शादी अपने बराबर वालों में ही होती है.”

इन सबसे इतर प्रेम ऊपर की किसी शर्त को मानने को तैयार नहीं, तो क्यों न दुश्मन हो जाए समाज उसका? चलो, प्रेम को तो माफ भी कर दिया जाय! याद रहे, हमारे समाज में अव्वल तो प्रेम करना नहीं चाहिए, हो गया तो कोई बात नहीं, पता नहीं चलना चाहिए (क्योंकि बद अच्छा, बदनाम बुरा) और मान लो पता भी चल गया, तो लड़कियों को नसीहत कि "उसे भूल समझकर भूल जाओ" और लड़कों को सीख कि "प्यार-व्यार तो ठीक, तुम एक क्या हज़ार करो, लेकिन वो लड़की इस घर की बहू नहीं बन सकती" प्रायः यह पितृसत्तात्मक परिवार के मुखिया का बड़े गर्व और धमकी भरे अंदाज़ में दिया हुआ हुक्म होता है.

तो सोचिये, इन हालात में प्रेम को शादी तक ले जाना कितनी बड़ी बात है. इसीलिये हमारे यहाँ शादी को प्रेम की परिणति या सफलता माना जाता है. प्रेम विवाह पितृसत्ता, सामंतवाद, वर्ग भेद, जातिवाद सबका दुश्मन है. प्रेम विवाह चाहे अंतरजातीय हो या स्वजातीय, चाहे एक धर्म में हो या अंतरधार्मिक, यह किसी न किसी स्तर पर कोई न कोई सामाजिक रूढ़ि तोड़ता है. 

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. प्रेम विवाह में असली परीक्षा तो गृहस्थ जीवन की शुरुआत के साथ शुरू होती है. मैंने इसके सम्बन्ध में इसी ब्लॉग पर एक लेख लिखा था- "प्रेम, प्रेम विवाह और पितृसत्ता".इस किताब की कुछ कहानियाँ इसी सच को सामने लाने की कोशिश करती हैं कि प्रेम विवाह को हमारे समाज में किस तरह से चुनौतियाँ झेलनी पड़ती हैं. एक ओर तो उन्हें घर-परिवार-समाज का विरोध झेलना पड़ता है, दूसरी ओर आपसी प्रेम को भी बचाए रखने की ज़िम्मेदारी होती है. सुमन केशरी, देवयानी भारद्वाज, प्रीती मोंगा, मसिजीवी और ममता की कहानियाँ शादी के बाद के संघर्षों को बयान करती हैं. इसमें से कुछ तो आपसी प्रेम को बचाए रखने के जद्दोजहद का वर्णन करती हैं और कुछ प्रेम विवाह के बाद लड़की द्वारा नए घर-परिवार में सामंजस्य की दास्तान.  

देवयानी जी ने जिस साहस और बेबाकी से अपने वैवाहिक जीवन के संघर्षों को चित्रित किया है, वह बेहद प्रभावी है. लेकिन यह तय है कि इस प्रकार ईमानदारी से अपने सम्बन्धों के अंतर्द्वंद्व को परखने का साहस वही लड़की कर सकती हो, जिसने अपने मनपसंद युवक से प्रेम किया और स्वयं विवाह का निर्णय लिया, उसे पूरी निष्ठा से निभाया और समस्याओं को सुलझाने के अथक प्रयास किये. और अंततः न सुलझ पाने पर कड़े निर्णय लेने की भी हिम्मत की

सुमन केशरी जी ने प्रेम के सामाजिक पहलुओं का विश्लेषण करते हुए अपनी कहानी को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखा है और प्रीती मोंगा ने यह बात स्पष्टता से कही कि यदि जीवन का एक निर्णय किसी कारणवश हमें गलत लगने लगता है, तो उसे बदलने में संकोच नहीं करना चाहिए

अमित कुमार श्रीवास्तव, विभावरी, नवीन रमण-पूनम, प्रज्ञा वर्षा सिंह, रूपा सिंह, किशोर दिवसे, राजुल तिवारी, मोहित खान और शकील अहमद खान आदि सभी की कहानियाँ प्रेम और उसे शादी के परिणाम तक पहुँचाने के संघर्ष की कहानियाँ हैं. इनमें से कुछ कहानियाँ बेहद रूमानी हैं तो कुछ सीधे-सीधे समाज को चुनौती देती हुयी.

यहाँ यह बता देना उचित होगा कि यह किताब मात्र प्रेम कहानियों का संग्रह नहीं. इसमें संकलित कई प्रेम कहानियाँ अपने-अपने ढंग से प्रेम के साथ-साथ समाज और उसके ताने-बाने की भी निर्ममता से जाँच-पड़ताल करती हैं. इसी के साथ संपादक द्वय -नीलिमा चौहान और अशोक कुमार पाण्डेय के लेख प्रेम के समाजशास्त्रीय आयाम और प्रभावों का विश्लेषण करते चलते हैं और सुजाता का लेख अनुभव और अध्ययन से उपजा एक दस्तावेजी बयान है.

मैंने इस लेख में बहुत ज़्यादा विस्तार इसलिए नहीं किया क्योंकि पहली बात, मैं कोई आलोचक या पुस्तक समीक्षक नहीं, जो तटस्थ भाव से समीक्षा कर सकूँ. मैंने जो लिखा एक पाठक की दृष्टि से लिखा. दूसरी बात, किताब के बारे में अधिक लिखकर मैं इसे पढ़ने का मज़ा किरकिरा नहीं करना चाहती. लेकिन मैं कहना चाहूँगी कि हाल ही में पढ़ी गयी कई पुस्तकों में से इस पुस्तक ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया. जैसा कि नीलिमा जी ने पुस्तक की भूमिका में कहा है कि ये सिर्फ प्रेम कहानियाँ नहीं, बल्कि समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए उपयोगी सामग्री भी है, मैं भी यह मानती हूँ कि साहित्य के अनुरागी पाठकों के साथ-साथ सामाजिक विषयों के अध्येताओं को भी यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए.

शनिवार, 14 मार्च 2015

भारतीय समाज और लिंग-जाति की अन्तःसम्बद्धता (1)



प्राचीनकाल में धर्मशास्त्रों में संकलित हिन्दू विधियाँ आज भी उनके सामाजिक जीवन को प्रभावित करती हैं। यद्यपि जनसाधारण इन स्मृतियों के सम्पूर्ण अध्ययन से दूर ही रहा है, तथापि परम्परा से इनके नियमों का पालन करता रहा है। अतः वर्तमान हिन्दू समाज को जटिल संरचना को समझने के लिए धर्मशास्त्रों का ज्ञान अपेक्षित है। 

भारतीय परम्परा में स्मृतियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है. स्मृतियाँ इतिहास को जानने का महत्वपूर्ण-स्रोत तो हैं ही, विश्व के प्राचीनतम अभिलेख होने के कारण भी अत्यधिक मूल्यवान हैं. स्मृति शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है-  एक अर्थ में यह वेद-वाङ्मय से इतर ग्रन्थों से सम्बन्धित है तथा संकीर्ण अर्थ में स्मृति तथा धर्मशास्त्र एक हैं. स्मृतियों के प्रतिपाद्य विषय अत्यधिक विस्तृत हैं. समाज और व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक पक्ष से सम्बन्धित प्रावधान इनमें उपस्थित हैं. इन प्रावधानों ने भारतीय समाज पर अत्यधिक गहन और बहुपक्षीय प्रभाव डाला है. इन्होंने एक ओर लोकमानस के दैनिक कार्यकलाप से लेकर सम्पूर्ण जीवन के विषय में आचार-संहिता का कार्य किया, दूसरी ओर भारतीय समाज की संरचना में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अतः वर्तमान हिंदू समाज की जटिल और स्तरीकृत संरचना को समझने के लिए स्मृतियों का अध्ययन आवश्यक है.

स्मृतियों में वर्णाश्रम-व्यवस्था, संस्कार, सामाजिक कार्यकलाप, दण्ड, दायभाग आदि के प्रसंग में शूद्रों तथा स्त्रियों के लिए विशेष प्रावधान किये गए हैं. इन सभी प्रावधानों में वर्ण-व्यवस्था एक ऐसा प्रावधान है, जिसने भारतीय समाज को एक स्तरीकृत रूप दिया. वर्ण-व्यवस्था ने ही क्रमशः जाति-व्यवस्था का रूप लेकर सामाजिक संरचना को और भी जटिल स्वरूप प्रदान किया. जाति-व्यवस्था, भारत की सामाजिक व्यवस्था में पृथक्करण और स्तरीकृत का सबसे प्रभावशाली और निर्णायक तत्व है. इस व्यवस्था की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस समाज के व्यक्तियों के जीवन का प्रत्येक क्षेत्र इससे प्रभावित और निर्धारित होता है. समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए एक जाति निर्धारित है, जिसका समाज की पदसोपानीय व्यवस्था में अपना एक अलग सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक स्थान है.

प्राचीनकाल से ही स्त्रियाँ जाति आधारित भारतीय समाज की सबसे अधिक प्रभावित और कमज़ोर सदस्य हैं. जाति-व्यवस्था के फलस्वरूप उत्पन्न इस पिरामिडीय व्यवस्था के सबसे ऊपर के स्तर पर ब्राह्मण पुरुष स्थित होता है तथा सबसे निचली सीढ़ी पर शूद्र स्त्री. जहाँ सामान्य जातियों की स्त्रियाँ आतंरिक (पारिवारिक) शोषण और लिंगगत भेदभाव की शिकार होती हैं, वहीं शूद्र तथा अन्य पिछड़ी जाति की औरतें जाति, वर्ग, धर्म आदि से सम्बन्धित बहुकोणीय तथा बहुपक्षीय दबावों को झेलती हैं

इस बात के ऐतिहासिक साक्ष्य उपस्थित हैं कि वैदिक काल में स्त्रियों को पुरुषों के ही समान यज्ञोपवीत संस्कार एवं वेदाध्ययन का अधिकार था. वर्ण-व्यवस्था उस युग में उतनी कठोर नहीं थी, जितनी कि धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों में वर्णित है. किन्तु इतना स्पष्ट है कि शूद्र तथा स्त्री दोनों ही वर्गों के लिए वेदों का अध्ययन कालान्तर में निषिद्ध हो गया. धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों में यह निषेध स्पष्ट है. यज्ञोपवीत संस्कार वेदाध्ययन तथा औपचारिक शिक्षा-दीक्षा के लिए अनिवार्य संस्कार था. इसे निषिद्ध करने के कारण जहाँ एक ओर स्त्री तथा शूद्र शिक्षा से दूर होते गए, वहीं दूसरी ओर उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा का भी ह्रास होता गयाइसके अतिरिक्त और भी अनेक प्रावधान हैं, जो इन दोनों ही वर्गों को समाज के हाशिए पर धकेलने के लिए उत्तरदायी हैं

यदि हम वर्तमान भारतीय सामाजिक संरचना पर दृष्टि डालें, तो हमें स्तरीकरण के विभिन्न रूप दिखाई देंगे, जिनमें ‘लिंग’ एवं ‘जाति’ प्रमुख हैं. स्तरीकरण तथा विभेदीकरण के ये रूप आपस में इस प्रकार संबद्ध हैं कि ये शोषण के कई रूप उत्पन्न करते हैं. जाति और लिंग की इस अन्तः संबद्धता (Intersection) के फलस्वरूप तीन शोषित वर्ग अस्तित्व में आते हैं-सवर्ण स्त्री, दलित पुरुष तथा दलित स्त्री.

कुछ दशक पहले तक समाजशास्त्री यह मानते थे कि जाति और लिंग दो भिन्न-भिन्न अवधारणाएँ हैं. जाति समाजशास्त्र के अध्ययन का विषय है और जेंडर का अध्ययन नारीवादियों का विषय है. यह समझा जाता था कि दलित वर्ग की समस्याएँ ‘जाति’ के अध्ययन से समझी जा सकती हैं, चाहे वह दलित स्त्री हो या दलित पुरुष. इसी प्रकार स्त्री मात्र की समस्याएँ ‘लिंग-सम्बन्धी अध्ययन’ (gender study) के अध्ययन से सुलझ जायेंगी, चाहे वह सवर्ण स्त्री हो अथवा दलित स्त्री. लेकिन समस्या यह होती थी कि ‘दलित स्त्री’ की समस्याओं के अध्ययन के लिए अलग से कोई सिद्धांत विकसित न होने के कारण उनकी समस्याओं को समझने और उन्हें सुलझाने में विचारकों, सिद्धांतकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को कठिनाई होती थी

विगत कुछ दशकों में समाज में हुए सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तनों के कारण यह माना जाने लगा है कि जाति और लिंग एक-दूसरे से गहन रूप से अन्तः संबद्ध हैं और इसका मूल धर्मशास्त्र, विशेषतः स्मृतियों के प्रावधानों में निहित है. एक शूद्र स्त्री के ऊपर स्मृतियों के शूद्र-सम्बन्धी प्रावधान भी लागू होते हैं और स्त्री-सम्बन्धी प्रावधान भी. इसका प्रभाव वर्तमान काल तक दिखता है. इसके कारण दलित स्त्री की समस्याएँ दलित होने के कारण भी हैं और स्त्री होने के कारण भी

अन्तः संबद्धता की अवधारणा ने भी भारतीय समाज की जाति-लिंग संबद्धता के अध्ययन की ओर सिद्धांतकारों और शोध-कर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया. यह सामाजिक नारीवादी सिद्धांत तब सामने आया, जब पश्चिम की रेडिकल नारीवादियों के एक वर्ग ने इस बात पर ध्यान देना शुरू किया कि परम्परागत पश्चिमी नारीवाद ने उनकी समस्याओं को ठीक प्रकार से नहीं समझा है. उनके अनुसार यह समझ सिरे से गलत है कि श्वेत महिलाओं और अश्वेत महिलाओं के अनुभव, परिस्थितियाँ और समस्याएँ एक समान हैं. इन नारीवादियों ने यह माना कि अश्वेत नारियों का शोषण सिर्फ ‘स्त्री’ होने के नाते ही नहीं होता, बल्कि उसके पीछे अनेक अन्य कारक जैसे- रंग, वर्ग आदि भी होते हैं. और शोषण के ये सभी कारक आपस में अन्तः सम्बद्ध हैं. भारतीय नारीवादियों ने अन्तः संबद्धता की इस अवधारणा को अपनाया और उसे दलित स्त्रियों की समस्याओं के अध्ययन में उपयोग करना आरम्भ किया.

मंगलवार, 7 मई 2013

पैतृक सम्पत्ति पर बेटी का अधिकार क्यों न हो?

कुछ  दिन पहले मैंने अपने पिता की सम्पत्ति पर अपने अधिकार के सम्बन्ध में श्री दिनेशराय द्विवेदी जी से उनके ब्लॉग 'तीसरा खम्बा' पर एक प्रश्न पूछा था. उनके उत्तर से मैं संतुष्ट भी हो गयी थी और सोचा था कि कुछ दिनों बाद मैं पिता की सम्पत्ति पर अपना दावा प्रस्तुत कर दूँगी. लेकिन मैंने देखा कि जिसे भी इस सम्बन्ध में बात करो, वही ऐसा न करने की सलाह देने लगता है. मैं ऐसे लोगों से कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ. और साथ ही द्विवेदी जी से भी कुछ प्रश्न हैं इसी सन्दर्भ में.
मेरे पिताजी ने हम तीनों भाई-बहनों का एक समान ढंग से पालन-पोषण किया. उन्होंने कभी हममें लड़का-लड़की का भेदभाव नहीं किया. अपने अंतिम समय में वे भाई से थोड़ा नाराज़ थे. तो उन्होंने गुस्से में ये तक कह दिया था कि "मैं अपनी सम्पत्ति अपनी दोनों बेटियों में बाँट दूँगा. इस नालायक को एक कौड़ी तक नहीं दूँगा." मैंने हमेशा बाऊ जी की सेवा उसी तरह से की, जैसे कोई बेटा करता (हालांकि बेटे ने नहीं ही की थी, पिताजी के अनुसार)
फिर मैं उनकी सम्पत्ति की उत्तराधिकारिणी क्यों नहीं हो सकती? किस मामले में मैं अपने भाई से कम हूँ? और 2005 के हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन के बाद से ये कानूनी हक भी है. लेकिन मेरे भाई ने पिताजी के देहांत के बाद से घर पर कब्ज़ा कर लिया. अभी कुछ दिन पहले ज़मीन के कागज़ की नक़ल निकलवाई तो पता चला कि वो अपने आप भाई के नाम ट्रांसफर हो गयी है. जब 2005 के कानून के अनुसार बेटी भी अब ठीक उसी तरह अपनी पैतृक सम्पत्ति में उत्तराधिकार और विभाजन की अधिकारी होगी, जैसा अधिकार एक बेटे का है, तो ज़मीन अपने आप भाई के नाम क्यों हो गयी? क्या मेरी जगह कोई भाई होता, तो भी ऐसा ही होता. अगर नहीं तो इस कानून का मतलब क्या? जब मुझे लड़कर ही अपना हक लेना पड़े, तो वो हक ही क्या?
अगर कोई कृषि भूमि के कानूनों का हवाला देता है, तो क्या ये ठीक है कि पैतृक सम्पत्ति में बेटी को हक ना दिया जाय, सिर्फ इसलिए कि ज़मीन के अधिक टुकड़े हो जायेंगे? फिर वही बात कि फिर उस कानून का मतलब क्या? क्योंकि हमारे गाँवों में तो उतराधिकार योग्य सम्पत्ति में अधिकतर कृषि भूमि ही होती है. ऐसे तो लड़कियों को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार के कानून का कोई मतलब ही नहीं रह जाता.
मेरे लिए उस सम्पत्ति का महत्त्व इसलिए नहीं है कि उससे मुझे कोई लाभ होगा. मेरे लिए सम्पत्ति में उतराधिकार की लड़ाई अपने पिता के प्रेम पर मेरे हक की लड़ाई है. और अगर कोई यह तर्क देता है कि लड़कियों के संपत्ति में हक माँगने से भाई-बहन के सम्बन्ध टूट जाते हैं, तो मेरे भाई से मेरे सम्बन्ध वैसे ही कौन से अच्छे हैं और अगर अच्छे होते भी, तो भी मैं अपना हिस्सा माँगती. रही बात दीदी की, तो उनदोनो ने तो पहले ही कह रखा है कि तीन भाग हो जाने दो, फिर अपना हिस्सा हम तुम्हें दे देंगे. क्योंकि हम दोनों बहनों के सम्बन्धों के बीच पैसा-रुपया-धन सम्पत्ति कभी नहीं आ सकती. जिनमें सच्चा प्यार होता है, वहाँ ये सभी मिट्टी के धेले के समान होता है.
मुझे लगता है कि इस प्रकार के ऊटपटांग तर्क देकर लड़कियों के उतराधिकार के हक को रोकने वाले लोग, न सिर्फ सामाजिक बल्कि कानूनी अपराध भी कर रहे हैं. याद रखिये कि जब आप ये कहते हैं कि लड़कियों को पिता की सम्पत्ति में हिस्सा लेने का क्या हक है, वे तो अपने पति के यहाँ चली जाती हैं, तो आप एक ओर तो उनके जैविक अभिभावक का हक उनसे छीन रहे होते हैं, दूसरी ओर 2005 के हिन्दू उतराधिकार कानून का उल्लंघन कर रहे होते हैं. लड़कियों का विवाह हुआ है या नहीं, उन्हें पति के घर जाना है या नहीं, इससे उनके माता-पिता के प्रेम पर हक क्यों कम होना चाहिए? और अगर माँ-बाप के प्रेम पर पूरा हक है, तो सम्पत्ति पर क्यों नहीं होना चाहिए?
अपनी अगली पोस्टों में मैं पैतृक सम्पत्ति में बेटियों के उत्तराधिकार और विभाजन के विषय में विस्तार से बताऊँगी. फिलहाल मैं जानती हूँ कि बहुत सी लड़कियाँ इस विषय में कोई जानकारी नहीं रखती हैं. इस पोस्ट के माध्यम से मैं सभी लड़कियों को ये बताना चाहती हूँ कि अब अपने बाप-दादा की ज़मीन पर तो उनका हक है ही, अपने पिता के आवास में रहने का हक भी है. कोई उनसे पैतृक सम्पत्ति पर उनके हक और पिता के घर में रहने का अधिकार नहीं छीन सकता है.

गुरुवार, 14 मार्च 2013

कविता-संग्रह "यथास्थिति से टकराते हुए: दलित-स्त्री-जीवन से जुड़ी कविताएँ"


एक सवर्ण स्त्री और एक दलित स्त्री की समस्याओं में क्या अंतर हैं-? ये पूछते समय लोग यह भूल जाते हैं कि सवर्ण स्त्री भी दलित स्त्री का छुआ नहीं खाती। उसे उन्हीं हिकारत भरी नज़रों से देखती है। कई स्त्रियों के साथ होने पर वह खुद को स्त्री होने से ज़्यादा जाति से आइडेंटिफाई करती दिखती है। लेकिन वह भूल जाती है कि जिस तरह पूंजीवाद ने जाति के नाम पर मजदूरों को बाँटकर उनका आंदोलन क्षीण कर दिया, उसी तरह से ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने औरतों को जाति के नाम पर बाँटकर नारीवादी आंदोलन में तेज धार नहीं आने दी।

नारीवाद से जुड़ी सभी औरतों को ये सोचना होगा कि भारत में दलित स्त्री की बात किये बगैर नारीवाद का प्रश्न अधूरा है और यही पश्चिमी नारीवाद से भारतीय नारीवाद की भिन्नता का आधार है।

ज़रूरत इस बात की है कि यथास्थिति से जूझने वाला हर व्यक्ति आगे आये और इस बात पर विचार करे कि दलित स्त्री समाज की पदसोपानीय व्यवस्था में सबसे नीचे रही है। वह तिहरा शोषण झेलती रही है-
1.एक दलित होने के नाते,
2.एक स्त्री होने के नाते और
3.एक मजदूर होने के नाते

कविता-संग्रह "यथास्थिति से टकराते हुए: दलित-स्त्री-जीवन से जुड़ी कविताएँ" इसी बात को पैंसठ कवियों की कविताओं के माध्यम से सामने लाने की कोशिश में एक और कदम है। संग्रह में सम्मिलित कवियों में स्त्रियाँ हैं, तो पुरुष भी हैं, सवर्ण हैं, तो दलित भी हैं, लेकिन सबका उद्देश्य दलित स्त्री के पक्ष में खड़े होना है।

दलित स्त्री की स्थिति को विपिन शर्मा ने अपनी कविता में बहुत सटीक ढंग से उठाया है-(एक दलित स्त्री घर-बाहर शोषण झेलती है। बाहर उसे उसे चीरकर खा जाने वाले भेडिये हैं, जिनकी लोलुप दृष्टि और अश्लील कटाक्ष झेलती वह मैला कमाने का काम करके घर आती है और घर पर उसे पति की मारपीट सहनी पड़ती है। वह ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ रहे अपने पति से पूछती है-)

मेरे मालिक
तुम तो मेरी तरह ही थे
सदियों से दलित-पीड़ित
एक स्त्री पाते ही
परमेश्वर बनने का ख़्वाब कैसे जाग उठा
तुम तो मालिकों के खिलाफ
मिसाल थे बगावत की
मुझे कुचल कर
किस मुँह से न्याय की बात करोगे

मेरे पतिदेव
तुम तो बड़े ज्ञानी-ध्यानी हो
आखिर पुरुष जो ठहरे
या तो मेरा-अपना भेद बता दो
या बता दो
ब्राह्मण पुरुष से
अपना भेद
तुम्हारा हक
हो सकता है अगर
एक ब्राह्मण के समतुल्य
तो हे मेरे देव
मेरा तुम्हारे बराबर क्यों नहीं??

यह कविता-संग्रह दलित-स्त्री के विभिन्न पक्षों से जुड़ी कहानी, कविता और आलोचनाओं को सामने लाने के प्रयास की एक और कड़ी है। इसके पहले इस श्रंखला की पहली कड़ी के रूप में कहानी-संग्रह 'यथास्थिति से टकराते हुए दलित स्त्री जीवन से जुड़ी कहानियाँ' भी प्रकाशित हो चुका है, जिसमें बाईस युवा कहानीकार शामिल हुए थे।

अनिता भारती और बजरंग बिहारी तिवारी द्वारा संपादित यह कविता-संग्रह इस मायने में प्रशंसनीय प्रयास है कि यह दलित स्त्री के प्रश्न पर 'मिलकर' सोचने की बात करता है। जाति-व्यवस्था पर अपने ढंग से प्रहार करते हुए एक समतावादी समाज की स्थापना करने वाले ऐसे प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

एक बेहतर समाज की कोशिश


जब भी औरतों के लिए समानता या स्वतंत्रता की बात होती है, भारतीय पुरुषों का तर्क होता है- "हमारे यहाँ तो पहले से ही औरतों का बड़ा सम्मान है. हमारे यहाँ तो औरतों को देवी माना जाता है. हमें पश्चिम की तरह बनने की ज़रूरत नहीं. देखो अमेरिका की संस्कृति. वहाँ औरतों को आज़ादी मिली तो कैसे घर टूटने लगे. तलाक के केसेज़ बढ़ने लगे." ... उसके बाद वो तर्क देंगे अमेरिका में भारत से कहीं ज्यादा रेप केसेज़ होते हैं. वहाँ औरतों के खिलाफ यौन-हिंसा के मामले भारत से बहुत अधिक हैं.
तो भाई अमेरिका में यौन-हिंसा के मामले इसलिए ज्यादा होते हैं क्योंकि वहाँ यौन-हिंसा की परिभाषा बहुत व्यापक है. वहाँ की औरतें चुप नहीं रहतीं, विरोध करती हैं, वहाँ की पुलिस एफ.आई.आर. दर्ज करवाने में आनाकानी नहीं करती और वहाँ के न्यायालय निर्णय देने में इतनी देर नहीं लगाते. और इस सबसे बढ़कर वहाँ का समाज यौन-हिंसा के लिए औरतों को ज़िम्मेदार नहीं मानता. इसलिए औरतें भी अपने विरुद्ध अपराध को छिपाती नहीं हैं.
और फिर औरतों ने कब कहा कि उन्हें पश्चिम की तरह आज़ादी चाहिए. अरे आज़ादी तो हमारे संविधान ने हमें दी हुयी है. किसी को उसे हमें देने की ज़रूरत नहीं है. बस एक सुरक्षित माहौल चाहिए, जिसमें हम उस आज़ादी का उपयोग कर सकें. और वो माहौल न अकेले पुलिस बना सकती है, न न्यायालय न सरकार और न समाज...सबको मिलकर बेहतर समाज बनाना होगा.
आप फिर तर्क देंगे कि एक आदर्श समाज कैसे बन सकता है. अपराध तो तब भी होंगे. ये तो हम भी जानते हैं कि अपराधमुक्त समाज की कल्पना 'यूटोपिया' से बढ़कर कुछ नहीं है. अपराधी हर युग में रहे हैं और आगे भी रहेंगे. पर कुछ ऐसी बातें हैं, जिन पर ध्यान दिया जाय तो न सिर्फ अपराध कम होंगे, बल्कि अपराध होने पर औरतें उसकी शिकायत दर्ज कराने से डरेंगी नहीं.
पहली बात तो ये है कि अपराधियों के अन्दर कानून-व्यवस्था का डर होना चाहिए और ये तभी होगा, जब पुलिस अपना काम ठीक से करेगी. यहाँ तो ये हाल हैं कि छेड़छाड़ की रिपोर्ट करवाने जाने पर पुलिस ही समझाने लगती है कि जाने दो कौन सी इतनी बड़ी बात है. कहीं-कहीं तो इससे भी बढ़कर पुलिस खुद औरतों पर ही दोषारोपण करने लगती है कि आप इतनी रात में बाहर क्यों निकली? एकाध बार बड़े अधिकारियों को भी ये कहते सुना गया है कि पुलिस सारी औरतों की रक्षा तो नहीं कर सकती. बताइये, जब पुलिस के आला अफसर ऐसे बयान देंगे तो अपराधियों को पुलिस का डर रह जाएगा? इन्हीं सब कारणों से यौन-हिंसा की शिकार औरतें रपट लिखाने ही नहीं जातीं. मुझे लगता है कि हमारी पुलिस फ़ोर्स को और अधिक जेंडर सेंसटिव बनाना चाहिए. ये ट्रेनिंग के स्तर पर तो हो ही, समय-समय पर वर्कशॉप और सेमीनार के माध्यम से भी किया जा सकता है.
दूसरी बात, अपराधियों को समाज का भी भय होना चाहिए. हमारे समाज में यौन-हिंसा की शिकार औरतों को ही ज़िम्मेदार मानने की जो घटिया प्रवृत्ति है, इसके कारण भी जहाँ एक ओर अपराधियों का हौसला बढ़ता है, वहीं दूसरी ओर औरतें डर जाती हैं. सबको ये बात दिमाग से निकाल देनी चाहिए कि अपने विरुद्ध अपराध के लिए महिला दोषी है. अपराध कहीं भी किसी के साथ भी हो सकता है. बुर्के वाली औरतों से लेकर जींस पहनने वाली लड़कियों तक और बच्चियों से लेकर बूढ़ी औरत तक, सुबह-शाम, घर में, बाहर- कहीं भी कोई भी महिला अपराध का शिकार हो सकती है. औरतों को अपराध का ज़िम्मेदार मानना अपराध का समर्थन करने के समान है. इसलिए इस सोच को बदलना ही होगा.
तीसरी बात औरतों के विरुद्ध होने वाले छोटे-मोटे अपराधों को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. जब हम छींटाकशी, ताने मारना, भीड़ का फायदा उठाकर धक्के मारना- जैसे अपराधों पर ध्यान नहीं देते हैं, तो ऐसा करने वालों का हौसला बढ़ता है. कई केसेज़ में देखा गया है कि बलात्कारी कई दिनों से लड़की का पीछा करता रहा है, लेकिन या तो लड़की ने ध्यान नहीं दिया या घरवालों से कहने पर उन्होंने उससे ध्यान न देने को कहा या फिर अपराधी को धमकाकर या पिटवाकर छोड़ दिया गया. दरअसल हम इसे अपराध समझते ही नहीं. इसलिए पुलिस में शिकायत नहीं करते, जबकि इस तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए. हमें अपनी लड़कियों को भी ये सिखाना चाहिए कि वो ऐसे असामाजिक तत्वों को अनदेखा न करें, उन पर ध्यान दें और खुद परिवार को भी बच्चों को विश्वास में लेकर पूछते रहना चाहिए.
चौथी बात, कानूनी सुधार, पुलिस व्यवस्था में सुधार, ये सब बहुत लंबी प्रक्रिया है. इस पर तो बहस होती ही रहनी चाहिए. कानून को तेजी से बदलती सामाजिक व्यवस्था के साथ तारतम्य बैठाने की ज़रूरत होती है. तेजी से बढ़ रही टेक्नालजी, नगरीकरण, सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव आदि के चलते नए-नए तरह के अपराध सामने आते रहते हैं. औरतें घर से बाहर निकली हैं, तो उनके विरुद्ध अपराध बढ़े हैं. बदलते समय के हिसाब से कानून को भी बदलना होगा. औरतों के पक्ष में नए कानून बनाने होंगे.
मेरे विचार से इन बातों को ध्यान में रखा जाय, तो स्थिति में कुछ सुधार तो होगा ही. कोई भी समाज 'आदर्श समाज' नहीं बन सकता. उस आदर्श को पाया नहीं जा सकता, लेकिन उस ओर बढ़ा तो जा ही सकता है. एक बेहतर समाज बनाने की कोशिश किसी भी तरह बंद नहीं होनी चाहिए. हम अमेरिका नहीं बनना चाहते, हमें एक बेहतर हिन्दुस्तान चाहिए.




सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

वैदिक एवं आर्ष महाकाव्य युग में स्त्रियों की शिक्षा



इस बात के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं कि वैदिक युग से लेकर आर्ष महाकाव्यों के लिखे जाने तक भारत में लड़कियों की शिक्षा-दीक्षा पर भी उतना ही ध्यान दिया जाता था, जितना कि लड़कों की शिक्षा पर। मैं अपने शोध-कार्य में इस बात की पड़ताल कर रही हूँ कि उसके बाद के समय में ऐसे कौन से परिवर्तन आये कि स्मृतियों में स्त्रियों की शिक्षा का स्पष्ट निषेध कर दिया गया, यहाँ तक कि विवाह को छोड़कर शेष संस्कार भी बिना मन्त्रों के करने का निर्देश दिया गया। यह पोस्ट मेरे शोध कार्य का एक अंश है, जिसमें वैदिक और आर्ष महाकाव्य काल में स्त्रियों की शिक्षा के विषय में चर्चा की गयी है।

ईस्वी सन् के आरम्भ तक लड़कियों का उपनयन संस्कार होता था और उन्हें वेदों का अध्ययन करने की भी लड़कों के समान ही अनुमति होती थी।[1] उपनयन संस्कार के बाद ही विधिवत् शिक्षा का आरम्भ होता था। बाद में उपनयन संस्कार स्त्रियों के लिए बस एक औपचारिकता मात्र रह गया, लेकिन वैदिक युग में यह अपनी पूर्णविधि के साथ ही स्त्रियों के लिए भी किया जाता था। वे भी गुरुओं के आश्रम में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करती हुयी यज्ञोपवीत, मौञ्जी, मेखला और वल्कल धारण करती थीं। ऋक्-यजुः-अथर्व संहिताओं में ब्रह्मचारिणी नारियों का उल्लेख है। अथर्ववेद में एक स्थान पर कहा गया है, “बह्मचर्य व्रत का पालन कर शिक्षा समाप्त करने वाली कन्याएँ योग्य पति को प्राप्त करती हैं।”[2] जो छात्राएँ अधिक से अधिक संहिताओं के मन्त्रों की पंडिता होती थीं, उन्हें ‘बहुवची’ की उपाधि दी जाती थी।

अल्टेकर के अनुसार, ‘स्त्रियाँ शूद्रों की तरह वैदिक अध्ययन के अयोग्य होती हैं’ यह दृष्टिकोण बाद के युग का है। प्राचीन वैदिककाल में स्त्रियाँ पुरुषों के समान ही मन्त्रद्रष्ट्री होती थीं। उनमें से कुछ के नाम तो वैदिक संहिताओं में भी आये हैं।[3] अल्टेकर के अनुसार ‘सर्वानुक्रमणिका’ में बीस ऐसी स्त्रियों के नाम गिनाए गए हैं। इनमें से कुछ नाम मिथक हो सकते हैं, लेकिन आतंरिक स्रोत दिखाते हैं कि लोपामुद्रा, विश्ववारा, सिक्ता निवावारी और घोषा आदि कुछ ऋषिकाएँ हैं, जिन्होंने ऋग्वेद के सूक्तों की रचना की है। इनमें से कुछ ऋषिकाओं और उनके द्वारा रचित ऋग्वेद के सूक्तों का वर्णन निम्नवत् है-

लोपामुद्रा- प्रथम मण्डल का 179वां सूक्त।
विश्ववारा आत्रेयी- पंचम मण्डल का 28वां सूक्त।
अपाला आत्रेयी- अष्टम मण्डल का 91वां सूक्त।
घोषा काक्षीवती- दशम मण्डल का 39वां तथा 40 वां सूक्त।
शची पौलोमी- दशम मण्डल का 149वां सूक्त (आत्मस्तुति)।
सूर्या सावित्री- दशम मण्डल का 85वां सूक्त।

उपर्युक्त ऋषिकाओं में से शची पौलोमी का नाम वैदिक युग के बाद भी प्रचलित रहा है। इन्हें इन्द्र की पत्नी माना गया है।

उपनिषदों में भी अनेक विदुषी स्त्रियों का नाम आया है, जिनमें सुलभा मैत्रेयी, वडवा पार्थियेयी और गार्गी वाचक्नवी प्रसिद्ध हैं। अल्टेकर के मत में इन नारियों का अस्तित्व वास्तव में रहा होगा और इन्होंने ज्ञान के क्षेत्र में अपना योगदान दिया होगा, अन्यथा इनका नाम विभिन्न ग्रंथों में बार-बार न आता।


उपनिषद् काल में महिला छात्राओं के दो प्रकार उल्लेखनीय हैं- (1.) सद्योद्वाहा तथा (2.) ब्रह्मवादिनी । ‘सद्योद्वाहा’ स्त्रियाँ वे होती थीं, जो ब्रह्मचर्य आश्रम के अनन्तर गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होती थीं तथा उस आश्रम के नियमों का पालन करती हुयी मातृत्व के महनीय पद पर प्रतिष्ठित होती थीं। वे उन समग्र विद्याओं का शिक्षण प्राप्त करती थीं, जो उन्हें सद्गृहिणी बनाने में पर्याप्त सहायक होती थीं। संगीत की शिक्षा भी उन्हें दी जाती थी। वैदिक यज्ञ में स्त्रियों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। यजमान-पत्नी के रूप में वे अग्न्याधान करने वाले अपने पति के धार्मिक कृत्यों में हाथ बँटाती थीं। अग्नि के परिचरण के अवसर पर वे तत्तत् विशिष्ट मन्त्रों के उच्चारण के साथ हवन-कार्य का भी संपादन करती थीं।[4]

‘ब्रह्मवादिनी’ स्त्रियाँ उपनिषद् युग की विशिष्टता मानी जा सकती हैं। ये स्त्रियाँ ब्रह्म-चिंतन में तथा ब्रह्म-विषयक व्याख्यान में अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर देती थीं। वे ब्रह्मतत्व के व्याख्यान तथा परिष्कार में उस युग के महान् दार्शनिकों से भी वाद-विवाद एवं शास्त्रार्थ करती थीं। बृहदारण्यकोपनिषद् ऐसी दो ब्रह्मवादिनी नारियों की विद्वता का परिचय बड़े विशद् शब्दों में देता है। इनमें से एक है- उस युग के महनीय तत्त्वज्ञानी याज्ञवल्क्य ऋषि की धर्मपत्नी मैत्रेयी और दूसरी हैं- उसी याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करने वाली वाचक्नवी गार्गी।[5]


ईसापूर्व चौथी शताब्दी में जब भारत में दार्शनिक विषयों का अध्ययन-मनन प्रमुखता से होने लगा, तब अनेक स्त्रियों ने अपना जीवन अध्ययन और ज्ञानार्जन को समर्पित कर दिया। अल्टेकर ने ‘कात्सकृत्स्ना’ का उल्लेख किया है, जिसके द्वारा रचित मीमांसा के एक ग्रन्थ को ‘कात्सकृत्सिनी’ कहा जाता है और जो स्त्रियाँ इस शाखा में पारंगत होती थीं, उन्हें ‘कात्सकृत्स्ना’ कहा जाता था।[6] अल्टेकर का यह अनुमान समीचीन है कि यदि स्त्रियाँ इतने विशिष्ट विषयों में पारंगत हो सकती थीं, तो इसका अर्थ है कि सामान्य रूप से उनकी शिक्षा-दीक्षा पर बहुत ध्यान दिया जाता रहा होगा।

उस युग में स्त्रियाँ वैदिक और दर्शन आदि की शिक्षा के अतिरिक्त गणित, वैद्यक, संगीत, नृत्य और शिल्प आदि का भी अध्ययन करती थीं। क्षत्रिय स्त्रियाँ धनुर्वेद अर्थात् युद्धविद्या की भी शिक्षा ग्रहण करती थीं तथा युद्ध में भाग भी लेती थीं। ऋग्वेद के दशम मण्डल के 102वें सूक्त में राजा मुद्गल एवं मुद्गालानी की कथा वर्णित है और उसे युद्ध में विजय दिलाती है। इसी प्रकार ‘शशीयसी’[7] का तथा वृत्तासुर की माता ‘दनु’[8] का वर्णन है, जिसने युद्ध में भाग लिया और इंद्र के हाथों वीरगति को प्राप्त हुयी। महाकाव्य काल में भी स्त्रियों के युद्ध में भाग लेने के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं। कैकयी ने देवासुर-संग्राम में मृतप्राय हुए राजा दशरथ की सारथी बनकर प्राणरक्षा की थी और उसके फलस्वरूप दो वर प्राप्त किये थे।[9]

आर्षमहाकाव्यों में वर्णित उच्चकुलों की नारियाँ विविध प्रकार की विद्याओं में निष्णात होती थीं। राजा कुन्तिभोज की पुत्री कुंती अत्यधिक गुणवती थी। उसने अपने आतिथ्य-सत्कार से दुर्वासा जैसे क्रोधी ऋषि को प्रसन्न किया और उनसे मनचाहा वर प्राप्त करने का वरदान प्राप्त किया। इसके लिए उन्होंने कुंती को वशीकरण मन्त्र दिया, जिसके द्वारा वह किसी भी देवता को वश में करके उससे पुत्र प्राप्त कर सकती थी।[10] इसी प्रकार सभापर्व में जब द्रौपदी को पाण्डवों द्वारा द्यूतक्रीड़ा में हार जाने के पश्चात् दुःशासन सभा में घसीटकर लाता है, तो वह वहाँ उपस्थित गुरुजनों से धर्म-विषयक प्रश्न करती है और धिक्कारती है।[11] इससे पता चलता है कि वह एक उच्चशिक्षित विदुषी युवती थी, जिसे धर्मविषयक गूढ़ बातों का ज्ञान था।

इस प्रकार स्पष्ट है कि संहिताकाल से लेकर महाकाव्य काल तक स्त्रियों को शिक्षा का पूर्ण अधिकार था। वे पुरुषों के समान ही उपनयन संस्कार के पश्चात् ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए अध्ययन करती थीं और उसके पश्चात् भी उन्हें आगे विद्याध्ययन करने या गृहस्थ धर्म अपनाने- दोनों ही विकल्प प्राप्त थे।


[1] अल्टेकर , पृष्ठ 9-10
[2] “ब्रह्मचर्येण कन्यानं युवाविन्दते पतिम् ।“ – अथर्ववेद, कांड-11, सूक्त-7, मन्त्र-18
[3] अल्टेकर , पृष्ठ 10
[4] आचार्य बलदेव उपाध्याय, वैदिक साहित्य और संस्कृति, शारदा संस्थान, वाराणसी 1998, पृष्ठ संख्या 424
[5] आचार्य बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ संख्या 425
[6] अल्टेकर, पृष्ठ 11
[7] ऋग्वेद, पंचम मण्डल, सूक्त- 61
[8] ऋग्वेद, प्रथम मण्डल, सूक्त- 32, मन्त्र- 9
[9] रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग-10,श्लोक 8 एवं 9
[10] महाभारत, आदिपर्व, अध्याय-110
[11] महाभारत, सभापर्व, अध्याय-69





बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

प्रेम, प्रेम विवाह और पितृसत्ता

पिछले कुछ दिनों से इस विषय पर सोच रही थी, अतिव्यस्तता के बाद भी। इसके दो प्रमुख कारण थे - मेरे बेहद करीबी दोस्तों के प्रेम विवाह में आ रही अडचनें और मेरी एक जूनियर द्वारा बार-बार प्रेम के अस्तित्व पर उठाये जा रहे प्रश्न। मेरी  जूनियर इस बात से परेशान है कि जीवन के संघर्ष के दिनों में जो प्रेम किसी का संबल बनता है, सहारा देता है, वही वास्तविक संसार के, यथार्थ के धरातल पर आकर स्वयं क्यों असहाय हो जाता है?

जब प्रेम और समाज के सम्बन्धों की समस्या के बारे में सोचती हूँ तो एक दूसरा ही प्रश्न सामने आ खड़ा होता है कि क्या वाकई जिसे हम प्रेम समझ रहे थे, वह प्रेम ही था? हमारे पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ लड़के-लड़कियों को अलग-अलग ढाँचों में ढलने की ट्रेनिंग दी जाती है, जहाँ विद्यालय के स्तर पर सह-शिक्षा में पढ़ाना ही अपराध समझा जाता है, वहाँ क्या हमारे पास प्रेम के लिए विकल्प होते हैं? मेरा जवाब है नहीं। ऐसे में अक्सर लड़के-लड़कियाँ पहली बार जिस विपरीतलिंगी के संपर्क में आते हैं, उसी की ओर आकर्षित हो जाते हैं और उसी को प्यार समझ बैठते हैं। इसमें 'प्रेम में एकनिष्ठता' की अनिवार्यता और 'एकाधिकार की भावना', न उन्हें अपने प्रेम पर पुनर्विचार करने देती है और न ही विकल्प ढूँढने देती है। यह प्रेम जब दुनिया के सामने पहुँचता है, तो उसको टूटना ही है। हालांकि हमेशा ही ऐसा नहीं होता। पर अगर प्रेम समाज के बनाए हुए नियमों से लड़ने के पहले ही हथियार डाल देता है, तो मैं उसे प्रेम ही नहीं मानती। हाँ, ये हो सकता है कि उसमें से किसी एक ने वास्तव में सच्चा प्यार किया हो, पर उसका साथी या तो खुद प्रेम के भ्रम में होता है अथवा अपने प्रेमी को जानबूझकर धोखा दे रहा होता है।

खैर, यहाँ इस पोस्ट का विषय 'प्रेम का भ्रम' नहीं प्रेम है, बशर्ते वह 'विशुद्ध प्रेम' हो। यहाँ विशुद्ध से मतलब किसी नैतिक शुचिता से नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि उसमें किसी भी तरह की अन्य भावना की मिलावट ना हो, जैसे स्वार्थ, निर्भरता, जिम्मेदारी, दया, करुणा आदि। वह प्रेम, जिसमें प्रेम के बदले बस प्रेम की अपेक्षा हो। बहुत पहले 'स्त्री मुक्ति संगठन' की साथी डॉ. पद्मा सिंह ने कहा था, "प्रेम दो बेहद स्वतंत्र और आत्मनिर्भर व्यक्तियों के बीच में ही संभव है।" अर्थात यदि प्रेमी-प्रेमिका प्रेम के अलावा किसी और बात के लिए एक-दूसरे पर निर्भर नहीं और प्रेम के अलावा और कोई स्वार्थ भी नहीं है, तभी प्रेम संभव है। मुझे एक दृष्टि में यह बात सही लगती है। आप इससे असहमत भी हो सकते हैं। पर, मैं मानती हूँ कि इस तरह के प्रेम में स्त्री-पुरुष दोनों समान स्थिति में होते हैं। इसलिए वो पितृसत्ता के लिए एक चुनौती होते हैं और इसीलिये समाज के ठेकेदार प्रेमियों से बहुत डरते हैं।

यहाँ मैं उस 'विक्टोरियन रोमैंटिक लव' को अलग कर रही हूँ, जो अंग्रेजी साहित्य के काल विशेष में और 'मिल्स एंड बून' के नावेल्स में पाया जाता है और जिसमें सफ़ेद घोड़े पर सवार एक राजकुमार आता है और खूब घेरदार फ्रिल वाली पोशाक पहनी हुयी नायिका को अपने साथ ले जाता है। मैं संस्कृत के 'सम्भोग श्रृंगार' वाले प्रेम को और हिंदी के 'रीतिकालीन प्रेम' को भी नहीं गिन रही हूँ। क्योंकि इन सभी स्थानों पर प्रेम की जो छवि है, वो पितृसत्ता की ही बनायी हुयी है और इसमें बिलकुल भी बराबरी नहीं है। भारतीय परम्परा में भी अर्जुन-सुभद्रा से लेकर पृथ्वीराज-संयोगिता तक नायिकाओं के अपहरण के किस्सों में भी इसी प्रकार का प्रेम परिलक्षित होता है। यह रूमानी और रूढ़िवादी प्रेम पितृसत्ता का पोषक ही है क्योंकि इसमें हमेशा नायिका कोमल कृशांगी और नायक वीर पुरुष होता है। वो हमेशा 'प्रोटेक्टर' की भूमिका में होता है और इसीलिये नायिका को कमज़ोर दिखाया जाता है। प्रेम, पितृसत्ता से टक्कर तभी ले सकता है जब प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से समान रूप में प्रेम करते हों। तभी वो पितृसत्ता की उस अवधारणा के विरुद्ध होते हैं, जिसमें एक को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाता है, एक को कठोर और दूसरे को कोमल माना जाता है।

नारीवाद का रोचक पक्ष यह है कि वह विवाह को तो एक पितृसत्तात्मक संस्था मानता है, पर प्रेम को नहीं। विवाह का पितृसत्ता से क्या सम्बन्ध है, इस पर भी कभी चर्चा होगी। फिलहाल विचार का विषय है कि प्रेम पितृसत्ता के लिए चुनौती कैसे है? हमारे समाज की बुनावट जैसी है उसमें जानबूझकर जीवनसाथी के चयन के विकल्प इतने कम रखे गए हैं और प्रक्रिया इतनी जटिल है कि आप अपने साथी के चयन के लिए समाज के बनाए नियमों के अधीन अपने परिवार की इच्छा पर निर्भर रहें। यह बात लड़के और लड़की दोनों के लिए समान रूप से लागू होती है अर्थात दोनों के ही पास 'चयन के विकल्प' नहीं हैं। ऐसे में जब कोई लड़का या लड़की अपनी इच्छा से कोई साथी ढूँढ़ लेता है, तो समाज को अपनी व्यवस्था खतरे में पड़ती दिखाई देती है। जब प्रेमी जोड़ा एक कदम आगे बढ़कर अपने प्रेम को विवाह में परिणत करना चाहता है, तो इसीलिये उसे घोर विरोध का सामना करना पड़ता है कि उन्होंने समाज के नियमों के विरुद्ध 'अपनी इच्छा' से साथी चुन लिया। यह उस सामाजिक व्यवस्था के लिए अपमान होता है, जिसमें पद्सोपानीयक्रम से छोटे को बड़े की, निर्धन को धनवान की, निर्बल को सबल की और स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना अनिवार्य होता है। सबसे ज्यादा डर परिवार को इस बात का होता है कि प्रेमविवाह कर आयी लड़की 'आदर्श बहू' बन पायेगी या नहीं। इसीलिये प्रेमविवाह को रोकने के लिए परिवार वाले सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वो अपने 'बिगड़े' हुए बच्चों को परिवार की प्रतिष्ठा का हवाला देते हैं, बराबरी में रिश्ता करने की बात कहते हैं और अन्ततः 'इमोशनल ब्लैकमेलिंग' का अमोघास्त्र प्रयुक्त करते हैं।

अगर यह प्रेम अंतरजातीय हुआ, तब तो विवाह के लिए प्रेमी-प्रेमिका को परिवार के साथ समुदाय का भी विरोध झेलना पड़ता है। अंतरजातीय विवाह पितृसत्ता के साथ ही साथ जातिव्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकते हैं, बशर्ते प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे का साथ निभाने को पूरी तरह प्रतिबद्ध हों।

लेकिन इन सब बातों का दूसरा पहलू भी है। अक्सर देखा जाता है कि प्रेम विवाह में परिणत होने के बाद पितृसत्तात्मक ढाँचे में ही ढल जाता है। पति-पत्नी दोनों अपनी-अपनी पारम्परिक भूमिका में आ जाते हैं और कुछ दिनों बाद दोनों की स्थिति को देखकर आप बिलकुल नहीं कह सकते कि इन्होंने प्रेम विवाह किया था या पारम्परिक विवाह। बल्कि प्रेम विवाह में लड़की खुद को 'आदर्श बहू' और 'आज्ञाकारी पत्नी' साबित करने के लिए अक्सर ज्यादा से ज्यादा 'त्याग' करने को तैयार रहती है।  ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लड़के-लड़कियाँ पले-बढे तो उसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में होते हैं, जहाँ सबकी भूमिकाएँ पहले से तय होती हैं।

इसलिए अगर हम यह सोचते हैं कि केवल प्रेम विवाह कर लेने भर से पितृसत्ता को कोई चोट पहुँच सकती है, तो यह एक भूल होगी।  हाँ, इतना अवश्य है कि प्रेमी एक स्तर पर तो उससे टक्कर ले लेते हैं, लेकिन अगले ही कदम पर वह अपने दूसरे रूप में उन्हें अपने अंदर समाहित करने को खड़ी मिलती है। हमें यह याद रखना होगा कि पितृसत्ता भी पूँजीवाद की तरह एक बेहद लचीली, परिवर्तनशील और बहुरूपिया व्यवस्था है और इसके साथ लड़ने के लिए इसके हर रूप को जानना और लगातार संघर्ष करना ज़रूरी है।

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों का साधारणीकरण: लापरवाही या षड्यंत्र?

(यह लेख कल के जनसत्ता में 'दुनिया मेरे आगे' स्तंभ में 'शब्दों से खेल' शीर्षक से छप चुका है.)
  
बात वहाँ से शुरू होती है, जब एक छोटी-सी लड़की को दुनिया की ऐसी कड़वी सच्चाइयों का सामना करना पड़ता है जिनके चलते वह सामान्य घटनाओं को भी एक खास नजरिए से देखने लग जाती है। मासूम दिल कम उम्र में ही परिपक्व हो जाता है। पिताजी रेलवे में स्टेशन मास्टर थे। जब मैं दस साल की थी, उनका तबादला उत्तर रेलवे के उन्नाव स्टेशन के पड़ोस में एक छोटे-से रेलवे स्टेशन मगरवारा में हो गया। मुझे चार साल तक मगरवारा से उन्नाव स्थित अपने स्कूल ट्रेन से आना-जाना पड़ता। भीड़ होने पर लोग छोटी बच्ची जान कर अपने पास जगह बनाकर बिठा लेते। एक-दो साल बाद लोगों के स्पर्श में मुझे अजीब-सा बदलाव महसूस होने लगा। अनचाहा स्पर्श मन में वितृष्णा भर देता। बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ती एक लड़की पर ऐसी घटनाओं का क्या प्रभाव पड़ता है, यह एक लड़की ही समझ सकती है। अनजाने में मैं खुद को ही इसका दोषी समझने लगी। ऐसा लगता जैसे मेरे शरीर में ही ऐसी कोई कमी है कि लोग मेरे साथ ऐसी हरकत करते हैं।
कुछ साल बाद इलाहाबाद में छात्रावास में रहते और ‘स्त्री अधिकार संगठन’ के साथ काम करते हुए पता चला कि अधिकतर लड़कियाँ इसी तरह के कड़वे अनुभवों से गुजरी हैं। पर मुझे तब बहुत आश्चर्य होता, जब हमारे पुरुष मित्र और रिश्तेदार कहते कि ‘क्या लड़कियाँ छेड़छाड़ नहीं करतीं?’ जो घटनाएँ लड़कियों के मन-मस्तिष्क को झिंझोड़कर खुद को ही दोषी मानने पर मजबूर कर देती हैं, उसे कोई इतने हल्के ढंग से कैसे ले सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं था कि वैसी हरकतों के लिए ‘छेड़छाड़’ के बजाय हम कोई सही शब्द नहीं खोज पा रहे थे? तब मुझे नहीं लगा कि मैं इसे ‘यौन हिंसा’ कहूँ, क्योंकि उस उम्र में तो बस इतना समझ में आता था कि यह व्यक्ति जो कर रहा है, वह ठीक नहीं है। उस समय मन जिस तरह घृणा से भर जाता था, उसके लिए ‘छेड़छाड़’ सच में हल्का शब्द है।
अकादमिक क्षेत्रों में नारीवादी सोच के लोग ऐसी माँगें उठाते रहे हैं और ‘जेंडर’ के नजरिए से संवेदनशील शब्दों को लेकर एक स्तर तक समझ भी बनी है। लेकिन हमारा समाज और उसका प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाला मीडिया इस मामले में अब तक जरूरी संवेदनशीलता नहीं बरत रहा है। यहां तक कि ‘बलात्कार’ जैसे जघन्य अपराधों में भी मीडिया की कोशिश होती है कि इसके लिए अपेक्षया हल्के शब्दों का इस्तेमाल किया जाए। आमतौर पर बलात्कार की घटनाओं से संबंधित खबरें संवेदनहीन तरीके से ऐसे पेश की जाती हैं कि तथाकथित सभ्य समाज के कुत्सित मानसिकता वाले लोग उसे चटखारे लेकर पढ़ते हैं। कभी इसके लिए ‘इज्जत लुट गई’ तो कभी ‘मुँह काला किया’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये सभी शब्द महिलाओं के प्रति अपमानजनक और एक तरह से पीड़ित को ही दोषी सिद्ध करने वाले रहे हैं। 
समय के साथ किसी औरत के शरीर पर हमला करके जबरन उसका यौन-उत्पीड़न करने जैसे जघन्य कृत्य को ‘बलात्कार’ शब्द के जरिए व्यक्त किया जाने लगा। इस शब्द में जाहिर बलाघात इस अपराध की भयावहता को दर्शाता है। लेकिन पिछले कुछ समय से अखबारों या टीवी चैनलों में बलात्कार की जगह ‘दुष्कर्म’ और यहाँ तक कि ‘ज्यादती’ जैसे शब्दों तक का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाने लगा है। ‘दुष्कर्म’ शब्द अपने आप में चोरी, डकैती, जेब काटने तक को व्यक्त करता है। सवाल है कि क्या बलात्कार जैसे गंभीरतम अपराध को चोरी या जेब काटने जैसे अपराधों के समकक्ष करके देखा जा सकता है? सच्चाई यह है कि ‘दुष्कर्म’ जैसे शब्दों का प्रयोग बलात्कार को बेहद मामूली अपराधों के समकक्ष ला खड़ा करता है तो ‘ज्यादती’ इस लिहाज से और भी आपत्तिजनक प्रयोग है।
महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के परिप्रेक्ष्य में पिछले दिनों ऊँचे पदों पर बैठे पुलिस और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के जिस तरह के बयान आए हैं, ऐसे शब्दों का आम होते जाना उसी की एक कड़ी लगता है। कभी कोई कहता है कि ‘औरतों को देर रात अकेले घर से बाहर निकालना नहीं चाहिए’ तो कभी कहा जाता है कि ‘बड़े-बड़े महानगरों में छोटे-मोटे अपराध होते ही रहते हैं’ और कभी लड़कियों की वेशभूषा पर ही सवाल उठा दिया जाता है।
हाल ही में ‘रेप’ की जगह ‘सेक्सुअल असॉल्ट’ शब्द प्रयोग करने का सुझाव सामने आया है। यानी एक ओर अंग्रेजी में इस अपराध का दायरा बढ़ाने के लिए जिस ‘यौन हमला’ शब्द का विकल्प रखा गया है, वह इस अपराध की गंभीरता और भयावहता को न केवल कम नहीं करता, बल्कि अर्थ के भाव और असर की गहराई को भी बनाए रखता है। लेकिन हिंदी में बलात्कार की जगह दुष्कर्म शब्द का प्रयोग अगर आम होता जा रहा है तो इसे व्यवस्था द्वारा महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साधारणीकरण के एक षड्यंत्र के तौर पर देखा जाना चाहिए। इसमें मीडिया एक बड़े मददगार की भूमिका निभा रहा है।

शनिवार, 15 जनवरी 2011

पुस्तक-सूची



स्त्री विमर्श : कुछ पठनीय पुस्तकें 

देह की राजनीति से देश की राजनीति तक - मृणाल पांडे
परिधि पर स्त्री - मृणाल पांडे
बंद गलियों के विरुद्ध - मृणाल पांडे
जहाँ औरतें गढ़ी जाती हैं - मृणाल पांडे
दुर्ग द्वार पर दस्तक - कात्यायनी
स्त्री का समय - क्षमा शर्मा
स्त्रीत्व का मानचित्र - अनामिका
हौवा की बेटी - दिव्या जैन
उपनिवेश में स्त्री - प्रभा खेतान
हम सभ्य औरतें - मनीषा
औरत के लिए औरत - नासिरा शर्मा
खुली खिड़कियाँ - मैत्रेयी पुष्पा
औरत के हक में - तसलीमा नसरीन
स्त्री संघर्ष का इतिहास - राधा कुमार
साम्प्रदायिक दंगे और नारी - नूतन सिन्हा
संघर्ष के बीच संघर्ष के बीज - इलीना सेन
स्त्रीवादी साहित्य विमर्श - जगदीश्वर चतुर्वेदी
अधीन ज़मीन - उपेन्द्र नाथ अश्क
रेणु की नारी दृष्टि - डॉ. अल्पना तिवारी
चुकते नहीं सवाल - मृदुला गर्ग
नारी प्रश्न - सरला माहेश्वरी
स्वागत है बेटी - विभा देवसरे
जीवन की तनी डोर ये स्त्रियाँ - नीलम कुलश्रेष्ठ
स्त्री पुरुष कुछ पुनर्विचार - राजकिशोर
स्त्री के लिए जगह - सं. राजकिशोर
स्त्रीत्ववादी विमर्श समाज और साहित्य - क्षमा शर्मा
स्त्री : मुक्ति का सपना - सं. प्रो. कमला प्रसाद, राजेन्द्र शर्मा, अतिथि सं. अरविन्द जैन व लीलाधर मंडलोई
धर्म के नाम पर - गीतेश शर्मा
स्त्री उपेक्षिता - सीमोन द बुआ
विद्रोही स्त्री - जर्मन ग्रेयर
स्त्री अधिकारों का औचित्य साधन - मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट
औरत की कहानी - सं. सुधा अरोड़ा
एक गुमशुदा औरत की डायरी - सीमोन द बुआ
बधिया स्त्री - जर्मन ग्रीयर
अपना कमरा - वर्जीनिया वुल्फ
एक स्त्री की ज़िंदगी के चौबीस घंटे - स्टीफन ज्विग
स्त्री की पराधीनता - जान स्टुअर्ट मिल

कुछ अन्य पुस्तकें 

औरत होने की सजा - अरविन्द जैन
उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार - अरविन्द जैन
यौन हिंसा और न्याय की भाषा - अरविन्द जैन
न्याय क्षेत्रे अन्याय क्षेत्रे - अरविन्द जैन
बचपन से बलात्कार - अरविन्द जैन
औरत अस्तित्व और अस्मिता - अरविन्द जैन
आदमी की निगाह में औरत - राजेन्द्र यादव
अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य - अर्चना वर्मा
औरत उत्तरकथा - राजेन्द्र यादव
भारत में विवाह संस्था का इतिहास - विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े
सामान नागरिक संहिता - सरला माहेश्वरी
नए आयामों को तलाशती नारी - दिनेश नंदिनी डालमिया
प्राचीन भारत में नारी - डॉ. उर्मिला प्रकाश मिश्र
जो मारे जायेंगे - जया मित्रा
प्राचीन भारत में न्याय व्यवस्था - नताशा अरोड़ा
इक्कीसवीं सदी की ओर - सुमन कृष्णकांत
नारी देह के विमर्श - सुधीश पचौरी

स्त्री विमर्श : कुछ पठनीय उपन्यास 

पचपन खम्बे लाल दीवारें - उषा प्रियंवदा
रुकोगी नहीं राधिका - उषा प्रियंवदा
शेष यात्रा - उषा प्रियंवदा
अंतर्वंशी - उषा प्रियंवदा
अनारो - मंजुल भगत
आँखों की दहलीज - मेहरुन्निसा परवेज
उसका घर - मेहरुन्निसा परवेज
कोरजा - मेहरुन्निसा परवेज
तत्सम - राजी सेठ
रेत की मछली - कांता भारती
मेरे संधि पत्र - सूर्यबाला
उसकी पंचवटी - कुसुम अंसल
फ्रीलांसर - शुभा वर्मा
सात फेरे अधूरे - मीनाक्षी पुरी
एक ज़मीन अपनी - चित्रा मुद्गल
आवां - चित्रा मुद्गल

स्त्री विमर्श : कुछ पठनीय आत्मकथाएँ 

कागजी हैं पैरहन - इस्मत चुगताई
रसीदी टिकट - अमृता प्रीतम
मेरे आका - तहमीना दुर्रानी
मेरी कहानी - कमला दास
जो कहा नहीं गया - कुसुम अंसल
लगता नहीं है दिल मेरा - कृष्णा अग्निहोत्री
बूँद बावड़ी - पद्मा सचदेव
दोहरा अभिशाप - कौशल्या बैसंत्री
खानाबदोश - अजीत कौर
नंगे पैरों का सफ़र - दिलीप कौर टिंवाडा
कुछ कही कुछ अनकही - शीला झुनझुनवाला
कस्तूरी कुंडल बसे - मैत्रेयी पुष्पा
गुड़िया भीतर गुड़िया - मैत्रेयी पुष्पा
बुरी औरत की कथा - किश्वर नाहीद
नाच री घूमा - माधवी देसाई
मेरे बचपन के दिन - तस्लीमा नसरीन
उत्ताल हवा - तस्लीमा नसरीन
द्विखंडिता - तसलीमा नसरीन
वे अँधेरे दिन - तस्लीमा नसरीन
अन्या से अनन्या - प्रभा खेतान
एक कहानी यह भी - मन्नू भण्डारी
धरती की बेटी - एलन स्मेडली


 (स्रोत : 'स्त्री : मुक्ति का सपना' पुस्तक एवं मित्रगण)

सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

पश्चिमी नारीवाद बनाम भारतीय नारीवाद

आमतौर पर नारीवाद की बात चलने पर यह प्रश्न सभी के मन में उठता है कि नारीवाद की पाश्चात्य अवधारणा का भारत में क्या उपयोग है? और ये प्रश्न कुछ हद तक वाजिब भी है. खासकर के तब जब नारीवाद पर खुद पश्चिम में ही कई सवाल उठने लगे हों.

दरअसल, पश्चिम में नारीवाद एक विचारधारा के रूप में उभरकर तब सामने आया, जब वहाँ की औरतों को मूलभूत अधिकार प्राप्त हो चुके थे. हालांकि इसके लिए उन लोगों ने अलग-अलग छिटपुट रूप से ही सही, लंबी लड़ाइयाँ लड़ी थीं, तब जाकर उन्हें मताधिकार जैसे नागरिक अधिकार, राजनीतिक और कुछ आर्थिक अधिकार प्राप्त हुए. चूँकि उन्हें मूलाधिकार मिल चुके थे, इसलिए उनके मुद्दे उससे बढ़कर यौनिकता, यौन स्वतंत्रता, स्त्रीत्व की अवधारणाओं, पुरुष के वर्चस्व आदि से जुड़ गए. इस विषय में उल्लेखनीय यह है कि वहाँ तब नारीवादी आन्दोलन उच्चवर्गीय श्वेत महिलाओं के कब्ज़े में ही था, निम्नवर्गीय अथवा अश्वेत नारियाँ इससे अलग थीं.

तत्कालीन पाश्चात्य नारीवाद के समक्ष जो मुद्दे थे, भारत जैसे देशों के लिए महत्त्वपूर्ण तो थे, पर ज्यादा नहीं. भारतीय समाज आज भी एक सामंतवादी ढाँचे वाला समाज है और यहाँ की नारियों के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या प्राचीनता थी, जिसके कारण उन्हें नागरिक अधिकारों के अलावा अन्य अधिकार लगभग नहीं के बराबर प्राप्त थे. हालांकि यहाँ भी नारियों का एक वर्ग था, जिन्हें जीवन की मूलभूत सुविधाएँ प्राप्त थीं और वे पश्चिमी नारीवाद के प्रभाव में थीं. इस प्रकार भारत में भी कुछ नारीवादी विचारक उन्हीं मुद्दों को उठाने लगे, जो कि पाश्चात्य नारीवाद के मुद्दे थे और जिनका यहाँ की ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था में कोई ख़ास उपयोग नहीं था.

नारीवादी अवधारणा में व्यापक बदलाव नारीवाद की तीसरी लहर के बाद आया. नारीवाद की तीसरी लहर मुख्यतः लैटिन अमेरिकी, एशियाई और अश्वेत नारियों से सम्बन्धित थी. इस लहर पर उत्तर आधुनिक विचारधारा का प्रभाव था, जो विभिन्नताओं का सम्मान करती थी. विभिन्नता की अवधारणा के फलस्वरूप ही इस बात पर विचार किया जाने लगा कि एक जैसे सिद्धांत से सभी वर्गों की नारियों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है. भिन्न-भिन्न वर्गों की समस्याएँ अलग-अलग हैं और इसीलिये उनका समाधान भी अलग ढंग से खोजा जाना चाहिए. इस लहर ने भारतीय नारीवादी आंदोलन पर गहरा प्रभाव डाला. यहाँ भी दलित नारियों ने नारीवादी आंदोलन पर आरोप लगाना शुरू किया कि वह उच्चवर्गीय सवर्ण नारियों का प्रतिनिधित्व करता है और दलित, ग्रामीण और निर्धन महिलाओं को बाहर छोड़ देता है.

इसके फलस्वरूप नारीवादी विचारकों का ध्यान भारतीय समाज की विभिन्नता पर गया और इस बात पर विचार-विमर्श शुरू हो गया कि 'नारीवाद' को भारतीय समाज के अनुसार किस प्रकार ढाला जा सकता है? यह अस्सी-नब्बे का दशक था  और इसी समय भारतीय समाज के लिए 'ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' शब्द का प्रयोग किया जाने लगा. यह शब्द हमारे समाज की जटिल सरंचना और उसके फलस्वरूप दलित नारियों के होने वाले तिहरे शोषण को व्यक्त करता है.  दलित नारी जाति, वर्ग और पितृसत्ता तीनों के द्वारा शोषण का शिकार होती है. उसे औरत होने के कारण उसके समाज का पुरुष शोषित करता है, गरीब मजदूर होने के कारण भू-स्वामी शोषित करता है और दलित होने के कारण उसे सवर्णों द्वारा अपमान सहना पड़ता है.

भारत में वर्तमान नारीवादी अवधारणा इस बात पर विचार करती है कि गरीब, ग्रामीण, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं की समस्याएँ अलग हैं और धनी तथा सवर्ण औरतों की अलग, अतः इन पर भिन्न-भिन्न ढंग से विचार करना चाहिए. वर्तमान नारीवाद नारी के साथ ही उन सभी दलित और शोषित तबकों की बात करता है, जो सदियों से समाज के हाशिए पर धकेल दिए गए हैं. यह मानता है कि स्वयं नारीवादी आंदोलन के अंतर्गत कई धाराएँ एक साथ काम कर सकती हैं, भले ही उनके रास्ते अलग-अलग हों पर उनका गंतव्य एक ही है. इसलिए सबको एक साथ आगे आना चाहिए.

बुधवार, 22 सितंबर 2010

स्त्री देह के बाजारीकरण पर सवालों के माध्यम से विचार-विमर्श

आमतौर पर हम समाज में घटने वाली घटनाओं को तो देखते हैं, पर उनके पीछे के कारणों को जानने का कभी प्रयास नहीं करते हैं. आज की नारी को बदलती सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के चलते पहले की अपेक्षा बहुत सी सहूलियतें मिली हैं. इतनी कि उन्हें मुक्त मान लिया गया है. जब हम माडलों, हिरोइनों और अन्य पेशों में आगे बढ़ती औरत को देखते हैं, तो ये मान बैठते हैं कि औरत आज़ाद हो गयी है और फिर ये सोच लेते हैं कि वो अपनी आज़ादी का गलत फायदा भी उठाने लगी है. सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाली औरत हो या कॉपरेट जगत की नारी, ये मान लिया जाता है कि वो अपनी देह को हथियार बनाकर आगे बढ़ने लगी है. टी.वी. में विज्ञापनों में औरतों के देह-प्रदर्शन पर भी उसे ही दोषी मान लिया जाता है. पर, उसके पीछे के कारणों को जानने की कोशिश नहीं की जाती.
प्रश्न ये हैं कि क्या वाकई आज की औरत आज़ाद हो गयी है... इतनी आज़ाद कि अपनी देह को हथियार की तरह  इस्तेमाल करके आगे बढ़ रही है? क्या उसकी सभी समस्याओं का अंत हो गया है? क्या उसे वे सभी अधिकार मिल गए हैं, जिनके लिए वो दशकों से लड़ाई लड़ रही थी? कुछ इन्हीं प्रश्नों के उत्तर ढूंढती एक पुस्तक आजकल पढ़ रही हूँ "स्त्री: मुक्ति का सपना" इसके मुख्य संपादक प्रो. कमला प्रसाद और राजेन्द्र शर्मा हैं, जबकि अरविंद जैन और लीलाधर मंडलोई अतिथि संपादक हैं.  यहाँ मैं अरविंद जैन के सम्पादकीय के कुछ उद्धरण दे रही हूँ, -
"स्त्री को 'देह के हथियार' से कितना 'सत्ता में हिस्सा'' मिला या मिला पाया- हम सब अच्छी तरह जांते हैं. पुरुषों के इस भयावह 'खेल' में स्त्री सहमति का निर्णय स्वयं ले रही है या 'सिक्का' (रुपया, डालर, पौंड ) ? देह के अर्थशास्त्र में स्वेच्छा और स्वतंत्रता का निर्णायक आधारबिंदु  क्या है? देह के व्यवसाय के मुनाफे और 'देह की कीमत' के बीच क्या अंतर्संबंध है? खेल के नियम, शर्तें और चुनाव प्रक्रिया कौन निर्धारित कर रहा है?"
इन सवालों से स्थिति स्पष्ट होती जाती है. हम ये तो देख रहे हैं कि पुरुष डियोडरेंट के विज्ञापन में औरतें बिकनी पहनकर दिख रही हैं, पर उनसे कौन ऐसा करा रहा है? कौन इस बात पर उन्हें मजबूर कर रहा है कि यदि वे ऐसा नहीं करेंगी तो प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जायेंगी?
यदि ये कहा जाए कि औरतें अपना शोषण होने ही क्यों देती हैं, तो उसका उत्तर यह है कि औरतों का शोषण कहाँ नहीं होता? यदि कार्यस्थल पर हो रहे शोषण से बचने के लिए वे घर में बंद रहने का निर्णय लें, तो क्या उनका शोषण नहीं होता? क्या घर में भी औरतें पूरी तरह सुरक्षित हैं? नहीं.
शो बिजनेस में नारी देह के इस्तेमाल को अरविन्द जैन बहुत अच्छी तरह सामने रखते हैं-
"बहुराष्ट्रीय पूँजी के सामने सुन्दर स्त्री के विरोध, प्रतिरोध और मोलभाव का क्या कोई मतलब है? पुरुष उद्योगपतियों द्वारा पहले से तय कीमत (इनाम, पुरस्कार, पारिश्रमिक...) पर, जब हज़ारों विश्व सुंदरियों को लाइन लगाकर देह प्रदर्शन के लिए लाकर खड़ा कर दिया जाता हो, तब राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय दलाओं के हाथों में नाचती कठपुतलियाँ या सुन्दर गुडियाँ सिर्फ वस्तु, माल या साधन भर होती हैं. खरीददार की शर्तों पर खेल-खेलने में, सुन्दरी की हार पहले से ही निश्चित है..."
स्त्री को घर में रखने और वहाँ से बाहर निकालने का सारा काम इसी विश्वव्यापक पूँजी के खेल का एक हिस्सा है. खेल के नियम भी यही तय करती है, खिलाड़ियों को भी और हार-जीत को भी. एक ओर तो औरतों को घर में बैठाकर, उसके घरेलू काम को अनुत्पादक सिद्ध करके उसके अंदर आत्मविश्वास की कमी पैदा करती है, तो दूसरी ओर माडलिंग, एक्टिंग आदि जैसे शो बिज़ को ग्लैमराइज करके सुन्दर लड़कियों को उस ओर आकर्षित करती है. ध्यान दीजिए रैम्प पर सैकड़ों लोगों के सामने वाक् करने के लिए माडल के पास बहुत अधिक आत्मविश्वास होना चाहिए और उसके अंदर ये आत्मविश्वास भी वही पूँजी भरती है, जो हाउस वाइफ को नकारा सिद्ध करती रहती है.
ये कहा जा सकता है कि पूंजीवाद अपना व्यापार चलाने के लिए औरतों का मनचाहा इस्तेमाल करता है. चाहे उसे घर में रखना हो या रैम्प पर चलना हो. वह सिर्फ 'कार्य करने' के लिए होती है, जैसा उसे कहा जाता है या उसे दिखाया जाता है. सोचना और निर्णय लेना औरतों का नहीं, पुरुषों का कार्य है. क्योंकि विश्व की लगभग समस्त पूँजी उन्हीं के पास है. एक-दो को छोड़ दें तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सी.ई.ओज., फिल्म, राजनीति हर जगह पुरुषों का वर्चस्व है.  इन बातों से औरतें बिल्कुल अनभिज्ञ, उनके इशारों पर नाचती रहती हैं और जो विरोध करती है या प्रश्न उठाती है, उसे प्रतिस्पर्धा से बाहर होना पड़ता है या फिर नारीवादी (जो कि आजकल एक गाली की तरह प्रयुक्त हो रहा है) कहकर उन्हें हे दृष्टि से देखा जाने लगता है.

(उपर्युक्त पुस्तक गूगल बुक्स पर इस पते पर देखी जा सकती है-
http://www.google.com/books?id=B9_b5iySOMAC&source=gbs_slider_thumb

और इस जगह ऑर्डर देकर मंगाई जा सकती है अपने पते पर, मैंने इसी तरह मंगाई है-
http://www.vaniprakashan.in/book_detail.php?id=224