बुधवार, 6 जनवरी 2010

छेड़छाड़ की समस्या के कारणों की पड़ताल

     छेड़छाड़ की समस्या हमारे समाज की एक गम्भीर समस्या है. इसके बारे में बातें बहुत होती हैं, परन्तु इसके कारणों को लेकर गम्भीर बहस नहीं हुयी है. अक्सर इसको लेकर महिलाएँ पुरुषों पर दोषारोपण करती रहती हैं और पुरुष सफाई देते रहते हैं, पर मेरे विचार से बात इससे आगे बढ़नी चाहिये.
    मैंने पिछले कुछ दिनों ब्लॉगजगत्‌ के कुछ लेखों को पढ़कर और कुछ अपने अनुभवों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि लोगों के अनुसार छेड़छाड़ की समस्या के कारणों की पड़ताल तीन दृष्टिकोणों से की जा सकती है-
जैविक दृष्टिकोण- जिसके अनुसार पुरुषों की जैविक बनावट ऐसी होती है कि उसमें स्वाभाविक रूप से आक्रामकता होती है. पुरुषों के कुछ जीन्स और कुछ हार्मोन्स (टेस्टोस्टेरोन) होते हैं, जिसके फलस्वरूप वह यौन-क्रिया में ऐक्टिव पार्टनर होता है. यही प्रवृत्ति अनुकूल माहौल पाकर कभी-कभी हावी हो जाती है और छेड़छाड़ में परिणत होती है.
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण - इसके अनुसार छेड़छाड़ की समस्या कुछ कुत्सित मानसिकता वाले पुरुषों से सम्बन्धित है. सामान्य लोगों से इसका कुछ लेना-देना नहीं है.
समाजवैज्ञानिक दृष्टिकोण-इसके अनुसार इस समस्या की जड़ें कहीं गहरे हमारी समाजीकरण की प्रक्रिया में निहित है. इसकी व्याख्या आगे की जायेगी.
    यदि हम इस समस्या को सिर्फ़ जैविक दृष्टि से देखें तो एक निराशाजनक तस्वीर सामने आती है, जिसके अनुसार पुरुषों की श्रेष्ठता की प्रवृत्ति युगों-युगों से ऐसी ही रही है और सभ्यता के विकास के बावजूद कम नहीं हुयी है. इस दृष्टिकोण के अनुसार तो इस समस्या का कोई समाधान ही नहीं हो सकता. लेकिन इस समस्या को जैविक मानने के मार्ग में एक बाधा है. यह समस्या भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न ढँग से पायी जाती है. जहाँ उत्तर भारत में छेड़छाड़ की घटनाएँ अधिक होती हैं, वहीं दक्षिण भारत में नाममात्र की. इसके अलावा सभी पुरुष इस कुत्सित कर्म में लिप्त नहीं होते. यदि यह समस्या केवल जैविक होती तो सभी जगहों पर और सभी पुरुषों पर ये बात लागू होती. यही बात मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर सामने आती है. लगभग दो-तिहाई पुरुष छेड़छाड़ करते हैं, तो क्या वे सभी मानसिक रूप से "एबनॉर्मल" होते हैं?
    नारीवादी छेड़छाड़ की समस्या को सामाजिक मानते हैं. चूँकि समाजीकरण के कारण पुरुषों में इस प्रकार की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है कि वे महिलाओं से छेड़छाड़ करें, इसलिये समाजीकरण के द्वारा ही इस समस्या का समाधान हो सकता है. अर्थात्‌ कुछ बातों का ध्यान रखकर, पालन-पोषण में सावधानी बरतकर हम अपने बेटों को "जेंडर सेंसटाइज़" कर सकते हैं. यहाँ पर यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या कोई अपने बेटे से यह कहता है कि छेड़छाड़ करो? तो इसका जवाब है-नहीं. यहाँ इस समस्या का जैविक पहलू सामने आता है. हाँ, यह सच है कि पुरुष ऐक्टिव पार्टनर होता है और इस कारण उसमें कुछ आक्रामक गुण होते हैं, पर स्त्री-पुरुष सिर्फ़ नर-मादा नहीं हैं और न ही छेड़छाड़ का यौन-क्रिया से कोई सम्बन्ध है. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. अतः समाज में रहने के लिये जिस प्रकार सभ्यता की आवश्यकता होती है, वह होनी चाहिये. हम लड़कों के पालन-पोषण के समय उसकी आक्रामक प्रवृत्तियों को रचनात्मक मोड़ देने के स्थान पर उसको यह एहसास दिलाते हैं कि वह स्त्रियों से श्रेष्ठ है. यह पूरी प्रक्रिया अनजाने में होती है और अनजाने में ही हम अपने बच्चों में लिंग-भेद व्याप्त कर देते हैं.
     हमें यह समझना चाहिये कि छेड़छाड़ की समस्या का स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक आकर्षण या यौन-सम्बन्धों से कोई सम्बन्ध नहीं है. छेड़छाड़ के द्वारा पुरुष अपनी श्रेष्ठता को स्त्रियों पर स्थापित करना चाहता है और यह उस दम्भ की अभिव्यक्ति है जो समाजीकरण की क्रिया द्वारा उसमें धीरे-धीरे भर जाती है. शेष अगले लेख में...

रविवार, 3 जनवरी 2010

स्त्रीलिंग-पुल्लिंग विवाद के व्यापक संदर्भ

स्त्रीलिंग-पुल्लिंग विवाद भले ही सबको निरर्थक बहस लगती हो, परन्तु नारीवादी आन्दोलन में भाषा के इस विवाद के व्यापक मायने हैं. जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे समाज में स्त्री-पुरुष के कार्यक्षेत्र तय थे और इसी अनुसार भाषा भी विकसित होती गयी. भाषा लोकानुगामिनी होती है. जो शब्द प्रचलन में होते हैं वे भाषा का अंग बन जाते हैं और इस प्रकार भाषा हमारे समाज की मनोवृत्ति को दर्शाती है. समाज में चूँकि घर के अन्दर के कार्य औरतें करती हैं, इसलिये "गृहिणी" शब्द स्त्रीलिंग है और बाहर का कार्य पुरुष करते हैं, इसलिये समाज के सभी महत्त्वपूर्ण पदों से सम्बन्धित शब्द पुल्लिंग है.
    जब नारीवादी आन्दोलन ने सर्वप्रथम यह प्रश्न उठाया था कि अधिकतर माहत्त्वपूर्ण शब्द पुल्लिंग क्यों हैं? तब उनका अभिप्राय था कि ये शब्द "जेंडर न्यूट्रल" होने चाहिये. इसका सबसे प्रासंगिक उदाहरण "राष्ट्रपति" शब्द है, जो पूरी तरह से पुल्लिंग है. विडम्बना यह है कि हमारा संविधान अंग्रेजी में लिखा गया, जिसमें "प्रेसिडेंट" शब्द जेंडर न्यूट्रल है. जब हमारे देश के विद्वान अनुवादकों ने संविधान का हिन्दी अनुवाद किया तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि राष्ट्र की प्रमुख कभी कोई महिला भी हो सकती है और आज जब महिला राष्ट्रपति बन गयी हैं, तो उनके साथ राष्ट्रपति शब्द कितना अटपटा लगता है, ये तो सभी जानते हैं.
    यहाँ मैं स्पष्ट करना चाहती हूँ कि इस संदर्भ में नारीवादियों की माँग क्या थी. उनका यह मतलब नहीं था कि प्रत्येक पुल्लिंग शब्द का स्त्रीलिंग शब्द भी होना चाहिये, बल्कि उनका अभिप्राय था कि महत्त्वपूर्ण पदों और कार्यों से सम्बन्धित शब्द ऐसे होने चाहिये जो कि अधिक व्यापक अर्थ वाले और अधिक समावेशी हों. इसीलिये "न्यूट्रल जेंडर" नहीं "जेंडर न्यूट्रल" कहा जाता है. न्यूट्रल जेंडर शब्द नकारात्मक है जिसका अर्थ है- न स्त्रीलिंग और न ही पुल्लिंग (नपुंसकलिंग). जबकि जेंडर न्यूट्रल सकारात्मक है जो कि स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और ट्रान्स जेंडर को भी समावेशित करता है.
     नारीवादियों की इस माँग का ही परिणाम है कि अब अधिकतर लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण शब्द जेंडर न्यूट्रल हो गये हैं. अब चेयरमैन, कैमरामैन में मैन के स्थान पर "पर्सन" शब्द प्रयुक्त होता है. न्यूज़रीडर, एंकर, जर्नलिस्ट आदि जेंडर न्यूट्रल शब्द हैं. बेशक ये शब्द अंग्रेजी के हैं. हिन्दी में अब भी एक कार्य के लिये स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का भेद बना हुआ है, जिससे कभी-कभी असुविधाजनक स्थिति उत्पन्न हो जाती है. इसकी ज़िम्मेदारी हम पर है कि हम अधिकतर जेंडर न्यूट्रल भाषा का प्रयोग करें. इसका बहुत अच्छा उदाहरण एन.सी.ई.आर.टी. की पुस्तके हैं, जिनमें किसान और मजदूरों के विषय में भी महिलाओं का उदाहरण दिया जाता है. यदि आप दस साल पहले और अब की पुस्तकों की तुलना करें तो आपको अन्तर स्पष्ट पता चलेगा.
     संक्षेप में, मेरा कहना है कि हमें ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिये जो अधिक से अधिक समावेशी हो. व्यावहारिक दिक्कतों से बचने के लिये उन शब्दों के आगे महिला या पुरुष लगाकर काम चलाया जा सकता है. या ऐसे शब्द प्रयुक्त हों जिनका स्त्रीलिंग शब्द उचित और व्यावहारिक हों जिससे कि "राष्ट्रपति" शब्द जैसी स्थिति न उत्पन्न हो. वैसे, मैं भी यह मानती हूँ कि ये प्रश्न उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि अन्य मुद्दे, परन्तु अब भी यह नारीवाद के अनेक सैद्धान्तिक मुद्दों में से एक है.