स्त्रीवाद क्यों?



मैं छेड़छाड़ की समस्या पर एक श्रृँखला लिख रही थी, जिसकी समापन किस्त तैयार करके रखी है. बस टाइप करनी है. पर इसी बीच मेरे एक मित्र ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक है-
"Do We Need Feminism At All?" मैं अपने इस लेख के माध्यम से उसका उत्तर देने का प्रयास कर रही हूँ.यद्यपि अपने एक लेख में मैं पहले भी लिख चुकी हूँ कि जब हम यह कहते हैं कि स्त्रीवाद की भारत में क्या ज़रूरत है? तो यह मानकर चलते हैं कि यह एक पश्चिम की अवधारणा है, जबकि ऐसा नहीं है. इसके उद्धरण में मैंने कुछ प्राचीन साहित्य और स्मृतियों के अंश दिये थे. 
     इस बात का उत्तर कि भारत में नारीवाद की क्या ज़रूरत है, एक वाक्य में दूँ तो यह होगा कि " नारीवाद नारी की उन परिस्थितियों को बदलने की बात करता है, जिनके कारण उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता और उन्हें वे अधिकार नहीं मिल पाते, जो पुरुषों को प्राप्त हैं. नारीवाद नारी को बदलने की बात नहीं करता." भारत में नारीवाद की उपयोगिता पर प्रश्न लगाने वाले तर्क देते हैं कि भारतीय नारी तो नारीत्व का, ममता का, करुणा का मूर्तिमान रूप है और पश्चिम की नारीवादी महिलाएँ उसे भी अपनी तरह भ्रष्ट कर डालना चाहती हैं. मैं यह कहती हूँ कि दुनिया सिर्फ़ भारत और अमेरिका या यूरोप ही नहीं है, एशिया, दक्षिण अमेरिका, अफ़्रीका के भी देशों में नारी आज अपनी परिस्थितियों को बदलने की माँग कर रही है और वह भी बिना अपनी संस्कृति को छोड़े. मुस्लिम देशों में औरतें बुर्क़े के साथ पढ़ना-लिखना और बाहर का काम करना चाहती हैं. इस्लाम में नारी की स्थिति पर  शीबा असलम फ़हमी अपने एक लेख में लिखती हैं, " तसलीमा ही नहीं आज विश्वभर में मुसलमान औरतें अपने-अपने समाजों में व्याप्त लिंग भेद पर सवाल खड़े कर रही हैं लेकिन इस्लाम पर हमला बोल कर नहीं। उनके यहां धर्म और समाज का फर्क साफ है। वह इस्लाम में रह कर इस्लामी न्यायप्रियता, बराबरी और आजादी के दर्शन से अपने लिए रास्ता निकाल रही हैं। वह मुसलमान मर्दों से ज्‍यादा स्पष्‍ट हैं इन मुद्दों को लेकर." आज बुर्क़ा हटाने का प्रश्न नहीं है. प्रश्न यह है कि औरत किस पहनावे में अपने आप को सुरक्षित और सहज पाती है. हम अपने देश में साड़ी की तारीफ़ करते नहीं थकते और मुस्लिम औरतों के पर्दे को बुरा-भला कहते हैं, बिना यह जाने कि औरत क्या चाहती है? साड़ी ठीक से पहनी जाये तो शालीन पहनावा है, नहीं तो आजकल की हिरोइनों के लिये वह सबसे सेक्सी ड्रेस है. बस फ़र्क इतना है कि उसे कौन किस उद्देश्य से पहनना चाहता है. पर्दा अगर ज़बर्दस्ती करवाया जाये तो ग़लत है, पर यदि औरत अपनी मर्ज़ी से पर्दा करना चाहती है, तो ये उस पर छोड़ देना चाहिये. बस परिस्थितियाँ ऐसी होनी चाहिये कि चयन का अधिकार औरत का हो और वह बिना किसी दबाव के अपना निर्णय खुद ले सके. 
     ठीक इसी तरह भारत में अगर नारी अपने नारीसुलभ गुण बनाये रखना चाहती है (जैसा कि अधिकतर औरत वास्तव में चाहती है) तो इस बात से उसे नारीवाद रोक नहीं रहा है, और न रोक सकता है. बात सिर्फ़ इतनी है कि उस पर ये गुण थोपे न जायें. ऐसा न कर दिया जाये कि उसे ज़बर्दस्ती शर्माना पड़े, चाहे शर्म आये या न आये. नारीवाद औरतों की निर्णय लेने और चयन की स्वतन्त्रता की बात करता है, न कि सभी औरतों को अपने स्वाभाविक गुण छोड़ देने की, चाहे वे नारीसुलभ गुण हों या कोई और. 
     नारीवाद का मुख्य उद्देश्य है नारी की समस्याओं को दूर करना. आज हमारे समाज में भ्रूण-हत्या, लड़का-लड़की में भेद, दहेज, यौन शोषण, बलात्कार आदि ऐसी कई समस्याएँ हैं, जिनके लिये एक संगठित विचारधारा की ज़रूरत है. जिसके लिये आज लगभग हर शोध-संस्था में वूमेन-स्टडीज़ की शाखा खोली गयी है. नारी-सशक्तीकरण, वूमेन स्टडीज़, स्त्रीविमर्श इन सब के मूल में नारीवाद ही है. नारी सशक्तीकरण और नारी सम्बन्धी शोध में हम नारी के सामाजिक विकास के लिये रणनीतियाँ बनाने के विषय में पढ़ते हैं और नारीवाद इन सभी समस्याओं की जड़ों की पहचान कराता है. इसलिये आज भारत में नारीवाद की सख्त ज़रूरत है. भारतीय नारीवाद, जो कि भारत में नारी की विशेष परिस्थितियों के मद्देनज़र एक सही और संतुलित सोच तैयार करे ताकि नारी-सशक्तीकरण के कार्य में सहायता मिले. 

(यह प्रविष्टि ब्लॉग के मुख्य पृष्ठ पर भी है. जहाँ इस पर होने वाली बहस टिप्पणियों और प्रतिटिप्पणियों के रूप में देखी जा सकती है 
"भारत में नारीवाद की क्या आवश्यकता है?")

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बहस चलती रहे, बात निकलती रहे...