"भारत में नारीवाद को पश्चिमी परिप्रेक्ष्य में देखा गया है, जबकि ज़रूरत उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझने की है. यद्यपि पितृसत्ता हर युग और काल में मौजूद रही है, पर भारत में यह अत्यधिक जटिल ताने-बाने के साथ उपस्थित है, जिसमें जाति, वर्ण, वर्ग और धर्म सभी सम्मिलित हैं. इसे 'ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' का नाम दिया गया है. इसका यह अर्थ नहीं कि इसका निशाना कोई एक जाति है. यह भारतीय समाज में व्याप्त स्त्री की पराधीनता के अलग-अलग रूपों को दर्शाता है.
मेरी कोशिश नारीवाद को इसी भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में समझने की और मौजूदा समस्याओं को इस आधार पर विश्लेषित करने की है."

बुधवार, 16 दिसम्बर 2009

नारीवाद से सम्बन्धित भ्रान्तियाँ-१ ( नारीवाद पश्चिमी अवधारणा है )

नारीवाद पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वह पश्चिम से आयातित अवधारणा है और उसका भारतीय संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है. प्रतिपक्षियों के अनुसार चूँकि भारत में नारी की पूजा होती है, उसका सर्वोच्च स्थान है. इसलिये नारीवाद की भारतीय समाज में न कोई आवश्यकता कभी थी और न है.
    यह बात बिल्कुल सही है कि "नारीवाद" को इस नाम से सर्वप्रथम पश्चिम में ही जाना गया और इसे एक विचारधारा का रूप भी वहीं प्रदान किया गया. परन्तु प्राचीन भारतीय साहित्य में आपको ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे , जिनमें नारी का विद्रोही स्वरूप सामने आया है. भले ही नारी के इस विद्रोह को नारीवाद नाम न दिया गया हो पर इससे यह पता चलता है कि विभिन्न युगों में नारी ने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में अपनी स्थिति पर क्षोभ व्यक्त किया है. "अभिज्ञान शाकुन्तल" कालिदास का प्रसिद्ध नाटक है, जिसकी नायिका शकुन्तला "निसर्ग कन्या" के रूप में वर्णित की गयी है. परन्तु शकुन्तला का वह रूप विद्रोह का प्रतीक है, जब वह अपने धर्मभाईयों के साथ ऋषि कण्व के आश्रम से विदा होकर दुष्यन्त के पास आती है और वह उसे पहचानने से मना कर देता है, उल्टे आरोप लगाता है कि आपलोग बलपूर्वक अपनी बहन को मेरे मत्थे मढ़ रहे हैं. उस समय शकुन्तला निर्भीक होकर कहती है कि आप जिस प्रकार स्वयं छली  हैं, उसी प्रकार दूसरों को भी समझते हैं. इस समय भोली-भाली शकुन्तला का रोष देखते बनता है. इसी प्रकार सीता अपनी पवित्रता पर उंगली उठाये जाने पर अपनी माँ (पृथ्वी) की गोद में शरण लेना उचित समझती हैं. अभिज्ञान शाकुन्तल की शकुन्तला और उत्तर रामायण की सीता अपने पुत्रों का अकेले ही (बिना पति के) ऋषियों के आश्रम में  पालन-पोषण करती हैं. बृहदारण्यकोपनिषद्‌ का गार्गी-याज्ञवल्क्य संवाद प्रसिद्ध है, जिसमें गार्गी याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करते हुये ब्रह्मविद्या से सम्बन्धित ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछती हैं कि वे परेशान होकर कह उठते हैं कि इससे आगे प्रश्न करने पर तुम्हारा सर धड़ से अलग हो जायेगा ( कुछ व्याख्याकारों के अनुसार याज्ञवल्क्य ने गार्गी को सर काटने की धमकी दी थी). गार्गी जानती थीं कि याज्ञवल्क्य एक प्रतिष्ठित महर्षि हैं, परन्तु उन्होंने शास्त्रार्थ करने में निर्भीकता दिखाई और बाद में विनम्रतापूर्वक अपनी पराजय भी स्वीकार कर लेती हैं. याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी गार्गी के आश्रम में शिक्षा प्राप्त करती है. वह उच्चशिक्षा प्राप्त करना चाहती है, परन्तु उस युग में उच्चशिक्षा पर पुरुषों का वर्चस्व था, अतः वह ऋषियों के आश्रम में ही प्राप्त की जा सकती थी और किसी युवती के लिये यह असंभव था. अतः मैत्रेयी याज्ञवल्क्य से विवाह करके उनके साथ रहकर उच्चशिक्षा प्राप्त करती है.
    ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि अन्य समाजों की तरह हमारा समाज भी पितृसत्तात्मक था, जिसमें नारी की स्थिति दोयम थी, परन्तु तब भी नारी अपनी स्थिति के विरुद्ध संघर्ष करती रहती थी. वस्तुतः प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में नारी अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं थी और जब तकनीकी विकास के फलस्वरूप वह एक-दूसरे के संपर्क में आयी तो उसके विद्रोह ने नारीवाद का रूप ले लिया. नारीवाद न पश्चिमी अवधरणा है और न ही भारतीय. यह नारी के अन्दर पल रहे रोष और क्षोभ की सर्वव्यापक अभिव्यक्ति है.

8 टिप्पणियाँ:

Arvind Mishra ने कहा…

अच्छा लिखा है आपने, बोधगम्य और प्रवाहपूर्ण ! "गार्गी जानती थीं कि याज्ञवल्क्य एक प्रतिष्ठित महर्षि हैं, परन्तु उन्होंने शास्त्रार्थ करने में निर्भीकता दिखाई और बाद में विनम्रतापूर्वक अपनी पराजय भी स्वीकार कर लेती हैं."
मगर आज की गार्गी तो याज्ञवल्क्य का ही सर चाहती है -उससे कम उसे कुछ स्वीकार ही नहीं ? अब आप ही बताईये की बात कैसे बने !

रचना ने कहा…

नारीवाद न पश्चिमी अवधरणा है और न ही भारतीय. यह नारी के अन्दर पल रहे रोष और क्षोभ की सर्वव्यापक अभिव्यक्ति है.
excellent summerization and people are still where they were unable ot foresee the change less alone accept it

Sandeep Bhatt ने कहा…

अच्छा लिखा है। नारीवाद को किसी मुल्क की सीमाओं में बांधकर देखना पूरी तरह से गलत है।

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा हैं आपने इसमे कोई दो राय नहीं है , और ज्यादा कुछ कह नहीं पाऊंगा अभी व्यसतता चल रही है ,। जेसे ही दिल्ली वापसी होगी इस पोस्ट के लिए जवाब जरुर दूंगा ।

mukti ने कहा…

अरविन्द जी,
गार्गी तब विनम्रता से पराजय स्वीकार कर सकती है जब कोई उससे अधिक विद्वान उसे शास्त्रार्थ में पराजित करे. परन्तु यदि मात्र नारी होने के नाते उससे पराजय स्वीकार करने की अपेक्षा की जाये तो नहीं करेगी. शेष, गुण-अवगुण तो भिन्न-भिन्न व्यक्ति के भिन्न-भिन्न होते हैं.

cmpershad ने कहा…

" भारत में नारी की पूजा होती है"

और नारी की ‘पूजा’ भी होती है:) भारत कोई अपवाद नहीं है॥

Suman ने कहा…

nice

Mired Mirage ने कहा…

अच्छी जानकारी दी है। आभार।
घुघूती बासूती

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