गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

नारीवाद से परहेज़ क्यों?

इस ब्लॉग पर मेरी पिछली पोस्ट से किसी को बुरा लगा हो तो मैं क्षमाप्रार्थिनी हूँ. वाणीगीत जी, आपने सच कहा है कि मुझे आपकी टिप्पणी को इतने हल्के में नहीं लेना चाहिये था. पर विश्वास कीजिये मेरा तात्पर्य किसी मुद्दे को उछालकर विवादित बनाने का बिल्कुल नहीं था. मेरा उद्देश्य तो नारीवाद और नारीवादियों को लेकर कुछ ग़लतफ़हमियों को दूर करना था. वस्तुतः मैंने इस ब्लॉग को आरम्भ ही किया था नारीवाद से सम्बन्धित कुछ सैद्धान्तिक बातों को स्पष्ट करने के लिये. नारी से सम्बन्धित समस्याओं,विमर्शों और व्यावहारिक मुद्दों पर अन्य लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण ब्लॉग हैं, जिनमें प्रमुख हैं- नारी, नारी का कविता ब्लॉग, स्त्रीविमर्श और चोखेरबाली.
     मुझे लगता है कि हमारे समाज में नारीवाद को लेकर कुछ भ्रान्तियाँ हैं, जिन्हें दूर करने का प्रयास मैं इस ब्लॉग से करती रहती हूँ. सबसे पहले तो मैं यह बताना चाहुँगी कि मैं ये सारी कवायद कर क्यों रही हूँ, तो मेरा मानना है कि समाज के किसी उपेक्षित वर्ग के लिये कार्य करना एक बात है और उसकी स्थिति ऐसी क्यों है? इसके क्या प्रभाव हैं और इसे किस तरह दूर करना है, इन मुद्दों पर शोध करना दूसरी बात है. दोनों ही बातें अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं. मेरा सरोकार दूसरी बात से है, जो कि सैद्धान्तिक है और जब यह उपेक्षित वर्ग नारी हो तो इसे नारीवाद कहेंगे. अतः नारीवाद एक विचारधारा है, जिसके अन्तर्गत उपर्युक्त बातों पर शोध किया जाता है और सिद्धान्त बनाये जाते हैं. समाज के एक वर्ग को यह बुद्धिजीवियों की जुगाली लगती है. परन्तु विचारणीय प्रश्न है कि यदि सिद्धान्त ही नहीं होंगे तो उसे व्यवहार में लाने की दिशा कैसे तय होगी? इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं कि नारी की स्थिति में सुधार होना चाहिये इस पर सभी सहमत हैं, पर यह सुधार किस प्रकार होगा? कौन-कौन से उपाय अपनाये जाने चाहिये? क्या सिर्फ़ अधिकार मात्र दे देने से या कानून बना देने से योजनायें लागू कर देने से समस्या हल हो जायेगी? क्या हमें सारी औरतों को एक वर्ग में रखना चाहिये या उनका वर्गीकरण करना चाहिये(जैसे-ग्रामीण बनाम शहरी औरतें, धनी बनाम निर्धन औरतें, नौकरी करने वाली बनाम घरेलू औरतें) आदि. यदि हम औरतों की बेहतरी के लिये कुछ करना चाहते हैं तो इन सब बातों पर शोध करना होगा. इसीलिये नारीवाद की प्रासंगिकता बनी हुयी है.
     जब हम यह कहते हैं कि नारीवाद को छोड़ो और नारी की बेहतरी की कोशिश करो तो यह ऐसा लगता है कि जैसे हम कह रहे हों समाजवाद को छोड़कर सामाजिक समता की बात करो. भले ही हम किसी विचारधारा से सहमत हों या नहीं, पर उसकी प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं होती, चाहे वह गाँधीवाद हो, मार्क्सवाद हो या नारीवाद. यह अवश्य है कि विभिन्न वादों के अन्तर्गत जो शोध या अध्ययन होते हैं उन्हें व्यवहार में लाने का प्रयास भी किया जाना चाहिये. कहीं ऐसा न हो कि मीटिंग, सेमिनार, वर्कशाप करते रहें और स्थिति जहाँ की तहाँ बनी रहे. पर यह भी मानना चाहिये कि इन बौद्धिक बहसों का भी उतना ही महत्त्व है जितना कि फ़ील्ड में जाकर कार्य करने का.
     मेरा प्रयास है कि नारी के लिये कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं के बीच सामंजस्य स्थापित हो ताकि दोनों मिलकर औरतों की बेहतरी के लिये रणनीति बनाकर उसे अमल में लाने के लिये नीतिनिर्माताओं पर दबाव डाल सकें, न कि सिर्फ़ आपसी बहसों में उलझे रह जायें. मैं चाहती हूँ कि ब्लॉगिंग "विमर्शी लोकतंत्र" का माध्यम बने. इसलिये मैं उन सभी से क्षमा माँगती हूँ, जिनको मेरी बातों का बुरा लगा हो.
     ...अपनी अगली पोस्ट में मैं नारीवाद से सम्बन्धित कुछ अन्य भ्रान्तियों तथा उनके निराकरण के विषय में लिखुँगी...

14 टिप्‍पणियां:

  1. नारीवाद तो ठीक है लेकिन जब कोई नारी अपनी बात कहने से इसलिए हिचकती है कि उसे नारीवादी विरोधी माना जाएगा तब सही विचार सामने नहीं आ पाते ।

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  2. सुचिंतित ,नारीवाद के संदर्भ में भी सिद्धान्त और व्यवहार का फर्क साफ़
    झलकता है क्योंकि कुछ लोग इसे सिर्फ अपनी विशिष्ट पहचान या मकसद
    हासिल करने करने के लिए एक जरिये के रूप में अपनाते /अपनाती हैं और उसे पूरा होते ही
    उनके मुहिम की इतिश्री हो जाती है -ऐसे लोगों से किसी भी विचार (धारा) को मूर्त रूप लेने के प्रति
    कोई आग्रह नहीं होता -ये पेज थ्री पर भी विद्यमान रहते/रहती हैं और पांच सितारा होटलों में भी और आब ब्लॉग जगत में भी !
    नारी की वास्तविक दशा से इनका क्या लेना देना ? ये समाज से कटे लोग हैं !

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  3. भले ही हम किसी विचारधारा से सहमत हों या नहीं, पर उसकी प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं होती,...
    कौन सहमत नहीं होगा ....??
    नारीवाद से कोई परहेज नहीं है हमें ...आखिर हम नारियां ही है ...मगर नारीवाद के नाम पर नारियों द्वारा किये गए अत्याचारों को तो बढ़ावा नहीं दिया जा सकता है ...जो कानून नारियों की सुरक्षा के लिए बनाये गए हैं ...बेहिसाब उनके दुरूपयोग से इन आँखों ने बहुत परिवार बर्बाद होते देखे हैं ...मेरा विरोध नारीवाद की आड़ में कानून के दुरूपयोग भर से है ...आप मेरे लेख देखें ...क्या नारियों पर होने वाले अत्याचारों पर आवाज नहीं उठाई है ....??
    सीधी सच्ची बात यह है कि हमारी सहानुभूति प्रताड़ित पक्ष से है ...वो चाहे नर हो या नारी ..
    आप मेरी बात समझ गयी ...बहुत आभार ....!!

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  4. मुक्ति
    आप की हर बात से सहमति हैं और अगर असहमति हो भी तो मेरा मानना हैं की नारी को नारी का साथ मिल जाए तो ३/४ समस्या अपने आप ख़तम हो जाए ।
    बात तो शायद आप , मै , रंजना , रेखा और वाणी सब एक ही कह रहे हैं बस सबके कहने मै जो मुद्दे उठते हैं वो एक दूसरे से कुछ भिन्न होते हैं जिनका कारण हैं हमारा अपना अपना व्यक्तिगत अनुभव , नजरिया और सोच । किसी की बहिन या बेटी अगर जलाई जाती हैं दहेज के लिये तो उसको स्त्री सुरक्षा सम्बन्धी दहेज कानून सही लगता हैं और अगर किसी के भाई या बेटे को इसी कानून की वजेह से सजा होती हैं पर उसका अपराध सिद्ध नहीं होता तो उसको ये कानून ग़लत लगता हैं ।

    सबसे अच्छी बात हैं की आज इस ब्लॉग जगत मे नारी की आवाज उसकी टंकार बन गयी हैं । २००७ अगस्त तक इसी ब्लॉग जगत मे ब्लॉग लिखती महिला को ना जाने कितने जेंडर बायस युक्त कमेन्ट मिलते थे । कविता लिखो तो ठीक मन जाता था पर विमर्श करो तो कहा जाता था की "विष " फैला रही हैं ।

    हर दिन कम से कम एक पोस्ट आती ही थी जिसमे भारतीये संस्कृति डूब जाती थी नारी के कपड़ो के चुनाव पर !!!!

    ख़ैर !!!!! मुझ तो लगता हैं नारी , नारीवादी नहीं होगी तो कौन होगा । बात चले क्युकी बहुत जरुरी हैं नारियों के अंदर जो चल रहा हैं वो बाहर आए , एक दूसरे से बात हो और अगर हम ग़लत हैं तो हम अपनी सोच बदले या अपने विचारों से अपने लडने की ताकत से दुसरो की सोच बदले

    बहुत अच्छा लिखा हैं तुमने , जारी रहे

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  5. देखिए, मेरी दृष्टि में किसी भी वाद को लेकर "अतिवादी " होना मुर्खता है ... और यह भी सच है की जिन कारणों से वह उत्पन्न हुआ है निदान भी वही कहीं होता है ...सिर्फ दृष्टि खुली रखे और मन पूर्वाग्रहों से मुक्त ..लोग पहले प्रतिक्रिया देंगे, उग्र होंगे जिन्हें सिर्फ विनम्र ढृढ़ता से ही बदला/समझाया जा सकता है ...एक आदमी ( मनुष्य ) जो पिछले कई दशकों से किसी एक बनी बनाई विचार धारा पर चल रहा है अगर आप उससे आशा करेंगी वह आपकी सही परन्तु नवीन बात के लिए एक झटके में तैयार हो जाएगा तो मुझे नही लगता यह संभव है ...दूसरी बात लोगों की निजी जिंदगी में कई अनुभव होते हैं जो किसी नजदीकी महिला को लेकर कटु होते हैं वह भी उसके विश्लेषण को प्रभावित करते हैं ..उस जगह भी आपको तिक्तता से पेश आने सेबचना होगा ..तब ही परिवर्तन की कोई बयार बनाने की संभावना है .... आशा है आप इशारा समझ रही होंगी.

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  6. ...और जाते -जाते अगर मनोविज्ञान में रूचि हो इसे पढिएगा ..मेरी बात समझने में आसानी होगी
    http://en.wiktionary.org/wiki/misoneism

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  7. वाणी जी की बात से सहमत सिर्फ नारी की आज़ादी को ले कर ही लडते रहने से नारी की दशा सुधरने वाली नहीं अधिकार और कर्तव्य की कोई संतुलित राय बने। हर वाद मे कुछ दशा और दिशा होती है मगर इस अन्दोलन मे कोई दशा और दिशा निर्धारित नहीं है। घर समाज को चलाने के लिये भी सन्तुलित माप दंड होने चाहिये अगर हम सिरे से ही मान ले कि औरत भी पुरुष की तरह ही वो गलत् काम करेगी पुॠश के जिन कामों से वो खुद त्रस्त है तो समाज क्या होगा? किसी देश, सभ्यता के लिये एक अच्छे समाज की संरचना बहुत जरूरी है। इस बात को ध्यान मे रख कर ही इस पर आम राय बन सकती है। धन्यवाद्

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  8. @अर्कजेश जी,
    यहाँ किसी को भी अपनी बात कहने से रोका नहीं जा सकता. अपनी बात तर्क से सामने रखी जाती है. किसी को सिर्फ़ इसलिये अपनी बात कहने से नहीं हिचकना चाहिये कि उसे अमुक वाद का विरोधी मान लिया जायेगा.
    @अरविन्द जी,
    आपकी बात से सहमत हूँ. कुछ ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी हर जगह होते हैं, जो सिर्फ़ नाम कमाने के लिये अपने नाम के साथ नारीवादी जोड़ लेते हैं. पर,सभी नारीवादी ऐसी नहीं होती, बल्कि जो नारी की बेहतरी के लिये अपना जीवन लगा देती है, उसको लोग जानते भी नहीं
    वाणीगीत जी,
    आपकी इस बात से सहमत हूँ. पर नारीवाद पितृसत्ता का विरोध करता है और यह सोच नारी और पुरुष दोनों में से किसी की भी हो सकती है और दूसरा पक्ष पीड़ित हो सकता है.
    @लवली जी,
    आपकी टिप्पणी अच्छी लगी, धन्यवाद.
    @निर्मला कपिला जी,
    मैं आपकी बात भी सही मानती हूँ. इसी बात के लिये तो हम प्रयास कर रहे हैं.
    @रचना जी,
    सार्थक टिप्पणी!
    एक सार्थक बहस के लिये सभी का धन्यवाद! ब्लॉग का नाम नारीवादी बहस सार्थक हुआ.

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  9. aaj ki nary binadas he magar vo fir bidara ti he har kam ko anajam de rahi he par jab bi akeli jati he to savalo ke gere me aakar kha di ho jati he kya kabata ka nari kesat yaha hota rega

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बहस चलती रहे, बात निकलती रहे...