"भारत में नारीवाद को पश्चिमी परिप्रेक्ष्य में देखा गया है, जबकि ज़रूरत उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझने की है. यद्यपि पितृसत्ता हर युग और काल में मौजूद रही है, पर भारत में यह अत्यधिक जटिल ताने-बाने के साथ उपस्थित है, जिसमें जाति, वर्ण, वर्ग और धर्म सभी सम्मिलित हैं. इसे 'ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' का नाम दिया गया है. इसका यह अर्थ नहीं कि इसका निशाना कोई एक जाति है. यह भारतीय समाज में व्याप्त स्त्री की पराधीनता के अलग-अलग रूपों को दर्शाता है.
मेरी कोशिश नारीवाद को इसी भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में समझने की और मौजूदा समस्याओं को इस आधार पर विश्लेषित करने की है."

मंगलवार, 1 दिसम्बर 2009

नारी, प्रेम और नारीवादी

परसों एक कविता लिखी औरत के प्रेम के पागलपन पर, कमेंट मिला कि यह किसी नारीवादी की कविता नहीं हो सकती. सही बात है. इसी प्रेम वाली बात को लेकर मेरे कई वामपंथी दोस्तों को मेरे ब्लॉग का "फ़ेमिनिस्ट पोएम्स" शीर्षक नहीं ठीक लगता. वे कहते हैं कि या तो ये शीर्षक हटा दो या इस पर प्रेम की कविताएँ मत लिखो. पर, मैं अपने भावों को किसी वाद में बाँधने के पक्ष में नहीं.
     अब मैं मुद्दे पर आ जाती हूँ. प्रेम प्रकृति का एक अनुपम उपहार है, स्त्री और पुरुष दोनों के लिये. दोनों ही प्यार करते हैं और प्यार में पागल भी होते हैं. पर दोनों के प्रेम के परिणाम अलग-अलग होते हैं. प्रायः स्त्रियाँ प्रेम में धोखा खाने के बाद भी अपने प्रेमी से प्रेम करती रहती हैं. पर पुरुष धोखा खाकर मरने-मारने पर उतर आता है. यहाँ मैंने 'प्रायः' शब्द का इसलिये प्रयोग किया क्योंकि अपवाद भी होते हैं. मैंने औरतों की इसी धोखा खाकर प्रेम करने की प्रवृत्ति पर कविता लिखी थी. इसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि मैं इस बात का समर्थन करती हूँ. पर इस प्रेम के मामले में कोई कुछ नहीं कर सकता क्योंकि यह जितना अनुपम उपहार है उतना ही गूढ़ भी. कोई जब प्रेम में पड़ जाता है तो उसे कोई वाद नहीं समझाया जा सकता, उसे उस राह पर जाने से रोका भी नहीं जा सकता.  अंग्रेजी में सही कहते हैं 'प्रेम में गिर पड़ना' (to fall in love). ऐसी स्थिति में प्रेमी से सिर्फ़ सहानुभूति जतायी जा सकती है.
     अब सवाल यहाँ यह है कि क्या एक नारीवादी को इस तरह के प्रेम का वर्णन करना चाहिये? पुरुषों से धोखा खाकर भी उसके प्रेम में डूबी रहने वाली औरत के साथ सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिये या भर्त्सना करनी चाहिये. तो अपने आप से पूछिये अपनी ग़लती से एक्सीडेंट करके बिस्तर पर पड़े रोगी को बुरा-भला कहेंगे क्या?
     यह एक ऐसा गूढ़ विषय है कि इस पर बहस करके किसी नतीजे तक नहीं पहुँचा जा सकता. पर एक बात मैं कहना चाहुँगी कि मुझे प्रेमी जनों से पूरी सहानुभूति होती है. औरतें इमोशनल फ़ूल होती हैं, इसमें उनका दोष नहीं. दोष उस माहौल का है, जिसमें उन्हें पाला-पोसा  जाता है और इसी तरह पुरुष प्रेम से अधिक महत्त्व प्रतिष्ठा को देते हैं, अपने अहं को देते हैं तो इसमें दोष उनका नहीं सामाजिक व्यवस्था का है.और कुछ दोष नारी की प्राकृतिक प्रवृत्ति का भी है. उसे बच्चे को जन्म देना होता है और पालन-पोषण करना होता है. अतः वह स्वभाव से अधिक कोमल, प्रेमी, और देखभाल करने वाली (caring) होती है. पुरुष इसी प्रवृत्ति का फ़ायदा उठाता है. इसीलिये मैंने औरतों को 'इमोशनल फ़ूल' कहा है.
     'प्रेम में धोखा  है' यह सोचकर कोई प्यार करना तो नहीं छोड़ देगा. और यदि कोई धोखा खाने के बाद भी प्रेमी को प्रेम किये जाता है, तो उसे भी रोका नहीं जा सकता. हाँ, इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि उसे अपने प्रेम को अपनी ताक़त बना लेना चाहिये. और स्वाभिमान की की़मत पर प्यार नहीं करना चाहिये. पर, फिर वही बात, प्यार कोई करता थोड़े ही है, वो तो प्यार में गिर पड़ता है. अब ये मत कहियेगा कि यह किसी नारीवादी का लेख नहीं हो सकता. क्या नारीवादियों के पास दिल नहीं होता?

12 टिप्पणियाँ:

शरद कोकास ने कहा…

कुछ नहीं बस एक कविता

नियम

प्यार देने का सुख
यदि बड़ा होता
प्यार पाने के सुख से
तो शायद
प्यार में भी नियम
होता मारने और बचाने का
---शरद कोकास

वाणी गीत ने कहा…

उक्त कविता में महिलाओं के प्रेम में मूर्ख बन जाने की बात कही गयी थी ...यही तो बिना नारीवाद का लेबल लगाए हम भी कहते हैं ....प्रेम सिर्फ प्रेम है ...धोखा खा कर भी प्रेम किया ही जाता है ...जबकि नारीवाद में किसी धोखे के लिए जरुरत नहीं है ...जैसा की नारीवादियों को प्रचारित किया जाता है ....मैंने कविता के लिए .."औरत प्यार करती है , दुःख सहती है , सृजन करती है ...तभी तो पागल होती है .....ये सब हमारे गुण है तो पागल कहला कर निहाल ही हुए ना ..." यह भी तो लिखा था मगर उसे बिलकुल ही नजरंदाज का दिया गया ...!!

वाणी गीत ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
वाणी गीत ने कहा…

मगर लगता है की ब्लॉगजगत में परम्परा सी हो गयी है ...हलके फुल्के मजाक को गंभीरता से लेने की और गंभीर प्रश्नों को हाशिये पर डालने की ...!!

उन्मुक्त ने कहा…

यहां तो बहुत गूढ़ बातें हो रही हैं। लेकिन मेरे विचार से प्रेम तो प्रकृति की सबसे प्यारी अनुभूति है। यह तो रिश्तों का वह संबन्ध है जो कि न केवल बन्धन रहित है पर नारीवाद या अन्य विचारधारा के परे है।

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

मैं आपकी सभी बातों से सहमत हूँ ..सिवाय एक के.."प्रायः स्त्रियाँ प्रेम में धोखा खाने के बाद भी अपने प्रेमी से प्रेम करती रहती हैं. पर पुरुष धोखा खाकर मरने-मारने पर उतर आता है."..ये गलत बात है मैंने देखा है स्त्रियाँ जब बदला लेने पर उतारू होती हो घर के घर बर्बाद हो जाते है..

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

इस कथन के बाद शेष क्या - "मैं अपने भावों को किसी वाद में बाँधने के पक्ष में नहीं."

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

जब आप मानती हैं कि '' मैं अपने भावों को किसी
वाद में बाँधने के पक्ष में नहीं.'' तब आपने क्यों
अपनी बात कहने के लिया '' नारीवादी - काव्य ''
का नेम - प्लेट लगाया है | आखिर नारीवाद
भी तो एक वाद ही है ...
............ ऐसा स्वतोव्याघात क्यों ..............

Arvind Mishra ने कहा…

आपकी दृष्टि बिल्कुल स्पष्ट है -प्रेम भी भला प्रायोजित हो सकता है ? हाँ आपने अबकी इसे विकार न मन कर
प्रक्रति का अनमोल उपहार कहा राहत हुयी !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

आपकी बातों से पूर्णत सहमति।
--------
अदभुत है हमारा शरीर।
क्या अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद सफल होगा?

sidheshwer ने कहा…

आप वही लिखें जो आपको लिखना है !

mukti ने कहा…

अमरेन्द्र जी,
मैंने अपने ब्लॉग के नाम का अर्थ है "एक नारीवादी की दृष्टि से दुनिया देखकर मन में आये भावों को व्यक्त करना" नारीवाद का मेरे द्वारा समझा गया अर्थ बहुत व्यापक है.

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