मंगलवार, 31 मार्च 2015

परम्परागत विवाह या...

मेरे एक मित्र ने कहा था कि "हिन्दुस्तान में नब्बे प्रतिशत संयुक्त परिवार इसलिए चल रहे हैं कि स्त्रियाँ 'सह' रही हैं, जिस दिन वे सहना छोड़ देंगी, परिवार भरभराकर ढह जायेंगे." उन्होंने उस मंदिर का जिक्र किया, जहाँ विधवा-विधुर और तलाकशुदा स्त्रियों और पुरुषों का विवाह करवाने के लिए उनके माता-पिता और सम्बन्धी नाम दर्ज कराते हैं. मुझे आश्चर्य हुआ कि ऐसी भी जगहें होती हैं. उन्होंने कहा कि वहाँ ज़्यादा संख्या तलाकशुदा लोगों की ही थी. और तलाक क्यों बढ़ रहे हैं उसका कारण भी उन्होंने यही दिया क्योंकि अब बहुत सी लड़कियाँ 'सह' नहीं रही हैं. पहले लड़कियाँ 'किसी भी तरह' निभाती रहती थीं, वैसे ही जैसे पिछली पीढ़ी संयुक्त परिवार की ज़िम्मेदारियाँ निभा रही है.

मैं मानती हूँ कि यह सच है कि स्त्रियाँ अब 'जैसे-तैसे' अपना गृहस्थ जीवन खींचना नहीं चाहतीं, जीना चाहती हैं. इसलिए उन्होंने 'लड़की की मायके से डोली उठती है और ससुराल से अर्थी' वाली कहावत को मानने से इंकार कर दिया है. लेकिन कितने प्रतिशत लड़कियों ने? यह सोचने की बात है.

तलाक सिर्फ इसलिए नहीं हो रहे कि लड़कियों ने सहना छोड़ दिया है, बल्कि इसलिए भी कि परम्परागत विवाह (अरेंज्ड मैरिज) की प्रक्रिया ही सिरे से बकवास है. मेरी एक मित्र जो कि राज्य प्रशासनिक सेवा की ऑफिसर है, कई लड़कों को 'देख' चुकी है '(मिलना' शब्द यहाँ किसी भी तरह उपयुक्त लग ही नहीं रहा है) लेकिन वह समझ ही नहीं पाती कि एक-दो या ज़्यादा से ज़्यादा तीन घंटे की देखन-दिखाई, वह भी परिवार वालों के बीच किसी व्यक्ति को जीवनसाथी के रूप में परखने में किस प्रकार सहायक हो सकती है? यहाँ लड़का-लड़की दोनों का अहं भी आ जाता है. यदि वे बात करें और सामने वाले ने उसके बाद मना कर दिया तो उनकी तो बेइज्जती हो जायेगी. यह भी बात है कि कहीं एकतरफा लगाव हो गया और सामने से अस्वीकार, तो?

एक नहीं, हज़ार बातें हैं. उस पर भी इतने झूठ बोले जाते हैं परम्परागत विवाह के लिए कि पूछिए मत. मेरे उन्हीं मित्र ने एक बात और कही कि न जाने कितने तलाक तो एक-दूसरे के झूठ खुलने की वजह से होते हैं. दोनों ओर से एक-दूसरे के बारे में खूब बढ़ा-चढ़ाकर बातें की जाती हैं, जिनमें से आधी झूठ होती हैं. देख-परखकर विवाह करना अच्छी बात है, लेकिन उसका अवकाश तो मिले. कम से कम थोड़ी देर के लिए तो अकेले में बात कर सकें. वैसे मेरे विचार से तो उन्हें कई दिन तक बात करनी चाहिए जिससे एक-दूसरे के बारे में गहराई से जान सकें...लेकिन यहाँ पर एक तो लड़का-लड़की का अहं और ठुकराए जाने का डर होता है दूसरे "झूठ बोलकर रिश्ता लगवाने वाले" उनको ऐसा नहीं करने देना चाहते. आश्चर्य है कि अपने देश में ऐसे कूढ़मगज आज भी हैं. माफ कीजियेगा ऐसा कहने के लिए, लेकिन जीवन भर के साथ के लिए इस तरह से शुरुआत मुझे बहुत हास्यास्पद लगती है.

वास्तवकिता यह है कि हममें से कुछ लोग किसी न किसी तरह से जल्द से जल्द अपने बच्चों की शादी कर देना चाहते हैं बस. ये बात लड़के-लड़की दोनों के लिए एक जैसी है. अरेंज्ड शादियों में इतना अवकाश नहीं होता कि एक-दूसरे को ठीक से जान-समझ सकें. प्रेम विवाह में भी कभी-कभी पता नहीं चल पाता कि हम वास्तव में एक-दूसरे से प्रेम करते हैं या नहीं. लेकिन मेरे मित्र ने जिन लोगों का जिक्र किया था वे सभी अरेंज्ड यानि पारंपरिक विवाह के सताए हुए ही थे. माता-पिता ने बिना गहराई से जाँच-पड़ताल किये और बिना लड़का-लड़की को एक-दूसरे को समझने का मौका दिए विवाह कर दिया. जब वे दोनों वैवाहिक जीवन में मिले तो पाया कि वैसा कुछ भी नहीं था, जैसा उन्होंने सोचा था. फिर भी कोशिश की टूटे दिल और रिश्ते को बचाने की और जब निभाते-निभाते ऊब गए तो आखिर अलग होने का फैसला ले लिया. मित्र के मुताबिक़ कुछ शादियाँ छः महीनों में टूट गयीं.

मैं यह नहीं मानती कि विवाह जन्म-जन्मांतर का बंधन होते हैं, लेकिन किसी रिश्ते के टूटने पर दर्द तो होता ही है, गुस्सा और पछतावा भी होता है, खासकर के जब वह उस "तरीके" के अनुसार हुआ हो, जिसे हम भारतीय सबसे आदर्श विवाह मानते हैं- "शादी दो लोगों के बीच नहीं, दो परिवारों के बीच होती है" क्या कर पाते हैं परिवारवाले जब रिश्ता टूटता है तो? कुछ नहीं न? तो इसे इतना अनुल्लंघनीय क्यों बना दिया है उन्होंने? इसी को आदर्श विवाह क्यों मानते हैं? ये मान क्यों नहीं लेते कि इसमें खामियाँ हैं और यदि सुधार न हुआ तो इसी तरह से आपके बच्चे मानसिक संत्रास से गुजरते रहेंगे.

मेरे विचार से विवाह का निर्णय उन दोनों लोगों के लिए ही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है, जिन्हें एक-दूसरे के साथ जीवन बिताना है. इसलिए निर्णय भी उन्हीं को केन्द्र में रखकर लिया जाना चाहिए और सबसे बेहतर है कि निर्णय ही उन्हीं को लेने दिया जाय. ये बात माँ-बाप को बुरी लग सकती है, लेकिन बेहतर तो यही है. लड़का-लड़की को भी समझना चाहिए कि रात-दिन एक साथ रहकर ज़िंदगी उन्हें बाँटनी है, माँ-बाप को नहीं, इसलिए खुद निर्णय लें, भले ही इसके लिए माँ-बाप के विरुद्ध जाना पड़े. और बेशक, जब लगे कि नहीं निभनी है तो अलग हो जाएँ. कोई भी रिश्ता इतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता कि उसे निभाने के लिए आप अपनी ज़िंदगी नरक बना लीजिए.



रविवार, 22 मार्च 2015

बेदाद ए इश्क रूदाद ए शादी: एक पाठक की नज़र से

'बेदाद ए इश्क रुदाद ए शादी' पहले-पहल किताब का नाम बड़ा अजीब सा लगा था, लेकिन जब अशोक भाई ने फेसबुक पर शेयर किया कि किताब में बागी प्रेम विवाहों के आख्यान हैं, तो इसे पढ़ने के लिए मन उत्सुक हो उठा. पुस्तक मेले से लाने के बाद तीसरे दिन जब इसे पढ़ना शुरू किया तो एक बैठक में पढ़ गयी. जी हाँ, रात के दो बजे से सुबह के दस बजे तक पूरी किताब जैसे एक सांस में पढ़ डाली

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसमें प्रेम कहानियाँ थीं, लेकिन उससे भी अधिक इसलिए कि वास्तविक कहानियाँ थीं और उन्हीं की ज़ुबानी जिन्होंने निराशा के इस दौर में प्रेम किया और उसे शादी तक पहुँचाने का साहस भी. यहाँ यह सवाल उठ सकता है कि प्रेम तो प्रेम है, क्या ज़रूरी है कि उसका अंजाम शादी ही हो? क्या जिनकी शादी नहीं होती, उनका प्रेम सच्चा नहीं होता? हाँ, होता है. प्रेम किसी भी रूप में हो, सच्चा ही होता है. प्रेम का सम्मान करने वाले हर प्रेम को समान दृष्टि से देखते हैं. उनके लिए प्रेमी बस प्रेमी हैं, भले ही वे अंततः विवाह बंधन में बांध पाए हों या नहीं. लेकिन प्रेम सबका दुश्मन तभी बन जाता है, जब वह शादी के अंजाम तक पहुँचने की कोशिश करता है.

हमारे समाज में एक बेचारी 'शादी' पर ही तो पूरे समाज की जिम्मेदारियों का बोझ है. उसे पितृसत्ता को बनाए रखना है, ताकि संपत्ति और स्त्रियों की यौनिकता पर पुरुषों का नियंत्रण बरकरार रहे. उसे 'सामंतवाद' को बचाकर रखना है, ताकि धन-दौलत-बाहुबल-सत्ता आदि का दिखावा करने का अवसर उपलब्ध होता रहे. उसे 'जातिवाद' को भी जिंदा रखना है, ब्राह्मणवाद बचा रहे. उसे धर्म की भी रक्षा करनी है, ताकि साम्प्रदायिक ताकतें लोगों की अंधश्रद्धा को ईंधन बनाकर नफ़रत की आग जलाए रख सकें और उससे अपने हाथ सेंकते रहें. और अंततः उसे वर्ग-भेद बनाए रखने में भी सहयोग करना है क्योंकि शादी से सम्बन्धित सबसे प्रसिद्ध जुमला "शादी अपने बराबर वालों में ही होती है.”

इन सबसे इतर प्रेम ऊपर की किसी शर्त को मानने को तैयार नहीं, तो क्यों न दुश्मन हो जाए समाज उसका? चलो, प्रेम को तो माफ भी कर दिया जाय! याद रहे, हमारे समाज में अव्वल तो प्रेम करना नहीं चाहिए, हो गया तो कोई बात नहीं, पता नहीं चलना चाहिए (क्योंकि बद अच्छा, बदनाम बुरा) और मान लो पता भी चल गया, तो लड़कियों को नसीहत कि "उसे भूल समझकर भूल जाओ" और लड़कों को सीख कि "प्यार-व्यार तो ठीक, तुम एक क्या हज़ार करो, लेकिन वो लड़की इस घर की बहू नहीं बन सकती" प्रायः यह पितृसत्तात्मक परिवार के मुखिया का बड़े गर्व और धमकी भरे अंदाज़ में दिया हुआ हुक्म होता है.

तो सोचिये, इन हालात में प्रेम को शादी तक ले जाना कितनी बड़ी बात है. इसीलिये हमारे यहाँ शादी को प्रेम की परिणति या सफलता माना जाता है. प्रेम विवाह पितृसत्ता, सामंतवाद, वर्ग भेद, जातिवाद सबका दुश्मन है. प्रेम विवाह चाहे अंतरजातीय हो या स्वजातीय, चाहे एक धर्म में हो या अंतरधार्मिक, यह किसी न किसी स्तर पर कोई न कोई सामाजिक रूढ़ि तोड़ता है. 

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. प्रेम विवाह में असली परीक्षा तो गृहस्थ जीवन की शुरुआत के साथ शुरू होती है. मैंने इसके सम्बन्ध में इसी ब्लॉग पर एक लेख लिखा था- "प्रेम, प्रेम विवाह और पितृसत्ता".इस किताब की कुछ कहानियाँ इसी सच को सामने लाने की कोशिश करती हैं कि प्रेम विवाह को हमारे समाज में किस तरह से चुनौतियाँ झेलनी पड़ती हैं. एक ओर तो उन्हें घर-परिवार-समाज का विरोध झेलना पड़ता है, दूसरी ओर आपसी प्रेम को भी बचाए रखने की ज़िम्मेदारी होती है. सुमन केशरी, देवयानी भारद्वाज, प्रीती मोंगा, मसिजीवी और ममता की कहानियाँ शादी के बाद के संघर्षों को बयान करती हैं. इसमें से कुछ तो आपसी प्रेम को बचाए रखने के जद्दोजहद का वर्णन करती हैं और कुछ प्रेम विवाह के बाद लड़की द्वारा नए घर-परिवार में सामंजस्य की दास्तान.  

देवयानी जी ने जिस साहस और बेबाकी से अपने वैवाहिक जीवन के संघर्षों को चित्रित किया है, वह बेहद प्रभावी है. लेकिन यह तय है कि इस प्रकार ईमानदारी से अपने सम्बन्धों के अंतर्द्वंद्व को परखने का साहस वही लड़की कर सकती हो, जिसने अपने मनपसंद युवक से प्रेम किया और स्वयं विवाह का निर्णय लिया, उसे पूरी निष्ठा से निभाया और समस्याओं को सुलझाने के अथक प्रयास किये. और अंततः न सुलझ पाने पर कड़े निर्णय लेने की भी हिम्मत की

सुमन केशरी जी ने प्रेम के सामाजिक पहलुओं का विश्लेषण करते हुए अपनी कहानी को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखा है और प्रीती मोंगा ने यह बात स्पष्टता से कही कि यदि जीवन का एक निर्णय किसी कारणवश हमें गलत लगने लगता है, तो उसे बदलने में संकोच नहीं करना चाहिए

अमित कुमार श्रीवास्तव, विभावरी, नवीन रमण-पूनम, प्रज्ञा वर्षा सिंह, रूपा सिंह, किशोर दिवसे, राजुल तिवारी, मोहित खान और शकील अहमद खान आदि सभी की कहानियाँ प्रेम और उसे शादी के परिणाम तक पहुँचाने के संघर्ष की कहानियाँ हैं. इनमें से कुछ कहानियाँ बेहद रूमानी हैं तो कुछ सीधे-सीधे समाज को चुनौती देती हुयी.

यहाँ यह बता देना उचित होगा कि यह किताब मात्र प्रेम कहानियों का संग्रह नहीं. इसमें संकलित कई प्रेम कहानियाँ अपने-अपने ढंग से प्रेम के साथ-साथ समाज और उसके ताने-बाने की भी निर्ममता से जाँच-पड़ताल करती हैं. इसी के साथ संपादक द्वय -नीलिमा चौहान और अशोक कुमार पाण्डेय के लेख प्रेम के समाजशास्त्रीय आयाम और प्रभावों का विश्लेषण करते चलते हैं और सुजाता का लेख अनुभव और अध्ययन से उपजा एक दस्तावेजी बयान है.

मैंने इस लेख में बहुत ज़्यादा विस्तार इसलिए नहीं किया क्योंकि पहली बात, मैं कोई आलोचक या पुस्तक समीक्षक नहीं, जो तटस्थ भाव से समीक्षा कर सकूँ. मैंने जो लिखा एक पाठक की दृष्टि से लिखा. दूसरी बात, किताब के बारे में अधिक लिखकर मैं इसे पढ़ने का मज़ा किरकिरा नहीं करना चाहती. लेकिन मैं कहना चाहूँगी कि हाल ही में पढ़ी गयी कई पुस्तकों में से इस पुस्तक ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया. जैसा कि नीलिमा जी ने पुस्तक की भूमिका में कहा है कि ये सिर्फ प्रेम कहानियाँ नहीं, बल्कि समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए उपयोगी सामग्री भी है, मैं भी यह मानती हूँ कि साहित्य के अनुरागी पाठकों के साथ-साथ सामाजिक विषयों के अध्येताओं को भी यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए.

शनिवार, 14 मार्च 2015

भारतीय समाज और लिंग-जाति की अन्तःसम्बद्धता (1)



प्राचीनकाल में धर्मशास्त्रों में संकलित हिन्दू विधियाँ आज भी उनके सामाजिक जीवन को प्रभावित करती हैं। यद्यपि जनसाधारण इन स्मृतियों के सम्पूर्ण अध्ययन से दूर ही रहा है, तथापि परम्परा से इनके नियमों का पालन करता रहा है। अतः वर्तमान हिन्दू समाज को जटिल संरचना को समझने के लिए धर्मशास्त्रों का ज्ञान अपेक्षित है। 

भारतीय परम्परा में स्मृतियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है. स्मृतियाँ इतिहास को जानने का महत्वपूर्ण-स्रोत तो हैं ही, विश्व के प्राचीनतम अभिलेख होने के कारण भी अत्यधिक मूल्यवान हैं. स्मृति शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है-  एक अर्थ में यह वेद-वाङ्मय से इतर ग्रन्थों से सम्बन्धित है तथा संकीर्ण अर्थ में स्मृति तथा धर्मशास्त्र एक हैं. स्मृतियों के प्रतिपाद्य विषय अत्यधिक विस्तृत हैं. समाज और व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक पक्ष से सम्बन्धित प्रावधान इनमें उपस्थित हैं. इन प्रावधानों ने भारतीय समाज पर अत्यधिक गहन और बहुपक्षीय प्रभाव डाला है. इन्होंने एक ओर लोकमानस के दैनिक कार्यकलाप से लेकर सम्पूर्ण जीवन के विषय में आचार-संहिता का कार्य किया, दूसरी ओर भारतीय समाज की संरचना में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अतः वर्तमान हिंदू समाज की जटिल और स्तरीकृत संरचना को समझने के लिए स्मृतियों का अध्ययन आवश्यक है.

स्मृतियों में वर्णाश्रम-व्यवस्था, संस्कार, सामाजिक कार्यकलाप, दण्ड, दायभाग आदि के प्रसंग में शूद्रों तथा स्त्रियों के लिए विशेष प्रावधान किये गए हैं. इन सभी प्रावधानों में वर्ण-व्यवस्था एक ऐसा प्रावधान है, जिसने भारतीय समाज को एक स्तरीकृत रूप दिया. वर्ण-व्यवस्था ने ही क्रमशः जाति-व्यवस्था का रूप लेकर सामाजिक संरचना को और भी जटिल स्वरूप प्रदान किया. जाति-व्यवस्था, भारत की सामाजिक व्यवस्था में पृथक्करण और स्तरीकृत का सबसे प्रभावशाली और निर्णायक तत्व है. इस व्यवस्था की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस समाज के व्यक्तियों के जीवन का प्रत्येक क्षेत्र इससे प्रभावित और निर्धारित होता है. समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए एक जाति निर्धारित है, जिसका समाज की पदसोपानीय व्यवस्था में अपना एक अलग सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक स्थान है.

प्राचीनकाल से ही स्त्रियाँ जाति आधारित भारतीय समाज की सबसे अधिक प्रभावित और कमज़ोर सदस्य हैं. जाति-व्यवस्था के फलस्वरूप उत्पन्न इस पिरामिडीय व्यवस्था के सबसे ऊपर के स्तर पर ब्राह्मण पुरुष स्थित होता है तथा सबसे निचली सीढ़ी पर शूद्र स्त्री. जहाँ सामान्य जातियों की स्त्रियाँ आतंरिक (पारिवारिक) शोषण और लिंगगत भेदभाव की शिकार होती हैं, वहीं शूद्र तथा अन्य पिछड़ी जाति की औरतें जाति, वर्ग, धर्म आदि से सम्बन्धित बहुकोणीय तथा बहुपक्षीय दबावों को झेलती हैं

इस बात के ऐतिहासिक साक्ष्य उपस्थित हैं कि वैदिक काल में स्त्रियों को पुरुषों के ही समान यज्ञोपवीत संस्कार एवं वेदाध्ययन का अधिकार था. वर्ण-व्यवस्था उस युग में उतनी कठोर नहीं थी, जितनी कि धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों में वर्णित है. किन्तु इतना स्पष्ट है कि शूद्र तथा स्त्री दोनों ही वर्गों के लिए वेदों का अध्ययन कालान्तर में निषिद्ध हो गया. धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों में यह निषेध स्पष्ट है. यज्ञोपवीत संस्कार वेदाध्ययन तथा औपचारिक शिक्षा-दीक्षा के लिए अनिवार्य संस्कार था. इसे निषिद्ध करने के कारण जहाँ एक ओर स्त्री तथा शूद्र शिक्षा से दूर होते गए, वहीं दूसरी ओर उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा का भी ह्रास होता गयाइसके अतिरिक्त और भी अनेक प्रावधान हैं, जो इन दोनों ही वर्गों को समाज के हाशिए पर धकेलने के लिए उत्तरदायी हैं

यदि हम वर्तमान भारतीय सामाजिक संरचना पर दृष्टि डालें, तो हमें स्तरीकरण के विभिन्न रूप दिखाई देंगे, जिनमें ‘लिंग’ एवं ‘जाति’ प्रमुख हैं. स्तरीकरण तथा विभेदीकरण के ये रूप आपस में इस प्रकार संबद्ध हैं कि ये शोषण के कई रूप उत्पन्न करते हैं. जाति और लिंग की इस अन्तः संबद्धता (Intersection) के फलस्वरूप तीन शोषित वर्ग अस्तित्व में आते हैं-सवर्ण स्त्री, दलित पुरुष तथा दलित स्त्री.

कुछ दशक पहले तक समाजशास्त्री यह मानते थे कि जाति और लिंग दो भिन्न-भिन्न अवधारणाएँ हैं. जाति समाजशास्त्र के अध्ययन का विषय है और जेंडर का अध्ययन नारीवादियों का विषय है. यह समझा जाता था कि दलित वर्ग की समस्याएँ ‘जाति’ के अध्ययन से समझी जा सकती हैं, चाहे वह दलित स्त्री हो या दलित पुरुष. इसी प्रकार स्त्री मात्र की समस्याएँ ‘लिंग-सम्बन्धी अध्ययन’ (gender study) के अध्ययन से सुलझ जायेंगी, चाहे वह सवर्ण स्त्री हो अथवा दलित स्त्री. लेकिन समस्या यह होती थी कि ‘दलित स्त्री’ की समस्याओं के अध्ययन के लिए अलग से कोई सिद्धांत विकसित न होने के कारण उनकी समस्याओं को समझने और उन्हें सुलझाने में विचारकों, सिद्धांतकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को कठिनाई होती थी

विगत कुछ दशकों में समाज में हुए सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तनों के कारण यह माना जाने लगा है कि जाति और लिंग एक-दूसरे से गहन रूप से अन्तः संबद्ध हैं और इसका मूल धर्मशास्त्र, विशेषतः स्मृतियों के प्रावधानों में निहित है. एक शूद्र स्त्री के ऊपर स्मृतियों के शूद्र-सम्बन्धी प्रावधान भी लागू होते हैं और स्त्री-सम्बन्धी प्रावधान भी. इसका प्रभाव वर्तमान काल तक दिखता है. इसके कारण दलित स्त्री की समस्याएँ दलित होने के कारण भी हैं और स्त्री होने के कारण भी

अन्तः संबद्धता की अवधारणा ने भी भारतीय समाज की जाति-लिंग संबद्धता के अध्ययन की ओर सिद्धांतकारों और शोध-कर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया. यह सामाजिक नारीवादी सिद्धांत तब सामने आया, जब पश्चिम की रेडिकल नारीवादियों के एक वर्ग ने इस बात पर ध्यान देना शुरू किया कि परम्परागत पश्चिमी नारीवाद ने उनकी समस्याओं को ठीक प्रकार से नहीं समझा है. उनके अनुसार यह समझ सिरे से गलत है कि श्वेत महिलाओं और अश्वेत महिलाओं के अनुभव, परिस्थितियाँ और समस्याएँ एक समान हैं. इन नारीवादियों ने यह माना कि अश्वेत नारियों का शोषण सिर्फ ‘स्त्री’ होने के नाते ही नहीं होता, बल्कि उसके पीछे अनेक अन्य कारक जैसे- रंग, वर्ग आदि भी होते हैं. और शोषण के ये सभी कारक आपस में अन्तः सम्बद्ध हैं. भारतीय नारीवादियों ने अन्तः संबद्धता की इस अवधारणा को अपनाया और उसे दलित स्त्रियों की समस्याओं के अध्ययन में उपयोग करना आरम्भ किया.