शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

पितृसत्ता :एक अवलोकन

पितृसत्ता का तात्पर्य आमतौर पर पुरुष-प्रधान समाज से लिया जाता है,जिसमें सम्पत्ति का उत्तराधिकार पिता से पुत्र को प्राप्त होता है. परन्तु नारीवादी दृष्टि से पितृसत्ता की अवधारणा अत्यन्त व्यापक है. यह मात्र पुरुषों के वर्चस्व से सम्बन्धित नहीं है, अपितु इसका सम्बन्ध उस सामाजिक ढाँचे से है, जिसके अन्तर्गत सत्ता सदैव शक्तिशाली के हाथ में होती है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष. इस प्रकार पितृसत्तात्मक विचारधारा स्त्री और पुरुष दोनों को प्रभावित करती है.
पितृसत्ता के इस अर्थ को समझ लेने पर हम उस आक्षेप का स्पष्टीकरण दे सकते हैं,जिसके अनुसार कहा जाता है "नारी ही नारी की दुश्मन होती है." इस सन्दर्भ में ग़ौर करने लायक बात यह है कि कोई भी सीधी-सादी और कमज़ोर स्त्री दूसरी स्त्री पर अत्याचार नहीं करती. ऐसा करने वाली स्त्रियाँ पितृसत्तात्मक विचारधारा से प्रभावित होती हैं, वे ख़ुद को श्रेष्ठ समझती हैं और दूसरी औरतों को नीचा दिखाने की कोशिश करती हैं.
हमारे समाज को ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज कहा जाता है क्योंकि यहाँ जाति-व्यवस्था समाज के ढाँचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो कि भारतीय समाज को एक पद-सोपानीय स्वरूप प्रदान करता है. इस क्रम में सवर्ण पुरुष सबसे ऊपर के पायदान पर स्थित होता है और दलित स्त्री सबसे निचले क्रम पर.
पितृसत्तात्मक व्यवस्था की यह महत्वपूर्ण विशेषता है कि यह समाज के प्रत्येक सदस्य को एक समान न मानकर ऊँचा या नीचा स्थान प्रदान करती है. इस प्रकार पितृसत्तात्मक व्यवस्था लोकतान्त्रिक मूल्यों के सर्वथा विपरीत है, जिसमें जाति, लिंग, वर्ण, वर्ग, धर्म आदि के भेद से ऊपर "एक व्यक्ति, एक मत" के सिद्धांत को अपनाकर मानवीय गरिमा को सर्वोपरि माना गया है. पितृसत्ता को पहचानकर उसका गहराई से विश्लेषण करना तथा उसका सही स्वरूप सामने लाना नारीवादी आन्दोलन का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है.

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

नारीवाद और नारी-सशक्तीकरण

नारीवाद और नारीसशक्तीकरण एक-दूसरे से भिन्न अवश्य हैं, परन्तु विरोधी नहीं। नारीवाद एक दर्शन है,जिसका उद्देश्य है-समाज में नारी की विशेष स्थिति के कारणों का पता लगाना और उसकी बेहतरी के लिये वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करना, जबकि महिला-सशक्तीकरण एक आन्दोलन है,एक कार्य-योजना है,एक प्रक्रिया है,जिसे मुख्यत: सरकार और गैरसरकारी संगठन करते हैं।
नारीवाद चूँकि नारी की समस्याओं का अध्ययन है,इसलिये यह तब तक अप्रसांगिक नहीं हो सकता जब तक कि समाज में नारी और पुरुष एक बराबर की स्थिति में न आ जाएं। women studies में हम दोनों का ही अध्ययन करते हैं- सिद्धांतों का भी और उसके अनुप्रयोगों का भी.
अब प्रश्न उठता है नारीवाद के प्रासंगिक या अप्रासंगिक होने का। नारी-सशक्तीकरण इस समय प्रमुख उद्देश्य है,इस से सभी सहमत हैं,परन्तु सशक्तीकरण की आवश्यकता क्यों है ? इसीलिये क्योंकि नारी अशक्त है। परन्तु नारी अशक्त क्यों और किस तरह है, इसका जवाब नारीवाद ही दे सकता है। नारीवाद ही बता सकता है कि किस समाज में नारी-सशक्तीकरण के कौन-कौन से तरीके या रणनीति अपनानी चाहिये। पर, अफ़सोस अभी हमारे समाज में बहुत से लोग यह मानते ही नहीं कि महिलाओं की स्थिति दोयम दर्ज़े की है। महिलायें किसी भी मामले में पुरुषों से कम नहीं हैं,परन्तु उन्हें अवसरों से वन्चित कर दिया जाता है-नारीवाद ऐसी परिस्थितियों के विषय में बताता है और उस दिशा में प्रयास करने का कार्य ही नारी-सशक्तीकरण कहलाता है।

रविवार, 12 अप्रैल 2009

सेक्स और जेंडर में अन्तर

नारीवाद का सबसे बड़ा योगदान है "सेक्स" और "जेन्डर" में भेद स्थापित करना . सेक्स एक जैविक शब्दावली है ,जो स्त्री और पुरुष में जैविक भेद को प्रदर्शित करती है . वहीं जेन्डर शब्द स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक भेदभाव को दिखाता है . जेन्डर शब्द इस बात की ओर इशारा करता है कि जैविक भेद के अतिरिक्त जितने भी भेद दिखते हैं,वे प्राकृतिक न होकर समाज द्वारा बनाये गये हैं और इसी में यह बात भी सम्मिलित है कि अगर यह भेद बनाया हुआ है तो दूर भी किया जा सकता है . समाज में स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव के पीछे पूरी सामाजीकरण की प्रक्रिया है,जिसके तहत बचपन से ही बालक-बालिका का अलग-अलग ढंग से पालन-पोषण किया जाता है और यह फ़र्क कोई भी अपने आसपास देख सकता है . लड़कियों को घर के अन्दर का कामकाज अच्छी तरह सिखाया जाता है,जबकि लड़कों को बाहर का . लड़्कियों को दयालु, कोमल, सेवाभाव रखने वाली और घरेलू समझा जाता है और लड़कों को मजबूत,ताकतवर, सख्त और वीर समझा जाता है .हालाँकि अब स्थिति में थोड़ा सुधार आया है पर हर जगह नहीं और हर स्तर पर नहीं .यह नहीं कहा जा सकता कि किसी तरह के किसी काम में कोई बुराई है पर काम के इस वर्गीकरण से बहुत सी लड़कियों की प्रतिभा दबी रह जाती है और बहुत से लड़के मानसिक विकृतियों के शिकार हो जाते हैं .यह सुनने में अटपटा लग सकता है,पर सामान्यतया छोटे लड़कों को यह कहकर चुप कराते हैं कि मर्दों को रोना नहीं चाहिये,हम उनसे भावनात्मक बातें नहीं करते ,जिससे वे अन्दर ही अन्दर घुटते रहते हैं . कुछ लड़के बहुत भावुक होते हैं और अक्सर अपनी बात कहकर इसलिये रो नहीं पाते कि लोग उन्हें चिढाएंगे . कुल मिलाकर, जेन्डर-आधारित भेदभाव न सिर्फ़ औरतों को, बल्कि पुरुषों को भी एक बने-बनाये ढाँचे में जीवन जीने के लिये मजबूर कर देता है.

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

नारीवाद का मतलब

ऑरकुट पर नारीवाद से सम्बंधित कम्युनिटी ढूँढते हुए मैंने नारीवाद-विरोधी कम्युनिटी भी देखीं .कुछ ऐसी भी हैं जिनका कहना है की वे feminists से नफरत करते हैं पर humanists से प्यार करते हैं .वैसे ,इस democratic देश में सभी को अपनी पसंद और विचार जाहिर करने का अधिकार है ,पर मैंने देखा है कि जो लोग जिसके बारे में नहीं जानते ,वे ही सबसे अधिक विरोध करते हैं .नारीवाद की ना कभी पुरुषों से दुश्मनी रही है और ना ही मानववाद से . तो जब कोई यह कह रहा होता है कि वह नारीवाद को इसलिए पसंद नहीं करता कि वह पुरुषों का विरोधी है ,तो वह अपने इस विषय में कम ज्ञान को दिखा रहा होता है .नारीवाद एक ऐसा सिद्धांत है जो समाज के उस पक्ष को प्रस्तुत करता है ,जहाँ सदियों से औरत को दूसरे स्थान पर रखा गया .अब लोग यह भी कह सकते हैं की हमारे देश में कभी नारी की पूजा होती थी ,यह बात भी पूरी तरह सच नहीं है ,इसके विषय में भी किसी को अच्छी तरह पढ़ के ही बोलना चाहिए .anti-feminism आज-कल उसी तरह fashion हो गया है ,जैसे किसी समय feminism का था .पर किसी भी विचार का समर्थन या विरोध करते समय कम से कम उसका कुछ ज्ञान तो होना ही चाहिए और मेरे विचार से एक बार नारीवाद को जान लेने के बाद कोई उसका विरोध नहीं करेगा , सहमत भले ही ना हो .

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

संदेश

जब मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था ,तो सोचा था कि सिर्फ़ कवितायें ही लिखूंगी .पर मुझे लगने लगा कि कविताओं में अपनी भावनाएँ तो सुन्दरता से अभिव्यक्त की जा सकती हैं ,पर विचार नहीं .तो मैंने यह नया ब्लॉग शुरू किया .इसके माध्यम से मैं अपने विचारों को अपने ब्लॉग-जगत के साथियों तक पहुँचाना चाहूँगी .मैं चाहूँगी की यह ब्लॉग नारी मुद्दों से सरोकार रखने वालों के लिए एक मंच का काम करे .मैं इस ब्लॉग को अन्य नारी सम्बन्धी ब्लॉग से जोड़ने का प्रयास भी करुँगी .मैं कुछ प्रश्न उठाऊंगी और अपने साथियों से अपेक्षा करुँगी कि वे इसका उत्तर बेहिचक दें।
Posted on 4/02/2009 11:47:00 am | Categories: