रविवार, 3 जनवरी 2010

स्त्रीलिंग-पुल्लिंग विवाद के व्यापक संदर्भ

स्त्रीलिंग-पुल्लिंग विवाद भले ही सबको निरर्थक बहस लगती हो, परन्तु नारीवादी आन्दोलन में भाषा के इस विवाद के व्यापक मायने हैं. जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे समाज में स्त्री-पुरुष के कार्यक्षेत्र तय थे और इसी अनुसार भाषा भी विकसित होती गयी. भाषा लोकानुगामिनी होती है. जो शब्द प्रचलन में होते हैं वे भाषा का अंग बन जाते हैं और इस प्रकार भाषा हमारे समाज की मनोवृत्ति को दर्शाती है. समाज में चूँकि घर के अन्दर के कार्य औरतें करती हैं, इसलिये "गृहिणी" शब्द स्त्रीलिंग है और बाहर का कार्य पुरुष करते हैं, इसलिये समाज के सभी महत्त्वपूर्ण पदों से सम्बन्धित शब्द पुल्लिंग है.
    जब नारीवादी आन्दोलन ने सर्वप्रथम यह प्रश्न उठाया था कि अधिकतर माहत्त्वपूर्ण शब्द पुल्लिंग क्यों हैं? तब उनका अभिप्राय था कि ये शब्द "जेंडर न्यूट्रल" होने चाहिये. इसका सबसे प्रासंगिक उदाहरण "राष्ट्रपति" शब्द है, जो पूरी तरह से पुल्लिंग है. विडम्बना यह है कि हमारा संविधान अंग्रेजी में लिखा गया, जिसमें "प्रेसिडेंट" शब्द जेंडर न्यूट्रल है. जब हमारे देश के विद्वान अनुवादकों ने संविधान का हिन्दी अनुवाद किया तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि राष्ट्र की प्रमुख कभी कोई महिला भी हो सकती है और आज जब महिला राष्ट्रपति बन गयी हैं, तो उनके साथ राष्ट्रपति शब्द कितना अटपटा लगता है, ये तो सभी जानते हैं.
    यहाँ मैं स्पष्ट करना चाहती हूँ कि इस संदर्भ में नारीवादियों की माँग क्या थी. उनका यह मतलब नहीं था कि प्रत्येक पुल्लिंग शब्द का स्त्रीलिंग शब्द भी होना चाहिये, बल्कि उनका अभिप्राय था कि महत्त्वपूर्ण पदों और कार्यों से सम्बन्धित शब्द ऐसे होने चाहिये जो कि अधिक व्यापक अर्थ वाले और अधिक समावेशी हों. इसीलिये "न्यूट्रल जेंडर" नहीं "जेंडर न्यूट्रल" कहा जाता है. न्यूट्रल जेंडर शब्द नकारात्मक है जिसका अर्थ है- न स्त्रीलिंग और न ही पुल्लिंग (नपुंसकलिंग). जबकि जेंडर न्यूट्रल सकारात्मक है जो कि स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और ट्रान्स जेंडर को भी समावेशित करता है.
     नारीवादियों की इस माँग का ही परिणाम है कि अब अधिकतर लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण शब्द जेंडर न्यूट्रल हो गये हैं. अब चेयरमैन, कैमरामैन में मैन के स्थान पर "पर्सन" शब्द प्रयुक्त होता है. न्यूज़रीडर, एंकर, जर्नलिस्ट आदि जेंडर न्यूट्रल शब्द हैं. बेशक ये शब्द अंग्रेजी के हैं. हिन्दी में अब भी एक कार्य के लिये स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का भेद बना हुआ है, जिससे कभी-कभी असुविधाजनक स्थिति उत्पन्न हो जाती है. इसकी ज़िम्मेदारी हम पर है कि हम अधिकतर जेंडर न्यूट्रल भाषा का प्रयोग करें. इसका बहुत अच्छा उदाहरण एन.सी.ई.आर.टी. की पुस्तके हैं, जिनमें किसान और मजदूरों के विषय में भी महिलाओं का उदाहरण दिया जाता है. यदि आप दस साल पहले और अब की पुस्तकों की तुलना करें तो आपको अन्तर स्पष्ट पता चलेगा.
     संक्षेप में, मेरा कहना है कि हमें ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिये जो अधिक से अधिक समावेशी हो. व्यावहारिक दिक्कतों से बचने के लिये उन शब्दों के आगे महिला या पुरुष लगाकर काम चलाया जा सकता है. या ऐसे शब्द प्रयुक्त हों जिनका स्त्रीलिंग शब्द उचित और व्यावहारिक हों जिससे कि "राष्ट्रपति" शब्द जैसी स्थिति न उत्पन्न हो. वैसे, मैं भी यह मानती हूँ कि ये प्रश्न उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि अन्य मुद्दे, परन्तु अब भी यह नारीवाद के अनेक सैद्धान्तिक मुद्दों में से एक है.

7 टिप्‍पणियां:

  1. एक समस्या यह भी है कि हिन्दी में शब्द या तो स्त्रीलिंग हैं या पुर्लिंग। वहाँ नपुंसकलिंग या द्विलिंगी या लिंगविहीन आप जो भी कहें शब्द हैं ही नहीं। हाँ अनेक शब्दों का प्रयोग अब हम उस रूप में जरूर करते हैं। जैसे आप, तुम शब्द जो बोलचाल में काम आते हैं दोनों के लिए संबोधन बन जाते हैं। अदालती आवेदनों में प्रार्थी यदि कोई महिला होती है तो प्रार्थिया या प्रार्थिनी प्रतिपक्षी होती है तो उसे प्रतिपक्षिनी लिखा जाता है लेकिन मैं पिछले दस वर्षों से भी अधिक समय से प्रार्थी और प्रतिपक्षी शब्द का ही प्रयोग करता हूँ।
    प्रथम पंक्ति में ही लिखते हैं। प्रार्थी निवेदन करती है। यहाँ करती शब्द से अभिप्राय स्पष्ट हो जाता है। लेकिन यह हिन्दी भाषा के व्याकरण से छेड़छाड़ भी है जिस में शब्दों के इस प्रकार का उपयोग वर्जित हैं अथवा प्रचलन में नहीं है। पर कभी मैं सोचता हूँ कि भाषाएँ तो प्रचलन से विकसित होती हैं। यदि हम शब्दों का उपयोग इस तरह करते रहें तो व्याकरण में नया अध्याय जोड़ना पड़े। हाँ यह भी हो सकता है कि कुछ शब्द हो सकते हैं जो स्त्रीलिंग और पुर्लिंग दोनों का ही बोध कराते हों। उपयोग के अनुसार उन का लिंग तय होता हो। फिर उन की तीसरी श्रेणी बनानी पड़ेगी। इस तरह यह समस्या नारीवाद की नहीं अपितु भाषा की है।

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  2. इस मुद्दे से दीगर इस वक्त एक जरुरी मुद्दा है कि हिन्दी का विकास हो.



    ’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

    -त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

    नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

    कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

    -सादर,
    समीर लाल ’समीर’

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  3. आपने विषय का अच्छा प्रवर्तन किया और दिनेश जी ने सार्थक टिप्पणी ...
    जेंडर न्यूट्रल शब्द ही शिष्टता की मांग भी हैं -
    क्या राष्ट्रपति के स्थान पर राष्ट्राध्यक्ष नहीं हो सकता था /सकता ! अब भी !

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  4. the main question is why every woman who wants to talk about woman rights is called naarivadi
    the question is if the root cause is the wrong selection of words lets try to change the words
    the question is ARE WE AUTHORIZED TO CHANGE A WORD THAT ORIGINATED IN ENGLISH AS "BLOGGER" AND THEN TRY TO FIND A STRILING WORD FOR IT .

    who gives us an right to insult a language and hijack a word for the mere pleasure and then when someone raises the voice against it say we were doing it for fun

    why woman orinted issues even the choice of words is fun mukti

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  5. main smeer lal jee se shmt hun,is vishy pr charcha bahut ho chukee ab viram hona chahiye.sadar ...

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  6. " भाषा लोकानुगामिनी होती है"

    शायद इसमे ही आपके प्रश्न का जवाब छुपा है .

    अंग्रेजी शब्दकोशों में हिन्दी के शब्दों का भी समानुवेश हुआ है .

    भाषा में मुद्दा लिंगभेद से आगे बढ़कर सरलता का होना चाहिए

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बहस चलती रहे, बात निकलती रहे...