सोमवार, 4 मई 2009

मेरे कुछ सवाल...जवाब कौन देगा?

मेरा पालन-पोषण बचपन से ही लड़कों की तरह हुआ था. मैं अपने भाई से सिर्फ़ एक साल बड़ी हूँ. मेरे घर में हम दोनों के लिये एक जैसी चीज़ें आती थीं. मुझे कभी नहीं लगा कि मैं उससे किसी भी मामले में अलग हूँ. पढ़ने-लिखने में उससे ज़्यादा तेज थी, इसलिये मेरे पिताजी मेहमानों के सामने मेरी बडा़ई करते थे. मैं उनकी दुलारी बिटिया थी. पर धीरे-धीरे मेरे बड़े होने के साथ ही चीज़ें बदलने लगीं. माँ मुझे लड़कों के साथ खेलने के लिये मना करने लगी. मेरा भाई शाम को देर से खेलकर घर आता था, पर मेरा बाहर आना-जाना बन्द हो गया. हम पढ़ने गाड़ी(ट्रेन) से आते-जाते थे. गाड़ी में अनचाहे स्पर्शों का सामना करना पड़ता था. मेरा भाई भीड़ में भी घुसकर बैठ जाता था और मैं किनारे बच-बचाकर खड़ी रहती थी .जिन लड़कियों को बस या ट्रेन से दैनिक यात्रा करनी पड़ती है ,उन्हें पता है कि कैसे गन्दे अनुभवों से गुज़रना पड़ता है. उफ़... धीरे-धीरे पता चला कि मैं अपने भाई जैसी नहीं हूँ, मैं उससे अलग कोई और ही "जीव" हूँ, जिसे जब चाहे छेड़ा जा सकता है, जैसे चिड़ियाघर में बन्द जानवरों को कुछ कुत्सित मानसिकता वाले लोग छेड़ते हैं. जब भी मेरे साथ ऐसी कोई घटना होती मुझे लगता कि मेरे अन्दर ही कोई कमी है ,मेरे शरीर में कुछ ऐसा है जो लोगों को आकर्षित करता है .ऐसी बातें सोचकर मैं अपने शरीर को लेकर हीनभावना का शिकार हो गयी. मैं अपनी लम्बाई के कारण उम्र से बड़ी दिखने लगी थी, इसलिये मैं झुककर चलने लगी. मैं अपने उन अंगों को छिपाने लगी जो मुझे मेरे लड़की होने का एहसास कराते थे. इस तरह एक लड़की जो बचपन में तेज-तर्रार और हँसमुख थी ,एक गंभीर, चुप ,डरी-डरी सी लड़की बन गयी. स्नातक की पढाई करने के लिये जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय आई और हास्टल में रहने लगी तब अन्य लड़कियों से बात करके पता चला कि छेड़छाड़ की समस्या सिर्फ़ मेरी ही नहीं थी. हर लड़की कभी न कभी इस कड़वे अनुभव से गुज़र चुकी है. ...अब सवाल यह है कि इस अप्रिय परिस्थिति का ज़िम्मेदार कौन है- मेरे परिवार वाले, हर लड़की के परिवार वाले या समाज........और... इसका जवाब कौन देगा या किसे देना चाहिये... क्या आप जवाब देंगे... कोशिश कीजिये ... नहीं तो मैं ही जवाब दूँगी... इसी ब्लोग पर.

7 टिप्‍पणियां:

  1. छेडछाड एक मानसिक समस्‍या है, जिसके बारे में मानसिक चिकित्‍सक ही बेहतर बता सकते हैं।

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    SBAI TSALIIM

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  2. जब तक पूरे समाज की सोच नही बदलेगी,ये समस्या तो रहेगी ही।फ़िर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है.........

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  3. बढ़िया प्रस्तुति के लिए बधाई ! जहा तक छेड़ छाड़ वाली बात है इसके बारे में इतना ही कहूँगा ... छोडिये कभी और...

    अगले लेख का इन्तेराज रहेगा...

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  4. आपके ब्लोग पर आज मैं पहली बार आया और विश्वास करें अचंभित हूँ आपकी लेखन विधि से। आपने मुद्दा बहुत ही पेचिदा उठाया है और मामला गंभीर है। लेकिन आप के लेख से पता चलता है कि आप साहसिक है। आप आगे बढे़ और इन सब बातो पर ज्यादा ध्यान ना दें।

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. छेड़छाड़ सचमुच एक मानसिक विसंगति है। जिसका उत्तर मनोविज्ञान बेहतर रूप से दे सकता है। किन्तु हमारा समाज भी इसके लिए जिम्मेदार है जिसने प्राचीनतम काल से ही दोहरी मानसिकता रखी और हमें इस मोड़ पर लाकर खड़ा किया जहाँ एक लड़के और लड़की में भेद उसकी भ्रूणावस्था से ही शुरू हो जाता है। हमारी कंडीशनिंग कुछ इस तरह से हो चुकी है की हमें बदलने में अब शायद उतना ही समय लगे जितना हमें यहाँ तक आने में लगा है।

    आपके ब्लॉग को पढ़कर अत्यंत हर्ष हुआ और प्रेरणा भी मिली। शुभकामनाएं! आपको आपका लक्ष्य प्राप्त हो।

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बहस चलती रहे, बात निकलती रहे...