सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

स्त्री की स्वतंत्रता : दूबे की पोस्ट का जवाब

आमतौर पर मैं किसी के ब्लॉगपोस्ट के प्रत्युत्तर में कुछ कहती नहीं पर ये लेख मैं दूबे जी की पोस्ट के जवाब में लिख रही हूँ. सबसे पहले मैं उनको ये सलाह देना चाहुँगी कि वे महिला संगठनों के बारे में लिखने से पहले कुछ जानकारी जुटा लेते तो अच्छा होता. सबसे पहले मैं उनकी महिला "शरीर के बाज़ारीकरण" की बात का जवाब देना चाहती हूँ. जब हम बाज़ार में महिलाओं के शरीर की नुमाइश के बारे में बात करते हैं तो दोष महिलाओं को देते हैं. हम ये भूल जाते हैं कि लगभग सभी बड़ी विज्ञापन कम्पनियों पर पुरुषों का कब्ज़ा है. हम बात करते हैं कि क्यों कोई महिला संगठन इसका विरोध क्यों नहीं करता? मैं ये पूछती हूँ कि किस संगठन ने इसका समर्थन किया है, बल्कि बहुत बार महिला संगठनों ने इस बात का जोर-शोर से विरोध किया है. पर ये बात तो सभी जानते हैं कि बाज़ार किसी की नहीं सुनता. न सरकार की, न जनता की, न संगठनों की. वह सुनता है तो सिर्फ़ पैसे वालों की. ख़ैर, बाज़ार की कहानी से बात विषयान्तरण हो जायेगा. देखिये, प्रायः बहुत सी बातों के साथ नारी की स्वतंत्रता की बात को भी लेकर लोगों में बहुत सी ग़लतफ़हमियाँ हैं. नारी संगठन जिस स्वतंत्रता की बात करते हैं वह बिल्कुल भी पश्चिम की स्वतंत्रता जैसी नहीं है. वस्तुतः इस बात को लेकर भी बहुत मतभेद हैं. पर लगभग सभी नारीवादी पितृसत्ता का विरोध करते हैं, जो कि हमारे समाज की संरचना से जुड़ी अवधारणा है. मैं अपने पुराने लेखों में इस विषय पर चर्चा कर चुकी हूँ. यहाँ मैं अपनी बात को बिन्दुवार रखने का प्रयास कर रही हूँ.
-नारी की स्वतंत्रता का मुख्य अर्थ है "निर्णय लेने की स्वतंत्रता" न कि समाज के नियम न मानने की. वो विवाह करे या न करे, करे तो कब और किससे करे इस बात का निर्णय और ऐसे ही अन्य निर्णय. इससे नारी अपने पैरों पर खड़ी हो सकेगी और अपने विरुद्ध हो रहे अत्याचार का विरोध कर सकेगी.
-यौन-शिक्षा एक अलग बहस का विषय है. यौन-उच्छृँखलता के लिये लड़का-लड़की दोनों दोषी होते हैं तो केवल लड़कियों को ही दोषी क्यों ठहराया जाता है? अति किसी भी बात की घातक होती है, यौन-सम्बन्धों की भी, यह बात युवा वर्ग को समझाना किस तरह से ग़लत है?
-हम औरतों के किसी भी तरह के शोषण के विरुद्ध हैं. आपने कहा है कि आजकल राजनीतिक सभाओं में भी औरतों को छोटे-छोटे कपड़ों में नचाया जाता है. आपने यह नहीं देखा कि उन्हें नचवाता कौन है? और उन्हें देखने कौन जाता है? औरतें तो नहीं जाती. और आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि ये लड़कियाँ कौन हैं और किन परिस्थितियों में ये काम करती हैं? मैंने दूध के लिये अपने बच्चे को बिलखता छोड़ कर नाचने वाली लड़कियों को देखा है. रात में बिना कुछ खाये-पिये घंटों नाचकर बेहोश होते हुये देखा है, अपनी आँखों के सामने. एक बार आप भी सहानुभूति से देखिये.
-कोई भी औरत जानबूझकर अपना घर तोड़ना नहीं चाहती. मैंने डॉक्टर, प्रवक्ता और वकील जैसे पद पर प्रतिष्ठित महिलाओं को अपना परिवार टूटने से बचाने के लिये पति से पिटकर भी चुप रहते देखा है. घर तब टूटते हैं जब बात हद से गुज़र जाती है.
दूबे जी मैं एक महिला संगठन के साथ कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) के रूप में काम कर चुकी हूँ और अपने अनुभव से ये बात कर रही हूँ. हमने घरेलू हिंसा से पीड़ित औरतों की काउंसलिंग की है और देखा है कि जिन पढ़ी-लिखी औरतों लोग तरह-तरह के आरोप लगाते हैं वही अपने परिवार को छोड़ना नहीं चाहती, जबकि अपेक्षाकृत निर्धन और अनपढ़ औरतें अपने पति और परिवार  को छोड़ने को तैयार हो जाती हैं. मैं अपने अनुभव से आपको बता रही हूँ न कि सुनी-सुनायी.

9 टिप्‍पणियां:

  1. sahee jawab diya aapne. Saree buraeeyon kee jad auraton ko samazne wale in mardon ko aisahee do took jawab chhiye.

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  2. sach to ye hai ke aurton ki man;stithi ko koi bhi purush smajhna hi nahi chahta aurton ki azadi se ye purush log ye smajhte hain ke aurat ab hawa mai udhne lagegi isse zyada kuchh nahi.

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  3. जिन पढ़ी-लिखी औरतों लोग तरह-तरह के आरोप लगाते हैं वही अपने परिवार को छोड़ना नहीं चाहती, जबकि अपेक्षाकृत निर्धन और अनपढ़ औरतें अपने पति और परिवार को छोड़ने को तैयार हो जाती हैं.
    हाँ ...यह तो हमारा भी अनुभव है ...
    मगर इसका दूसरा पहलू भी है ...कई घरों में स्त्री की रक्षा के लिए बनाये गए दहेज़ विरोधी कानूनों का उपयोग लड़किया अपनी आरामतलबी और स्वार्थलोलुपता के लिए भी करती हैं ...यह अनुभव भी दिनोदिन बढ़ता जा रहा है !!

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  4. आराधना जी नमस्कार
    सादर चरण स्पर्श

    आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ आपकी बहुमूल्य राय के लिए। मै आपसे बिल्कुल समते हूँ कि सारी बड़ी कम्पनीया पुरुषो के हाथ मे है तो इसका मतलब ये तो नहीं होता कि वे जो कहे आप मान ले। अब आप कहेंगी कि अगर वे इनकार करती है तो नौकरी से निकला दिया जायेगा, हाँ तो मेरा सवाल यहाँ से शुरु होता है। अगर वे महिलायें किसी दबाव मे आकर ये काम करती है तो इसका दोषी कौन है। मै आपसे बिलकुल सहमत हूँ कि इसका दोषी पुरुष वर्ग भी और इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता लेकिन ऊंगली आप पर ज्यादा इसलिए उठेगी क्योंकि आप महिला उत्थान हेतू बने संस्थान से जुड़ी हुई है। अगर वह महिला दबाव में किसी भी प्रकार का कार्य करती है तो आपकी आवाज क्यों नहीं उठती,। अब आप कहती है कि मजबुरी वस भी ये काम किया जा सकता है तो बात फीर वहीं आकर रुकती है अगर वह मजबुरहै तो उसकी मदद कौन करेगा। क्या आपकी महिला सघंटन बस उन्ही महिलाओं के लिए आवाज ऊठाती जिनका कोई बड़ा आदमी बलात्कार कर देता है । मैं ये इसलिए कह रहा हूँ कि मैंने देखा जैसे इसका अभी हाल का ही उदाहरण आपको बताता हूँ आपको याद होगा बोलीबुड के हिरो शाईनी अहुजा पर नौकरानी के साथ बलात्कार का आरोप लगा है। वहाँ मैंने देखा कि बहुत सी महिला सघंटनो ने नौकरानी का साथ दिया, जो की अच्छी बात है।

    तो क्या ये मान लिया जाये कि ऐसे सघंटनो को बस बलात्कार और दहेज के मामले ही दिखते महिला उत्पीड़न स्वरुप। अगर आप आँख खोले तो आपको ऐसे बहुत से क्षेत्र दिखेंगे जहाँ महिलाओं का उत्पीड़न हो रहा है अब आप इसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से कह सकती है। मेरा सवाल इससे जुड़ा हुआ भी था, । सड़क पर नित्य ही इसके उदाहरण आपको मिल जायेंगे। अब आपको लग राह होगा कि मैं महिला विरोधी हूँ तो ऐसा बिल्कुल नहीं है भला कोई भी पुरुष महिला विरोधी कैसे हो सकता है, क्योंकि उसकी उतपत्ति तो महिला के माध्यम से ही होती है। मै विरोधी हूँ तो बस पाश्चात संस्कृति का। मैं ये नही कहता कि महिला को समान अधिकार ना मिले।अब आप भले ही कहें कि आप पाश्चात को नहीं अपनाती तो ये जरा माना कठिन सा होगा।
    हमारे यहाँ तो सदियो पहले से ही महिलाओं के लिए समान अधिकार की बात होती आयी है। तो क्या अधिकार मतलब खुलापन या नग्नता तो नहीं होती। क्या आप यहाँ इनकार कर सकती है आप पाश्चात संस्कृति को नहीं अपना रहीं है। जिस अधिकार की बात वे कहती है वो तो हमारे यहाँ बहुत पहले कहा जा रहा है, अब आप खुद ही देख लिजीए स्त्रियों के बारे में भगवान् मनु क्या सोच रखते थे यह एक श्लोक से ही सिद्ध हो जाता है

    --यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ,रमन्ते तत्र देवताः।
    यत्रेतः तू न पूज्यन्ते सर्वा त्रता पद क्रिया

    (मनु स्मरति अध्याय २ श्लोक ५६ ) अर्थात : जहा नारियों का सम्मान होता है वहा देवता (दिव्य गुण ) निवास करते है, और जहां इनका सम्मान नहीं होता है , वहां उनकी सब क्रियायें निष्फल होती है। समाज में स्त्रियों की दशा बहुत उच्च थीं, उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। आर्थिक मामलो की सलाहकार और समाज-व्यवस्था को निर्धारित करने में भी स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्हें भाग्योदया कहा जाता था,,प्रजनार्थ महाभागः पूजार्हा ग्रहदिप्तया। स्त्रियः श्रियस्च गेहेषु न विशेषो स अस्ति कश्चन (मनु स्मरति अध्याय १ श्लोक २६अर्थात :संतान उत्पत्ति के लिए घर का भाग्य उदय करने वाली आदर सम्मान के योग्य है स्त्रिया , शोभा लक्ष्मी और स्त्री में कोई अंतर नहीं ये घर की प्रत्यक्ष शोभा है।
    अब बात आती है कि आप ने कहा कि जब औरते कम कपड़ो मे नाचती है ति उन्हे देखता कौन है, तो जाहीर सी बात है कि पुरुष वर्ग देखे गा क्यों कि ये प्राकृतिक है, । अगर क्या कम कपड़ो मे पुरुष होते तो महिलाओं को पसन्द नही आते। और ज्यादा कुछ तो नहीं कहना चाहूँगा बस यही कि आप औरतो की स्थिति बदले न की उन्हे बदले की कोशिश करें, और आजादी के परे आप अपने संस्कृति को धुमील ना किजीए।

    (अगर मैंने कुछ गलत कहा हो तो उसके क्षमा चाहुँगा। उम्मीद है कि आप मेरे जवाब को अन्यथा नहीं लेंगी)

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  5. यौन-शिक्षा एक अलग बहस का विषय है. यौन-उच्छृँखलता के लिये लड़का-लड़की दोनों दोषी होते हैं तो केवल लड़कियों को ही दोषी क्यों ठहराया जाता है? अति किसी भी बात की घातक होती है, यौन-सम्बन्धों की भी, यह बात युवा वर्ग को समझाना किस तरह से ग़लत है?

    bilkul nahi galat hai.......samjhana.......is para graph poori tarah agree hoon........

    जिन पढ़ी-लिखी औरतों लोग तरह-तरह के आरोप लगाते हैं वही अपने परिवार को छोड़ना नहीं चाहती, जबकि अपेक्षाकृत निर्धन और अनपढ़ औरतें अपने पति और परिवार को छोड़ने को तैयार हो जाती हैं. मैं अपने अनुभव से आपको बता रही हूँ न कि सुनी-सुनायी.
    yeh baat to bilkul sahi hai.....gareeb pariwar ki striyaan........ chhodne ko jaldi tayyar ho jaatein hain..... par yahan kaaran financial hi hota hai..... yahan ek baat aur hai........ agar male successful aur rich hai.......... to kaun bevkoof chhodna chahega...... aur rich aur successful ki wife padhi likhi to hogi hi..... aur agar koi anpadh ganwaar ka husband bhi agar rich aur successful hoga to wo bhi kyun chhodegi...? to poora matter finance pe hi aa jata hai..... successful aur rich ke har gunaah aur galtiyan maaf hotin hain.......

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  6. सार्थक बहस!

    वैसे भी चौबे जी के सामने दुबे जी भला कैसे टिक पाएंगे !

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  7. सटीक बात
    सफ़ल स्वीकार्य योग्य ज़वाब सहमत हूं

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  8. " behad khubsurat aur ...saaf ..aur siddha jawab diya hai ....dubeyji ne ....mai unki baat se sahmat hu ki ....

    JAB GARIB AURAT PER ANYAYA HOTA HAI TAB KAHAN JAATI HAI mahila uthhan samiti ....?

    KYU NAHI AAWAZ UTHATI HAI ...GARIB AURAT KE LIYE AAWAZ ?

    hum aurat ke viroddhi nahi hai balki ...us systum ke virodhi hai jo nyay nahi deta hai ...virodhi hai ..aisi sanstha o ke jo sirf ....naam ki ho ...jo ...kabhi ...apana FAYADA dekhker kaam karti ho ..."

    bahut si mahila per atyachar hote hai ..ye sahi hai ..magar mahila aayog ne kitni mahilao ko nyay diya .....sirf un mahila ko saath diya ...jiska jikr MAHFOOZ ne band muthhi se kiya hai ."

    " hum bhi mante hai ki naari sakti ka pratik hai ...kyu ki NAARI ek MAA bhi hai ...."


    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

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बहस चलती रहे, बात निकलती रहे...