सोमवार, 29 मार्च 2010

छेड़छाड़ की समस्या : समाधान के कुछ सुझाव ( 2.)

हम प्रायः इस ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि हमारे घर-परिवार के पुरुष सदस्य छेड़छाड़ कर ही नहीं सकते और जब ऐसा हो जाता है, तो हम या फिर आश्चर्य करते हैं या उनके अपराध को छिपाने की कोशिश. ऐसा बहुत से केसों में देखने को मिला है कि अपराधी के घर वाले उल्टा पीड़ित पर ही आरोप लगाने लगते हैं.

अभी कुछ दिनों पहले का चर्चित केस है. पूर्वी यू.पी. के एक लड़के ने गोवा में एक नौवर्षीय रूसी लड़की के साथ यौन-दुर्व्यवहार किया. जब पुलिस लड़के के घर पूछताछ करने पहुँची, तो उसके घर वाले आश्चर्य में पड़ गये. उसकी बूढ़ी माँ ने कहा,"पता नहीं ऐसा कैसे हुआ? लड़का तो ऐसा नहीं था. हमने तो देखा नहीं. पता नहीं सच क्या है?" अब इसमें ग़लती इस माँ की नहीं है. उसने तो अपने बेटे को ये सब सिखाया नहीं.

कोई भी अपने बेटों को ग़लत शिक्षा नहीं देता, पर अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाये, तो ऐसी दुर्घटना से बचा जा सकता है. मेरा ये कहना बिल्कुल नहीं है कि हम अपने घर के पुरुष सदस्यों को शक की निगाह से देखें और उनकी हर गतिविधि पर नज़र रखें. ऐसा करना न व्यावहारिक होगा और न ही उचित. और परिवार की शान्ति भंग होगी सो अलग से. पर विशेषकर किशोरावस्था के लड़कों के पालन-पोषण में सावधानी बहुत ज़रूरी है. मैं अपने अनुभवों और अध्ययन के आधार पर कुछ सुझाव दे रही हूँ, शेष...जो भी लोग इस मुद्दे को लेकर संवेदनशील हैं और कुछ सुझाव देना चाहते हैं, वे दे सकते हैं---
---अपने बेटों को बचपन से ही नारी का सम्मान करना सिखायें, इसलिये नहीं कि वह नारी होने के कारण पूज्य है, बल्कि इसलिये कि वह एक इन्सान है और उसे पूरी गरिमा के साथ जीने का हक़ है.
---उन्हें यह बतायें कि उनकी बहन का भी परिवार में वही स्थान है, जो उनका है, न उससे ऊँचा और न नीचा.
---उसे अपनी बहन का बॉडीगार्ड न बनायें. ऐसा करने पर लड़के अपने को श्रेष्ठतर समझने लगते हैं.
---अपने किशोरवय बेटे की गतिविधियों पर ध्यान दें, परन्तु अनावश्यक टोकाटाकी न करें.
---उन्हें उनकी महिलामित्रों को लेकर कभी भी चिढ़ायें नहीं, एक स्वस्थ मित्रता का अधिकार सभी को है.
---किशोरावस्था के लड़कों को यौनशिक्षा देना बहुत ज़रूरी है. मेरे ख्याल से परिवार इसके लिये बेहतर जगह होती है. यह कार्य उनके बड़े भाई या पिता कर सकते हैं. इसके लिये घर का माहौल कम से कम इतना खुला होना चाहिये कि लड़का अपनी समस्याएँ पिता को बता सके. ( यहाँ मैं यौनशिक्षा पर विचार उतने विस्तार से नहीं रख रही क्योंकि इस विषय में मैं खुशदीप भाई की पोस्ट से शत-प्रतिशत सहमत हूँ)

छेड़छाड़ की समस्या के कारणों और समाधान के पड़ताल की यह समापन किस्त है. मैं दिनोदिन औरतों के साथ बढ़ रहे यौन शोषण और बलात्कार के मामलों से बहुत चिन्तित हूँ. मुझे ये नहीं लगता कि ये सब कुछलोगों की कुत्सित मानसिकता या औरतों के पहनावे का परिणाम है. इस तरह के विश्लेषण ऐसी गम्भीर समस्या को उथला और समाधान को असंभव बना देते हैं. यौन शोषण की समस्या की जड़ें हमारी सामाजिक संरचना में कहीं गहरे निहित हैं. वर्तमान काल की परिवर्तित होती परिस्थितियाँ, सांस्कृतिक संक्रमण, विभिन्न वर्गों के बीच बढ़ता अन्तराल आदि इस समस्या को और जटिल बना देते हैं. इस समस्या के कारण और समाधान खोजने के लिये समाज में एक लम्बी बहस चलाने की आवश्यकता है.

21 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक आलेख. उचित सुझाव दिये हैं आपने!

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  2. निश्चित ही यौन शोषण की जड़ें हमारी सामाजिक संरचना में गहरे निहित हैं। यौन शिक्षा परिजनों के द्वारा ही होनी चाहिए। लेकिन उस के लिए वयस्कों विशेष रूप से पिताओं को प्रशिक्षित होना चाहिए।

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  3. सार्थक विमर्श शुरू करने के लिए साधुवाद...

    ये आपने सही कहा कि छेड़छाड़ के मामले या विवाहेत्तर संबंधों को लेकर ये गारंटी के साथ कैसे मान लिया जाता है कि घर के पुरुष (नारी भी) ऐसा कर ही नहीं सकते...

    और जब ऐसा हो जाता है तो फिर उनका बचाव किया जाता है...अभिनेता शाइनी आहूजा, हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ (रूचिका मल्होत्रा केस), हरियाणा के पूर्व आईजी आर के भटनागर (शिवानी मर्डर केस), उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री अमर मणि त्रिपाठी (मधुमिता शुक्ला मर्डर केस) में हमने यही देखा कि सभी जगह पत्नियों ने आगे आकर पतियों को बचाने की कोशिश की...अगर पुरुष रसूखदार हो तो पीड़ित की जान बचना भी बड़ा मुश्किल हो जाता है...क्योंकि उसे अपने झूठे मान-सम्मान की इतनी फिक्र होती है कि वो हत्या जैसा जघन्य अपराध करते हुए भी नहीं घबराता...

    मैं ये नहीं कह रहा कि विवाहेत्तर संबंध रखने में सिर्फ पुरुष ही पुरुष आगे होते हैं...नारियों में से भी अपवाद हो सकते हैं...लेकिन मेरा ये कहना है कि पुरुष कुछ ऐसा वैसा करता है तो घर वाले बचाव करते हैं,,,लेकिन किसी नारी के साथ कुछ ऐसा हो जाए तो फिर उसे इतनी आसानी से स्वीकार किया जाता है क्या...मैंने तो यहां देखा है कि अगर किसी के साथ बलात्कार हो जाता है...तो यहां तक सलाह दी जाती है कि बलात्कारी के साथ ही विवाह करा दिया जाए...इस में पीड़िता का क्या कसूर....यहां मुझे रेखा और विनोद मेहरा को लेकर बनी फिल्म घर याद आ रही है...विनोद मेहरा के सुलझे हुए पति होने के बावजूद रेखा को बलात्कार होने का गिल्ट रहता है...

    फिर कहूंगा जिस तरह मांएं बेटियों को ऊंच-नीच समझाती हैं, उसी तरह पिता किशोर बेटों के सारे मिथ दूर करते हुए उन्हें सेक्स पर सही जानकारी देते हुए अच्छे-बुरे की तमीज़ कराएं...

    मेरी पोस्ट का उल्लेख करने के लिए आभार...

    जय हिंद...

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  4. आज के परिवेश पर यह लेख श्रंखला एकदम सार्थक है। आपने जो जनोपयोगी सुझाव दिये हैं उनके लिये आभार

    प्रणाम स्वीकार करें

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  5. @ दिनेश सर, आपकी बात गौर करने लायक है कि यौन शिक्षा बच्चों को सीधे-सीधे न देकर उनके परिजनों को दी जाये क्योंकि उन्हें मालूम ही नहीं होता कि वे अपने बच्चों को इन चीज़ों के बारे में कैसे बतायें.
    @ खुशदीप, आपकी बात बिल्कुल सही है.ये सारे उदाहरण ध्यान में रखकर ही मैंने ये बात कही थी कि हम इस बात पर विश्वास नहीं करते कि हमारे घर के पुरुष इस तरह के कामों में लिप्त हो सकते हैं, सही बात ये है कि हम मानना ही नहीं चाहते क्योंकि हमारे समाज में औरत और आदमी के लिये अलग-अलग मापदण्ड हैं.

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  6. मुझे तो हमेशा लगा है की भारत में बच्चों को नहीं बड़ों को यौन शिक्षा की जरूरत है !

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  7. @ अरविन्द मिश्र जी,
    मैं भी यही बात कह चुकी हूँ दिनेश सर के समर्थन में.

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  8. Aaj bhi ham jis shikshit kahe jaane samaj mein jeete hai aur es tarah kee ghatnayne hoti rahati hain to lagta hai.. kuch log graduate nahi sifr 'literate' hi kahe jaane layak hai... es tarh kee ghatnaon ke jitne ninda ki jay kam hi kam hai...
    Saarthak lekhan ke liye bahai

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  9. पूर्णतया सहमत :)

    ये एक निष्पक्ष और निर्भीक लेख है :)

    खुद को एक अबला नारी बता कर रोने या चिल्लाने से बेहतर है इस तरह के सुझाव ढूंढना :)

    इस लेख के लिये हृदय से धन्यावाद :)

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  10. मैंने आपका ब्लॉग देखा. नारियोके बारेमे आपने जो लिखा है ओ सही है. नारियोंका सन्मान करना चाहिए आपके इस विचारसे मई बिलकुल सहेमत हु. मगर आपने इसके कारनोका परामर्श नहीं लिया. आप मराठी पढ़ ओंर समाज सकती है तो मेरी ' बैची चप्पल ' यह पोस्ट देखे. शिग्रही मै ' बैपनाचा बाजार ' यह पोस्ट भी लिखने जा रहा हु.

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  11. apne mitr ke kahne par aapke blog par aai magar ise khojne me poora din lag gaya ,magar pata nahi mila tab phir mitr ke paas gayi aur kahi tab naari blog ka pata mila aur pahunchi is karan padhne baad me aaungi kyonki tarif jo suni hai use siddh karna hai .waise yakin hai apne mitr par ,wo galat kah nahi sakti .

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  12. @ विजय जी, इस समस्या के कारणों के विषय में मैं पहले एक पोस्ट लिख चुकी हूँ. इसके विषय में पूरी एक श्रृंखला लिखी है,जिसकी यह आख़िरी किस्त है.

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  13. bahut umdaa blog hai... aapki tahreer bhi aur layout bhi... waise aap itne jagaho se taalluq rakhti hain... gulzar ke shabdon me
    "jisse bhi puchho uska ek aur pata bata deta hai,
    ya wo beghar hai, ya phir harjaaii"

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  14. गम्भीर चिंतन, विचारणीय बिन्दु।
    ---------
    क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
    अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

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  15. जिन्दा लोगों की तलाश!
    मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!


    काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
    =0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=

    सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

    हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

    इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

    अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

    आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

    सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

    जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

    (सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
    राष्ट्रीय अध्यक्ष
    भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
    7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
    फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666

    E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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बहस चलती रहे, बात निकलती रहे...