शुक्रवार, 19 मार्च 2010

भारत में नारीवाद की क्या आवश्यकता है???



मैं छेड़छाड़ की समस्या पर एक श्रृँखला लिख रही थी, जिसकी समापन किस्त तैयार करके रखी है. बस टाइप करनी है. पर इसी बीच मेरे एक मित्र ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक है-"Do We Need Feminism At All?" मैं अपने इस लेख के माध्यम से उसका उत्तर देने का प्रयास कर रही हूँ.यद्यपि अपने एक लेख में मैं पहले भी लिख चुकी हूँ कि जब हम यह कहते हैं कि नारीवाद की भारत में क्या ज़रूरत है? तो यह मानकर चलते हैं कि यह एक पश्चिम की अवधारणा है, जबकि ऐसा नहीं है. इसके उद्धरण में मैंने कुछ प्राचीन साहित्य और स्मृतियों के अंश दिये थे. 
     इस बात का उत्तर कि भारत में नारीवाद की क्या ज़रूरत है, एक वाक्य में दूँ तो यह होगा कि " नारीवाद नारी की उन परिस्थितियों को बदलने की बात करता है, जिनके कारण उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता और उन्हें वे अधिकार नहीं मिल पाते, जो पुरुषों को प्राप्त हैं. नारीवाद नारी को बदलने की बात नहीं करता." भारत में नारीवाद की उपयोगिता पर प्रश्न लगाने वाले तर्क देते हैं कि भारतीय नारी तो नारीत्व का, ममता का, करुणा का मूर्तिमान रूप है और पश्चिम की नारीवादी महिलाएँ उसे भी अपनी तरह भ्रष्ट कर डालना चाहती हैं. मैं यह कहती हूँ कि दुनिया सिर्फ़ भारत और अमेरिका या यूरोप ही नहीं है, एशिया, दक्षिण अमेरिका, अफ़्रीका के भी देशों में नारी आज अपनी परिस्थितियों को बदलने की माँग कर रही है और वह भी बिना अपनी संस्कृति को छोड़े. मुस्लिम देशों में औरतें बुर्क़े के साथ पढ़ना-लिखना और बाहर का काम करना चाहती हैं. इस्लाम में नारी की स्थिति पर  शीबा असलम फ़हमी अपने एक लेख में लिखती हैं, " तसलीमा ही नहीं आज विश्वभर में मुसलमान औरतें अपने-अपने समाजों में व्याप्त लिंग भेद पर सवाल खड़े कर रही हैं लेकिन इस्लाम पर हमला बोल कर नहीं। उनके यहां धर्म और समाज का फर्क साफ है। वह इस्लाम में रह कर इस्लामी न्यायप्रियता, बराबरी और आजादी के दर्शन से अपने लिए रास्ता निकाल रही हैं। वह मुसलमान मर्दों से ज्‍यादा स्पष्‍ट हैं इन मुद्दों को लेकर." आज बुर्क़ा हटाने का प्रश्न नहीं है. प्रश्न यह है कि औरत किस पहनावे में अपने आप को सुरक्षित और सहज पाती है. हम अपने देश में साड़ी की तारीफ़ करते नहीं थकते और मुस्लिम औरतों के पर्दे को बुरा-भला कहते हैं, बिना यह जाने कि औरत क्या चाहती है? साड़ी ठीक से पहनी जाये तो शालीन पहनावा है, नहीं तो आजकल की हिरोइनों के लिये वह सबसे सेक्सी ड्रेस है. बस फ़र्क इतना है कि उसे कौन किस उद्देश्य से पहनना चाहता है. पर्दा अगर ज़बर्दस्ती करवाया जाये तो ग़लत है, पर यदि औरत अपनी मर्ज़ी से पर्दा करना चाहती है, तो ये उस पर छोड़ देना चाहिये. बस परिस्थितियाँ ऐसी होनी चाहिये कि चयन का अधिकार औरत का हो और वह बिना किसी दबाव के अपना निर्णय खुद ले सके. 
     ठीक इसी तरह भारत में अगर नारी अपने नारीसुलभ गुण बनाये रखना चाहती है (जैसा कि अधिकतर औरत वास्तव में चाहती है) तो इस बात से उसे नारीवाद रोक नहीं रहा है, और न रोक सकता है. बात सिर्फ़ इतनी है कि उस पर ये गुण थोपे न जायें. ऐसा न कर दिया जाये कि उसे ज़बर्दस्ती शर्माना पड़े, चाहे शर्म आये या न आये. नारीवाद औरतों की निर्णय लेने और चयन की स्वतन्त्रता की बात करता है, न कि सभी औरतों को अपने स्वाभाविक गुण छोड़ देने की, चाहे वे नारीसुलभ गुण हों या कोई और. 
     नारीवाद का मुख्य उद्देश्य है नारी की समस्याओं को दूर करना. आज हमारे समाज में भ्रूण-हत्या, लड़का-लड़की में भेद, दहेज, यौन शोषण, बलात्कार आदि ऐसी कई समस्याएँ हैं, जिनके लिये एक संगठित विचारधारा की ज़रूरत है. जिसके लिये आज लगभग हर शोध-संस्था में वूमेन-स्टडीज़ की शाखा खोली गयी है. नारी-सशक्तीकरण, वूमेन स्टडीज़, स्त्रीविमर्श इन सब के मूल में नारीवाद ही है. नारी सशक्तीकरण और नारी सम्बन्धी शोध में हम नारी के सामाजिक विकास के लिये रणनीतियाँ बनाने के विषय में पढ़ते हैं और नारीवाद इन सभी समस्याओं की जड़ों की पहचान कराता है. इसलिये आज भारत में नारीवाद की सख्त ज़रूरत है. भारतीय नारीवाद, जो कि भारत में नारी की विशेष परिस्थितियों के मद्देनज़र एक सही और संतुलित सोच तैयार करे ताकि नारी-सशक्तीकरण के कार्य में सहायता मिले. 

40 टिप्‍पणियां:

  1. सुमन जी तो मानो तकते ही रहते हैं परिश्रम से और प्रचार प्रवाह के लेखो पर अपना पहला ठप्पा लगा देने के लिए -मगर यह सब किये धरे पर पानी फेरना नहीं है यह उनका अनुमोदन है -
    हमें लगता है दृष्टि भेद से दृश्य भेद उभर रहे हैं -वादों और वायदों के फेर में न पड़कर हमें इमानदारी से मनुष्य मात्र के लिए काम करने की जरूरत है -नर हो या नारी !
    नारी को निसंदेह कई सुविधाओं की दरकार है किन्तु हमें पश्चिम के भोंडे नारीवाद से सबक नहीं सीखना है !

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  2. भारत में नारी की विशेष परिस्थितियों के मद्देनज़र एक सही और संतुलित सोच तैयार करे ताकि नारी-सशक्तीकरण के कार्य में सहायता मिले.
    आपसे सहमत। बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

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  3. नारीवाद बिल्कुल सही परिभाषा पेश की है आपने। यह सच है कि किसी भी बड़े बदलाव के लिए यह महत्वपूर्ण है कि इस संबंध में नारी क्या सोचती है और क्या चाहती है। कोई भी बदलाव न तो थोपा होना चाहिए और न ही जबरदस्ती का होना चाहिए।अपने विकास के लिए जिस सामाजिक बदलाव में नारी सहज हो, वहीं नारी का विकास है। नारीवाद कोई फरमान नहीं, वरन स्वविकास का एक माध्यम है।

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  4. @अरविन्द मिश्र जी,
    नारीवाद पूर्व या पश्चिम का नहीं होता. यही तो मैं समझाने की कोशिश कर रही हूँ. जहाँ भी नारी अपनी परिस्थितियों से असंतुष्ट है, भेदभाव से क्षुब्ध है और इन सबके विरुद्ध आवाज़ उठाती है, वहीं नारीवाद है. नारीवाद समस्या की जड़ों को समझने वाली और समाधान के लिये उपाय सुझाने वाली अवधारणा है, अतः जहाँ समस्या है, वहाँ नारीवाद है.

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  5. jha stree ke sath stree hone ki vjh se kisi v prakar ki asmanta hgi vha narivad ki jraurat hogi,phir chahe vh bharat ho ya koi anya desh,jb vimari ek hi ho to marij ki halat dekh kr dwa ki matra ko km jayad kiya ja skta hai lekin dwa di hi na jaye to nasur bn jata hai,khair..narivad ko saral sabdo me rakhne ke liye sukriya...

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  6. मुक्ति ! बहुत ही सधा हुआ और संतुलित लेख है. और बिलकुल सही परिभाषा पेश की है नारीवाद की .सही अर्थ यही हैं नारीवाद के कि उनकी समस्याओं ,दशाओं पर ध्यान दिया जाये उन्हें सुधारा जाये ..न कि डंडा लेकर पुरषों पर चढ़ जाया जाये या आँख बंद करके पश्चिम का अनुसरण किया जाये..पश्चिम से आगे जहाँ और भी है जहाँ नारियों कि स्थिति पशुओं से भी बत्तर है ..नारीवाद नाम है उन्हें इंसानों वाली जिन्दगी देने का,.उन्हें इंसानों के हक दिलाने का.
    बहुत ही सटीक और नपा तुला लेख है...शुभकामनाये

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  7. प्रगतिशील नारियां यानी बंधी बंधाई सोच से हट कर सोचने वाली स्त्रियाँ । रुढिवादी सोच यानी एक बंधी बंधाई लकीर जिस पर सालो से नारी चल रही थी । जहाँ क्या क्या करना हैं और क्या क्या नहीं करना हैं इसका फैसला वो ख़ुद नहीं करने मे सक्षम थी , उसे कोई और बताता था । समाज के बनाए हुए नियम जिसमे नारी को बराबरी का नहीं दर्जा नहीं दिया गया । जहाँ नारी को केवल और केवल एक वस्तु माना गया पुरूष के लिये एक ऐसा खिलौना जिसका शील कभी भी पुरूष भंग कर सकता था ।

    इन सब परिस्थितयों से लड़कर जिस स्त्री ने भी अपना मुकाम अलग बनाया , समाज से अपने अस्तित्व कि पुकार कि कही उसे नारीवादी कहा गया तो कही फेमिनिस्ट और कहीं प्रगतिशील का तमगा दिया गया .

    as usual a comprehensive article

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  8. Niether I have read "Do We Need Feminism at All" nor I intend to read but I am writing to extend what Mukti has put forward.

    Narivaad paschim ka bapouti nahin hai. Paschim ka naarivad ek pryog tha jis me hit and trail paddati ka istemal kiya gaya tha. Sadiyon se chale aa rahe dhare ko chunouti dene mein kai tarah ki uthak patak to hoti hi hai. Samay ke saath jo upyogi ho use rakha jata hai aur shesh ko chhod diya jaata hai.

    1. Paschim ke naarivaad ki duhai dene walon ko yeh samajhna chahiye ki pehali lehar ke narivaad ki vajah se hi mahilaon ko matdaan ka adhikar mila. Agar vah mahilaen sangarsh na karti to bhartiya swatantrata senaniyon ki koi iccha nahin thi bhartiye mahilaon to yeh adhikar dene ki. Bhartiye mahilaon ki sithiti ko behtar batane ke liye aur videshi nari ki sithiti ko dhatta batane ke liye yeh adhikar diya gaya.

    2. Jab colonized India mein paschatyakaran ko selectively apnaya gaya to wah sahi tha. Angreji padenge, dhoti par tie bhi lagayenge par wahin jaat paat ka bhed bhi rakhenge. To us hi tarh agar paschimi narivad se kuchh le bhi liya to kya aasman toot padega.

    3. Jis paschatya narivad ki bar bar duhai di jati hai wah narivad ki doosari lahar thi. Jisne sirf nari ko hi nahin balki purushon ke ek warg (peopleof color)aur nimn warg (poor economic classes) ke purshon ko bhi unki dayniye awastha ka ehsaas karaye. Is se ek alag aur mukhar teesari duniya ka narivaad samne aaya.

    4. Teesari duniya ke narivaad mein saab kuchh nari ke ird gird nahin ghoomta apitu nari jis smaj mein rehati hai use badalne ki cheshta hai yeh. For example Hamare narivaad mein nari ki garibi bina samj ki garibi hataye sambhav nahin hai, aur is samaj mein purush bhi garibi se pidit hein. Best example is Grameen bank in Bagladesh- when loans were given to women they religiously returned them but men felt threatedned and emasculated so men were included in this program but soon defaulting began. So is it possible to uplift a woman without uplifting her family?

    Yeh narivaad har utpidit aur dalit ki pairavi karta hai aur is shoshan bhare dhanche ko badalne ka pryas karta hai.
    Kuchh log (jism purush hi nahin kuchh mahilaen bhi hongi kyon ki unhe bhi is wyawastha ka laabh mil raha hai) jo sadion se is system se laabh utha rahein hai wah to is parivartan se ghabrayenge hi.

    5. Narivaad ki is liye zyad zaroorat hai kyonki purushvaad mein sirf nari hi nahin purush bhi pidit hein. Ro nahin sakte kyonki purush hein par stress se hypertension karva heart attack se marna manzoor hai. Yeh kaisa jeena hua ki dukh mein dukhi na ho sako aur khush ho to izhar na kar sako is dar se ki aurat sir par chad jayegi.

    PS: Is there a way to make comments in devnagari. Please write the procedure for people like me who tech challenged.

    www.girlsguidetosurvival.wordpress.com

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  9. @ girlsguidetosurvival,
    आपसे शत-प्रतिशत सहमत हूँ.यही तो मैं भी कहती रहती हूँ. हमारा नारीवाद पितृसत्ता के विरुद्ध है और पितृसत्ता का अर्थ ही है समाज की पदसोपानीय व्यस्था, जिसमें सवर्ण पुरुष, सबसे ऊपर होता है और दलित महिला सबसे नीचे. हमें इसी चीज़ से लड़ाई लड़नी है. हर उस चीज़ के खिलाफ़, जो किसी भी व्यक्ति को समाज में दूसरे दर्ज़े का नागरिक मानती है.
    मैं आपके कमेंट को देवनागरी में लिख दूँगी.

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  10. घर या बाहर निर्णय लेने में भागीदारी ...आर्थिक रूप से स्वतंत्रता ...अपनी जीवन दिशा तय करने का अधिकार ..शिक्षा .जब तक इस देश के अस्सी प्रतिशत समाज में ये चेतना नहीं आ जाती ....ऐसे वादों की आवश्यकता रहेगी ......

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  11. बहुत संतुलित लेख
    अगर अपने पूर्वाग्रह पीछे छोड़ कर खुले मन से नारीवाद को समझा जाए तो काफी कुछ बदल सकता है ....

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  12. पुनश्च :
    फिर यह भारतीय नारीवाद क्या है ?
    पूरी एक पेज की टिप्पणी बिजली माई और यू पी एस के जवाब दे देने से गयी -
    महिला सशक्तीकरण का अभियान चल निकला है -पंचायतों में उनका एक तिहाई आरक्षण है और कई निर्णयों में उनकी भागीदारी बढ़ रही है -भविष्य उज्जवल है ! मगर इज्म के सफिक्स से अति सक्रियता ,प्रतिक्रियावाद और नकारात्मकता की जो बू आने लगती है उससे बचते हुए जमीनी सच्चाईयों से रूबरू होकर आज काम करने की जरूरत है -मार्क्स ने भी अंत में हताश होकर कह डाला था -आयी एम नॉट अ मार्क्सिस्ट !
    मैंने पिछले एक वर्ष में ५ दर्जन से अधिक गावों में चौपाल लगाई है और पाया है महिलाएं अब मुखर हो रही हैं -अब पति प्रधान और पुत्र प्रधानों की दखलंदाजी कम हो रही है -पर नारीवाद के सही स्वरुप के मुखरित होने में भी पुरुष और नारी को कन्धा से कन्धा मिलाकर काम करने फिकरे को यथार्थ में बदलना होगा -यह एकला चलो का अभियान नहीं है !

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  13. @ अरविन्द मिश्र जी,
    आपकी बात सही है. परिवर्तन हो रहा है, पर अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है. नारी के सशक्तीकरण की आवश्यकता जो भी महसूस करता है, उसके सहयोग की अपेक्षा तो है ही. चाहे वह पुरुष हो या स्त्री. निस्संदेह, समाज में किसी भी प्रकार के परिवर्तन या सुधार के लिये नर-नारी दोनों को मिलकर काम करने की ज़रूरत है.

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  14. .
    .
    .
    परंपरा और संस्कृति रक्षा की आड़ लेकर जो यौनकुंठित दोगले चिल्ला-चिल्ला के हर मंच पर इस बात का मलाल करते हैं कि...

    आज की नारी...

    * भूल गई है आंचल और पायल को...
    * पहनने लगी है अपनी पसंद के कपड़े...
    * अपने ढंग से जीना चाहती है...
    * भूल गई है प्राचीन काल से परिभाषित तथाकथित 'नारी की मर्यादा'...
    * बच्चे पैदा करने और परिवार चलाने में ही अपना जीवन धन्य न मानकर अपने कैरियर के लिये भी सचेत हो गई है...
    * हो गई है आर्थिक रूप से स्वतंत्र, अपनी इस स्वतंत्रता का महत्व जानती है और उसकी इज्जत करती है...
    * अपनी खुद की राय रखने लगी है अपने आस-पास की घटनाओं और मुद्दों पर...
    * जवाब देने लगी है 'नारी को क्या करना चाहिये और क्या नहीं' सिखाने वालों को...
    * के पास आज बहुत से विकल्प हैं और वह इन विकल्पों का प्रयोग करती/करना चाहती है...


    उन सबों के खिलाफ मुखर आवाज है... नारीवाद !

    एक सफल व प्रभावी आलेख के तीन जरूरी गुण हैं Brevity, Clarity & Precision, यह तीनों पाये आज ...

    आभार!

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  15. बिल्कुल सही कहा मुक्ति....भारतीय समाज ने नारी को सम्मान देना छोड़ा....पतन के गर्त में गिरा....जाने कब समझेंगे लोग....ये नारी पर छोड़ना चाहिए कि क्या पहनावा हो उसका......पर नर पिशाचों के रहने तक सावधानी बरतनी पड़ेगी....सेक्स की वस्तु नहीं है नारी....ये समझ आने में जाने कितना समय लगेगा....आधुनिक काल में फिर से नारी को सशक्त होना होगा....तब ही भारत फिर से सोने की चिड़िया बन पाएगा...

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  16. Mukti,

    Anuvad aur devnagari mein meri tippani type karne ke prastav ke liye abhar. It is a good post. Keep up the good work.

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  17. बहुत अच्छा लेख रहा. कई महत्वपूर्ण सवालों पर चर्चा की गई. शुभकामनाएं.

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  18. Happy to see people engaging with Gender Issues and encouraging the trend here. This dialog is the hope of tomorrow. Hoping it will radiate up to every corner of this country and will destroy the masculine understanding of society, state, power and life itself.
    Congrats Aradhna!

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  19. thanks sheeba,
    for your support and encouragement. i need do more hard work to increase acceptability of women issues.

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  20. बहुत सटीक सवाल ''भारत में नारीवाद की क्या आवश्यकता है???''....नारी कि समस्या का हल से ज़्यादा समस्या बढ़ रही है ......बहुत बढ़िया लिखा आपने

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  21. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  22. girlsguidetosurvival की टिप्पणी का लिप्यन्तरण और अनुवाद---
    girlsguidetosurvival ने कहा…
    न मैंने "Do We Need Feminism at All" पढ़ा है और न पढ़ने का कोई इरादा है, पर मैं मुक्ति की बात को आगे बढ़ाने के लिये लिख रही हूँ.
    नारीवाद पश्चिम की बपौती नहीं है. पश्चिम का नारीवाद एक प्रयोग था जिस में hit and trail पद्धति का इस्तेमाल किया गया था. सदियों से चले आ रहे ढर्रे को चुनौती देने में कई तरह की उठापटक तो होती ही है. समय के साथ जो उपयोगी हो उसे रखा जाता है और शेष को छोड़ दिया जाता है.
    -पश्चिम के नारीवाद की दुहाई देने वलों को यह समझना चाहिये कि पहली लहर के नारीवाद की वजह से ही महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला. अगर वे महिलाएँ संघर्ष ना करतीं तो भारतीय स्वतन्त्रता सेनानियों की कोई इच्छा नहीं थी भारतीय महिलाओं को यह अधिकार देने की. भारतीय महिलाओं की स्थिति को बेहतर बताने के लिये और विदेशी नारी की स्थिति को धता बताने के लिये यह अधिकार दिया गया.
    -जब कॉलोनाइज्ड इंडिया (औपनिवेशिक भारत) में पाश्चात्यकरण को सेलेक्टिवली (आंशिक रूप से) अपनाया गया तो वह सही था. अंग्रेजी पढ़ेंगे, धोती पर टाई लगायेंगे, पर वहीं जात-पात का भेद भी रखेंगे. तो उस तरह अगर पश्चिमी नारीवाद से कुछ ले भी लिया तो क्या आसमान टूट पड़ेगा?
    -जिस पाश्चात्य नारीवाद की बार-बार दुहाई दी जाती है, वह नारीवाद की दूसरी लहर थी. जिसने सिर्फ़ नारी को ही नहीं बल्कि पुरुषों के एक वर्ग (अश्वेत लोग) और निम्न वर्ग (निम्न आर्थिक स्थिति वाला वर्ग) के पुरुषों को भी उनकी दयनीय अवस्था के एहसास कराया. इस से एक अलग और मुखर तीसरी दुनिया का नारीवाद सामने आया.
    -तीसरी दुनिया के नारीवाद में सब कुछ नारी के इर्द-गिर्द नहीं घूमता अपितु नारी जिस समाज में रहती है उसे बदलने की चेष्टा है यह. उदाहरण के लिये हमारे नारीवाद में नारी की गरीबी बिना समाज की गरीबी हटाये सम्भव नहीं है, और उस समाज में पुरुष भी गरीबी से पीड़ित हैं. सबसे अच्छा उदाहरण बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक का है, जहाँ औरतों को लोन दिया जाता था, जो उनके द्वारा धार्मिक रूप से लौटा दिया जाता था, लेकिन पुरुष अपने आपको उपेक्षित और शोषित महसूस करते थे. इसलिये पुरुषों को भी इस कार्यक्रम में सम्मिलित कर लिया गया, लेकिन शीघ्र ही पहले जैसा होने लगा. तो क्या औरतों के विकास के बिना उसके परिवार को ऊपर उठाना सम्भव है ?
    यह नारीवाद हर उत्पीड़ित और दलित की पैरवी करता है और इस शोषण भरे ढाँचे को बदलने का प्रयास करता है.
    कुछ लोग (जिसमें पुरुष ही नहीं कुछ महिलाएँ भी होंगी क्योंकि उन्हें भी इस व्यवस्था का लाभ मिल रहा है) जो सदियों से लाभ उठा रहे हैं, वह तो इस परिवर्तन से घबरायेंगे ही.
    -नारीवाद की इस लिये ज्यादा ज़रूरत है क्योंकि पुरुषवाद में सिर्फ़ नारी ही नहीं पुरुष भी पीड़ित हैं. रो नहीं सकते क्योंकि पुरुष हैं, पर तनाव से हाइपरटेंशन करवा हर्ट अटैक से मरना मंज़ूर है. यह कैसा जीना हुआ कि दुख में दुखी न हो सको और खुश हो तो इज़हार न कर सको. इस डर से कि औरत सिर पर चढ़ जायेगी.

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  23. ठीक इसी तरह भारत में अगर नारी अपने नारीसुलभ गुण बनाये रखना चाहती है (जैसा कि अधिकतर औरत वास्तव में चाहती है) तो इस बात से उसे नारीवाद रोक नहीं रहा है, और न रोक सकता है. बात सिर्फ़ इतनी है कि उस पर ये गुण थोपे न जायें. ऐसा न कर दिया जाये कि उसे ज़बर्दस्ती शर्माना पड़े, चाहे शर्म आये या न आये. नारीवाद औरतों की निर्णय लेने और चयन की स्वतन्त्रता की बात करता है, न कि सभी औरतों को अपने स्वाभाविक गुण छोड़ देने की, चाहे वे नारीसुलभ गुण हों या कोई और. ...

    यदि यही सचमुच नारीवाद की परिभाषा है तो इससे इंकार करने वाला मूर्ख/जाहिल है ....नारियों को चयन और निर्णय लेने की स्वतंत्रता हो और मैं सोचती हूँ कि इसमें किसी अन्य नारी की भी दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए ...यदि कोई अपने घर परिवार में प्रसन्न है और परिवार में रह कर बिना किसी का असम्मान किये अपनी स्वतन्त्रता को बनाये रखना चाहता/चाहती है तो उसके इस प्रयास का सम्मान किया जाना चाहिए ना कि इसे उस नारी की पुरातन सोच समझ कर माखौल उड़ाना चहिये ....

    टिप्पणी में " नारीवाद की इस लिये ज्यादा ज़रूरत है क्योंकि पुरुषवाद में सिर्फ़ नारी ही नहीं पुरुष भी पीड़ित हैं. रो नहीं सकते क्योंकि पुरुष हैं" ....आपकी इस बहस को और मजबूत आधार दे रही हैं

    नारी सशक्तिकरण पर एक बहुत ही संतुलित आलेख ...बधाई ....!!

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  24. बहुत बढिया तथ्यपरक आलेख. नारीवाद को सही ढंग से परिभाषित करने में सफ़ल हुईं हैं आप. बधाई.

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  25. मुक्ति,

    लिप्यंतरण और अनुवाद के लिए आभार सिवीकार करें. मैं क़ुयल पेड़ के मध्यम से यह टिप्पणी कर रही हूँ. आशा है भविष्या में भी इसका उपयोग कर पाऊँगी.

    www. girlsguidetosurvival.wordpress.com

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  26. सार्थक पोस्ट.... सटीक टिप्पणियां.... सधे उत्तर..

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  27. सार्थक पोस्ट है
    ब्लाग लिंक जनपक्ष में लगा दिया है।

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  28. बहुत ही प्रभावशाली ढंग से आपने विषय को विवेचित किया है...

    सही कहा आपने...सौ बात की एक बात - आवश्यकता नारी को पुरुष बना देने की नहीं,बल्कि उसे एक पूर्ण व्यक्तित्व बनाने की है...उसे सोचने समझने पढने लिखने और अपना सर्वांगीण विकास करने की उतनी ही स्वतंत्रता और अवसर मिलना चाहिए जितना कि परिवार समाज में सहज रूप से एक पुरुष को है...

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  29. शुक्रिया...
    अच्छी और जरूरी मुहिम चला रखी है मुक्ति जी

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  30. इस बार गाँव में एक बात पता चली कि फलां चाचा- भतीजा साथ साथ जा रहे थे। खेत की मेड़ पर एक लड़की घास कर रही थी और तभी पंदरह वर्षीय भतीजे को न जाने क्या हुआ अपने चाचा ( उम्र लगभग 32) को कहा चाचा आप चलो मैं आया। चाचा ने भी उस लड़की को देख लिया था और इस आशंका में कि ये कम्बख्त कहीं वहीं न जा रहा हो - पूछ बैठा - अरे, कुछ बात वात किया है कि ऐसे ही जा रहा है..लेकिन उसके पहले कि चाचा अपनी बात पूरी कर पाता, भतीजा जा पहुँचा उस लड़की के पास और लड़की चिल्ला दी - माई रेsss
    भतीजे महाराज तो गड़बड़ा गये। भाग कर चाचा के पास कांपते पैरों से पहुंचे कि चाचा - अब का होई ?

    चाचा भी असमंजस में कि बड़ा बेवकूफ लड़का है, बिना कुछ आगे बात चलाये-उलाये जा पहुंचा था वहां।

    बात बढ़ी, शाम तक चाचा और भतीजा दोनों बुलाए गये। बहसबाजी हुई, और सारी जिम्मेदारी चाचा पर डाल दी गई कि आप सीनियर थे। बच्चे को समझाना चाहिए था।

    और चाचा ने क्या कहा ?

    चाचा ने कहा कि लड़की ने बुलाया होगा तभी तो वह गया होगा। आप मुझ पर नाहक तोहमत लगा रहे हैं।

    तो सारे वाकये का लब्बो-लुआब ये कि - बड़े भी एक तरह से अपने से छोटों का बचाव करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। आखिर उसी परिपाटी को जीते हुए तो चाचा भी कभी किसी की ओर झुका होगा।

    आपकी पोस्ट का मर्म इस वाकये से बिल्कुल मेल खा रहा था इसलिए उसे यहां लिखना जरूरी समझा।

    पोस्ट बहुत जरूरी मुद्दे पर है और बढ़िया ढंग से लिखी गई है।

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  31. और जब तक बड़े आदर करना न सिखाएंगे, समाज में छेड़खानी और बदसलूकी वाली बातें इसी तरह पनपती रहेंगी।

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  32. मुक्ति जी ,
    आपके पिछले कई लेखों को पढ़ा है और टिप्पणिओं पर भी निगाहें रहीं. बहुत ही सार्थक और बेबाक विवेचन ( और कई टिप्पणियां भी ) .आपसे मूलतः सहमत .

    कुछ पूर्व पश्चिम के घोलमाल की भी बातें कही गयीं .पर जो असली बात आपने कही वह नर नारी का आपसी सघर्ष नहीं वरन ' पितृसत्तात्मक ' व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की बात है और जिसके मूल में धर्मों (?) की अहम् भूमिका रही .

    लोहिया शताब्दी वर्ष में आपके विचारों का लौह ,डा. लोहिया के सपने का प्रतिबिम्ब है .

    इस मनन और चिंतन पूर्ण सार्थक आलेख के लिए आप के साथ ही बहुत से विवेकशील टिप्पणीकारों को भी बधाई !

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  33. RAJ SINH जी से सहमत

    बहुत ही सार्थक और बेबाक विवेचन :)

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  34. नारीवाद पूर्व या पश्चिम का नहीं होता. यही तो मैं समझाने की कोशिश कर रही हूँ. जहाँ भी नारी अपनी परिस्थितियों से असंतुष्ट है, भेदभाव से क्षुब्ध है और इन सबके विरुद्ध आवाज़ उठाती है, वहीं नारीवाद है. नारीवाद समस्या की जड़ों को समझने वाली और समाधान के लिये उपाय सुझाने वाली अवधारणा है, अतः जहाँ समस्या है, वहाँ नारीवाद है.

    बहुत अच्छी परिभाषा दी मुक्ति जी .....बहुत खूब .....!!

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  35. मेरी समझ से ये सारे सुझाव ऊपरी स्तर पर तो देखने में अच्छे लगते हैं, पर बहुत कारगर नहीं हो सकते। क्योंकि छेड़छाड़ एक मानसिक समस्या है, जिसका इलाज सिर्फ और सिर्फ मनोविज्ञान के द्वारा ही किया जा सकता है।
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    ब्लॉगवाणी माहौल खराब कर रहा है?

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  36. nari ko apne aap me ye filling lana hoga ki o kisi se kam nahi hai wo har jagah puruso ke equal hai.any ime,any where,...but wo aisa karti nahi hai. ek school se 5 teacher padha kar nikle o apas me mahila ki puruso ke sath brabri ka hi bat kar rahi thi. ki mahila ko puruso ke saman izzat milna chahiye wo kisi se kam nahi hai .mahila aaj kuch bhi kar sakti hai. o sabhi bus me chaden ,ye 5 the bus me sit ek hi khali tha . aur jab wo log chadhe to usme se ek teacher sit pe baith gayen .sab kahne lage kya sir mahila teacher ko sit pe baithne digiye . aur ye 50 sal ka purus teacher apni sit 30 sal ki mahila, teacher ke liye chodh diya.

    .......wo brabri ki bat karne wali mahila teacher ko jara bhi samagj me nahi aaya ki , aaj jab hum mahila-purus ke brabri ki bat kar rahe hai to aisa kyon.
    why....................i want to answer for this question!!!!!!!!!!!!!!!!!@@@@@@

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बहस चलती रहे, बात निकलती रहे...