बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

प्रेम, प्रेम विवाह और पितृसत्ता

पिछले कुछ दिनों से इस विषय पर सोच रही थी, अतिव्यस्तता के बाद भी। इसके दो प्रमुख कारण थे - मेरे बेहद करीबी दोस्तों के प्रेम विवाह में आ रही अडचनें और मेरी एक जूनियर द्वारा बार-बार प्रेम के अस्तित्व पर उठाये जा रहे प्रश्न। मेरी  जूनियर इस बात से परेशान है कि जीवन के संघर्ष के दिनों में जो प्रेम किसी का संबल बनता है, सहारा देता है, वही वास्तविक संसार के, यथार्थ के धरातल पर आकर स्वयं क्यों असहाय हो जाता है?

जब प्रेम और समाज के सम्बन्धों की समस्या के बारे में सोचती हूँ तो एक दूसरा ही प्रश्न सामने आ खड़ा होता है कि क्या वाकई जिसे हम प्रेम समझ रहे थे, वह प्रेम ही था? हमारे पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ लड़के-लड़कियों को अलग-अलग ढाँचों में ढलने की ट्रेनिंग दी जाती है, जहाँ विद्यालय के स्तर पर सह-शिक्षा में पढ़ाना ही अपराध समझा जाता है, वहाँ क्या हमारे पास प्रेम के लिए विकल्प होते हैं? मेरा जवाब है नहीं। ऐसे में अक्सर लड़के-लड़कियाँ पहली बार जिस विपरीतलिंगी के संपर्क में आते हैं, उसी की ओर आकर्षित हो जाते हैं और उसी को प्यार समझ बैठते हैं। इसमें 'प्रेम में एकनिष्ठता' की अनिवार्यता और 'एकाधिकार की भावना', न उन्हें अपने प्रेम पर पुनर्विचार करने देती है और न ही विकल्प ढूँढने देती है। यह प्रेम जब दुनिया के सामने पहुँचता है, तो उसको टूटना ही है। हालांकि हमेशा ही ऐसा नहीं होता। पर अगर प्रेम समाज के बनाए हुए नियमों से लड़ने के पहले ही हथियार डाल देता है, तो मैं उसे प्रेम ही नहीं मानती। हाँ, ये हो सकता है कि उसमें से किसी एक ने वास्तव में सच्चा प्यार किया हो, पर उसका साथी या तो खुद प्रेम के भ्रम में होता है अथवा अपने प्रेमी को जानबूझकर धोखा दे रहा होता है।

खैर, यहाँ इस पोस्ट का विषय 'प्रेम का भ्रम' नहीं प्रेम है, बशर्ते वह 'विशुद्ध प्रेम' हो। यहाँ विशुद्ध से मतलब किसी नैतिक शुचिता से नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि उसमें किसी भी तरह की अन्य भावना की मिलावट ना हो, जैसे स्वार्थ, निर्भरता, जिम्मेदारी, दया, करुणा आदि। वह प्रेम, जिसमें प्रेम के बदले बस प्रेम की अपेक्षा हो। बहुत पहले 'स्त्री मुक्ति संगठन' की साथी डॉ. पद्मा सिंह ने कहा था, "प्रेम दो बेहद स्वतंत्र और आत्मनिर्भर व्यक्तियों के बीच में ही संभव है।" अर्थात यदि प्रेमी-प्रेमिका प्रेम के अलावा किसी और बात के लिए एक-दूसरे पर निर्भर नहीं और प्रेम के अलावा और कोई स्वार्थ भी नहीं है, तभी प्रेम संभव है। मुझे एक दृष्टि में यह बात सही लगती है। आप इससे असहमत भी हो सकते हैं। पर, मैं मानती हूँ कि इस तरह के प्रेम में स्त्री-पुरुष दोनों समान स्थिति में होते हैं। इसलिए वो पितृसत्ता के लिए एक चुनौती होते हैं और इसीलिये समाज के ठेकेदार प्रेमियों से बहुत डरते हैं।

यहाँ मैं उस 'विक्टोरियन रोमैंटिक लव' को अलग कर रही हूँ, जो अंग्रेजी साहित्य के काल विशेष में और 'मिल्स एंड बून' के नावेल्स में पाया जाता है और जिसमें सफ़ेद घोड़े पर सवार एक राजकुमार आता है और खूब घेरदार फ्रिल वाली पोशाक पहनी हुयी नायिका को अपने साथ ले जाता है। मैं संस्कृत के 'सम्भोग श्रृंगार' वाले प्रेम को और हिंदी के 'रीतिकालीन प्रेम' को भी नहीं गिन रही हूँ। क्योंकि इन सभी स्थानों पर प्रेम की जो छवि है, वो पितृसत्ता की ही बनायी हुयी है और इसमें बिलकुल भी बराबरी नहीं है। भारतीय परम्परा में भी अर्जुन-सुभद्रा से लेकर पृथ्वीराज-संयोगिता तक नायिकाओं के अपहरण के किस्सों में भी इसी प्रकार का प्रेम परिलक्षित होता है। यह रूमानी और रूढ़िवादी प्रेम पितृसत्ता का पोषक ही है क्योंकि इसमें हमेशा नायिका कोमल कृशांगी और नायक वीर पुरुष होता है। वो हमेशा 'प्रोटेक्टर' की भूमिका में होता है और इसीलिये नायिका को कमज़ोर दिखाया जाता है। प्रेम, पितृसत्ता से टक्कर तभी ले सकता है जब प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से समान रूप में प्रेम करते हों। तभी वो पितृसत्ता की उस अवधारणा के विरुद्ध होते हैं, जिसमें एक को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाता है, एक को कठोर और दूसरे को कोमल माना जाता है।

नारीवाद का रोचक पक्ष यह है कि वह विवाह को तो एक पितृसत्तात्मक संस्था मानता है, पर प्रेम को नहीं। विवाह का पितृसत्ता से क्या सम्बन्ध है, इस पर भी कभी चर्चा होगी। फिलहाल विचार का विषय है कि प्रेम पितृसत्ता के लिए चुनौती कैसे है? हमारे समाज की बुनावट जैसी है उसमें जानबूझकर जीवनसाथी के चयन के विकल्प इतने कम रखे गए हैं और प्रक्रिया इतनी जटिल है कि आप अपने साथी के चयन के लिए समाज के बनाए नियमों के अधीन अपने परिवार की इच्छा पर निर्भर रहें। यह बात लड़के और लड़की दोनों के लिए समान रूप से लागू होती है अर्थात दोनों के ही पास 'चयन के विकल्प' नहीं हैं। ऐसे में जब कोई लड़का या लड़की अपनी इच्छा से कोई साथी ढूँढ़ लेता है, तो समाज को अपनी व्यवस्था खतरे में पड़ती दिखाई देती है। जब प्रेमी जोड़ा एक कदम आगे बढ़कर अपने प्रेम को विवाह में परिणत करना चाहता है, तो इसीलिये उसे घोर विरोध का सामना करना पड़ता है कि उन्होंने समाज के नियमों के विरुद्ध 'अपनी इच्छा' से साथी चुन लिया। यह उस सामाजिक व्यवस्था के लिए अपमान होता है, जिसमें पद्सोपानीयक्रम से छोटे को बड़े की, निर्धन को धनवान की, निर्बल को सबल की और स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना अनिवार्य होता है। सबसे ज्यादा डर परिवार को इस बात का होता है कि प्रेमविवाह कर आयी लड़की 'आदर्श बहू' बन पायेगी या नहीं। इसीलिये प्रेमविवाह को रोकने के लिए परिवार वाले सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वो अपने 'बिगड़े' हुए बच्चों को परिवार की प्रतिष्ठा का हवाला देते हैं, बराबरी में रिश्ता करने की बात कहते हैं और अन्ततः 'इमोशनल ब्लैकमेलिंग' का अमोघास्त्र प्रयुक्त करते हैं।

अगर यह प्रेम अंतरजातीय हुआ, तब तो विवाह के लिए प्रेमी-प्रेमिका को परिवार के साथ समुदाय का भी विरोध झेलना पड़ता है। अंतरजातीय विवाह पितृसत्ता के साथ ही साथ जातिव्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकते हैं, बशर्ते प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे का साथ निभाने को पूरी तरह प्रतिबद्ध हों।

लेकिन इन सब बातों का दूसरा पहलू भी है। अक्सर देखा जाता है कि प्रेम विवाह में परिणत होने के बाद पितृसत्तात्मक ढाँचे में ही ढल जाता है। पति-पत्नी दोनों अपनी-अपनी पारम्परिक भूमिका में आ जाते हैं और कुछ दिनों बाद दोनों की स्थिति को देखकर आप बिलकुल नहीं कह सकते कि इन्होंने प्रेम विवाह किया था या पारम्परिक विवाह। बल्कि प्रेम विवाह में लड़की खुद को 'आदर्श बहू' और 'आज्ञाकारी पत्नी' साबित करने के लिए अक्सर ज्यादा से ज्यादा 'त्याग' करने को तैयार रहती है।  ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लड़के-लड़कियाँ पले-बढे तो उसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में होते हैं, जहाँ सबकी भूमिकाएँ पहले से तय होती हैं।

इसलिए अगर हम यह सोचते हैं कि केवल प्रेम विवाह कर लेने भर से पितृसत्ता को कोई चोट पहुँच सकती है, तो यह एक भूल होगी।  हाँ, इतना अवश्य है कि प्रेमी एक स्तर पर तो उससे टक्कर ले लेते हैं, लेकिन अगले ही कदम पर वह अपने दूसरे रूप में उन्हें अपने अंदर समाहित करने को खड़ी मिलती है। हमें यह याद रखना होगा कि पितृसत्ता भी पूँजीवाद की तरह एक बेहद लचीली, परिवर्तनशील और बहुरूपिया व्यवस्था है और इसके साथ लड़ने के लिए इसके हर रूप को जानना और लगातार संघर्ष करना ज़रूरी है।

18 टिप्‍पणियां:

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  3. विवाह का सर्वोत्कृष्ठ रूप केवल स्त्री-पुरुष की समानता स्थापित होने पर ही संभव है। विवाह के तीन रूप इतिहास में दिखाई देते हैं। यूथ विवाह, युग्म विवाह और एकनिष्ठ विवाह। इन में एकनिष्ठ विवाह सभ्यता के युग में अस्तित्व में आया और इस में लगातार सुधार भी होता रहा है। मोर्गन कहते हैं कि इस में अभी और सुधार हो सकता है और वह उस समय तक होता रहेगा जब तक कि नारी और पुरुष की समानता स्थापित नहीं हो जाएगी। यदि सूदूर भविष्य में एकनिष्ठ परिवार समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ सिद्ध होता है तो आज यह भविष्यवाणी करना असंभव है कि उस का स्थान विवाह का कौन सा रूप लेगा।

    अब आप इस विषय पर विचार कर ही रही हैं तो आप को एंगेल्स की पुस्तक 'परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति' तथा Lewis H. Morgan की Ancient Society अवश्य पढ़नी चाहिए। Ancient Society का लिंक http://www.marxists.org/reference/archive/morgan-lewis/ancient-society/ है।

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    1. फिलहाल तो प्रेम विवाह और पितृसत्ता के सम्बन्धों पर विचार कर रही हूँ. लिंक के लिए धन्यवाद !

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  4. प्रेम को विवाह का रूप देने के लिए दुनिया के खिलाफ बगावत करनी पडती है , लेकिन उस विवाह को प्रेम का रूप देने के लिए अपने खिलाफ. यहीं मामला बिगड जाता है . खैर जो प्रेमीजन पहले ही मार दिए जाते हैं , वे इस दूसरी वाली विडम्बना से बच जाते हैं .

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  5. सबसे पहले तो इस चिंतन के लिए साधुवाद आराधना जी |

    वाकई में प्रेम जैसी चीज़ों को समझपाना अपने जैसे समाज के लिए संभव ही नहीं है | इसका एक सबसे बड़ा कारण मुझे इंडीविजुअलीटी को तवज्जो ना देना है |किसी इंसान कि थिंकिंग कोई मायने नहीं रखती, जो पोथी में लिखा है बस वही सही है, तुम्हे मानना होगा नहीं तो जाओ भाड़ में| और कोई माने ना भी तो कहाँ जाए, इंसान एक सामाजिक पशु जो ठहरा | हमने समाज का ढांचा ऐसा बना दिया है कि इसमे नयी बातों को स्वीकार करने की बजाय नकार देने की परिपाटी है | भगत सिंह सबको चाहिए पर पड़ोसी के घर में, हमारा बेटा तो अफसर बनेगा |

    धर्म मुझे हमेशा जीवन जीने का एक सरलीकृत तरीका लगता था जो की विचारकों और मनीषियों ने घोर चिंतन के बाद बनाया था | पर हमारा समाज ये नहीं समझ पाया कि कोई भी सिस्टम वो चाहे धर्म क्यूँ न हो, उसे अगर वक़्त के साथ बदला नहीं गया तो रुके पानी की तरह सड़ जाता है | जब जब हमने धर्म से वैज्ञानिक और भावुक पहलुओं को दरकिनार करने की कोशिश की, हमारा धर्म भ्रष्ट हो गया | और हम समाज को इसी धर्म की दुहाई दे देकर चलाते रहे हैं , और यही भ्रष्ट-धर्म ही कहीं न कहीं पित्रसत्तात्मक सत्ता का कारण भी है |

    रही बात प्रेम, विवाह और प्रेम विवाह की, तो यही धार्मिक ढकोसले एक बार फिर सामने आ जाते हैं | अब बताइए प्रेम भी क्या किसी चेकलिस्ट को फोलो करके किया जा सकता है ? और जब एक बार प्रेम हो जाए तो क्या उसे वाकई में ख़त्म किया जा सकता है ? मुझे तो नहीं लगता | फिर बातें आदर्शों, परम्पराओं , रीति-रिवाजों से जोड़ दी जाती हैं | और इंसान ना चाहकर भी झुकता है, क्या करे , उसका साथ देने वाले ही कितने होते हैं|

    कभी-कभी मुझे लगता है प्रेम का इतना तिरस्कार, अपनी पसंद से शादी करने का हक बच्चों से छीन लेना जैसी थिंकिंग ही हमारे समाज से दहेज़, जातिवाद, भाषावाद जैसी कुप्रथाओं को भी नहीं जाने दे रही | नतीजा अच्छे वर की तलाश में माँ-बाप पूरे जीवन की कमाई लुटाने को तैयार बैठे हैं | लड़के बिकाऊ हो जाते हैं, बाकायदा रेट-लिस्ट है, आपके नाम के टाइटिल के हिसाब से |

    मुझे तो इस बात पर भी अक्सर अचम्भा होता है कि किसी रिश्तेदार के बताये, न्यूज़ पेपर में छपे या मैट्रिमोनियल वेबसाइट्स पर मिले रिश्तों पर तो लोग भरोसा कर लेते हैं पर अपने बच्चों के द्वारा पसंद किये गए लाइफ-पार्टनर पर उन्हें शक रहता है | क्यूँ? जिनको शादी करनी है वो ही तो जाने-समझेंगे न अपने बारे में ज्यादा???

    पता नहीं कभी कभी लगता है कि ये धर्म,रीति-रिवाज़ जैसी चीज़ें हमारी ज़िंदगी को आसान बनाने के लिए बनाई गयी थी और आज इनमे ज़िंदगी के अलावा सब मिलता है |

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    1. मुझे भी बहुत ज्यादा आश्चर्य होता है जब ये देखती हूँ कि अपने बच्चों को हर तरह की आधुनिक सुख-सुविधाएँ देने वाले, अपने बच्चों के फैशनेबल कपड़े पहनने पर इतराने वाले, यहाँ तक कि उन्हें विपरीतलिंगी मित्र बनाने की छूट देने वाले माता-पिता शादी जैसे मुद्दों पर रूढ़िवादी बन जाते हैं.

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  6. पूँजीवाद और पितृसत्ता...
    आराधना, दोनो ही वादों को लेकर तुम्हारी समझ
    grass-roots की सी और in-depth है...

    जो रोटी देता है वही भय भी दिखाता है...और तुम्हारे
    जीवन का क़ब्ज़ा भी ले लेता है...कभी-कभी इन्सानी
    आत्मा पर भी सिनाज़ोरी चलती है...और अपने बेहद
    लचिले, परिवर्तनशील और बहुरुपियेपन से वे सभी को
    कठपुतली की तरह नचाता भी है...जहां जीने के अधिकार
    भी बाधित होते है...पितृसत्ता भी इसी सिक्के का दूसरा
    पहलू है...जहां उसके पक्ष में धर्म सत्ताएं खड़ी है और हमारे
    समय की हर छोटी-बडी सत्ता भी खड़ी है...सच कहा है कि
    इससे लड़ने को,इसके हर रुप को जानने को लगातार संघर्ष
    जरूरी है...

    आज पितृसत्ता "शब्द" मात्र भी ( सही स्वरूप को जान ना तो
    बाद की बात है) हमारे देश की ७० % महिलाओं तक शायद
    ही पहुंचा हो...पर नारीवादी-बहसों के ज़रिये इस दिशा में
    हो रहे प्रयत्न भी आशास्पद तो हैं ही.

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  7. प्रेमियो को भी चूँकि रहना तो समाज में ही होता है अतः वो भी विवाह के बाद इसके अनुसार ही ढलने की कोशिश करते हैं।लडके लडकियों से जैसी समाज या परिवार अपेक्षा करता है वैसी ही अपेक्षाएँ प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे से करते है जैसे पुरुष को स्त्री की कोमलता मासूमियत आदि भाती है तो स्त्री को पुरुष का थोड़ा रफ टफ पना या आर्थिक रूप से सुदृढ़ होना आदि। लेकिन जैसे जैसे महिलाओं की स्थिति समाज मे अच्छी हुई है इस बात में भी परिवर्तन आया है।मैंने बहुत से प्रेमी जोडे ऐसे देखे हैं जिनमें लड़का खूबसूरत है लेकिन लड़की साधारण शक्ल सूरत की है।या लडकी लडके से उम्र और कद में भी बड़ी है कुछ मामलों में तो लड़के से ज्यादा कमाती भी है।लेकिन पारंपरिक विवाह में अक्सर ऐसा नहीं हो पाता ये वहीं हो सकता हैं जहाँ बिना कोई शर्त सच्चा प्रेम होता हो।वहाँ आपको पुरुष द्वारा भी बहुत से त्याग और समझौतों की कहानियाँ मिल जाएँगी लेकिन विवाह मे तो केवल सती प्रथा ही दिखाई देती है क्योंकि वहाँ बराबरी नहीं है और समाज का दबाव हावी है।

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  8. पति पत्नी के प्रेम में कितना और कैसा प्रेम होता है कह नहीं सकता लेकिन यह वास्तविक प्रेम से अलग होता है इसमें प्रेम वह कर रहा है जो निर्भर है और उससे कर रहा है जिस पर वह निर्भर है।वही सारे त्याग और समझौते आदि भी कर रहा है यानी की पत्नी।उसे लगता है कि पति की वजह से ही समाज में उसका सम्मान है और उसका अस्तित्व ही पति पर निर्भर करता है ।मैं इसे पत्नी का स्वार्थ तो नहीं कहूँगा लेकिन शायद इस प्रेम में मोह की मात्रा ज्यादा है वहीं यदि कहीं पति खुद आर्थिक रूप से पत्नी पर निर्भर है या इसका सामाजिक रुतबा पत्नी की तुलना में कम है वहाँ खुद पत्नी भी पति के साथ मन से नहीं जुड़ पाती है बहुत सी तो ये ही सोचती होंगी कि ये डैडी ने किस लल्लू के साथ मेरी शादी कर दी।
    और वैसे भी पितृसत्ता तो माँ द्वारा बच्चों के प्रति प्रेम में अंतर करवा देती है जैसे बेटे को अधिक स्नेह बैटी को कम या बिल्कुल नहीं तो फिर स्त्री पुरुष के मध्य प्रेम पर तो असर पडना ही है।

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  9. निचले स्तर पर प्रेम विवाह आज भी एक भयावह त्रासदी ही बनी हुयी है ....बहुत बढ़िया विश्लेषणात्मक प्रस्तुति

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  10. aapke lekh ka andaaj nirala hai!!

    kya prem jaruri hai ya prem vivah??
    mujhe to lagta hai vivak ke uprant panapne wala prem hi sabse behtareen hai:)

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  11. इस पोस्ट को पढ़कर भी बहुत अच्छा लगा।

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    1. धन्यवाद, देखिये हम फिर से ब्लॉगिंग में कूद पड़े हैं :)

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    2. पुण्य का काम किया। अच्छा लग रहा होगा।

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  12. aapke is lekh ko padh kar laga

    - aankhe aur bhi hain~
    kisi pahalu pe najar dalati huyin~
    unke najariyon ko bhi samajho~
    Jo apani aakhen kholani ho //

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  13. Mai bhi soncha karata tha ki kyon akshar prem vivah kuchh dino ke baad ek bojh ban jaata hai.
    Prachalit maanyta ke anusar aise unka ek dushare me interest ka khatm ho jana ya phir rojmarra ki musibato ko mana jata hai, par yadi aisa hai to prem k astitwa par hi sawal khada ho jaata hai.
    Yahan Jo apane bataya ki prem barabari managta hai Jo ki normal family structure me ho nahi pata hai. Mudde ke bare me nayi samajh prasad karata hai.

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बहस चलती रहे, बात निकलती रहे...