शनिवार, 31 जुलाई 2010

मैं ऐसा क्यों करती हूँ?

ये प्रश्न मैंने अपने आप से तब पूछा, जब किसी ने सीधे-सीधे मुझसे पूछ लिया कि मैं ये औरतों वाले मुद्दों के पीछे क्यों पड़ी रहती हूँ??? यह भी कहा कि आप नारीवादियों का बस एक ही काम है औरतों को उनके घर के पुरुषों के खिलाफ भड़काना और पुरुषों के विरुद्ध तरह-तरह के इल्जाम लगाना. आप ये सोच सकते हैं कि कोई मुझसे इतना सब कह गया और मैं सुनती गयी...हाँ, क्योंकि मैं जिस विषय पर शोध कर रही हूँ, जो मेरा मिशन है, उसका पूर्वपक्ष और प्रतिपक्ष सुनना ज़रूरी है. ये देखना ज़रुरी है कि ये मानसिकता हमारे समाज में कितनी गहरी पैठी है कि कोई नारी-सशक्तीकरण की बात सुनना ही नहीं चाहता, या फिर उसे सिर्फ गरीब औरतों से जोड़कर देखता है, पर इससे पहले ये जानना ज़रुरी है कि मैं ऐसा क्यों करती हूँ ? मतलब नारी मुद्दों पर लेख लिखना, कवितायें लिखना, बहस करना, विरोध करना और जिस जगह नारी-सम्बन्धी कोई अनुचित बात दिखे वहाँ कूद पड़ना.

मेरे मन में नारी-मुद्दों को लेकर जो अत्यधिक संवेदनशीलता है, वो सिर्फ इसलिए नहीं है कि मैं अपने जीवन में पुरुषों द्वारा सताई गयी हूँ, हालांकि मैंने भी बहुत कुछ झेला है, जो किसी भी भावुक औरत को विद्रोही बनाने के लिए पर्याप्त है. पर बात इतनी सी ही नहीं है... इससे कहीं आगे की है. मैं गहन अध्ययन और विचार-विमर्श में विश्वास करती हूँ और यह अध्ययन सिर्फ किताबी नहीं है, वास्तविक समाज का अध्ययन है, लोगों का अध्ययन है. इसी कारण मैं समाज को एक नए नजरिये से देखना चाहती हूँ, जो कि कोई भी तार्किक और संवेदनशील व्यक्ति कर सकता है, भले ही उसने उतनी पढ़ाई ना की हो.

हमारा समाज बहुत ही रुढिवादी है, जो कि ना सिर्फ परिवर्तन से डरता है बल्कि चीज़ों को नए दृष्टिकोण से देखना तक नहीं चाहता, पर मैं इतना कहूँगी कि अगर आप किसी बात को बस एक आयाम से देखते हैं, तो कभी भी प्रगति नहीं कर सकते. अगर आपने सिर्फ इतिहास पढ़ा और सबाल्टर्न इतिहास नहीं पढ़ा, तो आपका ज्ञान अधूरा है; सिर्फ संस्कृत पढ़ी, प्राकृत नहीं, तो आप अधूरी जानकारी रखते हैं, इसी तरह मनोविज्ञान के साथ समाजशास्त्र और मानवशास्त्र जुड़ा हुआ है. ये सच है कि कोई भी व्यक्ति एक साथ सभी अंतर्संबंधित विषयों पर मास्टरी नहीं हासिल कर सकता, पर फिर भी एक विषय के साथ अन्य विषयों का सामान्य ज्ञान होना चाहिए और विषय को अलग-अलग दृष्टिकोणों से पढ़ना चाहिये.

अब बात नारीवादी दृष्टिकोण की आती है. मेरा समाज को देखने का यह एक नजरिया है... ध्यान देने योग्य बात है कि 'एक मात्र' नजरिया नहीं. जैसे-जैसे मैं संस्कृत के नए ग्रंथों और अन्य लोकोक्तियों की बारे में पढ़ती जा रही हूँ,  इतिहास और समकालीन समाज को देखने का नारीवादी दृष्टिकोण और भी स्पष्ट होता जा रहा है. इतिहास को देखने के नारीवादी नजरिये के बारे में अपने पिछले लेख में मैं एक संक्षिप्त परिचय दे चुकी हूँ. जैसा कि हम सभी विश्वास करते हैं कि हमारी संस्कृति में नारी का सर्वोच्च स्थान था और उसमें कालान्तर में ह्रास आ गया, मुख्यतः मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारण. इसका मतलब यह कि यदि मुस्लिम आक्रमणकारी नहीं आते तो हमारे देश में नारी की स्थिति घर-बाहर दोनों जगह सर्वोच्च होती. नारीवादी विचारक इस बात को सही नहीं मानते और विभिन्न तर्कों से अपने पक्ष को पुष्ट करते हैं. पिछले लेख में मैं इसे बता चुकी हूँ.

मैंने जब इन नारीवादी विचारकों के विचार पढ़े थे, तो उस पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं किया था, क्योंकि मैं बहुत तार्किक हूँ और किसी की भी बात को बिना अपने तर्क की कसौटी पर उतारे नहीं मानती, लेकिन जैसे-जैसे मैं संस्कृत का अध्ययन और अधिक करती गयी मेरा यह नजरिया पुष्ट होता गया. मैं अभी शोध कर रही हूँ, इसलिए पूरी बात तो यहाँ नहीं रख सकती क्योंकि जो संस्था मुझे फेलोशिप दे रही है, उसकी नियमावली में है कि मैं थीसिस पूरी होने से पहले सम्बंधित विषय पर कुछ प्रकाशित नहीं कर सकती. पर कुछ निष्कर्ष जो मेरे अपने हैं उन्हें कुछ बिंदुओं में रखने का प्रयास कर रही हूँ---

(1.)-- सबसे पहले तो ये बात पूरी तरह सत्य नहीं है कि प्राचीनकाल में भारत में नारी की स्थिति सर्वोच्च थी. यह आंशिक सत्य है. समाज में विवाहिता स्त्री और माता का स्थान अन्य स्त्रियों की अपेक्षा उच्च था. विवाहिता तो अपने पति के अधीन थी, परन्तु माँ सबसे ऊपर थी. यहाँ तक कि उसे ईश्वर से भी उच्च माना गया. परन्तु इसके ठीक विपरीत जो स्त्री माँ नहीं बन पाती, उसे समाज की उपेक्षा झेलनी पड़ती, जो अब भी कायम है. इसी तरह अविवाहित अथवा विधवा को समाज में बिल्कुल सम्मान नहीं मिलता था. स्त्रियों की स्थिति पुरुषों से उनके संबंध के सापेक्ष थी. ये परम्परा अब भी कायम है. समाज में जो सम्मान विवाहित स्त्रियों को प्राप्त है, वह अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा को नहीं और उस पर विडम्बना यह कि विवाहित स्त्री के घरेलू कार्य को उपेक्षा से देखकर समय-समय पर उसकी औकात को बताया जाता रहता है.

(2.)--प्राचीन संस्कृत-साहित्य में स्थापित नारी की 'सती' वाली आदर्श छवि से इतर भी एक छवि रही है और वह थी एक स्वतन्त्र नारी की छवि, जिसे 'कन्या' कहा गया. यह नारी अपने कार्यों और निर्णयों के लिए और यहाँ तक कि यौन-संबंधों के लिए भी किसी एक पुरुष के अधीन नहीं थी. वह अपने निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतन्त्र थी. शास्त्रों में नहीं, अपितु लोक में उसे मान्यता प्राप्त थी. कुंती, द्रौपदी, देवयानी, उर्वशी और सूर्पनखा इसी श्रेणी में आती हैं. यह सभी लोग जानते हैं कि सूर्पनखा ने राम और लक्ष्मण से प्रणय-निवेदन किया था और इसी प्रकार देवयानी ने कच से और उर्वशी ने अर्जुन से प्रणय-निवेदन किया था. ये अलग बात है कि इन सभी को इस कार्य के लिए दंड भोगना पड़ा. क्योंकि तब भी पुरुषप्रधान समाज का एक वर्ग था जो कि स्त्रियों की इस विषय में स्वतंत्रता नहीं पसंद करता था. और भी उदाहरण हैं, विस्तार के भय से और नहीं लिख रही हूँ.

(3.)-- यह भी गलत तथ्य है कि औरतों की स्थिति में ह्रास अर्थात पर्दाप्रथा, सतीप्रथा, बालविवाह आदि मुस्लिमों के आक्रमण के बाद समाज में आये. घूँघट डालना संभ्रांत घरों की स्त्रियों में प्राचीनकाल से प्रचलित है और (उदाहरण- अभिज्ञान शाकुंतल का पाँचवाँ अंक, जब शकुंतला घूँघट डालकर दुष्यंत की सभा में जाती है और बाणभट्ट की कादम्बरी में चांडाल कन्या)  इसी प्रकार बालविवाह ( मनुस्मृति) और सती प्रथा (महाभारत) भी. मात्र जौहरप्रथा मुस्लिमकाल के बहुत बाद मुख्यतः राजपूतों में प्रचलित हुयी.

(4.)-- तत्कालीन विभेदकारी सामाजिक व्यवस्था को लेकर नारियों के एक वर्ग में असंतोष था, जो कि समय-समय पर बाहर आ जाता था, जैसा कि मैंने अपने इस लेख में लिखा है कि किस प्रकार प्राचीन भारत में भी नारी द्वारा सामाजिक विरोध के उदाहरण मिलते हैं.

इस प्रकार मेरे लिए नारीवाद ना सिर्फ एक आंदोलन है, एक विचारधारा है, बल्कि समाज को समझने का एक दृष्टिकोण और उपागम भी है. हमें इतिहास को अवश्य एक नए नज़रिए से देखना होगा और इसके लिए संस्कृत साहित्य को भी नए प्रकार से पढ़ना होगा, ताकि उन लोगों को जवाब दिया जा सके जो भारतीय संस्कृति में औरतों की सर्वोच्च स्थिति के विषय में एक-आध ग्रंथों से कुछ श्लोक उद्धृत करके यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि हमारे देश में इस प्रकार के आंदोलनों की कोई ज़रूरत नहीं है. सच तो यह है कि औरतों के लिए सरकारी स्तर पर, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा, एन.जी.ओज द्वारा और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किये जा रहे इतने प्रयासों के बावजूद उनका सशक्तीकरण इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि हमारे यहाँ के पुरुष अभी भी यह मानने को ही तैयार नहीं होते कि औरतों के साथ भेदभाव होता है और सदियों से होता आया है. हम आज भी अतीत की स्वर्णिम कल्पनाओं में डूबे हुए हैं और जाने कब उबर पायेंगे???
   

29 टिप्‍पणियां:

  1. :)

    Awesome... I agree.

    Aur meri knowledge me izaafa karne ka.. shukriya!

    Badlaav.. hum zaroor layenge...

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  2. kafi gahan adhdhyan kiyaa hai aur nishkarsh bhi achche nikaale hain.

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  3. ये प्रश्न मैंने अपने आप से तब पूछा, जब किसी ने सीधे-सीधे मुझसे पूछ लिया कि मैं ये औरतों वाले मुद्दों के पीछे क्यों पड़ी रहती हूँ??? यह भी कहा कि आप नारीवादियों का बस एक ही काम है औरतों को उनके घर के पुरुषों के खिलाफ भड़काना और पुरुषों के विरुद्ध तरह-तरह के इल्जाम लगाना

    जवाब - आप क्यों गरीबो 'किसानो और आम आदमी के लिए बोलते और लिखते है क्यों उस बेचारे को भड़का रहे है उसके मालिक ,साहूकार ,उद्ययोग्पतियो और सरकार के खिलाफ वो चुपचाप जी रहे है उनकी तरफ से आप क्यों आवाज उठा रहे है बेवजह सरकार पर अमीरों पर इल्जाम लगाते है |इस तरह के सवाल करने वालो को ये जवाब दिया जा सकता है |
    मैंने प्राचीन समय में नारी कि स्थिति के बारे में ज्यादा पढ़ा तो नहीं है पर कुछ नारी है जिनकी स्थिति देख कर नहीं लगता कि उस समय भी नारी को उतना सम्मान मिलता था जितना कि कहा जाता है | चाहे सीता कि अग्नि परीक्षा लेना और उसके बाद भी उनका त्याग कर देना हो या द्रौपती को संम्पति मान कर जुए में हारना फिर भरी सभा में उनका चिर हरन करना हो या विद्योतमा से शास्त्रार्थ में हराने के बाद कुछ विद्वानों द्वारा खुन्नस में उनका विवाह धोखे से कालिदास जैसे मुर्ख से करवाना हो इनको देख कर नहीं लगता कि विवाहित नारी को भी समाज में ज्यादा महत्व और सम्मान नहीं दिया जाता था | पर सीता द्रौपती और विद्योतमा तीनो में ही स्वाभिमान कि कोई कमी नहीं थी | दुबारा त्यागे जाने के बाद सीता वापस राम के कहने पर भी उनके साथ नहीं जाती है और धरती में समां जाती है द्रौपती उसी सभा में अपने अपमान का बदला लेने कि कसम खाती है और विद्योत्मा पति के मुर्ख होने कि बात जान कर उसे अपने घर से निकाल देती है |

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  4. ओह हो , बढ़िया लिखा है आपने , अब ज्यादा तो नहीं बोलूँगा खाशकर इस पोस्ट पर , क्यूंकि इस पोस्ट के जवाब मई भी कुछ लिख रहा हूँ जो आपको जल्द ही पढने के लिए मिलेंगा तब तक इंतेजारकरिए

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  5. सशक्तीकरण इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि हमारे यहाँ के पुरुष अभी भी यह मानने को ही तैयार नहीं होते कि औरतों के साथ भेदभाव होता है और सदियों से होता आया है. हम आज भी अतीत की स्वर्णिम कल्पनाओं में डूबे हुए हैं और जाने कब उबर पायेंगे???
    .....jab tak purush mansikta mein badlav nahi hota tab tak naari sashktikaran kee baat bemani hi hai.. bhale hi apwaadswaroop bhartiya naari aaj bahut tarakki karti dikhti hai lekin uska % kitna hai? Ham jyada door ki nahi shahron mein hi dekhte hai ki kis tarah aaj bhi naari ke saath dogla vyahar hota hai, dogali baat hoti hai....
    ..Naari chintan kee saarthakta liye aapki yah post bahut achhi lagi... aapka naari chintan mujhe behad achha lagta hai ki aap gahrayee se logon ke dukh-dard ko samjhti hai aur sahi disha dene ke liye prayasrat rahti hai..
    Haardik shubhkamnayne

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  6. anshumala@@@@

    --यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ,रमन्ते तत्र देवताः।
    यत्रेतः तू न पूज्यन्ते सर्वा त्रता पद क्रिया

    (मनु स्मरति अध्याय २ श्लोक ५६ ) अर्थात : जहा नारियों का सम्मान होता है वहा देवता (दिव्य गुण ) निवास करते है, और जहां इनका सम्मान नहीं होता है , वहां उनकी सब क्रियायें निष्फल होती है। समाज में स्त्रियों की दशा बहुत उच्च थीं, उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। आर्थिक मामलो की सलाहकार और समाज-व्यवस्था को निर्धारित करने में भी स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्हें भाग्योदया कहा जाता था,,प्रजनार्थ महाभागः पूजार्हा ग्रहदिप्तया। स्त्रियः श्रियस्च गेहेषु न विशेषो स अस्ति कश्चन (मनु स्मरति अध्याय १ श्लोक २६अर्थात :संतान उत्पत्ति के लिए घर का भाग्य उदय करने वाली आदर सम्मान के योग्य है स्त्रिया , शोभा लक्ष्मी और स्त्री में कोई अंतर नहीं ये घर की प्रत्यक्ष शोभा है। ऐसे ही बहुत से उदाहरण हैं , जरूरत हो तो और मिलेंगे

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  7. मिथलेश जी ऐसे हजारो श्लोक है हमारे ग्रंथो में मै भी जानती हु वो महान विद्वानों द्वारा लिखे गये है पर समाज में रहने वाला कोई आम आदमी इनको अपने जीवन में क्या तब और अब भी लागु करता है | मैंने जिन नारियो का जिक्र किया है वो समाज में उच्चे वर्ग से थी उनकी ये स्थिति थी तो अंदाजा लगा सकते है कि एक आम नारी कि क्या स्थिति रही होगी |

    "आर्थिक मामलो की सलाहकार और समाज-व्यवस्था को निर्धारित करने में भी स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान था"

    ऐसा केवल कुछ नारियो ही कर सकती थी जो खुद अपनी हिम्मत से आगे आकर ये करती थी जैसा कि आज भी है |

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  8. एक गंभीर ,शोधपरक और विश्लेष्णात्मक पोस्ट -अगर आप अध्ययन काल को और भी पीछे -पूर्ववैदिक /प्रागैतिहासिक काल में जायं और तत्कालीन समाज के जैवीय ,पुरा-शास्त्रीय साक्ष्यों को भी संज्ञान में लें तो वस्तुस्थिति का नीर क्षीर विवेचन हो सकेगा !इस धरा पर मनुष्य के पदार्पण के लगभग डेढ़ दो लाख वर्ष बीत चुके हैं मगर कथित संस्कृति हद से हद १० से १५ हजार वर्ष पुरानी है -मनुष्य के बारे में कोई भी अध्ययन केवल उसके अल्पावधि सांस्कृतिक सभ्यता के दृष्टिगत ही होता है तो वह अपूर्ण होगा .
    नर नारी अपने अपने दायित्वों में बराबरी के दर्जे पर रहे हैं -हाँ हमारी कुछ गैर तार्किक धार्मिक मान्यताओं ने उनकी स्थति शोचनीय बनायी है !

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  9. एक गंभीर ,शोधपरक और विश्लेष्णात्मक पोस्ट -अगर आप अध्ययन काल को और भी पीछे -पूर्ववैदिक /प्रागैतिहासिक काल में जायं और तत्कालीन समाज के जैवीय ,पुरा-शास्त्रीय साक्ष्यों को भी संज्ञान में लें तो वस्तुस्थिति का नीर क्षीर विवेचन हो सकेगा !इस धरा पर मनुष्य के पदार्पण के लगभग डेढ़ दो लाख वर्ष बीत चुके हैं मगर कथित संस्कृति हद से हद १० से १५ हजार वर्ष पुरानी है -मनुष्य के बारे में कोई भी अध्ययन केवल उसके अल्पावधि सांस्कृतिक सभ्यता के दृष्टिगत ही होता है तो वह अपूर्ण होगा .
    नर नारी अपने अपने दायित्वों में बराबरी के दर्जे पर रहे हैं -हाँ हमारी कुछ गैर तार्किक धार्मिक मान्यताओं ने उनकी स्थति शोचनीय बनायी है !

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  10. @ अरविंद जी, वैदिककाल में नारी की स्थिति पश्चातकालीन समाज की अपेक्षा उच्चतर थी, इसमें कोई संदेह नहीं, परन्तु उतनी भी ऊंची नहीं थी, जितना प्रस्तुत किया जाता है. मातृसत्तात्मक समाज का कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता.फिर भी यदि मान लिया जाए कि आदि समाज मातृसत्तात्मक था, तो उसे पितृसत्तात्मक किसने बनाया??? और क्यों??? यदि आदि समाज में महिलायें शिकार जैसा कार्य कर सकती थीं, तो पशुपालन और कृषिकालीन समाज में वैसा कार्य क्यों नहीं कर सकती थीं??? ये तो आप भी जानते हैं कि दलित वर्ग की औरतें आज भी कृषिकार्यों में बराबर हिस्सा लेती हैं, तो फिर सवर्ण औरतों को किसने रोका था?
    @ मिथिलेश, मैंने पहले भी कहा है कि एक-आध ग्रन्थ पढ़कर कुछ श्लोक उद्धृत कर देने से वास्तविकता बदल नहीं जायेगी. पहले सारा संस्कृत साहित्य पढ़ लो, रामायण और महाभारत पढ़ लो कम से कम प्रमुख स्मृतियाँ पढ़ लो, प्रमुख पुराण नहीं तो उन पर आधारित कुछ आलोचनात्मक पुस्तकें पढ़ लो और फिर उस पर मनन करो. परिणाम एकदम उलटे निकलेंगे.
    लेकिन नहीं, पढ़ना उतना ज़रुरी नहीं जितना कि तार्किक होना. यदि आप तार्किक नहीं हैं और सदियों पहले कुछ ग्रंथों में जो लिख दिया गया, उसे आँख मूँदकर आज के युग में लागू करना चाहते हैं, तो आपको इन ग्रंथों में भी वही बातें दिखाई देंगी, जो आप देखना चाहेंगे और ग्रंथों को ज्यों का त्यों पढ़ लेने और उस पर मनन ना करने से पढ़ने का कोई फायदा नहीं.

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  11. आप उन रचनाकारों में से है जो स्‍त्री विमर्श के ऊपर लिखती रही है और समकालीन भारतीय स्‍त्री के दुख दर्द को केंद्र में रखकर लिखती रही है। उन्‍हें पढ़ते हुए किसी आधुनिक, पेशेवर या समय के कदमताल करती स्‍त्री का चेहरा सामने जरूर आ जाते हैं कि आज के स्‍त्री विमर्श की केंद्रीय चिंता क्या है ?

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  12. @ मनोज जी, केन्द्रीय चिंता है उनलोगों के शंका का समाधान करना, जो ये मान बैठे हैं कि हमारे देश में सब कुछ ठीक-ठाक है... आज भी और प्राचीनकाल से भी. हमारे यहाँ प्राचीनकाल से औरतों को बहुत सम्मान प्राप्त है. इसलिए उनके सशक्तीकरण की ज़रूरत नहीं. बस हम जैसे कुछ नारीवादियो ने ये भ्रम फैला रखा है कि नारी को अधिकारों की ज़रूरत है...
    समस्या यह है कि ये लोग समझना नहीं चाहते, जबकि किसी भी समस्या का हल तब तक नहीं हो सकता जब तक सम्पूर्ण समाज उसे समस्या मान ना ले.

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  13. आराधना, .. थोड़ी लम्बी टिप्पणी करूँगा ।
    मेरा अभीष्ट कुतर्क करने का नहीं है.. अतएव अन्यथा न लेना ।
    यह एक निताँत यूटोपिक ( Utopic ) भ्रम है कि, प्राचीन में नारी को समान अधिकार प्राप्त थे ।
    मैं इसे पुनः दोहराऊँगा.. यह एक निताँत यूटोपिक ( Utopic ) भ्रम है कि, प्राचीन में नारी को समान अधिकार प्राप्त थे ।

    विश्व में युगपरिवर्तन की आँधियाँ चलती रही और हमारे कर्मकाँडी पँडित कोंहड़ा-कद्दू में लटके वर्ज़नाओं के नियम गढ़ने में सिर धुनते रहे.. दूसरी ओर एक दूसरा वर्ग विद्वता की डकारें लेता, समाज को हाँकता और चराता रहा । प्रचलित कालसँदर्भ में, स्थितियों के हिसाब से प्राचीन ग्रँथों के उद्धरण अपने सुविधानुसार रखे जाते रहे हैं । नासमझों के ज़मात की वाह-वाह ने इन फुसलाऊ फ़तवों को इस कदर सार्वभौमिक बना दिया जैसे यह शाश्वत रहे हों । उनकी नीतियाँ समाज को जागृत करने और ललकारने की कम, राज्य और स्वहित में फुसलाने और बहलाये रखने की अधिक थी । उनकी गढ़ी हुई रूढ़ियाँ हम आज तक ढो रहे हैं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी इसमें कुछ न कुछ सहर्ष जोड़ते ही जा रहे हैं ।
    नारी को इन्हीं रूढ़ियों ने जकड़ रखा है, न कि पुरुषों ने ( सदैव से विद्वता अपने को निरपेक्ष नपुसँक लिंग बने रहने में ही सुरक्षित मानता रहा है ! )
    मैं सहमत हूँ तुमसे.." समाज को एक नए संवेदनशील नजरिये से देखने की ज़रूरत है, जो तार्किक व्यक्ति कर सकता है, भले ही उसने उतनी पढ़ाई ना की हो. पर सच यही है कि समाज बड़ा रुढिवादी है, परिवर्तन से डरता है , चीज़ों को नए दृष्टिकोण से देखना नहीं चाहता, यह भी सच है कि अगर हम किसी बात को बस एक आयाम से देखते हैं, तो कभी भी प्रगति नहीं कर सकते.
    पर इससे पहले हमें यह जानना और समझना चाहिये कि विद्वजन समाज के सम्मुख वही आयाम प्रस्तुत करते आये हैं, जो उनके अनुकूल बैठता था । नतीज़ा.. भारत की सँस्कृति महान होने के बावज़ूद इस अँधे कुँयें का कूपमँडूक बनी रामगुन गा रही है !
    नमूने देखोगी ?
    असूर्यंपश्या या नार्यः शुद्धाश्च पतिव्रता
    स्वच्छँदगामिनी या सा स्वतँत्रा शूकरी समा ( ब्रह्मवैवर्त )
    इसके आगे देखो..
    पिता रक्षति कौमारे भर्त्ता रक्षति यवने
    पुत्रो रक्षति वार्धक्ये न स्त्री स्वातँत्र्यमर्हति
    और यह भी है..
    द्वारोपवेशनं नित्यं गवाक्षेण निरीक्षणम
    असतप्रलापो हास्यं च दूषितं कु्लयोषिताम ( व्याससँहिता )
    बेचारे तालिबान इनके चरण चाँपते नज़र आते, जब वो यह पढ़ते
    आगुल्फाद धारयेद वासः नेत्रेत प्रकटस्तनीम
    नग्नां परस्त्रियं दृष्ट्वा व्रतमेकं समाचरेत ( शँखस्मृति )
    तब तो आज टी-शर्ट धारिणी सभी यौवनायें प्रायश्चित में व्रत करते करते जाने कहाँ बिला गयी होतीं :)
    स्त्री शिक्षा ? अरे राम भजो.. बालां तु पाठयेत तावत यावन्नहि कुचोद्गमः
    या फिर यह..
    प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति
    मासि मासि रजस्तस्याः पिब्रन्ति पितरोऽनिशम ( यमसँहिता )
    रोमकाले तु संप्राप्ते सोमो भुंजीथ कन्यकाम
    रजः काले तु गँधर्वो वह्निस्तु कुचदर्शने ( पराशरस्मृति )
    और यह आश्चर्य है कि यह सब भारतवर्ष में ही लागू था :)
    सुपुण्ये भारतेवर्षें पतिसेवा करोति या
    बैकुण्ठं स्वामिनां सार्धं सा याति ब्रह्मणः शतम ( ब्रह्मवैवर्त )

    ( समयाभाव व स्थानाभाव दोनों ही हैं, अतः तुम इनकी व्याख़्या अगली पोस्ट / टिप्पणी में कर देना )
    धन्यवाद तुम्हे.. कि ब्लॉगजगत के चिर शैशवकाल में किसी पोस्टविशेष के लिये एक वर्ष पहले एकत्रित नोट्स व सँदर्भों का यहाँ आँशिक उपयोग हो सका..
    ( तब मुझे आगाह किया गया था कि यह विषय गरिष्ठ है.. फलस्वरूप मैं निट्ठल्ला ही बना रह गया ! उसके मज़े अलग हैं । )

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  14. @ अमर जी,
    इस लंबी टिप्पणी के लिए आभार. मैं लकीर पीटकर भारतीय संस्कृति का गुणगान करने वालों से तंग आ गयी थी. आपने मेरा साथ तो दिया. अमूमन इन पोंगापंथियों का विरोध करने वालों के पास सन्दर्भ की कमी होती है और इनलोगों के पास बस कोटेशन ही कोटेशन होते हैं, अपनी बुद्धि तो होती नहीं. आपने अपनी बात बहुत अच्छी तरह से रखी. फिर से धन्यवाद !

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  15. अभी अभी शेष टिप्पणियाँ पढ़ीं,
    हालाँकि मैं प्रमाद.. विवाद.. मवाद और भी अन्य किसिम के वाद से बचता आया हूँ
    पर, लगता है कि इसी भावों की टिप्पणी मुक्ति पहले ही कर चुकी हैं ।
    एहिका बुढ़वा बानर केर गुलाटी जिन मानौ, भाय !
    सो, ( No offences intended, Mukti ) मुझे मुक्तिवादी माना जाये :)
    इसे श्लेष में लिया जा सकता है :-)

    --यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ,रमन्ते तत्र देवताः।
    यत्रेतः तू न पूज्यन्ते सर्वा त्रता पद क्रिया
    जैसा मैंनें कहा है.. यह एक फुसलाऊ सृजन है ।
    देवी की स्तुति तक में ऋषियों, ब्रह्मचारियों की दृष्टि कुच, स्तन, नितम्ब इत्यादि न जाने कहाँ कहाँ टिकी रही है.. वह इस टिप्पणी का विषय नहीं है ।

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  16. अरे, आराधना और मुक्ति एक ही हैं ?
    कभी प्रोफ़ाइल भी देख लिया कर, निट्ठल्ले !

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  17. @ अमर जी,
    एहिका बुढ़वा बानर केर गुलाटी जिन मानौ, भाय !
    बहुत सही !

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 01.08.10 की चर्चा मंच में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  19. डॉ अमर मेरे भी गुरु है बल्कि कहें तो जन गुरु हैं ....उन्होंने अपने स्वर्णकाल {:)} के कुछ अध्ययन उद्धरणों को यहाँ संरक्षित कर दिया -जीवन में ऐसी प्रतिक्रियात्मकता कभी न कभी हिलोरे लेती ही है -मनन शील व्यक्तित्व नीर क्षीर विवेचन की ओर शनैः शनैः बढ़ता रहता है ....उद्धृत अंशों को महज खयाली पुलाव न मान कर उनके पीछे के देश काल परिस्थितियों को भी देखना होगा ....वैसे उनकी संस्कृत बहुत प्रांजल प्यारी हैं ....मैं तो उसी पर मोहित हो १०० में नब्बे दे दूंगा ..अर्थ वर्थ के पचड़े में कौन पड़े :)
    मुक्ति ,नारी पुरुष के साथ शिकार पर बहुत कम आपवादिक तौर पर जाती थी ,नृशास्त्री ,जीवशास्त्री इस पर एक राय हैं ,मगर घर गृहस्थी ,किचेन गार्डेन का जिमा उसने बहुत कुशलता से ले रखा था -सैन्धव सभ्यता मूलतः मातृसत्तात्मक थी ...ऐसा लगता है -आर्यों से हुयी भिडंत में पुरुषों के जीनोसाईड के उपरान्त भी मातृसत्ता की हनक वैदिक कल में भी दिखती है -ऋषि पत्नी उतनी ही सम्मानित दिखती है ...कालांतर में नारी की स्थिति गिरती गयी इसमें शक नहीं है ....आज भी वह अपने अत्यंत विकृत रूप में ही है ...हम एक संभ्रमित ,दिशाहीन विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं -यह भी कतई सही नहीं है की भारतीय नारीवाद नारी की स्वतंत्रता और आधुनिकता को एकदम सही परिप्रेक्ष्य दे पा रहा है -संदर्भों से एकदम कट कर हम कहीं नहीं पहुँच सकते ..यह एक बड़ा विषय है ,कई सेमिनारों में भी न समा पाने वाला ..अतः डॉ अमर कुमार जी के उद्धरणों के अभिप्रेत भाष्य से विचलित न होकर अपनी सहज तटस्थता बनाए रखें जो एक अध्येता के लिए परमावश्यक है ...अष्टावक्र के २४ गुरु थे -आपको बाताना है क्या ?

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  20. जब भी ऐसी कोई पोस्ट पढता हूं तो मेरे मन में हमेशा ही एक तथ्य उभर कर सामने आ जाता है .......
    देश की पहली महिला आईपीएस ...किरन बेदी ..जिनका लोहा पूरे विश्व ने माना ...उन्हें दिल्ली पुलिस से लगभग अपमानित होकर जबरन ही अवकाश ग्रहण करने पर मजबूर कर दिया गया वो भी तब .........जब गद्दी पर सोनिया गांधी , प्रतिभा पाटिल , और शीला दीक्षित विराजमान थीं .......कमाल है कि एक भी प्रतिक्रिया नहीं हुई.....न नारियों की तरफ़ से ..न ही नारिवादियों की तरफ़ से ...पुरूष तो खैर पुरूष ही ठहरे ।

    आपका आलेख तथ्यपरक है और बहुत ही तर्कपूर्ण भी .......मगर जाने क्यों मैं ये सब लिख गया .......

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  21. लेख और सारी टिप्पणियाँ पढ़ीं ...टिप्पणियाँ सार्थक हैं ...तुम्हारे विषय को बढ़ाती हुईं .....आज भी समाज नारी को यही कह कर फुसलाता है की नारी की पूजा होती है भारत देश में ....लेकिन यदि आंकड़े इक्कठे किये जाएँ तो सबसे ज्यादा शोषण भी यहीं होता है....बहुत दूर की बात क्यों करें ...सीता के जीवन से ही देख लिया जाये ...हर घडी परीक्षा ही तो देती रहीं और अंत में मिला क्या ?
    अहिल्या का कौन स गुनाह था ? और उनका उद्धार भी किया तो राम ने चरण छुआ कर ? तुम्हारे शोध के लिए मेरी शुभकामनयें ...यूँ ही जागरूक करने का बीड़ा उठाये रखो....कभी सुबह तो आएगी

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  22. @ अजय जी,
    आपका कहना बिल्कुल सही है. यदि सत्ता में रहने वाली औरतें देश की आम औरत के बारे में सोचतीं तो इंदिरा जी के समय में ही कल्याण हो गया होता. पर पितृसत्ता की यही विशेषता है कि वह विचारधारा स्त्री-पुरुषों दोनों पर सामान्य रूप से लागू होती है. पितृसत्ता एक पद्सोपानीय व्यवस्था बनाती है, जिसमें जो सत्ता में होता है, वह दूसरों का शोषण करता है ( अपने देश की व्यवस्था ब्राह्माणवादी पितृसत्तात्मक है अर्थात सवर्ण सर्वोच्च स्थान पर दलित सबसे नीचे) प्रायः सत्ता में पुरुष ही रहा है, जब महिलायें आयी भी हैं तो वे भी उसी विचारधारा में ढल गयीं. जिन्होंने नहीं ढलना चाहा, जैसे कि किरण बेदी ने उन्हें निकाल बाहर किया गया.
    मेरे ख्याल से आपको उत्तर मिल गया होगा.

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  23. हमारा समाज बहुत ही रुढिवादी है, जो कि ना सिर्फ परिवर्तन से डरता है बल्कि चीज़ों को नए दृष्टिकोण से देखना तक नहीं चाहता !!!
    सशक्त तहरीर !!!!

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  24. इस विषय पर मैंने शोध तो नही किया मुक्ति पर पढ़ा बहुत है.कभी वक्त मिला तब लिखूंगी. लोगों की आपत्तिओ का जवाब एक एक पाइंट को विस्तार से लिख कर दो,वह ठीक होगा.

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  25. arvind ji ki baate uchit lagi aur aapke uthaye huye mudde bhi aham hai .yah sach to nahi badla shayad umeed bhi kam nazar aati hai ,aapki koshish tarife kabil hai .umda

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  26. देरी से आने का यही नुक्सान है ..सब कुछ तो कहा जा चुका होता है ..
    भारत में औरतों कि स्थिति में बदलाव आया तो है पर उपरी तौर पर ..मानसिकता आज भी वही है .
    बहुत शुभकामनाये आराधना .

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  27. हमारा समाज बहुत ही रुढिवादी है, जो कि ना सिर्फ परिवर्तन से डरता है बल्कि चीज़ों को नए दृष्टिकोण से देखना तक नहीं चाहता, पर मैं इतना कहूँगी कि अगर आप किसी बात को बस एक आयाम से देखते हैं, तो कभी भी प्रगति नहीं कर सकते.
    aaj phir padhi aur yah baat bilkul sahi lagi aapki .bina sahyog kuchh nahi .

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  28. नमस्ते मुक्ति जी..बहुत ही गहन शोध किया है आपने....
    मै आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हू..great thoughts ..Archana

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  29. सुन्दर,पावन, निर्मल, करूण, अनुरागी,..इत्यादि जितने भी सुन्दर भाव धरती पर है उससे अलंकृत नारी के सन्दर्भ में आप के लेखन को साधूवाद!

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बहस चलती रहे, बात निकलती रहे...