शर्मिला रेगे ने भारतीय नारीवाद को केवल सवर्ण और शहरी महिलाओं के दायरे से बाहर निकालकर दलित, शोषित और हाशिए के समाज की महिलाओं की असली आवाज़ बनाया। इस ब्लॉग पोस्ट में हम शर्मिला रेगे के जीवन, उनकी क्रांतिकारी 'दलित स्टैंडपॉइंट थ्योरी' (Dalit Standpoint Theory), उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों और समाजशास्त्र में उनके योगदान के बारे में विस्तार से जानेंगे।
![]() |
शर्मिला रेगे का संक्षिप्त जीवन परिचय (Biography of Sharmila Rege)
जन्म और शिक्षा: शर्मिला रेगे का जन्म 1 नवंबर 1964 को हुआ था। उन्होंने समाजशास्त्र (Sociology) के क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त की और अकादमिक जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई।
कार्यक्षेत्र: वह पुणे विश्वविद्यालय (अब सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय) में 'क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले स्त्री अध्ययन केंद्र' (Gender Studies Center) की निदेशक रहीं। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का माध्यम माना।
निधन: कैंसर के कारण 13 जुलाई 2013 को मात्र 48 वर्ष की आयु में उनका आकस्मिक निधन हो गया। इतनी कम उम्र में भी उन्होंने जो काम किया, वह आज भी प्रासंगिक है।
शर्मिला रेगे की 'दलित स्टैंडपॉइंट थ्योरी' क्या है? (What is Dalit Standpoint Theory?)
शर्मिला रेगे का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी योगदान भारतीय स्त्रीवाद में 'दलित स्टैंडपॉइंट थ्योरी' (Dalit Standpoint Theory) को स्थापित करना था। सरल शब्दों में कहें तो 'स्टैंडपॉइंट थ्योरी' का मतलब है कि किसी भी सामाजिक समस्या को उस व्यक्ति के नज़रिए से देखना और समझना, जो समाज में सबसे ज्यादा प्रताड़ित या हाशिए पर है।
उन्होंने 1998 में अपने एक बेहद प्रसिद्ध शोध पत्र "Dalit Women Talk Differently: A Critique of 'Difference' and Towards a Dalit Feminist Standpoint" के माध्यम से इस सिद्धांत को सामने रखा। उनकी इस थ्योरी के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. तिहरा उत्पीड़न (Triple Oppression)
रेगे का तर्क था कि एक दलित महिला समाज में केवल एक मोर्चे पर नहीं, बल्कि तीन स्तरों पर शोषण का सामना करती है:
जेंडर (Gender): महिला होने के कारण पितृसत्ता का शिकार।
जाति (Caste): दलित होने के कारण जातिगत भेदभाव और छुआछूत का शिकार।
वर्ग (Class): आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण श्रम का शोषण।
2. सवर्ण बनाम दलित महिला का अनुभव
इस थ्योरी के अनुसार, एक सवर्ण (Upper-caste) महिला का पितृसत्तात्मक अनुभव और एक दलित महिला का अनुभव एक जैसा नहीं हो सकता। सवर्ण महिला का संघर्ष अक्सर घर की चारदीवारी के भीतर के अधिकारों, शिक्षा या नौकरी को लेकर था। इसके विपरीत, दलित महिला को सार्वजनिक स्थानों पर पानी भरने, मजदूरी के दौरान यौन शोषण और खुलेआम जातिगत हिंसा का सामना करना पड़ता था। इसलिए सभी महिलाओं की समस्याओं को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
3. ब्राह्मणवादी पितृसत्ता (Brahmanical Patriarchy)
उन्होंने खुलकर लिखा कि भारत में पितृसत्ता का चरित्र 'ब्राह्मणवादी' है। इसका मतलब है कि जाति व्यवस्था की शुद्धता (Purity) को बनाए रखने के लिए महिलाओं की लैंगिकता (Sexuality) और उनके विवाहों पर कड़ा नियंत्रण रखा जाता है। दलित स्टैंडपॉइंट इस ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के ढांचे को तोड़ता है।
4. 'बोलने' और 'ज्ञान निर्माण' का अधिकार
अकादमिक जगत में हमेशा दूसरों ने दलितों के बारे में लिखा। शर्मिला रेगे की थ्योरी कहती है कि दलित महिलाओं को अपने अनुभव खुद बयां करने का अधिकार होना चाहिए। जब दलित महिलाएं अपनी आत्मकथाएं और गवाहियां (Testimonies) लिखती हैं, तो वह समाज का एक प्रामाणिक इतिहास होता है। इसीलिए उन्होंने अपनी पुस्तक में दलित स्त्रियों की आत्मकथाओं को सम्मिलित किया।
5. यह केवल दलित महिलाओं के लिए नहीं है (Alliance Building)
शर्मिला रेगे ने स्पष्ट किया कि 'दलित स्टैंडपॉइंट' एक दृष्टिकोण है। एक गैर-दलित महिला या पुरुष भी अपनी विशेषाधिकार प्राप्त (Privileged) स्थिति को छोड़कर इस स्टैंडपॉइंट को अपना सकते हैं और इस न्याय की लड़ाई का हिस्सा बन सकते हैं।
शर्मिला रेगे की प्रसिद्ध पुस्तकें (Famous Books by Sharmila Rege)
यदि आप उनके विचारों को गहराई से समझना चाहते हैं, तो उनकी निम्नलिखित पुस्तकें ज़रूर पढ़नी चाहिए:
Writing Caste, Writing Gender: Narrating Dalit Women's Testimonies (2006)
यह उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब है। इसमें उन्होंने दलित महिलाओं की आत्मकथाओं के जरिए उनके संघर्षों, दर्द और साहस को बयां किया है।
'Writing Caste, Writing Gender' पुस्तक का विस्तृत विश्लेषण
यह पुस्तक केवल एक अकादमिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह दलित महिलाओं के छिपे हुए इतिहास और उनके संघर्षों का एक जीवंत दस्तावेज है। इस पुस्तक के माध्यम से शर्मिला रेगे ने मुख्यधारा के इतिहास और नारीवाद दोनों को चुनौती दी है।
1. दलित महिलाओं की आत्मकथाओं का संकलन (Dalit Women's Testimonies)
इस पुस्तक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि शर्मिला रेगे ने इसमें महाराष्ट्र की विभिन्न पीढ़ियों की दलित महिलाओं की आत्मकथाओं (Testimonies) और संस्मरणों का अनुवाद और विश्लेषण किया है। इनमें कुमुद पावड़े, शांताबाई दाणी, बेबी कांबले और उर्मिला पवार जैसी प्रख्यात दलित लेखिकाओं के काम शामिल हैं। रेगे इन्हें केवल 'आत्मकथा' नहीं मानतीं, बल्कि वे इन्हें समाज की 'गवाही' (Testimony) कहती हैं, जो पूरे समाज की कड़वी सच्चाई को उजागर करती हैं।
2. 'व्यक्तिगत ही राजनीतिक है' का नया अर्थ (Personal is Political)
नारीवाद का एक प्रसिद्ध नारा है - "The Personal is Political" (व्यक्तिगत ही राजनीतिक है)। शर्मिला रेगे ने इस किताब में दिखाया कि कैसे एक दलित महिला का व्यक्तिगत जीवन (जैसे उसका घर, उसका चूल्हा-चौका, उसका शरीर और उसके साथ होने वाली हिंसा) सीधे तौर पर देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। जब ये महिलाएं लिखती हैं, तो वे केवल अपना दर्द नहीं लिखतीं, बल्कि वे उस जातिवादी व्यवस्था पर प्रहार करती हैं जिसने उन्हें सदियों से दबाकर रखा।
3. मुख्यधारा के इतिहास को चुनौती
शर्मिला रेगे इस पुस्तक में तर्क देती हैं कि भारत के आधुनिक इतिहास और स्त्रीवादी इतिहास दोनों ने दलित महिलाओं के योगदान को नजरअंदाज किया। जहां एक तरफ पुरुषों के नेतृत्व वाले दलित आंदोलनों ने महिलाओं के विशिष्ट मुद्दों (जैसे घरेलू हिंसा या पितृसत्ता) को दबा दिया, वहीं सवर्ण महिलाओं के आंदोलनों ने जाति के सवाल को अनदेखा कर दिया। यह पुस्तक उस खाली जगह को भरती है।
4. रोजमर्रा के संघर्षों का चित्रण
पुस्तक में शामिल गवाहियां बताती हैं कि कैसे एक दलित महिला को हर दिन पानी भरने, मजदूरी करने, भोजन जुटाने और सार्वजनिक स्थानों पर अपमान का सामना करना पड़ता था। इसके बावजूद, यह पुस्तक उन्हें केवल 'बेचारी' या 'पीड़ित' (Victims) के रूप में नहीं दिखाती, बल्कि उन्हें प्रतिरोध (Resistance) और साहस के प्रतीक के रूप में पेश करती है, जिन्होंने हर विपरीत परिस्थिति में लड़ना सीखा।
5. भाषा और अनुवाद का महत्व
रेगे ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि इन महिलाओं ने अपनी क्षेत्रीय और अनौपचारिक भाषाओं (जैसे मराठी की स्थानीय बोलियों) में लिखा था। उन्होंने इन आत्मकथाओं का अंग्रेजी में अनुवाद करते समय उनके मूल भाव, गुस्से और दर्द को उसी रूप में बनाए रखने का प्रयास किया, ताकि वैश्विक स्तर पर लोग इनके संघर्ष को समझ सकें।
अन्य पुस्तकें
Sociology of Gender: The Challenge of Feminist Sociological Knowledge (2003)
इस पुस्तक में उन्होंने बताया है कि कैसे समाजशास्त्र के भीतर स्त्रीवादी दृष्टिकोण को शामिल करके समाज को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
Against the Madness of Manu: B.R. Ambedkar's Writings on Brahmanical Patriarchy (2013)
इस किताब में डॉ. बी.आर. आंबेडकर के पितृसत्ता और जाति व्यवस्था पर लिखे गए लेखों का संकलन और बेहतरीन विश्लेषण है।
निष्कर्ष (Conclusion)
शर्मिला रेगे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार आज भी हर उस व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक हैं जो समानता में विश्वास रखता है। उन्होंने हमें सिखाया कि जब तक हम समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी महिला के हक की बात नहीं करेंगे, तब तक हमारा स्त्रीवाद अधूरा और झूठा है। उन्होंने समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम में डॉ. आंबेडकर, महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के विचारों को शामिल कराकर शिक्षा व्यवस्था को और समृद्ध किया।
