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शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

शर्मिला रेगे का जीवन परिचय और दलित स्टैंडपॉइंट थ्योरी: भारतीय स्त्रीवाद को बदलने वाली प्रखर विचारक


अगर आप भारत में स्त्रीवाद (Feminism) के इतिहास और उसकी सबसे मजबूत आवाज़ को समझना चाहते हैं, तो आपको प्रख्यात समाजशास्त्री और भारतीय स्त्रीवादी विचारक शर्मिला रेगे (Sharmila Rege) के विचारों को ज़रूर जानना चाहिए।

शर्मिला रेगे ने भारतीय नारीवाद को केवल सवर्ण और शहरी महिलाओं के दायरे से बाहर निकालकर दलित, शोषित और हाशिए के समाज की महिलाओं की असली आवाज़ बनाया। इस ब्लॉग पोस्ट में हम शर्मिला रेगे के जीवन, उनकी क्रांतिकारी 'दलित स्टैंडपॉइंट थ्योरी' (Dalit Standpoint Theory), उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों और समाजशास्त्र में उनके योगदान के बारे में विस्तार से जानेंगे।

शर्मीला रेगे के जीवन एवं विचारों का परिचय
शर्मीला रेगे (फोटो विकिपीडिया से साभार)

शर्मिला रेगे का संक्षिप्त जीवन परिचय (Biography of Sharmila Rege)

जन्म और शिक्षा: शर्मिला रेगे का जन्म 1 नवंबर 1964 को हुआ था। उन्होंने समाजशास्त्र (Sociology) के क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त की और अकादमिक जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई।

कार्यक्षेत्र: वह पुणे विश्वविद्यालय (अब सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय) में 'क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले स्त्री अध्ययन केंद्र' (Gender Studies Center) की निदेशक रहीं। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का माध्यम माना।

निधन: कैंसर के कारण 13 जुलाई 2013 को मात्र 48 वर्ष की आयु में उनका आकस्मिक निधन हो गया। इतनी कम उम्र में भी उन्होंने जो काम किया, वह आज भी प्रासंगिक है।

शर्मिला रेगे की 'दलित स्टैंडपॉइंट थ्योरी' क्या है? (What is Dalit Standpoint Theory?)

शर्मिला रेगे का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी योगदान भारतीय स्त्रीवाद में 'दलित स्टैंडपॉइंट थ्योरी' (Dalit Standpoint Theory) को स्थापित करना था। सरल शब्दों में कहें तो 'स्टैंडपॉइंट थ्योरी' का मतलब है कि किसी भी सामाजिक समस्या को उस व्यक्ति के नज़रिए से देखना और समझना, जो समाज में सबसे ज्यादा प्रताड़ित या हाशिए पर है।

उन्होंने 1998 में अपने एक बेहद प्रसिद्ध शोध पत्र "Dalit Women Talk Differently: A Critique of 'Difference' and Towards a Dalit Feminist Standpoint" के माध्यम से इस सिद्धांत को सामने रखा। उनकी इस थ्योरी के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. तिहरा उत्पीड़न (Triple Oppression)

रेगे का तर्क था कि एक दलित महिला समाज में केवल एक मोर्चे पर नहीं, बल्कि तीन स्तरों पर शोषण का सामना करती है:

जेंडर (Gender): महिला होने के कारण पितृसत्ता का शिकार।

जाति (Caste): दलित होने के कारण जातिगत भेदभाव और छुआछूत का शिकार।

वर्ग (Class): आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण श्रम का शोषण।

2. सवर्ण बनाम दलित महिला का अनुभव

इस थ्योरी के अनुसार, एक सवर्ण (Upper-caste) महिला का पितृसत्तात्मक अनुभव और एक दलित महिला का अनुभव एक जैसा नहीं हो सकता। सवर्ण महिला का संघर्ष अक्सर घर की चारदीवारी के भीतर के अधिकारों, शिक्षा या नौकरी को लेकर था। इसके विपरीत, दलित महिला को सार्वजनिक स्थानों पर पानी भरने, मजदूरी के दौरान यौन शोषण और खुलेआम जातिगत हिंसा का सामना करना पड़ता था। इसलिए सभी महिलाओं की समस्याओं को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

3. ब्राह्मणवादी पितृसत्ता (Brahmanical Patriarchy)

उन्होंने खुलकर लिखा कि भारत में पितृसत्ता का चरित्र 'ब्राह्मणवादी' है। इसका मतलब है कि जाति व्यवस्था की शुद्धता (Purity) को बनाए रखने के लिए महिलाओं की लैंगिकता (Sexuality) और उनके विवाहों पर कड़ा नियंत्रण रखा जाता है। दलित स्टैंडपॉइंट इस ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के ढांचे को तोड़ता है।

4. 'बोलने' और 'ज्ञान निर्माण' का अधिकार

अकादमिक जगत में हमेशा दूसरों ने दलितों के बारे में लिखा। शर्मिला रेगे की थ्योरी कहती है कि दलित महिलाओं को अपने अनुभव खुद बयां करने का अधिकार होना चाहिए। जब दलित महिलाएं अपनी आत्मकथाएं और गवाहियां (Testimonies) लिखती हैं, तो वह समाज का एक प्रामाणिक इतिहास होता है। इसीलिए उन्होंने अपनी पुस्तक में दलित स्त्रियों की आत्मकथाओं को सम्मिलित किया। 

5. यह केवल दलित महिलाओं के लिए नहीं है (Alliance Building)

शर्मिला रेगे ने स्पष्ट किया कि 'दलित स्टैंडपॉइंट' एक दृष्टिकोण है। एक गैर-दलित महिला या पुरुष भी अपनी विशेषाधिकार प्राप्त (Privileged) स्थिति को छोड़कर इस स्टैंडपॉइंट को अपना सकते हैं और इस न्याय की लड़ाई का हिस्सा बन सकते हैं।

शर्मिला रेगे की प्रसिद्ध पुस्तकें (Famous Books by Sharmila Rege)

यदि आप उनके विचारों को गहराई से समझना चाहते हैं, तो उनकी निम्नलिखित पुस्तकें ज़रूर पढ़नी चाहिए:

Writing Caste, Writing Gender: Narrating Dalit Women's Testimonies (2006)

यह उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब है। इसमें उन्होंने दलित महिलाओं की आत्मकथाओं के जरिए उनके संघर्षों, दर्द और साहस को बयां किया है।

'Writing Caste, Writing Gender' पुस्तक का विस्तृत विश्लेषण

यह पुस्तक केवल एक अकादमिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह दलित महिलाओं के छिपे हुए इतिहास और उनके संघर्षों का एक जीवंत दस्तावेज है। इस पुस्तक के माध्यम से शर्मिला रेगे ने मुख्यधारा के इतिहास और नारीवाद दोनों को चुनौती दी है।

1. दलित महिलाओं की आत्मकथाओं का संकलन (Dalit Women's Testimonies)

इस पुस्तक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि शर्मिला रेगे ने इसमें महाराष्ट्र की विभिन्न पीढ़ियों की दलित महिलाओं की आत्मकथाओं (Testimonies) और संस्मरणों का अनुवाद और विश्लेषण किया है। इनमें कुमुद पावड़े, शांताबाई दाणी, बेबी कांबले और उर्मिला पवार जैसी प्रख्यात दलित लेखिकाओं के काम शामिल हैं। रेगे इन्हें केवल 'आत्मकथा' नहीं मानतीं, बल्कि वे इन्हें समाज की 'गवाही' (Testimony) कहती हैं, जो पूरे समाज की कड़वी सच्चाई को उजागर करती हैं।

2. 'व्यक्तिगत ही राजनीतिक है' का नया अर्थ (Personal is Political)

नारीवाद का एक प्रसिद्ध नारा है - "The Personal is Political" (व्यक्तिगत ही राजनीतिक है)। शर्मिला रेगे ने इस किताब में दिखाया कि कैसे एक दलित महिला का व्यक्तिगत जीवन (जैसे उसका घर, उसका चूल्हा-चौका, उसका शरीर और उसके साथ होने वाली हिंसा) सीधे तौर पर देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। जब ये महिलाएं लिखती हैं, तो वे केवल अपना दर्द नहीं लिखतीं, बल्कि वे उस जातिवादी व्यवस्था पर प्रहार करती हैं जिसने उन्हें सदियों से दबाकर रखा।

3. मुख्यधारा के इतिहास को चुनौती

शर्मिला रेगे इस पुस्तक में तर्क देती हैं कि भारत के आधुनिक इतिहास और स्त्रीवादी इतिहास दोनों ने दलित महिलाओं के योगदान को नजरअंदाज किया। जहां एक तरफ पुरुषों के नेतृत्व वाले दलित आंदोलनों ने महिलाओं के विशिष्ट मुद्दों (जैसे घरेलू हिंसा या पितृसत्ता) को दबा दिया, वहीं सवर्ण महिलाओं के आंदोलनों ने जाति के सवाल को अनदेखा कर दिया। यह पुस्तक उस खाली जगह को भरती है।

4. रोजमर्रा के संघर्षों का चित्रण

पुस्तक में शामिल गवाहियां बताती हैं कि कैसे एक दलित महिला को हर दिन पानी भरने, मजदूरी करने, भोजन जुटाने और सार्वजनिक स्थानों पर अपमान का सामना करना पड़ता था। इसके बावजूद, यह पुस्तक उन्हें केवल 'बेचारी' या 'पीड़ित' (Victims) के रूप में नहीं दिखाती, बल्कि उन्हें प्रतिरोध (Resistance) और साहस के प्रतीक के रूप में पेश करती है, जिन्होंने हर विपरीत परिस्थिति में लड़ना सीखा।

5. भाषा और अनुवाद का महत्व

रेगे ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि इन महिलाओं ने अपनी क्षेत्रीय और अनौपचारिक भाषाओं (जैसे मराठी की स्थानीय बोलियों) में लिखा था। उन्होंने इन आत्मकथाओं का अंग्रेजी में अनुवाद करते समय उनके मूल भाव, गुस्से और दर्द को उसी रूप में बनाए रखने का प्रयास किया, ताकि वैश्विक स्तर पर लोग इनके संघर्ष को समझ सकें।

अन्य पुस्तकें

Sociology of Gender: The Challenge of Feminist Sociological Knowledge (2003)

इस पुस्तक में उन्होंने बताया है कि कैसे समाजशास्त्र के भीतर स्त्रीवादी दृष्टिकोण को शामिल करके समाज को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।

Against the Madness of Manu: B.R. Ambedkar's Writings on Brahmanical Patriarchy (2013)

इस किताब में डॉ. बी.आर. आंबेडकर के पितृसत्ता और जाति व्यवस्था पर लिखे गए लेखों का संकलन और बेहतरीन विश्लेषण है।

निष्कर्ष (Conclusion)

शर्मिला रेगे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार आज भी हर उस व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक हैं जो समानता में विश्वास रखता है। उन्होंने हमें सिखाया कि जब तक हम समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी महिला के हक की बात नहीं करेंगे, तब तक हमारा स्त्रीवाद अधूरा और झूठा है। उन्होंने समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम में डॉ. आंबेडकर, महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के विचारों को शामिल कराकर शिक्षा व्यवस्था को और समृद्ध किया।


शुक्रवार, 10 मार्च 2023

प्राचीन भारत में स्त्रियों की स्थिति के सम्बन्ध में विभिन्न दृष्टिकोण


(प्रस्तुत लेख मेरे शोध-कार्य "मनुस्मृति एवं याज्ञवल्क्यस्मृति के नारी-संबंधी प्रावधानों का नारी-सशक्तीकरण पर प्रभाव" का अंश है. इसलिए अधूरा भी लग सकता है और हो सकता है कि कहीं और भी पढ़ा जा चुका है. वैसे सन्दर्भ-ग्रंथों के नाम भी दे दिए गए हैं)


प्राचीन भारत में स्त्रियों की दशा के विषय में इतिहासकारों के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं. कुछ विचारक यह मानते हैं कि प्राचीनकाल में स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी थी और उन्हें पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे. वहीं कुछ विचारक इस बात का विरोध करते हैं. उनका कहना है कि प्राचीनकाल मुख्यतः वैदिककाल में स्त्रियों की स्थिति को कुछ अधिक ही बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि सत्य यह है कि प्राचीन भारतीय समाज भी अन्य अनेक प्राचीन सभ्यताओं के समान ही पितृसत्तात्मक था. 

मुख्य रूप से इन ऐतिहासिक दृष्टिकोणों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -
- राष्ट्रवादी दृष्टिकोण
- वामपंथी दृष्टिकोण
- नारीवादी दृष्टिकोण
- दलित लेखकों का दृष्टिकोण

जहाँ राष्ट्रवादी विचारक यह मानते हैं कि वैदिक-युग में भारत में नारी को उच्च-स्थिति प्राप्त थी. नारी की स्थिति में विभिन्न बाह्य कारणों से ह्रास हुआ. परिवर्तित परिस्थितियों के कारण ही नारी पर विभिन्न बन्धन लगा दिये गये जो कि उस युग में अपरिहार्य थे. इसी प्रकार वर्ण-व्यवस्था को भी कर्म पर आधारित और बाद के काल की अपेक्षा लचीला बताते हुये ये विचारक उसका बचाव करते हैं. वामपंथी विचारक राष्ट्रवादी विद्वानों के इन विचारों से सर्वथा असहमत हैं. उनके अनुसार स्त्रियों तथा शूद्रों की अधीन स्थिति तत्कालीन उच्च-वर्ग का षड्‌यंत्र है, जिससे वे वर्ग-संघर्ष को दबा सकें. उच्च-वर्ग अर्थात्‌ मुख्यतः ब्राह्मण (क्योंकि समाज के लिये नियम बनाने का कार्य ब्राह्मणों का ही था) शूद्रों को अस्पृश्यता के नाम पर तथा नारियों को परिवारवाद के नाम पर संगठित नहीं होने देना चाहते थे.

नारीवादी विचारक भी राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का विरोध करते हैं. उनके अनुसार तत्कालीन सामाजिक ढाँचा पितृसत्तात्मक था और धर्मगुरुओं ने जानबूझकर नारी की अधीनता की स्थिति को बनाये रखा. ये विचारक यह भी नहीं मानते कि वैदिक युग में स्त्रियों की बहुत अच्छी थी, हाँ स्मृतिकाल से अच्छी थी, इस बात पर सहमत हैं. दलित विचारक स्मृतियों और विशेषतः मनुस्मृति के कटु आलोचक हैं. वे यह मानते हैं कि शूद्रों की युगों-युगों की दासता इन्हीं स्मृतियों के विविध प्रावधानों का परिणाम है. वे मनुस्मृति के प्रथम अध्याय के ३१वें[i] और ९१वें[ii] श्लोक का मुख्यतः विरोध करते हैं जिनमें क्रमशः शूद्रों की ब्रह्मा की जंघा से उत्पत्ति तथा सभी वर्णों की सेवा शूद्रों का कर्त्तव्य बताया गया है.

प्राचीन भारत में नारी की स्थिति के विषय में सबसे अधिक विस्तार से वर्णन राष्ट्रवादी विचारक ए.एस. अल्टेकर ने अपनी पुस्तक में किया है. उन्होंने नारी की शिक्षा, विेवाह तथा विवाह-विच्छेद, गृहस्थ जीवन, विधवा की स्थिति, नारी का सार्वजनिक जीवन, धार्मिक जीवन, सम्पत्ति के अधिकार,नारी का पहनावा और रहन-सहन, नारी के प्रति सामान्य दृष्टिकोण आदि पर प्रकाश डाला है. अल्टेकरके अनुसार प्राचीन भारत में वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति समाज और परिवार में उच्च थी, परन्तु पश्चातवर्ती काल में कई कारणों से उसकी स्थिति में ह्रास होता गया. परिवार के भीतर नारी की स्थिति में अवनति का प्रमुख कारण अल्टेकर अनार्य स्त्रियों का प्रवेश मानते हैं. वे नारी को संपत्ति का अधिकार न देने, नारी को शासन के पदों से दूर रखने, आर्यों द्वारा पुत्रोत्पत्ति की कामना करने आदि के पीछे के कारणों को जानने का प्रयास करते हैं तथा उन्होंने कई बातों का स्पष्टीकरण भी दिया है. उदाहरण के लिये उनके अनुसार महिलाओं को सम्पत्ति का अधिकार न देने का कारण यह है कि उनमें लड़ाकू क्षमता का अभाव होता है, जो कि सम्पत्ति की रक्षा के लिये आवश्यक होता है. इस प्रकारअल्टेकर ने उन अनेक बातों में भारतीय संस्कृति का पक्ष लिया है, जिसके लिये हमारी संस्कृति की आलोचना की जाती है. उन्होंने अपनी पुस्तक के प्रथम संस्करण की भूमिका में स्वयं यह स्वीकार किया है कि निष्पक्ष रहने के प्रयासों के पश्चात्‌ भी वे कहीं-कहीं प्राचीन संस्कृति के पक्ष में हो गये हैं.* प्रसिद्ध राष्ट्रवादी इतिहासकार आर. सी. दत्त ने भी अल्तेकर के दृष्टिकोण का समर्थन किया है उनकेअनुसार, "महिलाओं को पूरी तरह अलग-अलग रखना और उन पर पाबन्दियाँ लगाना हिन्दू परम्परानहीं थी. मुसलमानों के आने तक यह बातें बिल्कुल अजनबी थीं... . महिलाओं को ऐसी श्रेष्ठ स्थिति हिन्दुओं के अलावा और किसी प्राचीन राष्ट्र में नहीं दी गयी थी."[iii]शकुन्तला राव शास्त्री ने अपनी पुस्तक ‘वूमेन इन सेक्रेड लॉज़’ में इसी प्रकार के निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं.

आधुनिक काल के प्रमुख नारीवादी इतिहासकारों तथा विचारकों ने अल्टेकर और शास्त्री के उपर्युक्त स्पष्टीकरणों की आलोचना की है. आर.सी. दत्त के विरोध में प्रसिद्ध नारीवादी विचारक डा. उमाचक्रवर्ती कहती हैं, "... ... मनु तथा अन्य कानून-निर्माताओं ने लड़कियों की कम उम्र में ही शादी की हिमायत की थी. सातवीं सदी में हर्षवर्धन के प्राम्भिक काल से संबंधित विवरणों में सती-प्रथा उच्चजाति की महिलाओं के साथ साफ़ जुड़ी देखी जा सकती है. महिलाओं का अधीनीकरण सुनिश्चित करनेवाली संस्थाओं का ढाँचा अपने मूलरूप में मुस्लिम धर्म के उदय से भी काफ़ी पहले अस्तित्व में आ चुका था. इस्लाम के अनुयायियों का आना तो इन तमाम उत्पीड़क कुरीतियों को वैधता देने के लिये एक आसान बहाना भर है."[iv]

नारीवादी विचारकों ने यह माना है कि प्राचीन भारत में नारी की स्थिति में ह्रास का कारण हिन्दू समाज की पितृसत्तात्मक संरचना थी न कि कोई बाहरी कारण. इसके लिये नारीवादी विचारक प्रमुख दोष स्मृतियों के नारी-सम्बन्धी नकारात्मक प्रावधानों को देते हैं, क्योंकि तत्कालीन समाज में स्मृतिग्रन्थ सामाजिक आचार-संहिता के रूप में मान्य थे और उनमें लिखी बातों का जनजीवन पर व्यापक प्रभाव था. प्रमुख स्मृतियों में नारी-शिक्षा पर रोक, उनका कम उम्र में विवाह करने सम्बन्धी प्रावधान, उनको सम्पत्ति में समान अधिकार न देना आदि प्रावधानों के कारण समाज में स्त्रियों की स्थिति में अवनति होती गयी. नारीवादी विचारकों के अनुसार हमें अपनी कमियों का स्पष्टीकरण देने के स्थान पर उनको स्वीकार करना चाहिये ताकि वर्तमान में नारी की दशा में सुधार लाने के उपाय ढूँढे़ जा सकें.


सन्दर्भ :

* द पोजीशन ऑफ वूमेन इन हिन्दू सिविलाइजेशन, ए.एस. अल्तेकर, प्रकाशक-मोतीलाल बनारसी दास.
[i] “लोकानां तु विवृद्धि – अर्थं मुख- बाहु- ऊरु- पादतः
ब्राह्मणं क्षत्रिय वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत्‌“ १/३१ मनुस्मृति.
[ii] “एकम्‌ एव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्‌
एतेषाम्‌ एव वर्णानां शुश्रूषाम्‌ अनुसूयया“ १/९१ मनुस्मृति.
[iii] पृष्ठ संख्या २३, द सिविलाइजेशन ऑफ इण्डिया, आर.सी. दत्त, प्रकाशक-रूपा कंपनी, नई दिल्ली, २००२.
[iv] पृष्ठ संख्या १२९, अल्टेकेरियन अवधारणा के परे : प्रारंभिक भारतीय इतिहास में जेंडर संबंधों का नई समझ, उमा चक्रवर्ती, नारीवादी राजनीति, संघर्ष एवं मुद्दे, साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, २००१.
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सोमवार, 18 मार्च 2019