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बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों का साधारणीकरण: लापरवाही या षड्यंत्र?

(यह लेख कल के जनसत्ता में 'दुनिया मेरे आगे' स्तंभ में 'शब्दों से खेल' शीर्षक से छप चुका है.)
  
बात वहाँ से शुरू होती है, जब एक छोटी-सी लड़की को दुनिया की ऐसी कड़वी सच्चाइयों का सामना करना पड़ता है जिनके चलते वह सामान्य घटनाओं को भी एक खास नजरिए से देखने लग जाती है। मासूम दिल कम उम्र में ही परिपक्व हो जाता है। पिताजी रेलवे में स्टेशन मास्टर थे। जब मैं दस साल की थी, उनका तबादला उत्तर रेलवे के उन्नाव स्टेशन के पड़ोस में एक छोटे-से रेलवे स्टेशन मगरवारा में हो गया। मुझे चार साल तक मगरवारा से उन्नाव स्थित अपने स्कूल ट्रेन से आना-जाना पड़ता। भीड़ होने पर लोग छोटी बच्ची जान कर अपने पास जगह बनाकर बिठा लेते। एक-दो साल बाद लोगों के स्पर्श में मुझे अजीब-सा बदलाव महसूस होने लगा। अनचाहा स्पर्श मन में वितृष्णा भर देता। बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ती एक लड़की पर ऐसी घटनाओं का क्या प्रभाव पड़ता है, यह एक लड़की ही समझ सकती है। अनजाने में मैं खुद को ही इसका दोषी समझने लगी। ऐसा लगता जैसे मेरे शरीर में ही ऐसी कोई कमी है कि लोग मेरे साथ ऐसी हरकत करते हैं।
कुछ साल बाद इलाहाबाद में छात्रावास में रहते और ‘स्त्री अधिकार संगठन’ के साथ काम करते हुए पता चला कि अधिकतर लड़कियाँ इसी तरह के कड़वे अनुभवों से गुजरी हैं। पर मुझे तब बहुत आश्चर्य होता, जब हमारे पुरुष मित्र और रिश्तेदार कहते कि ‘क्या लड़कियाँ छेड़छाड़ नहीं करतीं?’ जो घटनाएँ लड़कियों के मन-मस्तिष्क को झिंझोड़कर खुद को ही दोषी मानने पर मजबूर कर देती हैं, उसे कोई इतने हल्के ढंग से कैसे ले सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं था कि वैसी हरकतों के लिए ‘छेड़छाड़’ के बजाय हम कोई सही शब्द नहीं खोज पा रहे थे? तब मुझे नहीं लगा कि मैं इसे ‘यौन हिंसा’ कहूँ, क्योंकि उस उम्र में तो बस इतना समझ में आता था कि यह व्यक्ति जो कर रहा है, वह ठीक नहीं है। उस समय मन जिस तरह घृणा से भर जाता था, उसके लिए ‘छेड़छाड़’ सच में हल्का शब्द है।
अकादमिक क्षेत्रों में नारीवादी सोच के लोग ऐसी माँगें उठाते रहे हैं और ‘जेंडर’ के नजरिए से संवेदनशील शब्दों को लेकर एक स्तर तक समझ भी बनी है। लेकिन हमारा समाज और उसका प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाला मीडिया इस मामले में अब तक जरूरी संवेदनशीलता नहीं बरत रहा है। यहां तक कि ‘बलात्कार’ जैसे जघन्य अपराधों में भी मीडिया की कोशिश होती है कि इसके लिए अपेक्षया हल्के शब्दों का इस्तेमाल किया जाए। आमतौर पर बलात्कार की घटनाओं से संबंधित खबरें संवेदनहीन तरीके से ऐसे पेश की जाती हैं कि तथाकथित सभ्य समाज के कुत्सित मानसिकता वाले लोग उसे चटखारे लेकर पढ़ते हैं। कभी इसके लिए ‘इज्जत लुट गई’ तो कभी ‘मुँह काला किया’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये सभी शब्द महिलाओं के प्रति अपमानजनक और एक तरह से पीड़ित को ही दोषी सिद्ध करने वाले रहे हैं। 
समय के साथ किसी औरत के शरीर पर हमला करके जबरन उसका यौन-उत्पीड़न करने जैसे जघन्य कृत्य को ‘बलात्कार’ शब्द के जरिए व्यक्त किया जाने लगा। इस शब्द में जाहिर बलाघात इस अपराध की भयावहता को दर्शाता है। लेकिन पिछले कुछ समय से अखबारों या टीवी चैनलों में बलात्कार की जगह ‘दुष्कर्म’ और यहाँ तक कि ‘ज्यादती’ जैसे शब्दों तक का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाने लगा है। ‘दुष्कर्म’ शब्द अपने आप में चोरी, डकैती, जेब काटने तक को व्यक्त करता है। सवाल है कि क्या बलात्कार जैसे गंभीरतम अपराध को चोरी या जेब काटने जैसे अपराधों के समकक्ष करके देखा जा सकता है? सच्चाई यह है कि ‘दुष्कर्म’ जैसे शब्दों का प्रयोग बलात्कार को बेहद मामूली अपराधों के समकक्ष ला खड़ा करता है तो ‘ज्यादती’ इस लिहाज से और भी आपत्तिजनक प्रयोग है।
महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के परिप्रेक्ष्य में पिछले दिनों ऊँचे पदों पर बैठे पुलिस और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के जिस तरह के बयान आए हैं, ऐसे शब्दों का आम होते जाना उसी की एक कड़ी लगता है। कभी कोई कहता है कि ‘औरतों को देर रात अकेले घर से बाहर निकालना नहीं चाहिए’ तो कभी कहा जाता है कि ‘बड़े-बड़े महानगरों में छोटे-मोटे अपराध होते ही रहते हैं’ और कभी लड़कियों की वेशभूषा पर ही सवाल उठा दिया जाता है।
हाल ही में ‘रेप’ की जगह ‘सेक्सुअल असॉल्ट’ शब्द प्रयोग करने का सुझाव सामने आया है। यानी एक ओर अंग्रेजी में इस अपराध का दायरा बढ़ाने के लिए जिस ‘यौन हमला’ शब्द का विकल्प रखा गया है, वह इस अपराध की गंभीरता और भयावहता को न केवल कम नहीं करता, बल्कि अर्थ के भाव और असर की गहराई को भी बनाए रखता है। लेकिन हिंदी में बलात्कार की जगह दुष्कर्म शब्द का प्रयोग अगर आम होता जा रहा है तो इसे व्यवस्था द्वारा महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साधारणीकरण के एक षड्यंत्र के तौर पर देखा जाना चाहिए। इसमें मीडिया एक बड़े मददगार की भूमिका निभा रहा है।

मंगलवार, 30 मार्च 2010

छेड़छाड़ की समस्या : समाधान के कुछ सुझाव (2.)

हम प्रायः इस ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि हमारे घर-परिवार के पुरुष सदस्य छेड़छाड़ कर ही नहीं सकते और जब ऐसा हो जाता है, तो हम या फिर आश्चर्य करते हैं या उनके अपराध को छिपाने की कोशिश. ऐसा बहुत से केसों में देखने को मिला है कि अपराधी के घर वाले उल्टा पीड़ित पर ही आरोप लगाने लगते हैं.

अभी कुछ दिनों पहले का चर्चित केस है. पूर्वी यू.पी. के एक लड़के ने गोवा में एक नौवर्षीय रूसी लड़की के साथ यौन-दुर्व्यवहार किया. जब पुलिस लड़के के घर पूछताछ करने पहुँची, तो उसके घर वाले आश्चर्य में पड़ गये. उसकी बूढ़ी माँ ने कहा,"पता नहीं ऐसा कैसे हुआ? लड़का तो ऐसा नहीं था. हमने तो देखा नहीं. पता नहीं सच क्या है?" अब इसमें ग़लती इस माँ की नहीं है. उसने तो अपने बेटे को ये सब सिखाया नहीं.

कोई भी अपने बेटों को ग़लत शिक्षा नहीं देता, पर अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाये, तो ऐसी दुर्घटना से बचा जा सकता है. मेरा ये कहना बिल्कुल नहीं है कि हम अपने घर के पुरुष सदस्यों को शक की निगाह से देखें और उनकी हर गतिविधि पर नज़र रखें. ऐसा करना न व्यावहारिक होगा और न ही उचित. और परिवार की शान्ति भंग होगी सो अलग से. पर विशेषकर किशोरावस्था के लड़कों के पालन-पोषण में सावधानी बहुत ज़रूरी है. मैं अपने अनुभवों और अध्ययन के आधार पर कुछ सुझाव दे रही हूँ, शेष...जो भी लोग इस मुद्दे को लेकर संवेदनशील हैं और कुछ सुझाव देना चाहते हैं, वे दे सकते हैं---
---अपने बेटों को बचपन से ही नारी का सम्मान करना सिखायें, इसलिये नहीं कि वह नारी होने के कारण पूज्य है, बल्कि इसलिये कि वह एक इन्सान है और उसे पूरी गरिमा के साथ जीने का हक़ है.
---उन्हें यह बतायें कि उनकी बहन का भी परिवार में वही स्थान है, जो उनका है, न उससे ऊँचा और न नीचा.
---उसे अपनी बहन का बॉडीगार्ड न बनायें. ऐसा करने पर लड़के अपने को श्रेष्ठतर समझने लगते हैं.
---अपने किशोरवय बेटे की गतिविधियों पर ध्यान दें, परन्तु अनावश्यक टोकाटाकी न करें.
---उन्हें उनकी महिलामित्रों को लेकर कभी भी चिढ़ायें नहीं, एक स्वस्थ मित्रता का अधिकार सभी को है.
---किशोरावस्था के लड़कों को यौनशिक्षा देना बहुत ज़रूरी है. मेरे ख्याल से परिवार इसके लिये बेहतर जगह होती है. यह कार्य उनके बड़े भाई या पिता कर सकते हैं. इसके लिये घर का माहौल कम से कम इतना खुला होना चाहिये कि लड़का अपनी समस्याएँ पिता को बता सके. ( यहाँ मैं यौनशिक्षा पर विचार उतने विस्तार से नहीं रख रही क्योंकि इस विषय में मैं खुशदीप भाई की पोस्ट से शत-प्रतिशत सहमत हूँ)

छेड़छाड़ की समस्या के कारणों और समाधान के पड़ताल की यह समापन किस्त है. मैं दिनोदिन औरतों के साथ बढ़ रहे यौन शोषण और बलात्कार के मामलों से बहुत चिन्तित हूँ. मुझे ये नहीं लगता कि ये सब कुछलोगों की कुत्सित मानसिकता या औरतों के पहनावे का परिणाम है. इस तरह के विश्लेषण ऐसी गम्भीर समस्या को उथला और समाधान को असंभव बना देते हैं. यौन शोषण की समस्या की जड़ें हमारी सामाजिक संरचना में कहीं गहरे निहित हैं. वर्तमान काल की परिवर्तित होती परिस्थितियाँ, सांस्कृतिक संक्रमण, विभिन्न वर्गों के बीच बढ़ता अन्तराल आदि इस समस्या को और जटिल बना देते हैं. इस समस्या के कारण और समाधान खोजने के लिये समाज में एक लम्बी बहस चलाने की आवश्यकता है.

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

छेड़छाड़ की समस्या: समाधान के कुछ सुझाव (1.)

पिछली पोस्ट में मैंने छेड़छाड़ के कारणों को ढूढ़ने का प्रयास किया था. इस बार मैं कुछ समाधान सुझाने की कोशिश कर रही हूँ. इसके पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि छेड़छाड़ से मेरा मतलब उस घटिया हरकत से है, जिसे यौन-शोषण की श्रेणी में रखा जाता है. यह वो हल्की-फुल्की छींटाकशी नहीं है, जो विपरीतलिंगियों में स्वाभाविक है, क्योंकि वह कोई समस्या नहीं है. कोई भी इस प्रकार की हरकत समस्या तब बनती है, जब वह समाज के किसी एक वर्ग को कष्ट या हानि पहुँचाने लगती है.
समस्या यह है कि हम यौनशोषण को तो बलात्कार से तात्पर्यित करने लगते हैं और छेड़छाड़ को हल्की-फुल्की छींटाकशी समझ लेते हैं, जबकि छेड़छाड़ की समस्या भी यौन-शोषण की श्रेणी में आती है. मैं अपनी बात थोड़ी शिष्टता से कहने के लिये छेड़छाड़ शब्द का प्रयोग कर रही हूँ. किसी को अश्लील फब्तियाँ कसना, अश्लील इशारे करना, छूने की कोशिश करना आदि इसके अन्तर्गत आते हैं. लिस्ट तो बहुत लम्बी है. पर यहाँ चर्चा का विषय दूसरा है. मेरा कहना है कि ये हरकतें भी गम्भीर होती हैं. यदि इन्हें रोका नहीं जाता, तो यही बलात्कार में भी परिणत हो सकती हैं.
पिछली पोस्ट में छेड़छाड़ की समस्या के कारणों को खोजने के पीछे मेरा उद्देश्य था, इसे जैविक निर्धारणवाद के सिद्धान्त से अलग करना, क्योंकि जैविक निर्धारणवाद किसी भी समस्या के समाधान की संभावनाओं को सीमित कर देता है. मेरा कहना था कि यह समस्या जैविक और मनोवैज्ञानिक से कहीं अधिक सामाजिक है. समाजीकरण की प्रक्रिया में हम जाने-अनजाने ही लड़कों में ऐसी बातों को बढ़ावा दे देते हैं कि वे छेड़छाड़ को स्वाभाविक समझने लगते हैं. इसी प्रकार हम लड़कियों को इतना दब्बू बना देते हैं कि वे इन हरकतों का विरोध करने के बजाय डरती हैं और शर्मिन्दा होती हैं. चूँकि इस समस्या के मूल में समाजीकरण की प्रक्रिया है, अतः इसका समाधान भी उसी में ढूँढ़ा जा सकता है. वैसे तो सरकारी स्तर पर अनेक कानून और सामाजिक और नैतिक दबाव इसके समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, पर इसे रोकने का सबसे अच्छा और प्राथमिक उपाय अपने बच्चों के पालन-पोषण में सावधानी बरतना है. भले ही यह एक दीर्घकालीन समाधान है, पर कालान्तर में इससे एक अच्छी पीढ़ी तैयार हो सकती है.
मैं यहाँ लड़कियों के प्रति रखी जाने वाली सावधानियों की चर्चा कर रही हूँ, जिससे उन्हें ऐसी हरकतों से बचाया जा सके| याद रहे कि ये सुझाव लडकियों के माता-पिता और अन्य परिजनों के लिए हैं, लडकियों के लिए नहीं| लड़कियों को वैसे भी इतनी सीखें दी जाती हैं कि वे दब्बू बन जाती हैं|
-लड़कियों में आत्मविश्वास जगायें. घर का माहौल इतना खुला हो कि वे अपने साथ हुई किसी भी ऐसी घटना के बारे में बेहिचक बता सकें.
-लड़की के साथ ऐसी कोई घटना होने पर उसे कभी दोष न दें, नहीं तो वह अगली बार आपको बताने में हिचकेगी और जाने-अनजाने बड़ी दुर्घटना का शिकार हो सकती है.
-लड़कियों को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग ज़रूर दिलवाएँ. इससे उनमें आत्मविश्वास जगेगा और वो किसी दुर्घटना के समय घबराने के स्थान पर साहस से काम लेंगी.
-लड़कियों को कुछ बातें समझाये. जैसे कि-
  -वे रात में आने-जाने के लिये सुनसान रास्ते के बजाय भीड़भाड़ वाला रास्ता चुनें.
  -भरसक किसी दोस्त के साथ ही जायें, अकेले नहीं.
  -किसी दोस्त पर आँख मूंदकर भरोसा न करें.
  -अपने मोबाइल फोन में फ़ास्ट डायलिंग सुविधा का उपयोग करें और सबसे पहले घर का नम्बर रखें.
ऐसी एक दो नहीं अनेक बातें हैं. पर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात बेटियों को आत्मविश्वासी बनाना है और अति आत्मविश्वास से बचाना है. उपर्युक्त बातें एक साथ न बताने लग जायें, नहीं तो वो या तो चिढ़ जायेगी या डर जायेगी. आप अपनी ओर से भी कुछ सुझाव दे सकते हैं. अगली कड़ी में मैं लड़कों के पालन-पोषण में ध्यान रखने वाली बातों की चर्चा करूँगी.

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

छेड़छाड़ की समस्या के कारणों की पड़ताल

     छेड़छाड़ की समस्या हमारे समाज की एक गम्भीर समस्या है. इसके बारे में बातें बहुत होती हैं, परन्तु इसके कारणों को लेकर गम्भीर बहस नहीं हुयी है. अक्सर इसको लेकर महिलाएँ पुरुषों पर दोषारोपण करती रहती हैं और पुरुष सफाई देते रहते हैं, पर मेरे विचार से बात इससे आगे बढ़नी चाहिये.
    मैंने पिछले कुछ दिनों ब्लॉगजगत्‌ के कुछ लेखों को पढ़कर और कुछ अपने अनुभवों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि लोगों के अनुसार छेड़छाड़ की समस्या के कारणों की पड़ताल तीन दृष्टिकोणों से की जा सकती है-
जैविक दृष्टिकोण- जिसके अनुसार पुरुषों की जैविक बनावट ऐसी होती है कि उसमें स्वाभाविक रूप से आक्रामकता होती है. पुरुषों के कुछ जीन्स और कुछ हार्मोन्स (टेस्टोस्टेरोन) होते हैं, जिसके फलस्वरूप वह यौन-क्रिया में ऐक्टिव पार्टनर होता है. यही प्रवृत्ति अनुकूल माहौल पाकर कभी-कभी हावी हो जाती है और छेड़छाड़ में परिणत होती है.
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण - इसके अनुसार छेड़छाड़ की समस्या कुछ कुत्सित मानसिकता वाले पुरुषों से सम्बन्धित है. सामान्य लोगों से इसका कुछ लेना-देना नहीं है.
समाजवैज्ञानिक दृष्टिकोण-इसके अनुसार इस समस्या की जड़ें कहीं गहरे हमारी समाजीकरण की प्रक्रिया में निहित है. इसकी व्याख्या आगे की जायेगी.
    यदि हम इस समस्या को सिर्फ़ जैविक दृष्टि से देखें तो एक निराशाजनक तस्वीर सामने आती है, जिसके अनुसार पुरुषों की श्रेष्ठता की प्रवृत्ति युगों-युगों से ऐसी ही रही है और सभ्यता के विकास के बावजूद कम नहीं हुयी है. इस दृष्टिकोण के अनुसार तो इस समस्या का कोई समाधान ही नहीं हो सकता. लेकिन इस समस्या को जैविक मानने के मार्ग में एक बाधा है. यह समस्या भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न ढँग से पायी जाती है. जहाँ उत्तर भारत में छेड़छाड़ की घटनाएँ अधिक होती हैं, वहीं दक्षिण भारत में नाममात्र की. इसके अलावा सभी पुरुष इस कुत्सित कर्म में लिप्त नहीं होते. यदि यह समस्या केवल जैविक होती तो सभी जगहों पर और सभी पुरुषों पर ये बात लागू होती. यही बात मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर सामने आती है. लगभग दो-तिहाई पुरुष छेड़छाड़ करते हैं, तो क्या वे सभी मानसिक रूप से "एबनॉर्मल" होते हैं?
    नारीवादी छेड़छाड़ की समस्या को सामाजिक मानते हैं. चूँकि समाजीकरण के कारण पुरुषों में इस प्रकार की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है कि वे महिलाओं से छेड़छाड़ करें, इसलिये समाजीकरण के द्वारा ही इस समस्या का समाधान हो सकता है. अर्थात्‌ कुछ बातों का ध्यान रखकर, पालन-पोषण में सावधानी बरतकर हम अपने बेटों को "जेंडर सेंसटाइज़" कर सकते हैं. यहाँ पर यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या कोई अपने बेटे से यह कहता है कि छेड़छाड़ करो? तो इसका जवाब है-नहीं. यहाँ इस समस्या का जैविक पहलू सामने आता है. हाँ, यह सच है कि पुरुष ऐक्टिव पार्टनर होता है और इस कारण उसमें कुछ आक्रामक गुण होते हैं, पर स्त्री-पुरुष सिर्फ़ नर-मादा नहीं हैं और न ही छेड़छाड़ का यौन-क्रिया से कोई सम्बन्ध है. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. अतः समाज में रहने के लिये जिस प्रकार सभ्यता की आवश्यकता होती है, वह होनी चाहिये. हम लड़कों के पालन-पोषण के समय उसकी आक्रामक प्रवृत्तियों को रचनात्मक मोड़ देने के स्थान पर उसको यह एहसास दिलाते हैं कि वह स्त्रियों से श्रेष्ठ है. यह पूरी प्रक्रिया अनजाने में होती है और अनजाने में ही हम अपने बच्चों में लिंग-भेद व्याप्त कर देते हैं.
     हमें यह समझना चाहिये कि छेड़छाड़ की समस्या का स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक आकर्षण या यौन-सम्बन्धों से कोई सम्बन्ध नहीं है. छेड़छाड़ के द्वारा पुरुष अपनी श्रेष्ठता को स्त्रियों पर स्थापित करना चाहता है और यह उस दम्भ की अभिव्यक्ति है जो समाजीकरण की क्रिया द्वारा उसमें धीरे-धीरे भर जाती है. शेष अगले लेख में...

शनिवार, 19 सितंबर 2009

छेड़छाड़ की समस्या

बहुत दिनों से मैं इस लेख पर अच्छी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा कर रही थी. आज सोचा कि कुछ लिख ही लिया जाये. मेरे एक मित्र ने छेड़छाड़ की समस्या को एक मानसिक समस्या बताया है. मैं उनकी इस बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूँ. यह समस्या केवल मनोवैज्ञानिक नहीं बल्कि सामाजिक समस्या है. अगर इस समस्या को केवल मनोवैज्ञानिक मान लें तो दुनिया के साठ से सत्तर प्रतिशत पुरुष मनोरोगी सिद्ध हो जायेंगे. यह इतनी सीधी-सादी सी बात नहीं है. जिस तरह भारत में दलितों की समस्या की जड़ें इसके इतिहास और सामाजिक ढाँचे में निहित हैं, उसी प्रकार पूरे विश्व में नारी की समाज में दोयम स्थिति की जड़ें भी इतिहास और समाज में हैं. ये बात अलग है कि यह समस्या अलग-अलग देशों और समाजों में भिन्न-भिन्न रूप और स्तर लिये हुये है. एक बात और है कि कुछ देशों और समाजों ने इस समस्या पर काफी पहले ध्यान दिया और इसे दूर करने के प्रयास भी किये. हमारे सामने स्कैंडेनेवियाई देशों का उदाहरण है, जहाँ लिंग-भेद दूर तो नहीं हुआ, पर अन्य स्थानों से कम ज़रूर है.
     महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की समस्या हमारे समाज में गहरे पैठी लिंग-भेद से ही उपजती है, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती. हम देखते हैं कि बचपन से ही लड़के और लड़की के पालन-पोषण में दो अलग-अलग मानदंडों का प्रयोग किया जाता है. जहाँ लड़कों को बहिर्मुखी गुणों की शिक्षा दी जाती है, लड़कियों को कोमल गुणों की. लड़के के रोने पर रोक लगायी जाती है और लड़कियों के ज़ोर से हँसने पर. यदि आप लोगों के व्यवहार पर सूक्ष्म दृष्टि डालें तो आप देखेंगे कि विशेषतः गावों में लोग छोटे लड़कों के जननांगों को तरह-तरह से पुकारते और लाड़ करते हैं. यह सामाजीकरण की एक विशेष प्रक्रिया है, जिससे लड़कों में बचपन से ही एक उच्च्तर भावना आ जाती है जिसे अंग्रेजी में सुपीरियरिटी काम्प्लेक्स कहते हैं और लड़कियों में हीन-भावना आ जाती है. क्योंकि वे सोचती हैं कि कोई ऐसी चीज़ लड़कों के पास है जो उनके पास नहीं है. यदि आप सीमोन द बुआ की सेकेन्ड सेक्स पढ़ें तो ये सब बातें आपको और अधिक स्पष्ट हो जायेंगी. धीरे-धीरे यही ग्रन्थि आगे चलकर लड़कों में अपने शरीर के प्रति एक ख़ास तरह का अहंकार पैदा करती है और वे बात-बात में अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करने लगते हैं. लड़कों द्वारा लड़कियों से छेड़छाड़ के पीछे उनकी यही मानसिकता है. इसके द्वारा वे खुद को लड़कियों से श्रेष्ठ दिखाना चाहते हैं.
     इस प्रकार भले ही यह समस्या मनोवैज्ञानिक हो पर इसके मूल में सामाजीकरण की प्रक्रिया है. इस प्रकार दोष किसी एक पुरुष या समाज के किसी एक हिस्से का नहीं बल्कि पूरे सामाजिक ढाँचे का है. मज़े की बात यह है कि माँ-बाप कब अपने बच्चे में ये ग्रन्थि पैदा कर देते हैं उन्हें खुद ही नहीं मालूम होता क्योंकि ये तो हमेशा से होता आया है और हमारे समाज की संरचना में रचा-बसा है. मैं मानती हूँ कि और भी बातें हो सकती हैं जो इस समस्या को गंभीर बना देती हैं. और बहुत बार एक व्यक्ति  के व्यक्तित्व पर भी कुछ निर्भर करता है. पर सामान्यतः छेड़छाड़ की समस्या सामाजिक है और यदि हम अपने बच्चों के पालन-पोषण में कुछ बातों का ध्यान रखें तो इसे दूर भी कर सकते हैं.