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शनिवार, 31 जुलाई 2010

मैं ऐसा क्यों करती हूँ?

ये प्रश्न मैंने अपने आप से तब पूछा, जब किसी ने सीधे-सीधे मुझसे पूछ लिया कि मैं ये औरतों वाले मुद्दों के पीछे क्यों पड़ी रहती हूँ??? यह भी कहा कि आप नारीवादियों का बस एक ही काम है औरतों को उनके घर के पुरुषों के खिलाफ भड़काना और पुरुषों के विरुद्ध तरह-तरह के इल्जाम लगाना. आप ये सोच सकते हैं कि कोई मुझसे इतना सब कह गया और मैं सुनती गयी...हाँ, क्योंकि मैं जिस विषय पर शोध कर रही हूँ, जो मेरा मिशन है, उसका पूर्वपक्ष और प्रतिपक्ष सुनना ज़रूरी है. ये देखना ज़रुरी है कि ये मानसिकता हमारे समाज में कितनी गहरी पैठी है कि कोई नारी-सशक्तीकरण की बात सुनना ही नहीं चाहता, या फिर उसे सिर्फ गरीब औरतों से जोड़कर देखता है, पर इससे पहले ये जानना ज़रुरी है कि मैं ऐसा क्यों करती हूँ ? मतलब नारी मुद्दों पर लेख लिखना, कवितायें लिखना, बहस करना, विरोध करना और जिस जगह नारी-सम्बन्धी कोई अनुचित बात दिखे वहाँ कूद पड़ना.

मेरे मन में नारी-मुद्दों को लेकर जो अत्यधिक संवेदनशीलता है, वो सिर्फ इसलिए नहीं है कि मैं अपने जीवन में पुरुषों द्वारा सताई गयी हूँ, हालांकि मैंने भी बहुत कुछ झेला है, जो किसी भी भावुक औरत को विद्रोही बनाने के लिए पर्याप्त है. पर बात इतनी सी ही नहीं है... इससे कहीं आगे की है. मैं गहन अध्ययन और विचार-विमर्श में विश्वास करती हूँ और यह अध्ययन सिर्फ किताबी नहीं है, वास्तविक समाज का अध्ययन है, लोगों का अध्ययन है. इसी कारण मैं समाज को एक नए नजरिये से देखना चाहती हूँ, जो कि कोई भी तार्किक और संवेदनशील व्यक्ति कर सकता है, भले ही उसने उतनी पढ़ाई ना की हो.

हमारा समाज बहुत ही रुढिवादी है, जो कि ना सिर्फ परिवर्तन से डरता है बल्कि चीज़ों को नए दृष्टिकोण से देखना तक नहीं चाहता, पर मैं इतना कहूँगी कि अगर आप किसी बात को बस एक आयाम से देखते हैं, तो कभी भी प्रगति नहीं कर सकते. अगर आपने सिर्फ इतिहास पढ़ा और सबाल्टर्न इतिहास नहीं पढ़ा, तो आपका ज्ञान अधूरा है; सिर्फ संस्कृत पढ़ी, प्राकृत नहीं, तो आप अधूरी जानकारी रखते हैं, इसी तरह मनोविज्ञान के साथ समाजशास्त्र और मानवशास्त्र जुड़ा हुआ है. ये सच है कि कोई भी व्यक्ति एक साथ सभी अंतर्संबंधित विषयों पर मास्टरी नहीं हासिल कर सकता, पर फिर भी एक विषय के साथ अन्य विषयों का सामान्य ज्ञान होना चाहिए और विषय को अलग-अलग दृष्टिकोणों से पढ़ना चाहिये.

अब बात नारीवादी दृष्टिकोण की आती है. मेरा समाज को देखने का यह एक नजरिया है... ध्यान देने योग्य बात है कि 'एक मात्र' नजरिया नहीं. जैसे-जैसे मैं संस्कृत के नए ग्रंथों और अन्य लोकोक्तियों की बारे में पढ़ती जा रही हूँ,  इतिहास और समकालीन समाज को देखने का नारीवादी दृष्टिकोण और भी स्पष्ट होता जा रहा है. इतिहास को देखने के नारीवादी नजरिये के बारे में अपने पिछले लेख में मैं एक संक्षिप्त परिचय दे चुकी हूँ. जैसा कि हम सभी विश्वास करते हैं कि हमारी संस्कृति में नारी का सर्वोच्च स्थान था और उसमें कालान्तर में ह्रास आ गया, मुख्यतः मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारण. इसका मतलब यह कि यदि मुस्लिम आक्रमणकारी नहीं आते तो हमारे देश में नारी की स्थिति घर-बाहर दोनों जगह सर्वोच्च होती. नारीवादी विचारक इस बात को सही नहीं मानते और विभिन्न तर्कों से अपने पक्ष को पुष्ट करते हैं. पिछले लेख में मैं इसे बता चुकी हूँ.

मैंने जब इन नारीवादी विचारकों के विचार पढ़े थे, तो उस पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं किया था, क्योंकि मैं बहुत तार्किक हूँ और किसी की भी बात को बिना अपने तर्क की कसौटी पर उतारे नहीं मानती, लेकिन जैसे-जैसे मैं संस्कृत का अध्ययन और अधिक करती गयी मेरा यह नजरिया पुष्ट होता गया. मैं अभी शोध कर रही हूँ, इसलिए पूरी बात तो यहाँ नहीं रख सकती क्योंकि जो संस्था मुझे फेलोशिप दे रही है, उसकी नियमावली में है कि मैं थीसिस पूरी होने से पहले सम्बंधित विषय पर कुछ प्रकाशित नहीं कर सकती. पर कुछ निष्कर्ष जो मेरे अपने हैं उन्हें कुछ बिंदुओं में रखने का प्रयास कर रही हूँ---

(1.)-- सबसे पहले तो ये बात पूरी तरह सत्य नहीं है कि प्राचीनकाल में भारत में नारी की स्थिति सर्वोच्च थी. यह आंशिक सत्य है. समाज में विवाहिता स्त्री और माता का स्थान अन्य स्त्रियों की अपेक्षा उच्च था. विवाहिता तो अपने पति के अधीन थी, परन्तु माँ सबसे ऊपर थी. यहाँ तक कि उसे ईश्वर से भी उच्च माना गया. परन्तु इसके ठीक विपरीत जो स्त्री माँ नहीं बन पाती, उसे समाज की उपेक्षा झेलनी पड़ती, जो अब भी कायम है. इसी तरह अविवाहित अथवा विधवा को समाज में बिल्कुल सम्मान नहीं मिलता था. स्त्रियों की स्थिति पुरुषों से उनके संबंध के सापेक्ष थी. ये परम्परा अब भी कायम है. समाज में जो सम्मान विवाहित स्त्रियों को प्राप्त है, वह अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा को नहीं और उस पर विडम्बना यह कि विवाहित स्त्री के घरेलू कार्य को उपेक्षा से देखकर समय-समय पर उसकी औकात को बताया जाता रहता है.

(2.)--प्राचीन संस्कृत-साहित्य में स्थापित नारी की 'सती' वाली आदर्श छवि से इतर भी एक छवि रही है और वह थी एक स्वतन्त्र नारी की छवि, जिसे 'कन्या' कहा गया. यह नारी अपने कार्यों और निर्णयों के लिए और यहाँ तक कि यौन-संबंधों के लिए भी किसी एक पुरुष के अधीन नहीं थी. वह अपने निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतन्त्र थी. शास्त्रों में नहीं, अपितु लोक में उसे मान्यता प्राप्त थी. कुंती, द्रौपदी, देवयानी, उर्वशी और सूर्पनखा इसी श्रेणी में आती हैं. यह सभी लोग जानते हैं कि सूर्पनखा ने राम और लक्ष्मण से प्रणय-निवेदन किया था और इसी प्रकार देवयानी ने कच से और उर्वशी ने अर्जुन से प्रणय-निवेदन किया था. ये अलग बात है कि इन सभी को इस कार्य के लिए दंड भोगना पड़ा. क्योंकि तब भी पुरुषप्रधान समाज का एक वर्ग था जो कि स्त्रियों की इस विषय में स्वतंत्रता नहीं पसंद करता था. और भी उदाहरण हैं, विस्तार के भय से और नहीं लिख रही हूँ.

(3.)-- यह भी गलत तथ्य है कि औरतों की स्थिति में ह्रास अर्थात पर्दाप्रथा, सतीप्रथा, बालविवाह आदि मुस्लिमों के आक्रमण के बाद समाज में आये. घूँघट डालना संभ्रांत घरों की स्त्रियों में प्राचीनकाल से प्रचलित है और (उदाहरण- अभिज्ञान शाकुंतल का पाँचवाँ अंक, जब शकुंतला घूँघट डालकर दुष्यंत की सभा में जाती है और बाणभट्ट की कादम्बरी में चांडाल कन्या)  इसी प्रकार बालविवाह ( मनुस्मृति) और सती प्रथा (महाभारत) भी. मात्र जौहरप्रथा मुस्लिमकाल के बहुत बाद मुख्यतः राजपूतों में प्रचलित हुयी.

(4.)-- तत्कालीन विभेदकारी सामाजिक व्यवस्था को लेकर नारियों के एक वर्ग में असंतोष था, जो कि समय-समय पर बाहर आ जाता था, जैसा कि मैंने अपने इस लेख में लिखा है कि किस प्रकार प्राचीन भारत में भी नारी द्वारा सामाजिक विरोध के उदाहरण मिलते हैं.

इस प्रकार मेरे लिए नारीवाद ना सिर्फ एक आंदोलन है, एक विचारधारा है, बल्कि समाज को समझने का एक दृष्टिकोण और उपागम भी है. हमें इतिहास को अवश्य एक नए नज़रिए से देखना होगा और इसके लिए संस्कृत साहित्य को भी नए प्रकार से पढ़ना होगा, ताकि उन लोगों को जवाब दिया जा सके जो भारतीय संस्कृति में औरतों की सर्वोच्च स्थिति के विषय में एक-आध ग्रंथों से कुछ श्लोक उद्धृत करके यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि हमारे देश में इस प्रकार के आंदोलनों की कोई ज़रूरत नहीं है. सच तो यह है कि औरतों के लिए सरकारी स्तर पर, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा, एन.जी.ओज द्वारा और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किये जा रहे इतने प्रयासों के बावजूद उनका सशक्तीकरण इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि हमारे यहाँ के पुरुष अभी भी यह मानने को ही तैयार नहीं होते कि औरतों के साथ भेदभाव होता है और सदियों से होता आया है. हम आज भी अतीत की स्वर्णिम कल्पनाओं में डूबे हुए हैं और जाने कब उबर पायेंगे???
   

शनिवार, 20 मार्च 2010

भारत में नारीवाद की क्या आवश्यकता है???



मैं छेड़छाड़ की समस्या पर एक श्रृँखला लिख रही थी, जिसकी समापन किस्त तैयार करके रखी है. बस टाइप करनी है. पर इसी बीच मेरे एक मित्र ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक है-"Do We Need Feminism At All?" मैं अपने इस लेख के माध्यम से उसका उत्तर देने का प्रयास कर रही हूँ.यद्यपि अपने एक लेख में मैं पहले भी लिख चुकी हूँ कि जब हम यह कहते हैं कि नारीवाद की भारत में क्या ज़रूरत है? तो यह मानकर चलते हैं कि यह एक पश्चिम की अवधारणा है, जबकि ऐसा नहीं है. इसके उद्धरण में मैंने कुछ प्राचीन साहित्य और स्मृतियों के अंश दिये थे. 
     इस बात का उत्तर कि भारत में नारीवाद की क्या ज़रूरत है, एक वाक्य में दूँ तो यह होगा कि " नारीवाद नारी की उन परिस्थितियों को बदलने की बात करता है, जिनके कारण उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता और उन्हें वे अधिकार नहीं मिल पाते, जो पुरुषों को प्राप्त हैं. नारीवाद नारी को बदलने की बात नहीं करता." भारत में नारीवाद की उपयोगिता पर प्रश्न लगाने वाले तर्क देते हैं कि भारतीय नारी तो नारीत्व का, ममता का, करुणा का मूर्तिमान रूप है और पश्चिम की नारीवादी महिलाएँ उसे भी अपनी तरह भ्रष्ट कर डालना चाहती हैं. मैं यह कहती हूँ कि दुनिया सिर्फ़ भारत और अमेरिका या यूरोप ही नहीं है, एशिया, दक्षिण अमेरिका, अफ़्रीका के भी देशों में नारी आज अपनी परिस्थितियों को बदलने की माँग कर रही है और वह भी बिना अपनी संस्कृति को छोड़े. मुस्लिम देशों में औरतें बुर्क़े के साथ पढ़ना-लिखना और बाहर का काम करना चाहती हैं. इस्लाम में नारी की स्थिति पर  शीबा असलम फ़हमी अपने एक लेख में लिखती हैं, " तसलीमा ही नहीं आज विश्वभर में मुसलमान औरतें अपने-अपने समाजों में व्याप्त लिंग भेद पर सवाल खड़े कर रही हैं लेकिन इस्लाम पर हमला बोल कर नहीं। उनके यहां धर्म और समाज का फर्क साफ है। वह इस्लाम में रह कर इस्लामी न्यायप्रियता, बराबरी और आजादी के दर्शन से अपने लिए रास्ता निकाल रही हैं। वह मुसलमान मर्दों से ज्‍यादा स्पष्‍ट हैं इन मुद्दों को लेकर." आज बुर्क़ा हटाने का प्रश्न नहीं है. प्रश्न यह है कि औरत किस पहनावे में अपने आप को सुरक्षित और सहज पाती है. हम अपने देश में साड़ी की तारीफ़ करते नहीं थकते और मुस्लिम औरतों के पर्दे को बुरा-भला कहते हैं, बिना यह जाने कि औरत क्या चाहती है? साड़ी ठीक से पहनी जाये तो शालीन पहनावा है, नहीं तो आजकल की हिरोइनों के लिये वह सबसे सेक्सी ड्रेस है. बस फ़र्क इतना है कि उसे कौन किस उद्देश्य से पहनना चाहता है. पर्दा अगर ज़बर्दस्ती करवाया जाये तो ग़लत है, पर यदि औरत अपनी मर्ज़ी से पर्दा करना चाहती है, तो ये उस पर छोड़ देना चाहिये. बस परिस्थितियाँ ऐसी होनी चाहिये कि चयन का अधिकार औरत का हो और वह बिना किसी दबाव के अपना निर्णय खुद ले सके. 
     ठीक इसी तरह भारत में अगर नारी अपने नारीसुलभ गुण बनाये रखना चाहती है (जैसा कि अधिकतर औरत वास्तव में चाहती है) तो इस बात से उसे नारीवाद रोक नहीं रहा है, और न रोक सकता है. बात सिर्फ़ इतनी है कि उस पर ये गुण थोपे न जायें. ऐसा न कर दिया जाये कि उसे ज़बर्दस्ती शर्माना पड़े, चाहे शर्म आये या न आये. नारीवाद औरतों की निर्णय लेने और चयन की स्वतन्त्रता की बात करता है, न कि सभी औरतों को अपने स्वाभाविक गुण छोड़ देने की, चाहे वे नारीसुलभ गुण हों या कोई और. 
     नारीवाद का मुख्य उद्देश्य है नारी की समस्याओं को दूर करना. आज हमारे समाज में भ्रूण-हत्या, लड़का-लड़की में भेद, दहेज, यौन शोषण, बलात्कार आदि ऐसी कई समस्याएँ हैं, जिनके लिये एक संगठित विचारधारा की ज़रूरत है. जिसके लिये आज लगभग हर शोध-संस्था में वूमेन-स्टडीज़ की शाखा खोली गयी है. नारी-सशक्तीकरण, वूमेन स्टडीज़, स्त्रीविमर्श इन सब के मूल में नारीवाद ही है. नारी सशक्तीकरण और नारी सम्बन्धी शोध में हम नारी के सामाजिक विकास के लिये रणनीतियाँ बनाने के विषय में पढ़ते हैं और नारीवाद इन सभी समस्याओं की जड़ों की पहचान कराता है. इसलिये आज भारत में नारीवाद की सख्त ज़रूरत है. भारतीय नारीवाद, जो कि भारत में नारी की विशेष परिस्थितियों के मद्देनज़र एक सही और संतुलित सोच तैयार करे ताकि नारी-सशक्तीकरण के कार्य में सहायता मिले. 

सोमवार, 4 जनवरी 2010

स्त्रीलिंग-पुल्लिंग विवाद के व्यापक संदर्भ

स्त्रीलिंग-पुल्लिंग विवाद भले ही सबको निरर्थक बहस लगती हो, परन्तु नारीवादी आन्दोलन में भाषा के इस विवाद के व्यापक मायने हैं. जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे समाज में स्त्री-पुरुष के कार्यक्षेत्र तय थे और इसी अनुसार भाषा भी विकसित होती गयी. भाषा लोकानुगामिनी होती है. जो शब्द प्रचलन में होते हैं वे भाषा का अंग बन जाते हैं और इस प्रकार भाषा हमारे समाज की मनोवृत्ति को दर्शाती है. समाज में चूँकि घर के अन्दर के कार्य औरतें करती हैं, इसलिये "गृहिणी" शब्द स्त्रीलिंग है और बाहर का कार्य पुरुष करते हैं, इसलिये समाज के सभी महत्त्वपूर्ण पदों से सम्बन्धित शब्द पुल्लिंग है.
    जब नारीवादी आन्दोलन ने सर्वप्रथम यह प्रश्न उठाया था कि अधिकतर माहत्त्वपूर्ण शब्द पुल्लिंग क्यों हैं? तब उनका अभिप्राय था कि ये शब्द "जेंडर न्यूट्रल" होने चाहिये. इसका सबसे प्रासंगिक उदाहरण "राष्ट्रपति" शब्द है, जो पूरी तरह से पुल्लिंग है. विडम्बना यह है कि हमारा संविधान अंग्रेजी में लिखा गया, जिसमें "प्रेसिडेंट" शब्द जेंडर न्यूट्रल है. जब हमारे देश के विद्वान अनुवादकों ने संविधान का हिन्दी अनुवाद किया तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि राष्ट्र की प्रमुख कभी कोई महिला भी हो सकती है और आज जब महिला राष्ट्रपति बन गयी हैं, तो उनके साथ राष्ट्रपति शब्द कितना अटपटा लगता है, ये तो सभी जानते हैं.
    यहाँ मैं स्पष्ट करना चाहती हूँ कि इस संदर्भ में नारीवादियों की माँग क्या थी. उनका यह मतलब नहीं था कि प्रत्येक पुल्लिंग शब्द का स्त्रीलिंग शब्द भी होना चाहिये, बल्कि उनका अभिप्राय था कि महत्त्वपूर्ण पदों और कार्यों से सम्बन्धित शब्द ऐसे होने चाहिये जो कि अधिक व्यापक अर्थ वाले और अधिक समावेशी हों. इसीलिये "न्यूट्रल जेंडर" नहीं "जेंडर न्यूट्रल" कहा जाता है. न्यूट्रल जेंडर शब्द नकारात्मक है जिसका अर्थ है- न स्त्रीलिंग और न ही पुल्लिंग (नपुंसकलिंग). जबकि जेंडर न्यूट्रल सकारात्मक है जो कि स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और ट्रान्स जेंडर को भी समावेशित करता है.
     नारीवादियों की इस माँग का ही परिणाम है कि अब अधिकतर लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण शब्द जेंडर न्यूट्रल हो गये हैं. अब चेयरमैन, कैमरामैन में मैन के स्थान पर "पर्सन" शब्द प्रयुक्त होता है. न्यूज़रीडर, एंकर, जर्नलिस्ट आदि जेंडर न्यूट्रल शब्द हैं. बेशक ये शब्द अंग्रेजी के हैं. हिन्दी में अब भी एक कार्य के लिये स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का भेद बना हुआ है, जिससे कभी-कभी असुविधाजनक स्थिति उत्पन्न हो जाती है. इसकी ज़िम्मेदारी हम पर है कि हम अधिकतर जेंडर न्यूट्रल भाषा का प्रयोग करें. इसका बहुत अच्छा उदाहरण एन.सी.ई.आर.टी. की पुस्तके हैं, जिनमें किसान और मजदूरों के विषय में भी महिलाओं का उदाहरण दिया जाता है. यदि आप दस साल पहले और अब की पुस्तकों की तुलना करें तो आपको अन्तर स्पष्ट पता चलेगा.
     संक्षेप में, मेरा कहना है कि हमें ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिये जो अधिक से अधिक समावेशी हो. व्यावहारिक दिक्कतों से बचने के लिये उन शब्दों के आगे महिला या पुरुष लगाकर काम चलाया जा सकता है. या ऐसे शब्द प्रयुक्त हों जिनका स्त्रीलिंग शब्द उचित और व्यावहारिक हों जिससे कि "राष्ट्रपति" शब्द जैसी स्थिति न उत्पन्न हो. वैसे, मैं भी यह मानती हूँ कि ये प्रश्न उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि अन्य मुद्दे, परन्तु अब भी यह नारीवाद के अनेक सैद्धान्तिक मुद्दों में से एक है.

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

महिला ब्लॉगर्स बनाम पुरुष ब्लॉगर्स तथा नारीवाद बनाम समानतावाद

आजकल ब्लॉगजगत में महिला ब्लॉगर्स और महिला मुद्दों को लेकर कुछ अधिक चर्चाएँ हो रही हैं. इनमें दो मुद्दे प्रमुख हैं- पहला मुद्दा यह है कि एक लेखक, लेखक होता है. क्या उसे स्त्री या पुरुष के वर्ग में बाँटना उचित है? इस बात से एक और बात निकलती है कि नारी ब्लॉगर्स एक ओर तो स्त्री-पुरुष समानता की बात करते हैं, दूसरी ओर महिला ब्लॉगर का बिल्ला लगाये भी घूमना चाहते हैं. दूसरा मुद्दा यह है कि नारीवाद जब स्त्री-पुरुष दोनों की समानता की बात करता है तो उसे नारीवाद क्यों कहा जाय, समानतावाद क्यों नहीं?  देखने में ये दोनों बातें अलग-अलग लग सकती हैं,परन्तु ये दोनों ही बातें एक बात से जुड़ी हैं और वह है-समानतावाद.
     मैं इन दोनों ही मुद्दों पर नारीवादी दृष्टिकोण को स्पष्ट करुँगी. पहली बात के जवाब में मैं यह कहना चाहुँगी कि जिस प्रकार हमारा समाज विभिन्न जाति, धर्म, सम्प्रदाय में बँटा हुआ है, उसी तरह स्त्री और पुरुष से मिलकर भी बना है. सामाजिक व्यवस्था इस प्रकार की है कि लड़की और लड़के का पालन-पोषण अलग-अलग ढँग से होता है. समाज की एक विशेष मानसिकता के चलते लड़कियों को कुछ ऐसे अनुभव होते हैं, जिनके बारे में कोई लड़का सोच भी नहीं सकता. खुद लड़कियाँ भी ये नहीं जानतीं कि ऐसा प्रायः हर लड़की के साथ होता है. जब एक लड़की, औरत बनती है तो उसके सामने दूसरे तरह की समस्याएँ और अनुभव आते हैं. इन सब बातों के कारण स्त्रियों के विशेष प्रकार के लेखन की ज़रूरत होती है. और यह लेखन सामुदायिक इसलिये होना चाहिये क्योंकि औरतों के ये अनुभव उनकी विशेष प्रकृति के साथ-साथ समाज की विशेष व्यवस्था के कारण होते हैं. इस प्रकार के व्यक्तिगत अनुभवों की बातें एक मंच पर होने से हमें यह पता चलता है कि कोई समस्या कितनी गम्भीर है और उसके कितने आयाम हो सकते हैं. महिला लेखन ही क्यों, दलित लेखन भी उसी प्रकार उचित है, क्योंकि एक दलित अपने समस्याओं, अपने अनुभवों के बारे में जितना अच्छा लिख सकता है, उतना और कोई नहीं. मेरे विचार से इस प्रकार के अलग-अलग वर्गों के लेखन से साहित्यिक समाज में फूट नहीं पड़ती, बल्कि वह समृद्ध होता है.
     दूसरी बात जो यह उठी थी कि नारीवाद को समानतावाद क्यों न कहा जाय तो इसके जवाब में मैं यह कहूँगी कि नारीवाद और समानतावाद दो अलग सिद्धान्त हैं. यद्यपि समानतावाद के अन्तर्गत ही नारीवाद आता है, तथापि नारीवाद ने कभी निरपेक्ष समानता की बात नहीं की. नारीवाद ने कभी नहीं कहा कि स्त्री-पुरुष को एक समतल पर लाकर खड़ा कर दिया जाय. बल्कि नारीवाद ने विकल्प और अवसरों की समानता की बात कही है. नारीवाद ने कभी समाज के नियमों या नारी के उत्तरदायित्त्व से स्वतन्त्रता की माँग नहीं की, बल्कि निर्णय लेने की स्वतन्त्रता की माँग की है. स्त्री और पुरुष पूरी तरह से समान न हैं और न हो सकते हैं. पर दो लोग समान नहीं हैं, इससे यह कहाँ सिद्ध होता है कि एक दूसरे से श्रेष्ठ है? कौन क्या कर सकता है, इसका पता तो तब चले जब दोनों को बराबर अवसर मिले. पर हमारे समाज में तो पहले से ही यह मान लिया जाता है कि औरतें अमुक-अमुक कार्य कर ही नहीं सकतीं. मेरे विचार से हर लड़की और लड़के को समान अवसर मिलना चाहिये यह सिद्ध करने के लिये. और चूँकि यह अवसर आज सिर्फ़ पुरुषों को मिला हुआ है औरतों को नहीं, इसलिये नारीवाद ने यह माँग उठाई है. नारीवाद को समानतावाद कहने से समस्या के मूल का पता ही नहीं चलेगा क्योंकि फिर हर कोई यह पूछेगा कौन समान, किसके समान आदि.
     हमारे भारतीय समाज में विविधता है और हमें प्रत्येक विविधता का सम्मान करना चाहिये क्योंकि विविधता होना ग़लत नहीं है, उसके आधार पर भेदभाव ग़लत है.

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

नारीवाद से सम्बन्धित भ्रान्तियाँ--२ (नारीवाद पुरुष विरोधी है)

नारीवाद को अधिकतर लोग पुरुष-विरोधी समझते हैं. नारीवादी औरत को एक ऐसी एबनॉर्मल, फ़्रस्टेटेड, सख़्तमिजाज़, और झगड़ालू औरत समझा जाता है, जो बात-बात में पुरुषों से झगड़ा कर बैठती है और खोद-खोदकर ऐसे मुद्दे उछालती है, जिससे पुरुषों को नीचा दिखाया जा सके. नारीवादी औरत को लोग अपने व्यक्तिगत जीवन की कुंठा को सार्वजनिक जीवन में लागू करने वाली समझते हैं. लोगों के अनुसार ऐसी औरतें अपने जीवन में सामंजस्य नहीं बैठा पातीं, एडजस्टमेंट नहीं करना चाहतीं और इसका दोष पुरुषों के मत्थे मढ़ती हैं. जबकि अन्य अनेक भ्रान्तियों की तरह यह भी एक भ्रान्ति है. नारीवाद पुरुषों का विरोध नहीं करता, बल्कि समाज की पितृसत्तात्मक संरचना का विरोध करता है. पितृसत्ता एक पारिभाषिक शब्द है, जिसकी चर्चा मैं इसी ब्लॉग के पिछले आलेखों में कर चुकी हूँ.
     यह जानकर शायद कुछ लोगों को आश्चर्य होगा कि नारीवादी आन्दोलन के प्रारम्भिक चरण में जिस एक विचारक ने नारी-अधिकारों की पुरज़ोर वक़ालत की थी, वह एक पुरुष था-जॉन स्टुअर्ट मिल जो एक प्रसिद्ध उपयोगितावादी राजनीतिक विचारक थे. उन्होंने अपनी पुस्तक "स्त्री और पराधीनता" (The Subjection of Women ) में कहा था कि समाज का पूरी तरह विकास तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि आधी आबादी को उसके नागरिक और राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं हो जाते. उन्होंने मानवता, उदारता और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर नारी-अधिकारों की बात की थी. उन दिनों नारीवाद मात्र नागरिक व राजनीतिक अधिकारों की बात कर रहा था. अतः उसे उदारवादी नारीवाद नाम दिया गया.
     बाद में नारीवाद का विकास हुआ. पितृसत्तात्मक समाज की संरचना को समझने और नारी की स्थिति को सुधारने के विभिन्न उपायों के अधार पर नारीवाद की कई धाराओं का विकास हुआ, जिनमें से कुछ अतिवादी धाराएँ थीं. इन अतिवादी धाराओं ने अपने कुछ विवादित कदमों के फलस्वरूप अधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर ली. ब्रा बर्निंग मूवमेंट, समलैंगिकता को पुरुष-संसर्ग का वैकल्पिक समाधान सिद्ध करने की कोशिश, नारीत्व(feminity) का विरोध आदि कुछ ऐसे ही विवादित कदम थे. इन बातों के फलस्वरूप लोगों में ये बात घर कर गयी कि नारीवाद पुरुष  विरोधी विचारधारा है, जो कि पुरुषों को समाज से हटाकर स्त्रियों की सत्ता स्थापित करना चाहती है.
     यदि तार्किक ढँग से विचार किया जाय तो यह भ्रान्ति बहुत ही हास्यास्पद लगती है. स्त्री और पुरुष दोनों से मिलकर समाज बना है. अतः दोनों में से किसी एक के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती और न ही ऐसी कोई विचारधारा सफल हो सकती है, जो किसी एक के विरोध पर टिकी हो. नारीवाद एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहता है, जहाँ स्त्री और पुरुष दोनों को समान अवसर प्राप्त हों, विकल्प की स्वतंत्रता हो और निर्णय लेने की स्वतंत्रता हो. कोई सिर्फ़ इसलिये किसी अधिकार से वंचित न रह जाय कि वह स्त्री है या पुरुष. जहाँ पुरुषों को रोने का अधिकार हो और स्त्री को हँसने का, जहाँ पुरुष गुलाबी शर्ट पहन सके और स्त्री भूरे कपड़े, जहाँ नर्सिंग का काम पुरुष भी कर सके और नारी भी विमान उड़ा सके, जहाँ कोई पति यह निर्णय ले सके कि यदि उसकी पत्नी अपनी इच्छा से नौकरी कर रही है तो वह घर का कार्य कर सके और इस बात पर कोई उसकी खिल्ली न उड़ाये...
.......क्या यह सिर्फ़ एक सपना है जो सच नहीं हो सकता? मेरे विचार से हो सकता है यदि पुरुष अपने पुरुषत्त्व का अहंकार त्याग दे और आगे कदम बढ़ाये......
मुझे यह बात कहने में कोई हिचक नहीं है कि पुरुषों के साथ के बिना नारीवाद अधूरा है.

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

नारीवाद से सम्बन्धित भ्रान्तियाँ-१ ( नारीवाद पश्चिमी अवधारणा है )

नारीवाद पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वह पश्चिम से आयातित अवधारणा है और उसका भारतीय संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है. प्रतिपक्षियों के अनुसार चूँकि भारत में नारी की पूजा होती है, उसका सर्वोच्च स्थान है. इसलिये नारीवाद की भारतीय समाज में न कोई आवश्यकता कभी थी और न है.
    यह बात बिल्कुल सही है कि "नारीवाद" को इस नाम से सर्वप्रथम पश्चिम में ही जाना गया और इसे एक विचारधारा का रूप भी वहीं प्रदान किया गया. परन्तु प्राचीन भारतीय साहित्य में आपको ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे , जिनमें नारी का विद्रोही स्वरूप सामने आया है. भले ही नारी के इस विद्रोह को नारीवाद नाम न दिया गया हो पर इससे यह पता चलता है कि विभिन्न युगों में नारी ने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में अपनी स्थिति पर क्षोभ व्यक्त किया है. "अभिज्ञान शाकुन्तल" कालिदास का प्रसिद्ध नाटक है, जिसकी नायिका शकुन्तला "निसर्ग कन्या" के रूप में वर्णित की गयी है. परन्तु शकुन्तला का वह रूप विद्रोह का प्रतीक है, जब वह अपने धर्मभाईयों के साथ ऋषि कण्व के आश्रम से विदा होकर दुष्यन्त के पास आती है और वह उसे पहचानने से मना कर देता है, उल्टे आरोप लगाता है कि आपलोग बलपूर्वक अपनी बहन को मेरे मत्थे मढ़ रहे हैं. उस समय शकुन्तला निर्भीक होकर कहती है कि आप जिस प्रकार स्वयं छली  हैं, उसी प्रकार दूसरों को भी समझते हैं. इस समय भोली-भाली शकुन्तला का रोष देखते बनता है. इसी प्रकार सीता अपनी पवित्रता पर उंगली उठाये जाने पर अपनी माँ (पृथ्वी) की गोद में शरण लेना उचित समझती हैं. अभिज्ञान शाकुन्तल की शकुन्तला और उत्तर रामायण की सीता अपने पुत्रों का अकेले ही (बिना पति के) ऋषियों के आश्रम में  पालन-पोषण करती हैं. बृहदारण्यकोपनिषद्‌ का गार्गी-याज्ञवल्क्य संवाद प्रसिद्ध है, जिसमें गार्गी याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करते हुये ब्रह्मविद्या से सम्बन्धित ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछती हैं कि वे परेशान होकर कह उठते हैं कि इससे आगे प्रश्न करने पर तुम्हारा सर धड़ से अलग हो जायेगा ( कुछ व्याख्याकारों के अनुसार याज्ञवल्क्य ने गार्गी को सर काटने की धमकी दी थी). गार्गी जानती थीं कि याज्ञवल्क्य एक प्रतिष्ठित महर्षि हैं, परन्तु उन्होंने शास्त्रार्थ करने में निर्भीकता दिखाई और बाद में विनम्रतापूर्वक अपनी पराजय भी स्वीकार कर लेती हैं. याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी गार्गी के आश्रम में शिक्षा प्राप्त करती है. वह उच्चशिक्षा प्राप्त करना चाहती है, परन्तु उस युग में उच्चशिक्षा पर पुरुषों का वर्चस्व था, अतः वह ऋषियों के आश्रम में ही प्राप्त की जा सकती थी और किसी युवती के लिये यह असंभव था. अतः मैत्रेयी याज्ञवल्क्य से विवाह करके उनके साथ रहकर उच्चशिक्षा प्राप्त करती है.
    ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि अन्य समाजों की तरह हमारा समाज भी पितृसत्तात्मक था, जिसमें नारी की स्थिति दोयम थी, परन्तु तब भी नारी अपनी स्थिति के विरुद्ध संघर्ष करती रहती थी. वस्तुतः प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में नारी अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं थी और जब तकनीकी विकास के फलस्वरूप वह एक-दूसरे के संपर्क में आयी तो उसके विद्रोह ने नारीवाद का रूप ले लिया. नारीवाद न पश्चिमी अवधरणा है और न ही भारतीय. यह नारी के अन्दर पल रहे रोष और क्षोभ की सर्वव्यापक अभिव्यक्ति है.

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

आप कहाँ खड़े हैं?

    समाज में बहुत से मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर लोगों की राय बिल्कुल अलग-अलग होती है, परन्तु नारी की स्थिति से सम्बन्धित बहुत सी ऐसी बातें हैं, जिनके बारे में लोगों को पता ही नहीं होता कि वे क्या सोचते हैं? यहाँ तक कि नारी स्वयं नहीं जानती कि उनकी स्थिति जैसी है, वैसी क्यों है? और वह सही है या ग़लत? समाज में नारी की स्थिति के विषय में निम्नलिखित मत हो सकते हैं-
१. स्त्री और पुरुष दोनों में जैविक रूप से भेद है, अतः सामाजिक भेद भी होना चाहिये. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं. जहाँ तक पुरुषों द्वारा स्त्री के शोषण का प्रश्न है तो स्त्रियाँ भी ऐसा करती हैं और पुरुष भी. इसमें कहने वाली कोई बात नहीं है. नारी अधिकार जैसी कोई बात भी नहीं होनी चाहिये.
२. स्त्री और पुरुष दोनों जैविक रूप से भिन्न हैं तथा सामाजिक रूप से भी. पुरुषों द्वारा स्त्रियों को हमेशा से दबाया गया है. परन्तु अब स्थिति पहले से बहुत अच्छी है और धीरे-धीरे और भी परिवर्तन आयेगा. अब नारी भी पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रही है. इसलिये नारी-अधिकार जैसे किसी आन्दोलन की अब कोई आवश्यकता ही नहीं.
३. स्त्री और पुरुष दोनों जैविक रूप से भिन्न हैं, परन्तु सामाजिक भेद हमारी सामाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न किया जाता है. पुरुष-प्रधान समाज में नारी की स्थिति दूसरे दर्जे़ की नागरिक की रही है. ऐसा प्रत्येक देश और प्रत्येक युग में होता रहा है. नारी ने अपने अधिकारों के लिये लम्बी लड़ाई लड़कर कुछ अधिकार प्राप्त किये हैं. परन्तु स्थिति अब भी बहुत बेहतर नहीं है. इसलिये संघर्ष जारी है. अगर ये कहा जाता है कि नारी भी तो पुरुष पर अत्याचार करती है, तो एक तो ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं, दूसरी बात, जो नारी ऐसे शोषण के कार्य में शामिल होती है, वह स्वयं भी पितृसत्ता की वाहक होती है. क्योंकि पितृसत्ता ऐसी विचारधारा है, जिसमें जो शक्तिशाली होता है, वह शक्तिहीनों का शोषण करता है. इसमें शोषक या शोषित स्त्री या पुरुष दोनों में से कोई भी हो सकता है. यह सच है कि स्त्री शारीरिक रूप से पुरुष जितनी सक्षम नहीं है, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि उसे दूसरे दर्जे़ का नागरिक मान लिया जाये. इसीलिये हमारे संविधान में अन्य भेदों के निराकरण के साथ लिंगभेद का भी निराकरण किया गया है.
    नारीवाद तीसरे मत का समर्थन करता है. अब आप तय करें कि आप कहाँ खड़े हैं?

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

नारीवाद से परहेज़ क्यों?

इस ब्लॉग पर मेरी पिछली पोस्ट से किसी को बुरा लगा हो तो मैं क्षमाप्रार्थिनी हूँ. वाणीगीत जी, आपने सच कहा है कि मुझे आपकी टिप्पणी को इतने हल्के में नहीं लेना चाहिये था. पर विश्वास कीजिये मेरा तात्पर्य किसी मुद्दे को उछालकर विवादित बनाने का बिल्कुल नहीं था. मेरा उद्देश्य तो नारीवाद और नारीवादियों को लेकर कुछ ग़लतफ़हमियों को दूर करना था. वस्तुतः मैंने इस ब्लॉग को आरम्भ ही किया था नारीवाद से सम्बन्धित कुछ सैद्धान्तिक बातों को स्पष्ट करने के लिये. नारी से सम्बन्धित समस्याओं,विमर्शों और व्यावहारिक मुद्दों पर अन्य लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण ब्लॉग हैं, जिनमें प्रमुख हैं- नारी, नारी का कविता ब्लॉग, स्त्रीविमर्श और चोखेरबाली.
     मुझे लगता है कि हमारे समाज में नारीवाद को लेकर कुछ भ्रान्तियाँ हैं, जिन्हें दूर करने का प्रयास मैं इस ब्लॉग से करती रहती हूँ. सबसे पहले तो मैं यह बताना चाहुँगी कि मैं ये सारी कवायद कर क्यों रही हूँ, तो मेरा मानना है कि समाज के किसी उपेक्षित वर्ग के लिये कार्य करना एक बात है और उसकी स्थिति ऐसी क्यों है? इसके क्या प्रभाव हैं और इसे किस तरह दूर करना है, इन मुद्दों पर शोध करना दूसरी बात है. दोनों ही बातें अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं. मेरा सरोकार दूसरी बात से है, जो कि सैद्धान्तिक है और जब यह उपेक्षित वर्ग नारी हो तो इसे नारीवाद कहेंगे. अतः नारीवाद एक विचारधारा है, जिसके अन्तर्गत उपर्युक्त बातों पर शोध किया जाता है और सिद्धान्त बनाये जाते हैं. समाज के एक वर्ग को यह बुद्धिजीवियों की जुगाली लगती है. परन्तु विचारणीय प्रश्न है कि यदि सिद्धान्त ही नहीं होंगे तो उसे व्यवहार में लाने की दिशा कैसे तय होगी? इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं कि नारी की स्थिति में सुधार होना चाहिये इस पर सभी सहमत हैं, पर यह सुधार किस प्रकार होगा? कौन-कौन से उपाय अपनाये जाने चाहिये? क्या सिर्फ़ अधिकार मात्र दे देने से या कानून बना देने से योजनायें लागू कर देने से समस्या हल हो जायेगी? क्या हमें सारी औरतों को एक वर्ग में रखना चाहिये या उनका वर्गीकरण करना चाहिये(जैसे-ग्रामीण बनाम शहरी औरतें, धनी बनाम निर्धन औरतें, नौकरी करने वाली बनाम घरेलू औरतें) आदि. यदि हम औरतों की बेहतरी के लिये कुछ करना चाहते हैं तो इन सब बातों पर शोध करना होगा. इसीलिये नारीवाद की प्रासंगिकता बनी हुयी है.
     जब हम यह कहते हैं कि नारीवाद को छोड़ो और नारी की बेहतरी की कोशिश करो तो यह ऐसा लगता है कि जैसे हम कह रहे हों समाजवाद को छोड़कर सामाजिक समता की बात करो. भले ही हम किसी विचारधारा से सहमत हों या नहीं, पर उसकी प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं होती, चाहे वह गाँधीवाद हो, मार्क्सवाद हो या नारीवाद. यह अवश्य है कि विभिन्न वादों के अन्तर्गत जो शोध या अध्ययन होते हैं उन्हें व्यवहार में लाने का प्रयास भी किया जाना चाहिये. कहीं ऐसा न हो कि मीटिंग, सेमिनार, वर्कशाप करते रहें और स्थिति जहाँ की तहाँ बनी रहे. पर यह भी मानना चाहिये कि इन बौद्धिक बहसों का भी उतना ही महत्त्व है जितना कि फ़ील्ड में जाकर कार्य करने का.
     मेरा प्रयास है कि नारी के लिये कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं के बीच सामंजस्य स्थापित हो ताकि दोनों मिलकर औरतों की बेहतरी के लिये रणनीति बनाकर उसे अमल में लाने के लिये नीतिनिर्माताओं पर दबाव डाल सकें, न कि सिर्फ़ आपसी बहसों में उलझे रह जायें. मैं चाहती हूँ कि ब्लॉगिंग "विमर्शी लोकतंत्र" का माध्यम बने. इसलिये मैं उन सभी से क्षमा माँगती हूँ, जिनको मेरी बातों का बुरा लगा हो.
     ...अपनी अगली पोस्ट में मैं नारीवाद से सम्बन्धित कुछ अन्य भ्रान्तियों तथा उनके निराकरण के विषय में लिखुँगी...

रविवार, 11 जनवरी 2009

आज की नारी

हम इस ब्लॉग पर बातें करेंगे आज की नारी की आकांक्षाओं और सपनों की ,और दार्शनिकों में इन सपनों तथा उन्हें पूरा करने के रास्तों को लेकर चल रही बहसों की .ब्लॉग लेखक कोई बड़ा /बड़ी फेमिनिस्ट नहीं है ,लेकिन इन मामलों की थोड़ी बहुत समझ ज़रूर है .पाठक इस ब्लॉग पर बहस के लिए तथा ब्लोगर की बातों से सहमत और असहमत होने के लिए सादर आमंत्रित हैं .