पिछले कुछ दिनों से इस विषय पर सोच रही थी, अतिव्यस्तता के बाद भी। इसके दो प्रमुख कारण थे - मेरे बेहद करीबी दोस्तों के प्रेम विवाह में आ रही अडचनें और मेरी एक जूनियर द्वारा बार-बार प्रेम के अस्तित्व पर उठाये जा रहे प्रश्न। मेरी जूनियर इस बात से परेशान है कि जीवन के संघर्ष के दिनों में जो प्रेम किसी का संबल बनता है, सहारा देता है, वही वास्तविक संसार के, यथार्थ के धरातल पर आकर स्वयं क्यों असहाय हो जाता है?
जब प्रेम और समाज के सम्बन्धों की समस्या के बारे में सोचती हूँ तो एक दूसरा ही प्रश्न सामने आ खड़ा होता है कि क्या वाकई जिसे हम प्रेम समझ रहे थे, वह प्रेम ही था? हमारे पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ लड़के-लड़कियों को अलग-अलग ढाँचों में ढलने की ट्रेनिंग दी जाती है, जहाँ विद्यालय के स्तर पर सह-शिक्षा में पढ़ाना ही अपराध समझा जाता है, वहाँ क्या हमारे पास प्रेम के लिए विकल्प होते हैं? मेरा जवाब है नहीं। ऐसे में अक्सर लड़के-लड़कियाँ पहली बार जिस विपरीतलिंगी के संपर्क में आते हैं, उसी की ओर आकर्षित हो जाते हैं और उसी को प्यार समझ बैठते हैं। इसमें 'प्रेम में एकनिष्ठता' की अनिवार्यता और 'एकाधिकार की भावना', न उन्हें अपने प्रेम पर पुनर्विचार करने देती है और न ही विकल्प ढूँढने देती है। यह प्रेम जब दुनिया के सामने पहुँचता है, तो उसको टूटना ही है। हालांकि हमेशा ही ऐसा नहीं होता। पर अगर प्रेम समाज के बनाए हुए नियमों से लड़ने के पहले ही हथियार डाल देता है, तो मैं उसे प्रेम ही नहीं मानती। हाँ, ये हो सकता है कि उसमें से किसी एक ने वास्तव में सच्चा प्यार किया हो, पर उसका साथी या तो खुद प्रेम के भ्रम में होता है अथवा अपने प्रेमी को जानबूझकर धोखा दे रहा होता है।
खैर, यहाँ इस पोस्ट का विषय 'प्रेम का भ्रम' नहीं प्रेम है, बशर्ते वह 'विशुद्ध प्रेम' हो। यहाँ विशुद्ध से मतलब किसी नैतिक शुचिता से नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि उसमें किसी भी तरह की अन्य भावना की मिलावट ना हो, जैसे स्वार्थ, निर्भरता, जिम्मेदारी, दया, करुणा आदि। वह प्रेम, जिसमें प्रेम के बदले बस प्रेम की अपेक्षा हो। बहुत पहले 'स्त्री मुक्ति संगठन' की साथी डॉ. पद्मा सिंह ने कहा था, "प्रेम दो बेहद स्वतंत्र और आत्मनिर्भर व्यक्तियों के बीच में ही संभव है।" अर्थात यदि प्रेमी-प्रेमिका प्रेम के अलावा किसी और बात के लिए एक-दूसरे पर निर्भर नहीं और प्रेम के अलावा और कोई स्वार्थ भी नहीं है, तभी प्रेम संभव है। मुझे एक दृष्टि में यह बात सही लगती है। आप इससे असहमत भी हो सकते हैं। पर, मैं मानती हूँ कि इस तरह के प्रेम में स्त्री-पुरुष दोनों समान स्थिति में होते हैं। इसलिए वो पितृसत्ता के लिए एक चुनौती होते हैं और इसीलिये समाज के ठेकेदार प्रेमियों से बहुत डरते हैं।
यहाँ मैं उस 'विक्टोरियन रोमैंटिक लव' को अलग कर रही हूँ, जो अंग्रेजी साहित्य के काल विशेष में और 'मिल्स एंड बून' के नावेल्स में पाया जाता है और जिसमें सफ़ेद घोड़े पर सवार एक राजकुमार आता है और खूब घेरदार फ्रिल वाली पोशाक पहनी हुयी नायिका को अपने साथ ले जाता है। मैं संस्कृत के 'सम्भोग श्रृंगार' वाले प्रेम को और हिंदी के 'रीतिकालीन प्रेम' को भी नहीं गिन रही हूँ। क्योंकि इन सभी स्थानों पर प्रेम की जो छवि है, वो पितृसत्ता की ही बनायी हुयी है और इसमें बिलकुल भी बराबरी नहीं है। भारतीय परम्परा में भी अर्जुन-सुभद्रा से लेकर पृथ्वीराज-संयोगिता तक नायिकाओं के अपहरण के किस्सों में भी इसी प्रकार का प्रेम परिलक्षित होता है। यह रूमानी और रूढ़िवादी प्रेम पितृसत्ता का पोषक ही है क्योंकि इसमें हमेशा नायिका कोमल कृशांगी और नायक वीर पुरुष होता है। वो हमेशा 'प्रोटेक्टर' की भूमिका में होता है और इसीलिये नायिका को कमज़ोर दिखाया जाता है। प्रेम, पितृसत्ता से टक्कर तभी ले सकता है जब प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से समान रूप में प्रेम करते हों। तभी वो पितृसत्ता की उस अवधारणा के विरुद्ध होते हैं, जिसमें एक को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाता है, एक को कठोर और दूसरे को कोमल माना जाता है।
नारीवाद का रोचक पक्ष यह है कि वह विवाह को तो एक पितृसत्तात्मक संस्था मानता है, पर प्रेम को नहीं। विवाह का पितृसत्ता से क्या सम्बन्ध है, इस पर भी कभी चर्चा होगी। फिलहाल विचार का विषय है कि प्रेम पितृसत्ता के लिए चुनौती कैसे है? हमारे समाज की बुनावट जैसी है उसमें जानबूझकर जीवनसाथी के चयन के विकल्प इतने कम रखे गए हैं और प्रक्रिया इतनी जटिल है कि आप अपने साथी के चयन के लिए समाज के बनाए नियमों के अधीन अपने परिवार की इच्छा पर निर्भर रहें। यह बात लड़के और लड़की दोनों के लिए समान रूप से लागू होती है अर्थात दोनों के ही पास 'चयन के विकल्प' नहीं हैं। ऐसे में जब कोई लड़का या लड़की अपनी इच्छा से कोई साथी ढूँढ़ लेता है, तो समाज को अपनी व्यवस्था खतरे में पड़ती दिखाई देती है। जब प्रेमी जोड़ा एक कदम आगे बढ़कर अपने प्रेम को विवाह में परिणत करना चाहता है, तो इसीलिये उसे घोर विरोध का सामना करना पड़ता है कि उन्होंने समाज के नियमों के विरुद्ध 'अपनी इच्छा' से साथी चुन लिया। यह उस सामाजिक व्यवस्था के लिए अपमान होता है, जिसमें पद्सोपानीयक्रम से छोटे को बड़े की, निर्धन को धनवान की, निर्बल को सबल की और स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना अनिवार्य होता है। सबसे ज्यादा डर परिवार को इस बात का होता है कि प्रेमविवाह कर आयी लड़की 'आदर्श बहू' बन पायेगी या नहीं। इसीलिये प्रेमविवाह को रोकने के लिए परिवार वाले सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वो अपने 'बिगड़े' हुए बच्चों को परिवार की प्रतिष्ठा का हवाला देते हैं, बराबरी में रिश्ता करने की बात कहते हैं और अन्ततः 'इमोशनल ब्लैकमेलिंग' का अमोघास्त्र प्रयुक्त करते हैं।
अगर यह प्रेम अंतरजातीय हुआ, तब तो विवाह के लिए प्रेमी-प्रेमिका को परिवार के साथ समुदाय का भी विरोध झेलना पड़ता है। अंतरजातीय विवाह पितृसत्ता के साथ ही साथ जातिव्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकते हैं, बशर्ते प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे का साथ निभाने को पूरी तरह प्रतिबद्ध हों।
लेकिन इन सब बातों का दूसरा पहलू भी है। अक्सर देखा जाता है कि प्रेम विवाह में परिणत होने के बाद पितृसत्तात्मक ढाँचे में ही ढल जाता है। पति-पत्नी दोनों अपनी-अपनी पारम्परिक भूमिका में आ जाते हैं और कुछ दिनों बाद दोनों की स्थिति को देखकर आप बिलकुल नहीं कह सकते कि इन्होंने प्रेम विवाह किया था या पारम्परिक विवाह। बल्कि प्रेम विवाह में लड़की खुद को 'आदर्श बहू' और 'आज्ञाकारी पत्नी' साबित करने के लिए अक्सर ज्यादा से ज्यादा 'त्याग' करने को तैयार रहती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लड़के-लड़कियाँ पले-बढे तो उसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में होते हैं, जहाँ सबकी भूमिकाएँ पहले से तय होती हैं।
इसलिए अगर हम यह सोचते हैं कि केवल प्रेम विवाह कर लेने भर से पितृसत्ता को कोई चोट पहुँच सकती है, तो यह एक भूल होगी। हाँ, इतना अवश्य है कि प्रेमी एक स्तर पर तो उससे टक्कर ले लेते हैं, लेकिन अगले ही कदम पर वह अपने दूसरे रूप में उन्हें अपने अंदर समाहित करने को खड़ी मिलती है। हमें यह याद रखना होगा कि पितृसत्ता भी पूँजीवाद की तरह एक बेहद लचीली, परिवर्तनशील और बहुरूपिया व्यवस्था है और इसके साथ लड़ने के लिए इसके हर रूप को जानना और लगातार संघर्ष करना ज़रूरी है।
जब प्रेम और समाज के सम्बन्धों की समस्या के बारे में सोचती हूँ तो एक दूसरा ही प्रश्न सामने आ खड़ा होता है कि क्या वाकई जिसे हम प्रेम समझ रहे थे, वह प्रेम ही था? हमारे पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ लड़के-लड़कियों को अलग-अलग ढाँचों में ढलने की ट्रेनिंग दी जाती है, जहाँ विद्यालय के स्तर पर सह-शिक्षा में पढ़ाना ही अपराध समझा जाता है, वहाँ क्या हमारे पास प्रेम के लिए विकल्प होते हैं? मेरा जवाब है नहीं। ऐसे में अक्सर लड़के-लड़कियाँ पहली बार जिस विपरीतलिंगी के संपर्क में आते हैं, उसी की ओर आकर्षित हो जाते हैं और उसी को प्यार समझ बैठते हैं। इसमें 'प्रेम में एकनिष्ठता' की अनिवार्यता और 'एकाधिकार की भावना', न उन्हें अपने प्रेम पर पुनर्विचार करने देती है और न ही विकल्प ढूँढने देती है। यह प्रेम जब दुनिया के सामने पहुँचता है, तो उसको टूटना ही है। हालांकि हमेशा ही ऐसा नहीं होता। पर अगर प्रेम समाज के बनाए हुए नियमों से लड़ने के पहले ही हथियार डाल देता है, तो मैं उसे प्रेम ही नहीं मानती। हाँ, ये हो सकता है कि उसमें से किसी एक ने वास्तव में सच्चा प्यार किया हो, पर उसका साथी या तो खुद प्रेम के भ्रम में होता है अथवा अपने प्रेमी को जानबूझकर धोखा दे रहा होता है।
खैर, यहाँ इस पोस्ट का विषय 'प्रेम का भ्रम' नहीं प्रेम है, बशर्ते वह 'विशुद्ध प्रेम' हो। यहाँ विशुद्ध से मतलब किसी नैतिक शुचिता से नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि उसमें किसी भी तरह की अन्य भावना की मिलावट ना हो, जैसे स्वार्थ, निर्भरता, जिम्मेदारी, दया, करुणा आदि। वह प्रेम, जिसमें प्रेम के बदले बस प्रेम की अपेक्षा हो। बहुत पहले 'स्त्री मुक्ति संगठन' की साथी डॉ. पद्मा सिंह ने कहा था, "प्रेम दो बेहद स्वतंत्र और आत्मनिर्भर व्यक्तियों के बीच में ही संभव है।" अर्थात यदि प्रेमी-प्रेमिका प्रेम के अलावा किसी और बात के लिए एक-दूसरे पर निर्भर नहीं और प्रेम के अलावा और कोई स्वार्थ भी नहीं है, तभी प्रेम संभव है। मुझे एक दृष्टि में यह बात सही लगती है। आप इससे असहमत भी हो सकते हैं। पर, मैं मानती हूँ कि इस तरह के प्रेम में स्त्री-पुरुष दोनों समान स्थिति में होते हैं। इसलिए वो पितृसत्ता के लिए एक चुनौती होते हैं और इसीलिये समाज के ठेकेदार प्रेमियों से बहुत डरते हैं।
यहाँ मैं उस 'विक्टोरियन रोमैंटिक लव' को अलग कर रही हूँ, जो अंग्रेजी साहित्य के काल विशेष में और 'मिल्स एंड बून' के नावेल्स में पाया जाता है और जिसमें सफ़ेद घोड़े पर सवार एक राजकुमार आता है और खूब घेरदार फ्रिल वाली पोशाक पहनी हुयी नायिका को अपने साथ ले जाता है। मैं संस्कृत के 'सम्भोग श्रृंगार' वाले प्रेम को और हिंदी के 'रीतिकालीन प्रेम' को भी नहीं गिन रही हूँ। क्योंकि इन सभी स्थानों पर प्रेम की जो छवि है, वो पितृसत्ता की ही बनायी हुयी है और इसमें बिलकुल भी बराबरी नहीं है। भारतीय परम्परा में भी अर्जुन-सुभद्रा से लेकर पृथ्वीराज-संयोगिता तक नायिकाओं के अपहरण के किस्सों में भी इसी प्रकार का प्रेम परिलक्षित होता है। यह रूमानी और रूढ़िवादी प्रेम पितृसत्ता का पोषक ही है क्योंकि इसमें हमेशा नायिका कोमल कृशांगी और नायक वीर पुरुष होता है। वो हमेशा 'प्रोटेक्टर' की भूमिका में होता है और इसीलिये नायिका को कमज़ोर दिखाया जाता है। प्रेम, पितृसत्ता से टक्कर तभी ले सकता है जब प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से समान रूप में प्रेम करते हों। तभी वो पितृसत्ता की उस अवधारणा के विरुद्ध होते हैं, जिसमें एक को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाता है, एक को कठोर और दूसरे को कोमल माना जाता है।
नारीवाद का रोचक पक्ष यह है कि वह विवाह को तो एक पितृसत्तात्मक संस्था मानता है, पर प्रेम को नहीं। विवाह का पितृसत्ता से क्या सम्बन्ध है, इस पर भी कभी चर्चा होगी। फिलहाल विचार का विषय है कि प्रेम पितृसत्ता के लिए चुनौती कैसे है? हमारे समाज की बुनावट जैसी है उसमें जानबूझकर जीवनसाथी के चयन के विकल्प इतने कम रखे गए हैं और प्रक्रिया इतनी जटिल है कि आप अपने साथी के चयन के लिए समाज के बनाए नियमों के अधीन अपने परिवार की इच्छा पर निर्भर रहें। यह बात लड़के और लड़की दोनों के लिए समान रूप से लागू होती है अर्थात दोनों के ही पास 'चयन के विकल्प' नहीं हैं। ऐसे में जब कोई लड़का या लड़की अपनी इच्छा से कोई साथी ढूँढ़ लेता है, तो समाज को अपनी व्यवस्था खतरे में पड़ती दिखाई देती है। जब प्रेमी जोड़ा एक कदम आगे बढ़कर अपने प्रेम को विवाह में परिणत करना चाहता है, तो इसीलिये उसे घोर विरोध का सामना करना पड़ता है कि उन्होंने समाज के नियमों के विरुद्ध 'अपनी इच्छा' से साथी चुन लिया। यह उस सामाजिक व्यवस्था के लिए अपमान होता है, जिसमें पद्सोपानीयक्रम से छोटे को बड़े की, निर्धन को धनवान की, निर्बल को सबल की और स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना अनिवार्य होता है। सबसे ज्यादा डर परिवार को इस बात का होता है कि प्रेमविवाह कर आयी लड़की 'आदर्श बहू' बन पायेगी या नहीं। इसीलिये प्रेमविवाह को रोकने के लिए परिवार वाले सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वो अपने 'बिगड़े' हुए बच्चों को परिवार की प्रतिष्ठा का हवाला देते हैं, बराबरी में रिश्ता करने की बात कहते हैं और अन्ततः 'इमोशनल ब्लैकमेलिंग' का अमोघास्त्र प्रयुक्त करते हैं।
अगर यह प्रेम अंतरजातीय हुआ, तब तो विवाह के लिए प्रेमी-प्रेमिका को परिवार के साथ समुदाय का भी विरोध झेलना पड़ता है। अंतरजातीय विवाह पितृसत्ता के साथ ही साथ जातिव्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकते हैं, बशर्ते प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे का साथ निभाने को पूरी तरह प्रतिबद्ध हों।
लेकिन इन सब बातों का दूसरा पहलू भी है। अक्सर देखा जाता है कि प्रेम विवाह में परिणत होने के बाद पितृसत्तात्मक ढाँचे में ही ढल जाता है। पति-पत्नी दोनों अपनी-अपनी पारम्परिक भूमिका में आ जाते हैं और कुछ दिनों बाद दोनों की स्थिति को देखकर आप बिलकुल नहीं कह सकते कि इन्होंने प्रेम विवाह किया था या पारम्परिक विवाह। बल्कि प्रेम विवाह में लड़की खुद को 'आदर्श बहू' और 'आज्ञाकारी पत्नी' साबित करने के लिए अक्सर ज्यादा से ज्यादा 'त्याग' करने को तैयार रहती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लड़के-लड़कियाँ पले-बढे तो उसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में होते हैं, जहाँ सबकी भूमिकाएँ पहले से तय होती हैं।
इसलिए अगर हम यह सोचते हैं कि केवल प्रेम विवाह कर लेने भर से पितृसत्ता को कोई चोट पहुँच सकती है, तो यह एक भूल होगी। हाँ, इतना अवश्य है कि प्रेमी एक स्तर पर तो उससे टक्कर ले लेते हैं, लेकिन अगले ही कदम पर वह अपने दूसरे रूप में उन्हें अपने अंदर समाहित करने को खड़ी मिलती है। हमें यह याद रखना होगा कि पितृसत्ता भी पूँजीवाद की तरह एक बेहद लचीली, परिवर्तनशील और बहुरूपिया व्यवस्था है और इसके साथ लड़ने के लिए इसके हर रूप को जानना और लगातार संघर्ष करना ज़रूरी है।