मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

वैदिक एवं आर्ष महाकाव्य युग में स्त्रियों की शिक्षा



इस बात के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं कि वैदिक युग से लेकर आर्ष महाकाव्यों के लिखे जाने तक भारत में लड़कियों की शिक्षा-दीक्षा पर भी उतना ही ध्यान दिया जाता था, जितना कि लड़कों की शिक्षा पर। मैं अपने शोध-कार्य में इस बात की पड़ताल कर रही हूँ कि उसके बाद के समय में ऐसे कौन से परिवर्तन आये कि स्मृतियों में स्त्रियों की शिक्षा का स्पष्ट निषेध कर दिया गया, यहाँ तक कि विवाह को छोड़कर शेष संस्कार भी बिना मन्त्रों के करने का निर्देश दिया गया। यह पोस्ट मेरे शोध कार्य का एक अंश है, जिसमें वैदिक और आर्ष महाकाव्य काल में स्त्रियों की शिक्षा के विषय में चर्चा की गयी है।

ईस्वी सन् के आरम्भ तक लड़कियों का उपनयन संस्कार होता था और उन्हें वेदों का अध्ययन करने की भी लड़कों के समान ही अनुमति होती थी।[1] उपनयन संस्कार के बाद ही विधिवत् शिक्षा का आरम्भ होता था। बाद में उपनयन संस्कार स्त्रियों के लिए बस एक औपचारिकता मात्र रह गया, लेकिन वैदिक युग में यह अपनी पूर्णविधि के साथ ही स्त्रियों के लिए भी किया जाता था। वे भी गुरुओं के आश्रम में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करती हुयी यज्ञोपवीत, मौञ्जी, मेखला और वल्कल धारण करती थीं। ऋक्-यजुः-अथर्व संहिताओं में ब्रह्मचारिणी नारियों का उल्लेख है। अथर्ववेद में एक स्थान पर कहा गया है, “बह्मचर्य व्रत का पालन कर शिक्षा समाप्त करने वाली कन्याएँ योग्य पति को प्राप्त करती हैं।”[2] जो छात्राएँ अधिक से अधिक संहिताओं के मन्त्रों की पंडिता होती थीं, उन्हें ‘बहुवची’ की उपाधि दी जाती थी।

अल्टेकर के अनुसार, ‘स्त्रियाँ शूद्रों की तरह वैदिक अध्ययन के अयोग्य होती हैं’ यह दृष्टिकोण बाद के युग का है। प्राचीन वैदिककाल में स्त्रियाँ पुरुषों के समान ही मन्त्रद्रष्ट्री होती थीं। उनमें से कुछ के नाम तो वैदिक संहिताओं में भी आये हैं।[3] अल्टेकर के अनुसार ‘सर्वानुक्रमणिका’ में बीस ऐसी स्त्रियों के नाम गिनाए गए हैं। इनमें से कुछ नाम मिथक हो सकते हैं, लेकिन आतंरिक स्रोत दिखाते हैं कि लोपामुद्रा, विश्ववारा, सिक्ता निवावारी और घोषा आदि कुछ ऋषिकाएँ हैं, जिन्होंने ऋग्वेद के सूक्तों की रचना की है। इनमें से कुछ ऋषिकाओं और उनके द्वारा रचित ऋग्वेद के सूक्तों का वर्णन निम्नवत् है-

लोपामुद्रा- प्रथम मण्डल का 179वां सूक्त।
विश्ववारा आत्रेयी- पंचम मण्डल का 28वां सूक्त।
अपाला आत्रेयी- अष्टम मण्डल का 91वां सूक्त।
घोषा काक्षीवती- दशम मण्डल का 39वां तथा 40 वां सूक्त।
शची पौलोमी- दशम मण्डल का 149वां सूक्त (आत्मस्तुति)।
सूर्या सावित्री- दशम मण्डल का 85वां सूक्त।

उपर्युक्त ऋषिकाओं में से शची पौलोमी का नाम वैदिक युग के बाद भी प्रचलित रहा है। इन्हें इन्द्र की पत्नी माना गया है।

उपनिषदों में भी अनेक विदुषी स्त्रियों का नाम आया है, जिनमें सुलभा मैत्रेयी, वडवा पार्थियेयी और गार्गी वाचक्नवी प्रसिद्ध हैं। अल्टेकर के मत में इन नारियों का अस्तित्व वास्तव में रहा होगा और इन्होंने ज्ञान के क्षेत्र में अपना योगदान दिया होगा, अन्यथा इनका नाम विभिन्न ग्रंथों में बार-बार न आता।


उपनिषद् काल में महिला छात्राओं के दो प्रकार उल्लेखनीय हैं- (1.) सद्योद्वाहा तथा (2.) ब्रह्मवादिनी । ‘सद्योद्वाहा’ स्त्रियाँ वे होती थीं, जो ब्रह्मचर्य आश्रम के अनन्तर गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होती थीं तथा उस आश्रम के नियमों का पालन करती हुयी मातृत्व के महनीय पद पर प्रतिष्ठित होती थीं। वे उन समग्र विद्याओं का शिक्षण प्राप्त करती थीं, जो उन्हें सद्गृहिणी बनाने में पर्याप्त सहायक होती थीं। संगीत की शिक्षा भी उन्हें दी जाती थी। वैदिक यज्ञ में स्त्रियों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। यजमान-पत्नी के रूप में वे अग्न्याधान करने वाले अपने पति के धार्मिक कृत्यों में हाथ बँटाती थीं। अग्नि के परिचरण के अवसर पर वे तत्तत् विशिष्ट मन्त्रों के उच्चारण के साथ हवन-कार्य का भी संपादन करती थीं।[4]

‘ब्रह्मवादिनी’ स्त्रियाँ उपनिषद् युग की विशिष्टता मानी जा सकती हैं। ये स्त्रियाँ ब्रह्म-चिंतन में तथा ब्रह्म-विषयक व्याख्यान में अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर देती थीं। वे ब्रह्मतत्व के व्याख्यान तथा परिष्कार में उस युग के महान् दार्शनिकों से भी वाद-विवाद एवं शास्त्रार्थ करती थीं। बृहदारण्यकोपनिषद् ऐसी दो ब्रह्मवादिनी नारियों की विद्वता का परिचय बड़े विशद् शब्दों में देता है। इनमें से एक है- उस युग के महनीय तत्त्वज्ञानी याज्ञवल्क्य ऋषि की धर्मपत्नी मैत्रेयी और दूसरी हैं- उसी याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करने वाली वाचक्नवी गार्गी।[5]


ईसापूर्व चौथी शताब्दी में जब भारत में दार्शनिक विषयों का अध्ययन-मनन प्रमुखता से होने लगा, तब अनेक स्त्रियों ने अपना जीवन अध्ययन और ज्ञानार्जन को समर्पित कर दिया। अल्टेकर ने ‘कात्सकृत्स्ना’ का उल्लेख किया है, जिसके द्वारा रचित मीमांसा के एक ग्रन्थ को ‘कात्सकृत्सिनी’ कहा जाता है और जो स्त्रियाँ इस शाखा में पारंगत होती थीं, उन्हें ‘कात्सकृत्स्ना’ कहा जाता था।[6] अल्टेकर का यह अनुमान समीचीन है कि यदि स्त्रियाँ इतने विशिष्ट विषयों में पारंगत हो सकती थीं, तो इसका अर्थ है कि सामान्य रूप से उनकी शिक्षा-दीक्षा पर बहुत ध्यान दिया जाता रहा होगा।

उस युग में स्त्रियाँ वैदिक और दर्शन आदि की शिक्षा के अतिरिक्त गणित, वैद्यक, संगीत, नृत्य और शिल्प आदि का भी अध्ययन करती थीं। क्षत्रिय स्त्रियाँ धनुर्वेद अर्थात् युद्धविद्या की भी शिक्षा ग्रहण करती थीं तथा युद्ध में भाग भी लेती थीं। ऋग्वेद के दशम मण्डल के 102वें सूक्त में राजा मुद्गल एवं मुद्गालानी की कथा वर्णित है और उसे युद्ध में विजय दिलाती है। इसी प्रकार ‘शशीयसी’[7] का तथा वृत्तासुर की माता ‘दनु’[8] का वर्णन है, जिसने युद्ध में भाग लिया और इंद्र के हाथों वीरगति को प्राप्त हुयी। महाकाव्य काल में भी स्त्रियों के युद्ध में भाग लेने के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं। कैकयी ने देवासुर-संग्राम में मृतप्राय हुए राजा दशरथ की सारथी बनकर प्राणरक्षा की थी और उसके फलस्वरूप दो वर प्राप्त किये थे।[9]

आर्षमहाकाव्यों में वर्णित उच्चकुलों की नारियाँ विविध प्रकार की विद्याओं में निष्णात होती थीं। राजा कुन्तिभोज की पुत्री कुंती अत्यधिक गुणवती थी। उसने अपने आतिथ्य-सत्कार से दुर्वासा जैसे क्रोधी ऋषि को प्रसन्न किया और उनसे मनचाहा वर प्राप्त करने का वरदान प्राप्त किया। इसके लिए उन्होंने कुंती को वशीकरण मन्त्र दिया, जिसके द्वारा वह किसी भी देवता को वश में करके उससे पुत्र प्राप्त कर सकती थी।[10] इसी प्रकार सभापर्व में जब द्रौपदी को पाण्डवों द्वारा द्यूतक्रीड़ा में हार जाने के पश्चात् दुःशासन सभा में घसीटकर लाता है, तो वह वहाँ उपस्थित गुरुजनों से धर्म-विषयक प्रश्न करती है और धिक्कारती है।[11] इससे पता चलता है कि वह एक उच्चशिक्षित विदुषी युवती थी, जिसे धर्मविषयक गूढ़ बातों का ज्ञान था।

इस प्रकार स्पष्ट है कि संहिताकाल से लेकर महाकाव्य काल तक स्त्रियों को शिक्षा का पूर्ण अधिकार था। वे पुरुषों के समान ही उपनयन संस्कार के पश्चात् ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए अध्ययन करती थीं और उसके पश्चात् भी उन्हें आगे विद्याध्ययन करने या गृहस्थ धर्म अपनाने- दोनों ही विकल्प प्राप्त थे।


[1] अल्टेकर , पृष्ठ 9-10
[2] “ब्रह्मचर्येण कन्यानं युवाविन्दते पतिम् ।“ – अथर्ववेद, कांड-11, सूक्त-7, मन्त्र-18
[3] अल्टेकर , पृष्ठ 10
[4] आचार्य बलदेव उपाध्याय, वैदिक साहित्य और संस्कृति, शारदा संस्थान, वाराणसी 1998, पृष्ठ संख्या 424
[5] आचार्य बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ संख्या 425
[6] अल्टेकर, पृष्ठ 11
[7] ऋग्वेद, पंचम मण्डल, सूक्त- 61
[8] ऋग्वेद, प्रथम मण्डल, सूक्त- 32, मन्त्र- 9
[9] रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग-10,श्लोक 8 एवं 9
[10] महाभारत, आदिपर्व, अध्याय-110
[11] महाभारत, सभापर्व, अध्याय-69





गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

प्रेम, प्रेम विवाह और पितृसत्ता

पिछले कुछ दिनों से इस विषय पर सोच रही थी, अतिव्यस्तता के बाद भी। इसके दो प्रमुख कारण थे - मेरे बेहद करीबी दोस्तों के प्रेम विवाह में आ रही अडचनें और मेरी एक जूनियर द्वारा बार-बार प्रेम के अस्तित्व पर उठाये जा रहे प्रश्न। मेरी  जूनियर इस बात से परेशान है कि जीवन के संघर्ष के दिनों में जो प्रेम किसी का संबल बनता है, सहारा देता है, वही वास्तविक संसार के, यथार्थ के धरातल पर आकर स्वयं क्यों असहाय हो जाता है?

जब प्रेम और समाज के सम्बन्धों की समस्या के बारे में सोचती हूँ तो एक दूसरा ही प्रश्न सामने आ खड़ा होता है कि क्या वाकई जिसे हम प्रेम समझ रहे थे, वह प्रेम ही था? हमारे पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ लड़के-लड़कियों को अलग-अलग ढाँचों में ढलने की ट्रेनिंग दी जाती है, जहाँ विद्यालय के स्तर पर सह-शिक्षा में पढ़ाना ही अपराध समझा जाता है, वहाँ क्या हमारे पास प्रेम के लिए विकल्प होते हैं? मेरा जवाब है नहीं। ऐसे में अक्सर लड़के-लड़कियाँ पहली बार जिस विपरीतलिंगी के संपर्क में आते हैं, उसी की ओर आकर्षित हो जाते हैं और उसी को प्यार समझ बैठते हैं। इसमें 'प्रेम में एकनिष्ठता' की अनिवार्यता और 'एकाधिकार की भावना', न उन्हें अपने प्रेम पर पुनर्विचार करने देती है और न ही विकल्प ढूँढने देती है। यह प्रेम जब दुनिया के सामने पहुँचता है, तो उसको टूटना ही है। हालांकि हमेशा ही ऐसा नहीं होता। पर अगर प्रेम समाज के बनाए हुए नियमों से लड़ने के पहले ही हथियार डाल देता है, तो मैं उसे प्रेम ही नहीं मानती। हाँ, ये हो सकता है कि उसमें से किसी एक ने वास्तव में सच्चा प्यार किया हो, पर उसका साथी या तो खुद प्रेम के भ्रम में होता है अथवा अपने प्रेमी को जानबूझकर धोखा दे रहा होता है।

खैर, यहाँ इस पोस्ट का विषय 'प्रेम का भ्रम' नहीं प्रेम है, बशर्ते वह 'विशुद्ध प्रेम' हो। यहाँ विशुद्ध से मतलब किसी नैतिक शुचिता से नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि उसमें किसी भी तरह की अन्य भावना की मिलावट ना हो, जैसे स्वार्थ, निर्भरता, जिम्मेदारी, दया, करुणा आदि। वह प्रेम, जिसमें प्रेम के बदले बस प्रेम की अपेक्षा हो। बहुत पहले 'स्त्री मुक्ति संगठन' की साथी डॉ. पद्मा सिंह ने कहा था, "प्रेम दो बेहद स्वतंत्र और आत्मनिर्भर व्यक्तियों के बीच में ही संभव है।" अर्थात यदि प्रेमी-प्रेमिका प्रेम के अलावा किसी और बात के लिए एक-दूसरे पर निर्भर नहीं और प्रेम के अलावा और कोई स्वार्थ भी नहीं है, तभी प्रेम संभव है। मुझे एक दृष्टि में यह बात सही लगती है। आप इससे असहमत भी हो सकते हैं। पर, मैं मानती हूँ कि इस तरह के प्रेम में स्त्री-पुरुष दोनों समान स्थिति में होते हैं। इसलिए वो पितृसत्ता के लिए एक चुनौती होते हैं और इसीलिये समाज के ठेकेदार प्रेमियों से बहुत डरते हैं।

यहाँ मैं उस 'विक्टोरियन रोमैंटिक लव' को अलग कर रही हूँ, जो अंग्रेजी साहित्य के काल विशेष में और 'मिल्स एंड बून' के नावेल्स में पाया जाता है और जिसमें सफ़ेद घोड़े पर सवार एक राजकुमार आता है और खूब घेरदार फ्रिल वाली पोशाक पहनी हुयी नायिका को अपने साथ ले जाता है। मैं संस्कृत के 'सम्भोग श्रृंगार' वाले प्रेम को और हिंदी के 'रीतिकालीन प्रेम' को भी नहीं गिन रही हूँ। क्योंकि इन सभी स्थानों पर प्रेम की जो छवि है, वो पितृसत्ता की ही बनायी हुयी है और इसमें बिलकुल भी बराबरी नहीं है। भारतीय परम्परा में भी अर्जुन-सुभद्रा से लेकर पृथ्वीराज-संयोगिता तक नायिकाओं के अपहरण के किस्सों में भी इसी प्रकार का प्रेम परिलक्षित होता है। यह रूमानी और रूढ़िवादी प्रेम पितृसत्ता का पोषक ही है क्योंकि इसमें हमेशा नायिका कोमल कृशांगी और नायक वीर पुरुष होता है। वो हमेशा 'प्रोटेक्टर' की भूमिका में होता है और इसीलिये नायिका को कमज़ोर दिखाया जाता है। प्रेम, पितृसत्ता से टक्कर तभी ले सकता है जब प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से समान रूप में प्रेम करते हों। तभी वो पितृसत्ता की उस अवधारणा के विरुद्ध होते हैं, जिसमें एक को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाता है, एक को कठोर और दूसरे को कोमल माना जाता है।

नारीवाद का रोचक पक्ष यह है कि वह विवाह को तो एक पितृसत्तात्मक संस्था मानता है, पर प्रेम को नहीं। विवाह का पितृसत्ता से क्या सम्बन्ध है, इस पर भी कभी चर्चा होगी। फिलहाल विचार का विषय है कि प्रेम पितृसत्ता के लिए चुनौती कैसे है? हमारे समाज की बुनावट जैसी है उसमें जानबूझकर जीवनसाथी के चयन के विकल्प इतने कम रखे गए हैं और प्रक्रिया इतनी जटिल है कि आप अपने साथी के चयन के लिए समाज के बनाए नियमों के अधीन अपने परिवार की इच्छा पर निर्भर रहें। यह बात लड़के और लड़की दोनों के लिए समान रूप से लागू होती है अर्थात दोनों के ही पास 'चयन के विकल्प' नहीं हैं। ऐसे में जब कोई लड़का या लड़की अपनी इच्छा से कोई साथी ढूँढ़ लेता है, तो समाज को अपनी व्यवस्था खतरे में पड़ती दिखाई देती है। जब प्रेमी जोड़ा एक कदम आगे बढ़कर अपने प्रेम को विवाह में परिणत करना चाहता है, तो इसीलिये उसे घोर विरोध का सामना करना पड़ता है कि उन्होंने समाज के नियमों के विरुद्ध 'अपनी इच्छा' से साथी चुन लिया। यह उस सामाजिक व्यवस्था के लिए अपमान होता है, जिसमें पद्सोपानीयक्रम से छोटे को बड़े की, निर्धन को धनवान की, निर्बल को सबल की और स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना अनिवार्य होता है। सबसे ज्यादा डर परिवार को इस बात का होता है कि प्रेमविवाह कर आयी लड़की 'आदर्श बहू' बन पायेगी या नहीं। इसीलिये प्रेमविवाह को रोकने के लिए परिवार वाले सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वो अपने 'बिगड़े' हुए बच्चों को परिवार की प्रतिष्ठा का हवाला देते हैं, बराबरी में रिश्ता करने की बात कहते हैं और अन्ततः 'इमोशनल ब्लैकमेलिंग' का अमोघास्त्र प्रयुक्त करते हैं।

अगर यह प्रेम अंतरजातीय हुआ, तब तो विवाह के लिए प्रेमी-प्रेमिका को परिवार के साथ समुदाय का भी विरोध झेलना पड़ता है। अंतरजातीय विवाह पितृसत्ता के साथ ही साथ जातिव्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकते हैं, बशर्ते प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे का साथ निभाने को पूरी तरह प्रतिबद्ध हों।

लेकिन इन सब बातों का दूसरा पहलू भी है। अक्सर देखा जाता है कि प्रेम विवाह में परिणत होने के बाद पितृसत्तात्मक ढाँचे में ही ढल जाता है। पति-पत्नी दोनों अपनी-अपनी पारम्परिक भूमिका में आ जाते हैं और कुछ दिनों बाद दोनों की स्थिति को देखकर आप बिलकुल नहीं कह सकते कि इन्होंने प्रेम विवाह किया था या पारम्परिक विवाह। बल्कि प्रेम विवाह में लड़की खुद को 'आदर्श बहू' और 'आज्ञाकारी पत्नी' साबित करने के लिए अक्सर ज्यादा से ज्यादा 'त्याग' करने को तैयार रहती है।  ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लड़के-लड़कियाँ पले-बढे तो उसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में होते हैं, जहाँ सबकी भूमिकाएँ पहले से तय होती हैं।

इसलिए अगर हम यह सोचते हैं कि केवल प्रेम विवाह कर लेने भर से पितृसत्ता को कोई चोट पहुँच सकती है, तो यह एक भूल होगी।  हाँ, इतना अवश्य है कि प्रेमी एक स्तर पर तो उससे टक्कर ले लेते हैं, लेकिन अगले ही कदम पर वह अपने दूसरे रूप में उन्हें अपने अंदर समाहित करने को खड़ी मिलती है। हमें यह याद रखना होगा कि पितृसत्ता भी पूँजीवाद की तरह एक बेहद लचीली, परिवर्तनशील और बहुरूपिया व्यवस्था है और इसके साथ लड़ने के लिए इसके हर रूप को जानना और लगातार संघर्ष करना ज़रूरी है।

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों का साधारणीकरण: लापरवाही या षड्यंत्र?

(यह लेख कल के जनसत्ता में 'दुनिया मेरे आगे' स्तंभ में 'शब्दों से खेल' शीर्षक से छप चुका है.)
  
बात वहाँ से शुरू होती है, जब एक छोटी-सी लड़की को दुनिया की ऐसी कड़वी सच्चाइयों का सामना करना पड़ता है जिनके चलते वह सामान्य घटनाओं को भी एक खास नजरिए से देखने लग जाती है। मासूम दिल कम उम्र में ही परिपक्व हो जाता है। पिताजी रेलवे में स्टेशन मास्टर थे। जब मैं दस साल की थी, उनका तबादला उत्तर रेलवे के उन्नाव स्टेशन के पड़ोस में एक छोटे-से रेलवे स्टेशन मगरवारा में हो गया। मुझे चार साल तक मगरवारा से उन्नाव स्थित अपने स्कूल ट्रेन से आना-जाना पड़ता। भीड़ होने पर लोग छोटी बच्ची जान कर अपने पास जगह बनाकर बिठा लेते। एक-दो साल बाद लोगों के स्पर्श में मुझे अजीब-सा बदलाव महसूस होने लगा। अनचाहा स्पर्श मन में वितृष्णा भर देता। बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ती एक लड़की पर ऐसी घटनाओं का क्या प्रभाव पड़ता है, यह एक लड़की ही समझ सकती है। अनजाने में मैं खुद को ही इसका दोषी समझने लगी। ऐसा लगता जैसे मेरे शरीर में ही ऐसी कोई कमी है कि लोग मेरे साथ ऐसी हरकत करते हैं।
कुछ साल बाद इलाहाबाद में छात्रावास में रहते और ‘स्त्री अधिकार संगठन’ के साथ काम करते हुए पता चला कि अधिकतर लड़कियाँ इसी तरह के कड़वे अनुभवों से गुजरी हैं। पर मुझे तब बहुत आश्चर्य होता, जब हमारे पुरुष मित्र और रिश्तेदार कहते कि ‘क्या लड़कियाँ छेड़छाड़ नहीं करतीं?’ जो घटनाएँ लड़कियों के मन-मस्तिष्क को झिंझोड़कर खुद को ही दोषी मानने पर मजबूर कर देती हैं, उसे कोई इतने हल्के ढंग से कैसे ले सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं था कि वैसी हरकतों के लिए ‘छेड़छाड़’ के बजाय हम कोई सही शब्द नहीं खोज पा रहे थे? तब मुझे नहीं लगा कि मैं इसे ‘यौन हिंसा’ कहूँ, क्योंकि उस उम्र में तो बस इतना समझ में आता था कि यह व्यक्ति जो कर रहा है, वह ठीक नहीं है। उस समय मन जिस तरह घृणा से भर जाता था, उसके लिए ‘छेड़छाड़’ सच में हल्का शब्द है।
अकादमिक क्षेत्रों में नारीवादी सोच के लोग ऐसी माँगें उठाते रहे हैं और ‘जेंडर’ के नजरिए से संवेदनशील शब्दों को लेकर एक स्तर तक समझ भी बनी है। लेकिन हमारा समाज और उसका प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाला मीडिया इस मामले में अब तक जरूरी संवेदनशीलता नहीं बरत रहा है। यहां तक कि ‘बलात्कार’ जैसे जघन्य अपराधों में भी मीडिया की कोशिश होती है कि इसके लिए अपेक्षया हल्के शब्दों का इस्तेमाल किया जाए। आमतौर पर बलात्कार की घटनाओं से संबंधित खबरें संवेदनहीन तरीके से ऐसे पेश की जाती हैं कि तथाकथित सभ्य समाज के कुत्सित मानसिकता वाले लोग उसे चटखारे लेकर पढ़ते हैं। कभी इसके लिए ‘इज्जत लुट गई’ तो कभी ‘मुँह काला किया’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये सभी शब्द महिलाओं के प्रति अपमानजनक और एक तरह से पीड़ित को ही दोषी सिद्ध करने वाले रहे हैं। 
समय के साथ किसी औरत के शरीर पर हमला करके जबरन उसका यौन-उत्पीड़न करने जैसे जघन्य कृत्य को ‘बलात्कार’ शब्द के जरिए व्यक्त किया जाने लगा। इस शब्द में जाहिर बलाघात इस अपराध की भयावहता को दर्शाता है। लेकिन पिछले कुछ समय से अखबारों या टीवी चैनलों में बलात्कार की जगह ‘दुष्कर्म’ और यहाँ तक कि ‘ज्यादती’ जैसे शब्दों तक का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाने लगा है। ‘दुष्कर्म’ शब्द अपने आप में चोरी, डकैती, जेब काटने तक को व्यक्त करता है। सवाल है कि क्या बलात्कार जैसे गंभीरतम अपराध को चोरी या जेब काटने जैसे अपराधों के समकक्ष करके देखा जा सकता है? सच्चाई यह है कि ‘दुष्कर्म’ जैसे शब्दों का प्रयोग बलात्कार को बेहद मामूली अपराधों के समकक्ष ला खड़ा करता है तो ‘ज्यादती’ इस लिहाज से और भी आपत्तिजनक प्रयोग है।
महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के परिप्रेक्ष्य में पिछले दिनों ऊँचे पदों पर बैठे पुलिस और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के जिस तरह के बयान आए हैं, ऐसे शब्दों का आम होते जाना उसी की एक कड़ी लगता है। कभी कोई कहता है कि ‘औरतों को देर रात अकेले घर से बाहर निकालना नहीं चाहिए’ तो कभी कहा जाता है कि ‘बड़े-बड़े महानगरों में छोटे-मोटे अपराध होते ही रहते हैं’ और कभी लड़कियों की वेशभूषा पर ही सवाल उठा दिया जाता है।
हाल ही में ‘रेप’ की जगह ‘सेक्सुअल असॉल्ट’ शब्द प्रयोग करने का सुझाव सामने आया है। यानी एक ओर अंग्रेजी में इस अपराध का दायरा बढ़ाने के लिए जिस ‘यौन हमला’ शब्द का विकल्प रखा गया है, वह इस अपराध की गंभीरता और भयावहता को न केवल कम नहीं करता, बल्कि अर्थ के भाव और असर की गहराई को भी बनाए रखता है। लेकिन हिंदी में बलात्कार की जगह दुष्कर्म शब्द का प्रयोग अगर आम होता जा रहा है तो इसे व्यवस्था द्वारा महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साधारणीकरण के एक षड्यंत्र के तौर पर देखा जाना चाहिए। इसमें मीडिया एक बड़े मददगार की भूमिका निभा रहा है।

शनिवार, 15 जनवरी 2011

पुस्तक-सूची



स्त्री विमर्श : कुछ पठनीय पुस्तकें 

देह की राजनीति से देश की राजनीति तक - मृणाल पांडे
परिधि पर स्त्री - मृणाल पांडे
बंद गलियों के विरुद्ध - मृणाल पांडे
जहाँ औरतें गढ़ी जाती हैं - मृणाल पांडे
दुर्ग द्वार पर दस्तक - कात्यायनी
स्त्री का समय - क्षमा शर्मा
स्त्रीत्व का मानचित्र - अनामिका
हौवा की बेटी - दिव्या जैन
उपनिवेश में स्त्री - प्रभा खेतान
हम सभ्य औरतें - मनीषा
औरत के लिए औरत - नासिरा शर्मा
खुली खिड़कियाँ - मैत्रेयी पुष्पा
औरत के हक में - तसलीमा नसरीन
स्त्री संघर्ष का इतिहास - राधा कुमार
साम्प्रदायिक दंगे और नारी - नूतन सिन्हा
संघर्ष के बीच संघर्ष के बीज - इलीना सेन
स्त्रीवादी साहित्य विमर्श - जगदीश्वर चतुर्वेदी
अधीन ज़मीन - उपेन्द्र नाथ अश्क
रेणु की नारी दृष्टि - डॉ. अल्पना तिवारी
चुकते नहीं सवाल - मृदुला गर्ग
नारी प्रश्न - सरला माहेश्वरी
स्वागत है बेटी - विभा देवसरे
जीवन की तनी डोर ये स्त्रियाँ - नीलम कुलश्रेष्ठ
स्त्री पुरुष कुछ पुनर्विचार - राजकिशोर
स्त्री के लिए जगह - सं. राजकिशोर
स्त्रीत्ववादी विमर्श समाज और साहित्य - क्षमा शर्मा
स्त्री : मुक्ति का सपना - सं. प्रो. कमला प्रसाद, राजेन्द्र शर्मा, अतिथि सं. अरविन्द जैन व लीलाधर मंडलोई
धर्म के नाम पर - गीतेश शर्मा
स्त्री उपेक्षिता - सीमोन द बुआ
विद्रोही स्त्री - जर्मन ग्रेयर
स्त्री अधिकारों का औचित्य साधन - मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट
औरत की कहानी - सं. सुधा अरोड़ा
एक गुमशुदा औरत की डायरी - सीमोन द बुआ
बधिया स्त्री - जर्मन ग्रीयर
अपना कमरा - वर्जीनिया वुल्फ
एक स्त्री की ज़िंदगी के चौबीस घंटे - स्टीफन ज्विग
स्त्री की पराधीनता - जान स्टुअर्ट मिल

कुछ अन्य पुस्तकें 

औरत होने की सजा - अरविन्द जैन
उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार - अरविन्द जैन
यौन हिंसा और न्याय की भाषा - अरविन्द जैन
न्याय क्षेत्रे अन्याय क्षेत्रे - अरविन्द जैन
बचपन से बलात्कार - अरविन्द जैन
औरत अस्तित्व और अस्मिता - अरविन्द जैन
आदमी की निगाह में औरत - राजेन्द्र यादव
अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य - अर्चना वर्मा
औरत उत्तरकथा - राजेन्द्र यादव
भारत में विवाह संस्था का इतिहास - विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े
सामान नागरिक संहिता - सरला माहेश्वरी
नए आयामों को तलाशती नारी - दिनेश नंदिनी डालमिया
प्राचीन भारत में नारी - डॉ. उर्मिला प्रकाश मिश्र
जो मारे जायेंगे - जया मित्रा
प्राचीन भारत में न्याय व्यवस्था - नताशा अरोड़ा
इक्कीसवीं सदी की ओर - सुमन कृष्णकांत
नारी देह के विमर्श - सुधीश पचौरी

स्त्री विमर्श : कुछ पठनीय उपन्यास 

पचपन खम्बे लाल दीवारें - उषा प्रियंवदा
रुकोगी नहीं राधिका - उषा प्रियंवदा
शेष यात्रा - उषा प्रियंवदा
अंतर्वंशी - उषा प्रियंवदा
अनारो - मंजुल भगत
आँखों की दहलीज - मेहरुन्निसा परवेज
उसका घर - मेहरुन्निसा परवेज
कोरजा - मेहरुन्निसा परवेज
तत्सम - राजी सेठ
रेत की मछली - कांता भारती
मेरे संधि पत्र - सूर्यबाला
उसकी पंचवटी - कुसुम अंसल
फ्रीलांसर - शुभा वर्मा
सात फेरे अधूरे - मीनाक्षी पुरी
एक ज़मीन अपनी - चित्रा मुद्गल
आवां - चित्रा मुद्गल

स्त्री विमर्श : कुछ पठनीय आत्मकथाएँ 

कागजी हैं पैरहन - इस्मत चुगताई
रसीदी टिकट - अमृता प्रीतम
मेरे आका - तहमीना दुर्रानी
मेरी कहानी - कमला दास
जो कहा नहीं गया - कुसुम अंसल
लगता नहीं है दिल मेरा - कृष्णा अग्निहोत्री
बूँद बावड़ी - पद्मा सचदेव
दोहरा अभिशाप - कौशल्या बैसंत्री
खानाबदोश - अजीत कौर
नंगे पैरों का सफ़र - दिलीप कौर टिंवाडा
कुछ कही कुछ अनकही - शीला झुनझुनवाला
कस्तूरी कुंडल बसे - मैत्रेयी पुष्पा
गुड़िया भीतर गुड़िया - मैत्रेयी पुष्पा
बुरी औरत की कथा - किश्वर नाहीद
नाच री घूमा - माधवी देसाई
मेरे बचपन के दिन - तस्लीमा नसरीन
उत्ताल हवा - तस्लीमा नसरीन
द्विखंडिता - तसलीमा नसरीन
वे अँधेरे दिन - तस्लीमा नसरीन
अन्या से अनन्या - प्रभा खेतान
एक कहानी यह भी - मन्नू भण्डारी
धरती की बेटी - एलन स्मेडली


 (स्रोत : 'स्त्री : मुक्ति का सपना' पुस्तक एवं मित्रगण)

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

पश्चिमी नारीवाद बनाम भारतीय नारीवाद

आमतौर पर नारीवाद की बात चलने पर यह प्रश्न सभी के मन में उठता है कि नारीवाद की पाश्चात्य अवधारणा का भारत में क्या उपयोग है? और ये प्रश्न कुछ हद तक वाजिब भी है. खासकर के तब जब नारीवाद पर खुद पश्चिम में ही कई सवाल उठने लगे हों.

दरअसल, पश्चिम में नारीवाद एक विचारधारा के रूप में उभरकर तब सामने आया, जब वहाँ की औरतों को मूलभूत अधिकार प्राप्त हो चुके थे. हालांकि इसके लिए उन लोगों ने अलग-अलग छिटपुट रूप से ही सही, लंबी लड़ाइयाँ लड़ी थीं, तब जाकर उन्हें मताधिकार जैसे नागरिक अधिकार, राजनीतिक और कुछ आर्थिक अधिकार प्राप्त हुए. चूँकि उन्हें मूलाधिकार मिल चुके थे, इसलिए उनके मुद्दे उससे बढ़कर यौनिकता, यौन स्वतंत्रता, स्त्रीत्व की अवधारणाओं, पुरुष के वर्चस्व आदि से जुड़ गए. इस विषय में उल्लेखनीय यह है कि वहाँ तब नारीवादी आन्दोलन उच्चवर्गीय श्वेत महिलाओं के कब्ज़े में ही था, निम्नवर्गीय अथवा अश्वेत नारियाँ इससे अलग थीं.

तत्कालीन पाश्चात्य नारीवाद के समक्ष जो मुद्दे थे, भारत जैसे देशों के लिए महत्त्वपूर्ण तो थे, पर ज्यादा नहीं. भारतीय समाज आज भी एक सामंतवादी ढाँचे वाला समाज है और यहाँ की नारियों के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या प्राचीनता थी, जिसके कारण उन्हें नागरिक अधिकारों के अलावा अन्य अधिकार लगभग नहीं के बराबर प्राप्त थे. हालांकि यहाँ भी नारियों का एक वर्ग था, जिन्हें जीवन की मूलभूत सुविधाएँ प्राप्त थीं और वे पश्चिमी नारीवाद के प्रभाव में थीं. इस प्रकार भारत में भी कुछ नारीवादी विचारक उन्हीं मुद्दों को उठाने लगे, जो कि पाश्चात्य नारीवाद के मुद्दे थे और जिनका यहाँ की ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था में कोई ख़ास उपयोग नहीं था.

नारीवादी अवधारणा में व्यापक बदलाव नारीवाद की तीसरी लहर के बाद आया. नारीवाद की तीसरी लहर मुख्यतः लैटिन अमेरिकी, एशियाई और अश्वेत नारियों से सम्बन्धित थी. इस लहर पर उत्तर आधुनिक विचारधारा का प्रभाव था, जो विभिन्नताओं का सम्मान करती थी. विभिन्नता की अवधारणा के फलस्वरूप ही इस बात पर विचार किया जाने लगा कि एक जैसे सिद्धांत से सभी वर्गों की नारियों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है. भिन्न-भिन्न वर्गों की समस्याएँ अलग-अलग हैं और इसीलिये उनका समाधान भी अलग ढंग से खोजा जाना चाहिए. इस लहर ने भारतीय नारीवादी आंदोलन पर गहरा प्रभाव डाला. यहाँ भी दलित नारियों ने नारीवादी आंदोलन पर आरोप लगाना शुरू किया कि वह उच्चवर्गीय सवर्ण नारियों का प्रतिनिधित्व करता है और दलित, ग्रामीण और निर्धन महिलाओं को बाहर छोड़ देता है.

इसके फलस्वरूप नारीवादी विचारकों का ध्यान भारतीय समाज की विभिन्नता पर गया और इस बात पर विचार-विमर्श शुरू हो गया कि 'नारीवाद' को भारतीय समाज के अनुसार किस प्रकार ढाला जा सकता है? यह अस्सी-नब्बे का दशक था  और इसी समय भारतीय समाज के लिए 'ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' शब्द का प्रयोग किया जाने लगा. यह शब्द हमारे समाज की जटिल सरंचना और उसके फलस्वरूप दलित नारियों के होने वाले तिहरे शोषण को व्यक्त करता है.  दलित नारी जाति, वर्ग और पितृसत्ता तीनों के द्वारा शोषण का शिकार होती है. उसे औरत होने के कारण उसके समाज का पुरुष शोषित करता है, गरीब मजदूर होने के कारण भू-स्वामी शोषित करता है और दलित होने के कारण उसे सवर्णों द्वारा अपमान सहना पड़ता है.

भारत में वर्तमान नारीवादी अवधारणा इस बात पर विचार करती है कि गरीब, ग्रामीण, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं की समस्याएँ अलग हैं और धनी तथा सवर्ण औरतों की अलग, अतः इन पर भिन्न-भिन्न ढंग से विचार करना चाहिए. वर्तमान नारीवाद नारी के साथ ही उन सभी दलित और शोषित तबकों की बात करता है, जो सदियों से समाज के हाशिए पर धकेल दिए गए हैं. यह मानता है कि स्वयं नारीवादी आंदोलन के अंतर्गत कई धाराएँ एक साथ काम कर सकती हैं, भले ही उनके रास्ते अलग-अलग हों पर उनका गंतव्य एक ही है. इसलिए सबको एक साथ आगे आना चाहिए.

बुधवार, 22 सितंबर 2010

स्त्री देह के बाजारीकरण पर सवालों के माध्यम से विचार-विमर्श

आमतौर पर हम समाज में घटने वाली घटनाओं को तो देखते हैं, पर उनके पीछे के कारणों को जानने का कभी प्रयास नहीं करते हैं. आज की नारी को बदलती सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के चलते पहले की अपेक्षा बहुत सी सहूलियतें मिली हैं. इतनी कि उन्हें मुक्त मान लिया गया है. जब हम माडलों, हिरोइनों और अन्य पेशों में आगे बढ़ती औरत को देखते हैं, तो ये मान बैठते हैं कि औरत आज़ाद हो गयी है और फिर ये सोच लेते हैं कि वो अपनी आज़ादी का गलत फायदा भी उठाने लगी है. सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाली औरत हो या कॉपरेट जगत की नारी, ये मान लिया जाता है कि वो अपनी देह को हथियार बनाकर आगे बढ़ने लगी है. टी.वी. में विज्ञापनों में औरतों के देह-प्रदर्शन पर भी उसे ही दोषी मान लिया जाता है. पर, उसके पीछे के कारणों को जानने की कोशिश नहीं की जाती.
प्रश्न ये हैं कि क्या वाकई आज की औरत आज़ाद हो गयी है... इतनी आज़ाद कि अपनी देह को हथियार की तरह  इस्तेमाल करके आगे बढ़ रही है? क्या उसकी सभी समस्याओं का अंत हो गया है? क्या उसे वे सभी अधिकार मिल गए हैं, जिनके लिए वो दशकों से लड़ाई लड़ रही थी? कुछ इन्हीं प्रश्नों के उत्तर ढूंढती एक पुस्तक आजकल पढ़ रही हूँ "स्त्री: मुक्ति का सपना" इसके मुख्य संपादक प्रो. कमला प्रसाद और राजेन्द्र शर्मा हैं, जबकि अरविंद जैन और लीलाधर मंडलोई अतिथि संपादक हैं.  यहाँ मैं अरविंद जैन के सम्पादकीय के कुछ उद्धरण दे रही हूँ, -
"स्त्री को 'देह के हथियार' से कितना 'सत्ता में हिस्सा'' मिला या मिला पाया- हम सब अच्छी तरह जांते हैं. पुरुषों के इस भयावह 'खेल' में स्त्री सहमति का निर्णय स्वयं ले रही है या 'सिक्का' (रुपया, डालर, पौंड ) ? देह के अर्थशास्त्र में स्वेच्छा और स्वतंत्रता का निर्णायक आधारबिंदु  क्या है? देह के व्यवसाय के मुनाफे और 'देह की कीमत' के बीच क्या अंतर्संबंध है? खेल के नियम, शर्तें और चुनाव प्रक्रिया कौन निर्धारित कर रहा है?"
इन सवालों से स्थिति स्पष्ट होती जाती है. हम ये तो देख रहे हैं कि पुरुष डियोडरेंट के विज्ञापन में औरतें बिकनी पहनकर दिख रही हैं, पर उनसे कौन ऐसा करा रहा है? कौन इस बात पर उन्हें मजबूर कर रहा है कि यदि वे ऐसा नहीं करेंगी तो प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जायेंगी?
यदि ये कहा जाए कि औरतें अपना शोषण होने ही क्यों देती हैं, तो उसका उत्तर यह है कि औरतों का शोषण कहाँ नहीं होता? यदि कार्यस्थल पर हो रहे शोषण से बचने के लिए वे घर में बंद रहने का निर्णय लें, तो क्या उनका शोषण नहीं होता? क्या घर में भी औरतें पूरी तरह सुरक्षित हैं? नहीं.
शो बिजनेस में नारी देह के इस्तेमाल को अरविन्द जैन बहुत अच्छी तरह सामने रखते हैं-
"बहुराष्ट्रीय पूँजी के सामने सुन्दर स्त्री के विरोध, प्रतिरोध और मोलभाव का क्या कोई मतलब है? पुरुष उद्योगपतियों द्वारा पहले से तय कीमत (इनाम, पुरस्कार, पारिश्रमिक...) पर, जब हज़ारों विश्व सुंदरियों को लाइन लगाकर देह प्रदर्शन के लिए लाकर खड़ा कर दिया जाता हो, तब राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय दलाओं के हाथों में नाचती कठपुतलियाँ या सुन्दर गुडियाँ सिर्फ वस्तु, माल या साधन भर होती हैं. खरीददार की शर्तों पर खेल-खेलने में, सुन्दरी की हार पहले से ही निश्चित है..."
स्त्री को घर में रखने और वहाँ से बाहर निकालने का सारा काम इसी विश्वव्यापक पूँजी के खेल का एक हिस्सा है. खेल के नियम भी यही तय करती है, खिलाड़ियों को भी और हार-जीत को भी. एक ओर तो औरतों को घर में बैठाकर, उसके घरेलू काम को अनुत्पादक सिद्ध करके उसके अंदर आत्मविश्वास की कमी पैदा करती है, तो दूसरी ओर माडलिंग, एक्टिंग आदि जैसे शो बिज़ को ग्लैमराइज करके सुन्दर लड़कियों को उस ओर आकर्षित करती है. ध्यान दीजिए रैम्प पर सैकड़ों लोगों के सामने वाक् करने के लिए माडल के पास बहुत अधिक आत्मविश्वास होना चाहिए और उसके अंदर ये आत्मविश्वास भी वही पूँजी भरती है, जो हाउस वाइफ को नकारा सिद्ध करती रहती है.
ये कहा जा सकता है कि पूंजीवाद अपना व्यापार चलाने के लिए औरतों का मनचाहा इस्तेमाल करता है. चाहे उसे घर में रखना हो या रैम्प पर चलना हो. वह सिर्फ 'कार्य करने' के लिए होती है, जैसा उसे कहा जाता है या उसे दिखाया जाता है. सोचना और निर्णय लेना औरतों का नहीं, पुरुषों का कार्य है. क्योंकि विश्व की लगभग समस्त पूँजी उन्हीं के पास है. एक-दो को छोड़ दें तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सी.ई.ओज., फिल्म, राजनीति हर जगह पुरुषों का वर्चस्व है.  इन बातों से औरतें बिल्कुल अनभिज्ञ, उनके इशारों पर नाचती रहती हैं और जो विरोध करती है या प्रश्न उठाती है, उसे प्रतिस्पर्धा से बाहर होना पड़ता है या फिर नारीवादी (जो कि आजकल एक गाली की तरह प्रयुक्त हो रहा है) कहकर उन्हें हे दृष्टि से देखा जाने लगता है.

(उपर्युक्त पुस्तक गूगल बुक्स पर इस पते पर देखी जा सकती है-
http://www.google.com/books?id=B9_b5iySOMAC&source=gbs_slider_thumb

और इस जगह ऑर्डर देकर मंगाई जा सकती है अपने पते पर, मैंने इसी तरह मंगाई है-
http://www.vaniprakashan.in/book_detail.php?id=224

शनिवार, 31 जुलाई 2010

मैं ऐसा क्यों करती हूँ?

ये प्रश्न मैंने अपने आप से तब पूछा, जब किसी ने सीधे-सीधे मुझसे पूछ लिया कि मैं ये औरतों वाले मुद्दों के पीछे क्यों पड़ी रहती हूँ??? यह भी कहा कि आप नारीवादियों का बस एक ही काम है औरतों को उनके घर के पुरुषों के खिलाफ भड़काना और पुरुषों के विरुद्ध तरह-तरह के इल्जाम लगाना. आप ये सोच सकते हैं कि कोई मुझसे इतना सब कह गया और मैं सुनती गयी...हाँ, क्योंकि मैं जिस विषय पर शोध कर रही हूँ, जो मेरा मिशन है, उसका पूर्वपक्ष और प्रतिपक्ष सुनना ज़रूरी है. ये देखना ज़रुरी है कि ये मानसिकता हमारे समाज में कितनी गहरी पैठी है कि कोई नारी-सशक्तीकरण की बात सुनना ही नहीं चाहता, या फिर उसे सिर्फ गरीब औरतों से जोड़कर देखता है, पर इससे पहले ये जानना ज़रुरी है कि मैं ऐसा क्यों करती हूँ ? मतलब नारी मुद्दों पर लेख लिखना, कवितायें लिखना, बहस करना, विरोध करना और जिस जगह नारी-सम्बन्धी कोई अनुचित बात दिखे वहाँ कूद पड़ना.

मेरे मन में नारी-मुद्दों को लेकर जो अत्यधिक संवेदनशीलता है, वो सिर्फ इसलिए नहीं है कि मैं अपने जीवन में पुरुषों द्वारा सताई गयी हूँ, हालांकि मैंने भी बहुत कुछ झेला है, जो किसी भी भावुक औरत को विद्रोही बनाने के लिए पर्याप्त है. पर बात इतनी सी ही नहीं है... इससे कहीं आगे की है. मैं गहन अध्ययन और विचार-विमर्श में विश्वास करती हूँ और यह अध्ययन सिर्फ किताबी नहीं है, वास्तविक समाज का अध्ययन है, लोगों का अध्ययन है. इसी कारण मैं समाज को एक नए नजरिये से देखना चाहती हूँ, जो कि कोई भी तार्किक और संवेदनशील व्यक्ति कर सकता है, भले ही उसने उतनी पढ़ाई ना की हो.

हमारा समाज बहुत ही रुढिवादी है, जो कि ना सिर्फ परिवर्तन से डरता है बल्कि चीज़ों को नए दृष्टिकोण से देखना तक नहीं चाहता, पर मैं इतना कहूँगी कि अगर आप किसी बात को बस एक आयाम से देखते हैं, तो कभी भी प्रगति नहीं कर सकते. अगर आपने सिर्फ इतिहास पढ़ा और सबाल्टर्न इतिहास नहीं पढ़ा, तो आपका ज्ञान अधूरा है; सिर्फ संस्कृत पढ़ी, प्राकृत नहीं, तो आप अधूरी जानकारी रखते हैं, इसी तरह मनोविज्ञान के साथ समाजशास्त्र और मानवशास्त्र जुड़ा हुआ है. ये सच है कि कोई भी व्यक्ति एक साथ सभी अंतर्संबंधित विषयों पर मास्टरी नहीं हासिल कर सकता, पर फिर भी एक विषय के साथ अन्य विषयों का सामान्य ज्ञान होना चाहिए और विषय को अलग-अलग दृष्टिकोणों से पढ़ना चाहिये.

अब बात नारीवादी दृष्टिकोण की आती है. मेरा समाज को देखने का यह एक नजरिया है... ध्यान देने योग्य बात है कि 'एक मात्र' नजरिया नहीं. जैसे-जैसे मैं संस्कृत के नए ग्रंथों और अन्य लोकोक्तियों की बारे में पढ़ती जा रही हूँ,  इतिहास और समकालीन समाज को देखने का नारीवादी दृष्टिकोण और भी स्पष्ट होता जा रहा है. इतिहास को देखने के नारीवादी नजरिये के बारे में अपने पिछले लेख में मैं एक संक्षिप्त परिचय दे चुकी हूँ. जैसा कि हम सभी विश्वास करते हैं कि हमारी संस्कृति में नारी का सर्वोच्च स्थान था और उसमें कालान्तर में ह्रास आ गया, मुख्यतः मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारण. इसका मतलब यह कि यदि मुस्लिम आक्रमणकारी नहीं आते तो हमारे देश में नारी की स्थिति घर-बाहर दोनों जगह सर्वोच्च होती. नारीवादी विचारक इस बात को सही नहीं मानते और विभिन्न तर्कों से अपने पक्ष को पुष्ट करते हैं. पिछले लेख में मैं इसे बता चुकी हूँ.

मैंने जब इन नारीवादी विचारकों के विचार पढ़े थे, तो उस पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं किया था, क्योंकि मैं बहुत तार्किक हूँ और किसी की भी बात को बिना अपने तर्क की कसौटी पर उतारे नहीं मानती, लेकिन जैसे-जैसे मैं संस्कृत का अध्ययन और अधिक करती गयी मेरा यह नजरिया पुष्ट होता गया. मैं अभी शोध कर रही हूँ, इसलिए पूरी बात तो यहाँ नहीं रख सकती क्योंकि जो संस्था मुझे फेलोशिप दे रही है, उसकी नियमावली में है कि मैं थीसिस पूरी होने से पहले सम्बंधित विषय पर कुछ प्रकाशित नहीं कर सकती. पर कुछ निष्कर्ष जो मेरे अपने हैं उन्हें कुछ बिंदुओं में रखने का प्रयास कर रही हूँ---

(1.)-- सबसे पहले तो ये बात पूरी तरह सत्य नहीं है कि प्राचीनकाल में भारत में नारी की स्थिति सर्वोच्च थी. यह आंशिक सत्य है. समाज में विवाहिता स्त्री और माता का स्थान अन्य स्त्रियों की अपेक्षा उच्च था. विवाहिता तो अपने पति के अधीन थी, परन्तु माँ सबसे ऊपर थी. यहाँ तक कि उसे ईश्वर से भी उच्च माना गया. परन्तु इसके ठीक विपरीत जो स्त्री माँ नहीं बन पाती, उसे समाज की उपेक्षा झेलनी पड़ती, जो अब भी कायम है. इसी तरह अविवाहित अथवा विधवा को समाज में बिल्कुल सम्मान नहीं मिलता था. स्त्रियों की स्थिति पुरुषों से उनके संबंध के सापेक्ष थी. ये परम्परा अब भी कायम है. समाज में जो सम्मान विवाहित स्त्रियों को प्राप्त है, वह अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा को नहीं और उस पर विडम्बना यह कि विवाहित स्त्री के घरेलू कार्य को उपेक्षा से देखकर समय-समय पर उसकी औकात को बताया जाता रहता है.

(2.)--प्राचीन संस्कृत-साहित्य में स्थापित नारी की 'सती' वाली आदर्श छवि से इतर भी एक छवि रही है और वह थी एक स्वतन्त्र नारी की छवि, जिसे 'कन्या' कहा गया. यह नारी अपने कार्यों और निर्णयों के लिए और यहाँ तक कि यौन-संबंधों के लिए भी किसी एक पुरुष के अधीन नहीं थी. वह अपने निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतन्त्र थी. शास्त्रों में नहीं, अपितु लोक में उसे मान्यता प्राप्त थी. कुंती, द्रौपदी, देवयानी, उर्वशी और सूर्पनखा इसी श्रेणी में आती हैं. यह सभी लोग जानते हैं कि सूर्पनखा ने राम और लक्ष्मण से प्रणय-निवेदन किया था और इसी प्रकार देवयानी ने कच से और उर्वशी ने अर्जुन से प्रणय-निवेदन किया था. ये अलग बात है कि इन सभी को इस कार्य के लिए दंड भोगना पड़ा. क्योंकि तब भी पुरुषप्रधान समाज का एक वर्ग था जो कि स्त्रियों की इस विषय में स्वतंत्रता नहीं पसंद करता था. और भी उदाहरण हैं, विस्तार के भय से और नहीं लिख रही हूँ.

(3.)-- यह भी गलत तथ्य है कि औरतों की स्थिति में ह्रास अर्थात पर्दाप्रथा, सतीप्रथा, बालविवाह आदि मुस्लिमों के आक्रमण के बाद समाज में आये. घूँघट डालना संभ्रांत घरों की स्त्रियों में प्राचीनकाल से प्रचलित है और (उदाहरण- अभिज्ञान शाकुंतल का पाँचवाँ अंक, जब शकुंतला घूँघट डालकर दुष्यंत की सभा में जाती है और बाणभट्ट की कादम्बरी में चांडाल कन्या)  इसी प्रकार बालविवाह ( मनुस्मृति) और सती प्रथा (महाभारत) भी. मात्र जौहरप्रथा मुस्लिमकाल के बहुत बाद मुख्यतः राजपूतों में प्रचलित हुयी.

(4.)-- तत्कालीन विभेदकारी सामाजिक व्यवस्था को लेकर नारियों के एक वर्ग में असंतोष था, जो कि समय-समय पर बाहर आ जाता था, जैसा कि मैंने अपने इस लेख में लिखा है कि किस प्रकार प्राचीन भारत में भी नारी द्वारा सामाजिक विरोध के उदाहरण मिलते हैं.

इस प्रकार मेरे लिए नारीवाद ना सिर्फ एक आंदोलन है, एक विचारधारा है, बल्कि समाज को समझने का एक दृष्टिकोण और उपागम भी है. हमें इतिहास को अवश्य एक नए नज़रिए से देखना होगा और इसके लिए संस्कृत साहित्य को भी नए प्रकार से पढ़ना होगा, ताकि उन लोगों को जवाब दिया जा सके जो भारतीय संस्कृति में औरतों की सर्वोच्च स्थिति के विषय में एक-आध ग्रंथों से कुछ श्लोक उद्धृत करके यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि हमारे देश में इस प्रकार के आंदोलनों की कोई ज़रूरत नहीं है. सच तो यह है कि औरतों के लिए सरकारी स्तर पर, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा, एन.जी.ओज द्वारा और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किये जा रहे इतने प्रयासों के बावजूद उनका सशक्तीकरण इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि हमारे यहाँ के पुरुष अभी भी यह मानने को ही तैयार नहीं होते कि औरतों के साथ भेदभाव होता है और सदियों से होता आया है. हम आज भी अतीत की स्वर्णिम कल्पनाओं में डूबे हुए हैं और जाने कब उबर पायेंगे???
   

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

प्राचीन भारत में स्त्री

प्राचीन भारत में स्त्रियों की दशा के विषय में इतिहासकारों के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं. स्थूल रूप में इन ऐतिहासिक दृष्टिकोणों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -
  1. राष्ट्रवादी दृष्टिकोण
  2. वामपंथी दृष्टिकोण
  3. नारीवादी दृष्टिकोण
  4. दलित लेखकों का दृष्टिकोण
    जहाँ राष्ट्रवादी विचारक यह मानते हैं कि वैदिक-युग में भारत में नारी को उच्च-स्थिति प्राप्त थी. नारी की स्थिति में विभिन्न बाह्य कारणों से ह्रास हुआ. परिवर्तित परिस्थितियों के कारण ही नारी पर विभिन्न बन्धन लगा दिये गये जो कि उस युग में अपरिहार्य थे. इसी प्रकार वर्ण-व्यवस्था को भी कर्म पर आधारित और बाद के काल की अपेक्षा लचीला बताते हुये ये विचारक उसका बचाव करते हैं. वामपंथी विचारक राष्ट्रवादी विद्वानों के इन विचारों से सर्वथा असहमत हैं. उनके अनुसार स्त्रियों तथा शूद्रों की अधीन स्थिति तत्कालीन उच्च-वर्ग का षड्यंत्र है, जिससे वे वर्ग-संघर्ष को दबा सकें. उच्च-वर्ग अर्थात्मुख्यतः ब्राह्मण (क्योंकि समाज के लिये नियम बनाने का कार्य ब्राह्मणों का ही था) शूद्रों को अस्पृश्यता के नाम पर तथा नारियों को परिवारवाद के नाम पर संगठित नहीं होने देना चाहते थे.
    नारीवादी विचारक भी राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का विरोध करते हैं. उनके अनुसार तत्कालीन सामाजिक ढाँचा पितृसत्तात्मक था और धर्मगुरुओं ने जानबूझकर नारी की अधीनता की स्थिति को बनाये रखा. ये विचारक यह भी नहीं मानते कि वैदिक युग में स्त्रियों की बहुत अच्छी थी, हाँ स्मृतिकाल से अच्छी थी, इस बात पर सहमत हैं. दलित विचारक स्मृतियों और विषेशत मनुस्मृति के कटु आलोचक हैं. वे यह मानते हैं कि शूद्रों की युगों-युगों की दासता इन्हीं स्मृतियों के विविध प्रावधानों का परिणाम है. वे मनुस्मृति के प्रथम अध्याय के ३१वें[i] और ९१वें[ii] श्लोक का मुख्यतः विरोध करते हैं जिनमें क्रमशः शूद्रों की ब्रह्मा की जंघा से उत्पत्ति तथा सभी वर्णों की सेवा शूद्रों का कर्त्तव्य बताया गया है.
     प्राचीन भारत में नारी की स्थिति के विषय में सबसे अधिक विस्तार से वर्णन राष्ट्रवादी विचारक ए.एस. अल्टेकर ने अपनी पुस्तक में किया है. उन्होंने नारी की शिक्षा, विेवाह तथा विवाह-विच्छेद, गृहस्थ जीवन, विधवा की स्थिति, नारी का सार्वजनिक जीवन, धार्मिक जीवन, सम्पत्ति के अधिकार, नारी का पहनावा और रहन-सहन, नारी के प्रति सामान्य दृष्टिकोण आदि पर प्रकाश डाला है. अल्टेकर के अनुसार प्राचीन भारत में वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति समाज और परिवार में उच्च थी, परन्तु पश्चातवर्ती काल में कई कारणों से उसकी स्थिति में ह्रास होता गया. परिवार के भीतर नारी की स्थिति में अवनति का प्रमुख कारण अल्टेकर अनार्य स्त्रियों का प्रवेश मानते हैं. वे नारी को संपत्ति का अधिकार देने, नारी को शासन के पदों से दूर रखने, आर्यों द्वारा पुत्रोत्पत्ति की कामना करने आदि के पीछे के कारणों को जानने का प्रयास करते हैं तथा उन्होंने कई बातों का स्पष्टीकरण भी दिया है. उदाहरण के लिये उनके अनुसार महिलाओं को सम्पत्ति का अधिकार देने का कारण यह है कि उनमें लड़ाकू क्षमता का अभाव होता है, जो कि सम्पत्ति की रक्षा के लिये आवश्यक होता है. इस प्रकार अल्टेकर ने उन अनेक बातों में भारतीय संस्कृति का पक्ष लिया है, जिसके लिये हमारी संस्कृति की आलोचना की जाती है. उन्होंने अपनी पुस्तक के प्रथम संस्करण की भूमिका में स्वयं यह स्वीकार किया है कि निष्पक्ष रहने के प्रयासों के पश्चात्भी वे कहीं-कहीं प्राचीन संस्कृति के पक्ष में हो गये हैं. प्रसिद्ध राष्ट्रवादी इतिहासकार आर. सी. दत्त ने भी अल्तेकर के दृष्टिकोण का समर्थन किया है उनके अनुसार, "महिलाओं को पूरी तरह अलग-अलग रखना और उन पर पाबन्दियाँ लगाना हिन्दू परम्परा नहीं थी. मुसलमानों के आने तक यह बातें बिल्कुल अजनबी थीं... . महिलाओं को ऐसी श्रेष्ठ स्थिति हिन्दुओं के अलावा और किसी प्राचीन राष्ट्र में नहीं दी गयी थी."[iii] शकुन्तला राव शास्त्री ने अपनी पुस्तकवूमेन इन सेक्रेड लॉज़में इसी प्रकार के निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं.
     आधुनिक काल के प्रमुख नारीवादी इतिहासकारों तथा विचारकों ने अल्टेकर और शास्त्री के उपर्युक्त स्पष्टीकरणों की आलोचना की है. आर.सी. दत्त के विरोध में प्रसिद्ध नारीवादी विचारक डा. उमा चक्रवर्ती कहती हैं, "... ... मनु तथा अन्य कानून-निर्माताओं ने लड़कियों की कम उम्र में ही शादी की हिमायत की थी. सातवीं सदी में हर्षवर्धन के प्राम्भिक काल से संबंधित विवरणों में सती-प्रथा उच्च जति की महिलाओं के साथ साफ़ जुड़ी देखी जा सकती है. महिलाओं का अधीनीकरण सुनिश्चित करने वाली संस्थाओं का ढाँचा अपने मूलरूप में मुस्लिम धर्म के उदय से भी काफ़ी पहले अस्तित्व में चुका था. इस्लाम के अनुयायियों का आना तो इन तमाम उत्पीड़क कुरीतियों को वैधता देने के लिये एक आसान बहाना भर है."[iv]
    नारीवादी विचारकों ने यह माना है कि प्राचीन भारत में नारी की स्थिति में ह्रास का कारण हिन्दू समाज की पितृसत्तात्मक संरचना थी कि कोई बाहरी कारण. इसके लिये नारीवादी विचारक प्रमुख दोष स्मृतियों के नारी-सम्बन्धी नकारात्मक प्रावधानों को देते हैं, क्योंकि तत्कालीन समाज में स्मृतिग्रन्थ सामाजिक आचारसंहिता के रूप में मान्य थे और उनमें लिखी बातों का जनजीवन पर व्यापक प्रभाव था. प्रमुख स्मृतियों में नारी-शिक्षा पर रोक, उनका कम उम्र में विवाह करने सम्बन्धी प्रावधान, उनको सम्पत्ति में समान अधिकार देना आदि प्रावधानों के कारण समाज में स्त्रियों की स्थिति में अवनति होती गयी. नारीवादी विचारकों के अनुसार हमें अपनी कमियों का स्पष्टीकरण देने के स्थान पर उनको स्वीकार करना चाहिये ताकि वर्तमान में नारी की दशा में सुधार लाने के उपाय ढूँढे़ जा सकें.


सन्दर्भ :
[i]  “लोकानां तु विवृद्धि अर्थं मुख- बाहु- ऊरु- पादतः
   ब्राह्मणं  क्षत्रिय  वैश्यं  शूद्रं        निरवर्तयत्‌“ /३१ मनुस्मृति.
[ii]  “एकम्एव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्
  एतेषाम्एव वर्णानां  शुश्रूषाम्‌   अनुसूयया/९१ मनुस्मृति.
[iii] पृष्ठ संख्या २३, द सिविलाइजेशन ऑफ इण्डिया, आर.सी. दत्त, प्रकाशक-रूपा कंपनी, नई दिल्ली, २००२.
[iv] पृष्ठ संख्या १२९, अल्टेकेरियन अवधारणा के परे : प्रारंभिक भारतीय इतिहास में जेंडर संबंधों का नई समझ, उमा चक्रवर्ती, नारीवादी राजनीति, संघर्ष एवं मुद्दे, साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, २००१.

शुक्रवार, 18 जून 2010

लिंग समानता बनाम नारी-सशक्तीकरण

    ये पोस्ट मेरे शोध कार्य का अंश है. मैं इस विषय पर शोध कर रही हूँ कि किस प्रकार हमारे धर्मशास्त्रों ने नारी-सशक्तीकरण पर प्रभाव डाला है? क्या ये प्रभाव मात्र नकारात्मक है अथवा सकारात्मक भी है? जहाँ एक ओर हम मनुस्मृति के "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते" वाला श्लोक उद्धृत करके ये बताने का प्रयास करते हैं कि हमारे देश में प्राचीनकाल में नारी की पूजा की जाती थी, वहीं कई दूसरे ऐसे श्लोक हैं (न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति आदि) जिन्हें नारी के विरुद्ध उद्धृत किया जाता है और ये माना जाता है कि इस तरह के श्लोकों ने पुरुषों को बढ़ावा दिया कि वे औरतों को अपने अधीन बनाए रखने को मान्य ठहरा सकें. मेरे शोध का उद्देश्य यह पता लगाना है कि इन धर्मशास्त्रीय प्रावधानों का नारी की स्थिति पर किस प्रकार का प्रभाव अधिक पड़ा है.
    आज से कुछ दशक पहले हमारा समाज इन धर्मशास्त्रों से बहुत अधिक प्रभावित था. अनपढ़ व्यक्ति भी "अरे हमारे वेद-पुराण में लिखा है" कहकर अपनी बात सिद्ध करने का प्रयास करते थे, चाहे उन्होंने कभी उनकी सूरत तक न देखी हो. आज स्थिति उससे बहुत भिन्न है, कम से कम प्रबुद्ध और पढ़ा-लिखा वर्ग तो सदियों पहले लिखे इन ग्रंथों की बात नहीं ही करता है. पर फिर भी कुछ लोग हैं, जो आज भी औरतों के सशक्तीकरण की दिशा इन शास्त्रों के आधार पर तय करना चाहते हैं... अथवा अनेक उद्धरण देकर यह सिद्ध करना चाहते हैं कि 'हमारा धर्म अधिक श्रेष्ठ है' और 'हमारे धर्म में तो औरतें कभी निचले दर्जे पर समझी ही नहीं गयी' और मजे की बात यह कि यही लोग अपने घर की औरतों को घर में रखने के लिए भी शास्त्रों से उदाहरण खोज लाते हैं. यानी  चित भी मेरी पट भी मेरी. 
    मेरा कार्य इससे थोड़ा अलग हटकर है. मैं इन शास्त्रों द्वारा न ये सिद्ध करने की कोशिश कर रही हूँ कि प्राचीन भारत में नारी की स्थिति सर्वोच्च थी और उसके साथ कोई भेदभाव होता ही नहीं था (क्योंकि ये सच नहीं है गार्गी-याज्ञवल्क्य संवाद इसका उदाहरण है) और न ये सिद्ध करने की कोशिश कर रही हूँ कि नारी की वर्तमान स्थिति के लिए पूरी तरह शास्त्र उत्तरदायी हैं... मैं यह जानने का प्रयास कर रही हूँ कि धर्मशास्त्रों के प्रावधान वर्तमान में हमारे समाज में कहाँ तक प्रवेश कर पाए हैं और पुनर्जागरण काल से लेकर आज तक नारी-सशक्तीकरण पर कितना और किस प्रकार का प्रभाव डाल पाए हैं? 
    वस्तुतः धर्मशास्त्रीय प्रावधानों ने नारी की स्थिति मुख्यतः उसके सशक्तीकरण की प्रक्रिया पर क्या प्रभाव डाला है... इसे जानने से पूर्व सशक्तीकरण को जानना आवश्यक है. सशक्तीकरण को अलग-अलग विद्वानों ने भिन्न-भिन्न रूप में परिभाषित किया है. कैम्ब्रिज शब्दकोष इसे प्राधिकृत करने के रूप में परिभाषित करता है. लोगों के सम्बन्ध में इसका अर्हत होता है उनका अपने जीवन पर नियंत्रण. सशक्तीकरण की बात समाज के कमजोर वर्ग के विषय में की जाती है, जिनमें गरीब, महिलायें, समाज के अन्य दलित और पिछड़े वर्ग के लोग सम्मिलित हैं. औरतों को सशक्त बनाने का अर्थ है 'संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना और उसे बनाए रखना ताकि वे अपने जीवन के विषय में निर्णय ले सकें या दूसरों द्वारा स्वयं के विषय में लिए गए निर्णयों को प्रभावित कर सकें.'  एक व्यक्ति सशक्त तभी कहा जा सकता है, जब उसका समाज के एक बड़े हिस्से के संसाधन शक्ति पर स्वामित्व होता है. वह संसाधन कई रूपों में हो सकता है जैसे- निजी संपत्ति, शिक्षा, सूचना, ज्ञान, सामाजिक प्रतिष्ठा, पद, नेतृत्व तथा प्रभाव आदि. स्वाभाविक है कि जो अशक्त है उसे ही सशक्त करने की आवश्यकता है और यह एक तथ्य है कि हमारे समाज में औरतें अब भी बहुत पिछड़ी हैं... ये बात हमारे नीति-निर्माताओं, प्रबुद्ध विचारकों, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों के द्वारा मान ली गयी है.  कुछ लोग चाहे जितना कहें कि औरतें अब तो काफी सशक्त हो गयी हैं या फिर यदि औरतें सताई जाती हैं तो पुरुष भी तो कहीं-कहीं शोषित हैं. 
    विभिन्न विचारकों द्वारा ये मान लिया गया है कि भारत में औरतों की दशा अभी बहुत पिछड़ी है... इसीलिये विगत कुछ दशकों से प्रत्येक स्तर पर नारी-सशक्तीकरण के प्रयास किये जा रहे हैं. इन प्रयासों के असफल होने या अपने लक्ष्य को न प्राप्त कर पाने का बहुत बड़ा कारण अशिक्षा है, परन्तु उससे भी बड़ा कारण समाज की पिछड़ी मानसिकता है. जब हम आज भी इस बात को स्वीकार नहीं कर पाए हैं कि हमारे समाज में लैंगिक भेदभाव है, तो उसे दूर करने और नारी को सशक्त बनाने की बात ही कहाँ उठती है? हम अब भी नारी के साथ हो रही हिंसा के लिए सामाजिक संरचना को दोष न देकर व्यक्ति की मानसिक कुवृत्तियों को दोषी ठहराने लगते हैं...हम में से अब भी कुछ लोग औरतों को पिछड़ा नहीं मानते बल्कि कुछ गिनी-चनी औरतों का उदाहरण देकर ये सिद्ध करने लगते हैं कि औरतें कहाँ से कहाँ पहुँच रही हैं...?
   हाँ, कुछ औरतें पहुँच गयी हैं अपने गंतव्य तक संघर्ष करते-करते, पर अब भी हमारे देश की अधिकांश महिलायें आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से भी पिछड़ी हैं. उन्हें आगे लाने की ज़रूरत है.

मंगलवार, 30 मार्च 2010

छेड़छाड़ की समस्या : समाधान के कुछ सुझाव (2.)

हम प्रायः इस ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि हमारे घर-परिवार के पुरुष सदस्य छेड़छाड़ कर ही नहीं सकते और जब ऐसा हो जाता है, तो हम या फिर आश्चर्य करते हैं या उनके अपराध को छिपाने की कोशिश. ऐसा बहुत से केसों में देखने को मिला है कि अपराधी के घर वाले उल्टा पीड़ित पर ही आरोप लगाने लगते हैं.

अभी कुछ दिनों पहले का चर्चित केस है. पूर्वी यू.पी. के एक लड़के ने गोवा में एक नौवर्षीय रूसी लड़की के साथ यौन-दुर्व्यवहार किया. जब पुलिस लड़के के घर पूछताछ करने पहुँची, तो उसके घर वाले आश्चर्य में पड़ गये. उसकी बूढ़ी माँ ने कहा,"पता नहीं ऐसा कैसे हुआ? लड़का तो ऐसा नहीं था. हमने तो देखा नहीं. पता नहीं सच क्या है?" अब इसमें ग़लती इस माँ की नहीं है. उसने तो अपने बेटे को ये सब सिखाया नहीं.

कोई भी अपने बेटों को ग़लत शिक्षा नहीं देता, पर अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाये, तो ऐसी दुर्घटना से बचा जा सकता है. मेरा ये कहना बिल्कुल नहीं है कि हम अपने घर के पुरुष सदस्यों को शक की निगाह से देखें और उनकी हर गतिविधि पर नज़र रखें. ऐसा करना न व्यावहारिक होगा और न ही उचित. और परिवार की शान्ति भंग होगी सो अलग से. पर विशेषकर किशोरावस्था के लड़कों के पालन-पोषण में सावधानी बहुत ज़रूरी है. मैं अपने अनुभवों और अध्ययन के आधार पर कुछ सुझाव दे रही हूँ, शेष...जो भी लोग इस मुद्दे को लेकर संवेदनशील हैं और कुछ सुझाव देना चाहते हैं, वे दे सकते हैं---
---अपने बेटों को बचपन से ही नारी का सम्मान करना सिखायें, इसलिये नहीं कि वह नारी होने के कारण पूज्य है, बल्कि इसलिये कि वह एक इन्सान है और उसे पूरी गरिमा के साथ जीने का हक़ है.
---उन्हें यह बतायें कि उनकी बहन का भी परिवार में वही स्थान है, जो उनका है, न उससे ऊँचा और न नीचा.
---उसे अपनी बहन का बॉडीगार्ड न बनायें. ऐसा करने पर लड़के अपने को श्रेष्ठतर समझने लगते हैं.
---अपने किशोरवय बेटे की गतिविधियों पर ध्यान दें, परन्तु अनावश्यक टोकाटाकी न करें.
---उन्हें उनकी महिलामित्रों को लेकर कभी भी चिढ़ायें नहीं, एक स्वस्थ मित्रता का अधिकार सभी को है.
---किशोरावस्था के लड़कों को यौनशिक्षा देना बहुत ज़रूरी है. मेरे ख्याल से परिवार इसके लिये बेहतर जगह होती है. यह कार्य उनके बड़े भाई या पिता कर सकते हैं. इसके लिये घर का माहौल कम से कम इतना खुला होना चाहिये कि लड़का अपनी समस्याएँ पिता को बता सके. ( यहाँ मैं यौनशिक्षा पर विचार उतने विस्तार से नहीं रख रही क्योंकि इस विषय में मैं खुशदीप भाई की पोस्ट से शत-प्रतिशत सहमत हूँ)

छेड़छाड़ की समस्या के कारणों और समाधान के पड़ताल की यह समापन किस्त है. मैं दिनोदिन औरतों के साथ बढ़ रहे यौन शोषण और बलात्कार के मामलों से बहुत चिन्तित हूँ. मुझे ये नहीं लगता कि ये सब कुछलोगों की कुत्सित मानसिकता या औरतों के पहनावे का परिणाम है. इस तरह के विश्लेषण ऐसी गम्भीर समस्या को उथला और समाधान को असंभव बना देते हैं. यौन शोषण की समस्या की जड़ें हमारी सामाजिक संरचना में कहीं गहरे निहित हैं. वर्तमान काल की परिवर्तित होती परिस्थितियाँ, सांस्कृतिक संक्रमण, विभिन्न वर्गों के बीच बढ़ता अन्तराल आदि इस समस्या को और जटिल बना देते हैं. इस समस्या के कारण और समाधान खोजने के लिये समाज में एक लम्बी बहस चलाने की आवश्यकता है.

शनिवार, 20 मार्च 2010

भारत में नारीवाद की क्या आवश्यकता है???



मैं छेड़छाड़ की समस्या पर एक श्रृँखला लिख रही थी, जिसकी समापन किस्त तैयार करके रखी है. बस टाइप करनी है. पर इसी बीच मेरे एक मित्र ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक है-"Do We Need Feminism At All?" मैं अपने इस लेख के माध्यम से उसका उत्तर देने का प्रयास कर रही हूँ.यद्यपि अपने एक लेख में मैं पहले भी लिख चुकी हूँ कि जब हम यह कहते हैं कि नारीवाद की भारत में क्या ज़रूरत है? तो यह मानकर चलते हैं कि यह एक पश्चिम की अवधारणा है, जबकि ऐसा नहीं है. इसके उद्धरण में मैंने कुछ प्राचीन साहित्य और स्मृतियों के अंश दिये थे. 
     इस बात का उत्तर कि भारत में नारीवाद की क्या ज़रूरत है, एक वाक्य में दूँ तो यह होगा कि " नारीवाद नारी की उन परिस्थितियों को बदलने की बात करता है, जिनके कारण उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता और उन्हें वे अधिकार नहीं मिल पाते, जो पुरुषों को प्राप्त हैं. नारीवाद नारी को बदलने की बात नहीं करता." भारत में नारीवाद की उपयोगिता पर प्रश्न लगाने वाले तर्क देते हैं कि भारतीय नारी तो नारीत्व का, ममता का, करुणा का मूर्तिमान रूप है और पश्चिम की नारीवादी महिलाएँ उसे भी अपनी तरह भ्रष्ट कर डालना चाहती हैं. मैं यह कहती हूँ कि दुनिया सिर्फ़ भारत और अमेरिका या यूरोप ही नहीं है, एशिया, दक्षिण अमेरिका, अफ़्रीका के भी देशों में नारी आज अपनी परिस्थितियों को बदलने की माँग कर रही है और वह भी बिना अपनी संस्कृति को छोड़े. मुस्लिम देशों में औरतें बुर्क़े के साथ पढ़ना-लिखना और बाहर का काम करना चाहती हैं. इस्लाम में नारी की स्थिति पर  शीबा असलम फ़हमी अपने एक लेख में लिखती हैं, " तसलीमा ही नहीं आज विश्वभर में मुसलमान औरतें अपने-अपने समाजों में व्याप्त लिंग भेद पर सवाल खड़े कर रही हैं लेकिन इस्लाम पर हमला बोल कर नहीं। उनके यहां धर्म और समाज का फर्क साफ है। वह इस्लाम में रह कर इस्लामी न्यायप्रियता, बराबरी और आजादी के दर्शन से अपने लिए रास्ता निकाल रही हैं। वह मुसलमान मर्दों से ज्‍यादा स्पष्‍ट हैं इन मुद्दों को लेकर." आज बुर्क़ा हटाने का प्रश्न नहीं है. प्रश्न यह है कि औरत किस पहनावे में अपने आप को सुरक्षित और सहज पाती है. हम अपने देश में साड़ी की तारीफ़ करते नहीं थकते और मुस्लिम औरतों के पर्दे को बुरा-भला कहते हैं, बिना यह जाने कि औरत क्या चाहती है? साड़ी ठीक से पहनी जाये तो शालीन पहनावा है, नहीं तो आजकल की हिरोइनों के लिये वह सबसे सेक्सी ड्रेस है. बस फ़र्क इतना है कि उसे कौन किस उद्देश्य से पहनना चाहता है. पर्दा अगर ज़बर्दस्ती करवाया जाये तो ग़लत है, पर यदि औरत अपनी मर्ज़ी से पर्दा करना चाहती है, तो ये उस पर छोड़ देना चाहिये. बस परिस्थितियाँ ऐसी होनी चाहिये कि चयन का अधिकार औरत का हो और वह बिना किसी दबाव के अपना निर्णय खुद ले सके. 
     ठीक इसी तरह भारत में अगर नारी अपने नारीसुलभ गुण बनाये रखना चाहती है (जैसा कि अधिकतर औरत वास्तव में चाहती है) तो इस बात से उसे नारीवाद रोक नहीं रहा है, और न रोक सकता है. बात सिर्फ़ इतनी है कि उस पर ये गुण थोपे न जायें. ऐसा न कर दिया जाये कि उसे ज़बर्दस्ती शर्माना पड़े, चाहे शर्म आये या न आये. नारीवाद औरतों की निर्णय लेने और चयन की स्वतन्त्रता की बात करता है, न कि सभी औरतों को अपने स्वाभाविक गुण छोड़ देने की, चाहे वे नारीसुलभ गुण हों या कोई और. 
     नारीवाद का मुख्य उद्देश्य है नारी की समस्याओं को दूर करना. आज हमारे समाज में भ्रूण-हत्या, लड़का-लड़की में भेद, दहेज, यौन शोषण, बलात्कार आदि ऐसी कई समस्याएँ हैं, जिनके लिये एक संगठित विचारधारा की ज़रूरत है. जिसके लिये आज लगभग हर शोध-संस्था में वूमेन-स्टडीज़ की शाखा खोली गयी है. नारी-सशक्तीकरण, वूमेन स्टडीज़, स्त्रीविमर्श इन सब के मूल में नारीवाद ही है. नारी सशक्तीकरण और नारी सम्बन्धी शोध में हम नारी के सामाजिक विकास के लिये रणनीतियाँ बनाने के विषय में पढ़ते हैं और नारीवाद इन सभी समस्याओं की जड़ों की पहचान कराता है. इसलिये आज भारत में नारीवाद की सख्त ज़रूरत है. भारतीय नारीवाद, जो कि भारत में नारी की विशेष परिस्थितियों के मद्देनज़र एक सही और संतुलित सोच तैयार करे ताकि नारी-सशक्तीकरण के कार्य में सहायता मिले.